बिहार लोकसेवा आयोग के सदस्य और महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. अरुण कुमार भगत ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र द्वारा वरिष्ठ साहित्यकार, राष्ट्र-चिंतक एवं काव्य-पुरुष डॉ. देवेन्द्र दीपक के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर आयोजित राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी में वक्तव्य देते हुए कहा कि ‘डॉ. देवेंद्र दीपक के साहित्य में सूक्तियों की भरमार है। इन सूक्तियों में जीवन-दर्शन छिपा हुआ है। इनपर बड़े स्तर पर शोध होना चाहिए। उनकी रचना या लेखन में सांस्कृतिक और सामाजिक उन्मेष के साथ-साथ सामाजिक समरसता है।’ उन्होंने कहा कि समाज को ‘पानी से नहाया हुआ व्यक्ति स्वच्छ होता है और पसीने से नहाया व्यक्ति पवित्र होता है।’ और ‘अपनी कलम से खाई नहीं कुआँ खोदो, ताकि लोगों की प्यास बुझे।’ जैसे विचार देनेवाले डॉ. दीपक निश्चित ही काव्य-पुरुष हैं। प्रो. भगत ने कहा कि आपातकाल के दौरान शासकीय सेवा की दहशत की सींखचों में घिरे होने के बावजूद कलम की धार कम नहीं होने दी। उन्होंने अपनी रचना के आईने में लोकतंत्र के दमन को उकेरा। आपातकाल पर लिखनेवालों में वह अग्रणी रहे।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में वरिष्ठ पत्रकार और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष रामबहादुर राय ने इस अवसर पर कहा कि देवेंद्र दीपक जी के साथ समाज ने न्याय नहीं किया है। देवेंद्र दीपक जी का रचना-संसार वैदिक संस्कृति और इतिहास का प्रतिनिधित्व करता है। यह अपने आपमें बहुत बड़ी बात है। इसलिए हमारा दायित्व है कि उसे सामने लाएँ। यह कार्योत्सव एक साहित्योत्सव है।
इससे पहले स्वागत-वक्तव्य देते हुए इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य-सचिव एवं वरिष्ठ शिक्षाविद् प्रो. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि यह बहुत सौभाग्य की बात है कि 90वीं जयंती मनाने का सौभाग्य मिल रहा है। उन्होंने हमें अपनी रचनात्मकता से प्रभावित किया है। वे हमेशा धारा के विपरीत खड़े रहे हैं। युवाओं में वे वरिष्ठों की तुलना में काफी लोकप्रिय रहे हैं। वे हमेशा अपने आपको बेहतर करने के लिए प्रतिबद्ध रहे हैं। वे मेरे जैसे छोटे और नौजवान को भी बिठाकर सीखाते थे। वे मेरे जीवन के आले में सुरक्षित पल हैं।
कार्यक्रम के वक्ता और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर डॉ. अशोक कुमार ज्योति ने कहा कि डॉ. दीपक एक ऐसे वृक्ष हैं, जिनकी काव्य, गद्य, शासकीय और शिक्षकीय गुण शाखाएँ हैं। उनके शिक्षकीय गुण का जितना बखान किया जाए, कम है। उन्होंने अपनी रचना ‘मास्टर धरमदास’ के जरिए एक शिक्षक की पीड़ा और छात्र के प्रति उसके स्नेह को बताया है। उन्होंने कहा कि डॉ. दीपक वर्तमान और आनेवाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा के सागर हैं।
मुख्य वक्ता वरिष्ठ साहित्यकार एवं केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के पूर्व निदेशक प्रो. नंदकिशोर पांडेय ने कहा कि समकालीन कवियों में देवेंद्र दीपक शामिल हैं। वे चर्चा से स्वयं को आगे बढ़ानेवाले नहीं हैं। जिन विषयों पर कवि माखनलाल चतुर्वेदी ने लिखा, खंडवा में बूचड़खाने खुलने के खिलाफ लगातार लिखा, उसी मध्यप्रदेश की धरती से देवेंद्र दीपक ने ‘गौ उवाच’ लिखा। उनका पूरा-का-पूरा रचना-संसार पढ़ा जाना चाहिए। उनकी कविता ध्वंस पर ध्वंस करती है। उपासना करती है। उन्होंने गद्य और पद्य लेखन को एक भारतीय दृष्टि दी है।
हिंदुस्तानी एकेडमी, प्रयागराज के अध्यक्ष प्रो. उदय प्रताप सिंह ने बतौर मुख्य वक्ता कहा कि यदि रचना रचनाकार में परिवर्तन लाती है तो वह सही मायने में रचना है। सरकारी नौकरी करते हुए उन्होंने आदिवासियों की आवाज को पद्य के जरिए सामने रखा है।
बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ, उत्तर प्रदेश के कुलाधिपति डॉ. प्रकाश सी. बरतूनिया ने कहा कि हमने उनकी कथनी और करनी में कभी अंतर नहीं देखा। उनकी कई काव्य-प्रस्तुतियाँ भी देखने को मिला है। उन्होंने सद्भावना के लिए काफी काम किया है। उन्होंने अस्पृश्यता पर काफी लिखा है। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज के हाशिए पर रह रहे लोगों में आत्मविश्वास को बढ़ावा दिया है।
इस सत्र का संचालन दिल्ली विश्वविद्यालय की अध्यापिका डॉ. सारिका कालरा ने किया।
संगोष्ठी का दूसरा सत्र डॉ. देवेंद्र दीपक के गद्य-साहित्य पर केंद्रित रहा। इस सत्र में साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश के निदेशक डॉ. विकास दवे ने बतौर विशिष्ट वक्ता कहा कि जो देवेंद्र दीपक जी ने कहा, वह किया। उन्होंने बाल-विमर्श करते हुए परिवार-विमर्श भी किया। उन्होंने अपनी भाषा के विमर्श पर बहुत काम किया है। वे परिवर्तन को लेकर, सुधार को लेकर काफी काम किया है। उन्होंने हमेशा सिंहासन को चुनौती देने का कार्य किया है।
इस अवसर पर मुंबई विश्वविद्यालय के हिंदी-विभाग के प्राध्यापक डॉ. मृगेंद्र राय ने अपने व्याख्यान में कहा कि उनके साहित्य का अध्ययन करते हुए मैंने महसूस किया कि उन्होंने खुद को तपाया है। उनमें निरंतर पढ़ते रहने की लालसा है। यह संस्कार आज के समाज में पैदा करने की आवश्यकता है।
इस सत्र में श्रीमती विनय राजाराम ने बताया कि किस प्रकार डॉ. देवेंद्र दीपक का साहित्य सांस्कृतिक एवं पौराणिक लेखन में पाठकों को बाँधकर रखने की क्षमता है।
इस अवसर पर अपने उद्बोधन में डा. देवेंद्र दीपक ने कहा कि मैंने कभी ‘इस’ या ‘उस’ के लिए रचना नहीं लिखी। मेरा ध्यान उपेक्षित और अलक्षित समाज पर रहा।
द्वितीय सत्र की अध्यक्षता दिल्ली विश्वविद्यालय की अध्यापिका प्रो. कुमुद शर्मा ने की। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि देवेंद्र दीपक जी अपनी आस्थाओं, मूल्यों और संस्कृति के प्रति बहुत ही प्रतिबद्ध रहे हैं, जो उनकी साहित्य-यात्रा में परिलक्षित होता है।
इस सत्र का संचालन संजीव सिन्हा ने किया। धन्यवाद ज्ञापन डा. अशोक कुमार ज्योति ने किया।
न जाने कितने ही भारत माँ के वीर सपूतों ने हमारे देश भारत को आजाद कराने के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया है।तब जाकर हमारा देश अंग्रेजी दासता से मुक्त हुआ और आज हम खुली हवा में सांस ले रहे हैं। 17 जुलाई को पूर्वोत्तर भारत के मेघालय राज्य के एक वीर सपूत उ तिरोत सिंह जो खासी जनजाति से आते हैं अंग्रेजी दासता को ठुकराकर 33 वर्ष की अल्पायु में अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था।
अविभाजित असम (मेघालय व असम के विभाजन के पूर्व) के भूतपूर्व महामहिम राज्यपाल श्री जयरामदास दौलतराम ने 15 दिसम्बर 1952 को मयरांग में उ (खासी भाषा में नाम के आगे सम्मानपूर्वक उ लगाते हैं) तिरोत सिंह के स्मारक का आधारशिला रखते हुए कहा था कि उ तिरोत सिंह एक बहुत हीं कुशल व महान राजा थे और अन्ततः स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया। मैं आशा करता हूँ कि उनके नाम को भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास में उचित स्थान मिलेगा। उ तिरोत सिंह नंग्ख्लाऊ के राज्य के राजा थे जो खासी पहाड़ में स्थित है।नंग्ख्लाऊराज्य का गौरवशाली इतिहास उ शाजेर और उ सेनट्यू के समय से हीं था। उन्होंने नंग्ख्लाऊ राज्य पर शासन बहुत हीं उत्कृष्टता एवं बुद्धिमत्ता से किया। यह उनके राज्य कुशलता व योग्यता का हीं प्रमाण था कि उनका साम्राज्य गुवाहाटी के पास बोरदुआर से लेकर आज के बांग्लादेश के सिल्हट तक था। यह काल था सोलहवीं शताब्दी के आधा बीत जाने के बाद का काल। उ तिरोत सिंह को विरासत में अपने पूर्वजों से कुछ विशिष्ट गुण प्राप्त हुए थे। उन्होंने अंग्रेजों से अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए अदम्य साहस व स्वाभिमान का परिचय देते हुए मृत्यु को गले लगा लिया लेकिन कभी भी अंग्रेजी आधिपत्य के सामने सर नही झुकाया।
अपने मामा उ हेन सिंह के मृत्यु के पश्चात उ तिरोत सिंह नानखलाऊ राज्य के उत्तराधिकारी नियुक्त हुए। खासी जनजाति मातृ प्रधान समाज होने के कारण राजा के छोटी बहन का पुत्र यानी भांजा हीं राजा होता हैं। बाध्यकारी नियम, कानून एवं परंपरा जो उस भू-भाग पर लागू होते थे उसके कारण उनकी पकड़ को राज्य पर मजबूत करता था। खासी रीति के अनुसार राज्य की सुरक्षा के लिए एक मुखिया की आवश्यकता थी। उ तिरोत सिंह को नानखलाऊ राज्य का मुखिया यानी राजा मात्र 12 वर्ष की अल्पायु में 1814 ई० में घोषित किया गया। उनकी सरकार का संचालन उ तिरोत सिंह की माँ कसान सियम किया करती थी। प्रशासनिक कार्य और वहाँ की संसद जिसे दरबार हीमा कहा जाता है उसका संचालन कैबिनेट जो कि अनेक मंत्रियों का समूह हुआ करता था उसके माध्यम से होता था।
उस जमाने में भी खासी राज्य का संविधान पूरी तरह से लोकतांत्रिक था। ब्रिटिश आने से पूर्व खासी पहाड़ में कुल 30 राज्य थे। इन राज्यों के राजा स्वायत व बहुत हीं अधिक शक्तिशाली थे। सभी के पास उनके स्वयं के मंत्रिमंडल थे जिनकी अनुमति के बगैर कोई भी व्यापार नही हो सकता था। खासी राज्य में वस्तुतः ऐसी एक लोकतांत्रिक व्यवस्था थी जिसमें कोई भी ऊँचा नीचा नही था,अपितु सभी का बराबरी का सहभाग था। अगर कभी विवाद या उत्तराधिकारी को लेकर प्रश्न भी खड़ा होता था तो उस विषय की चर्चा सदन में होती थी,जहाँ सभी को अपना मत प्रकट करने व वोट देने का अधिकार था। अंग्रेज अधिकारी डेविड स्कोट के सहायक कैप्टन वाइट एक बार ऐसे ही मौके पर दरबार में उपस्थित थे। वे दो दिनों तक चली एक चर्चा की व्यवस्था, शालीनता व शिष्टाचार देखकर वो आश्चर्यचकित हो गए।
अंग्रेजी शासन को यह महसूस होने लगा कि अगर ब्रह्मपुत्र वैली से आगे हमें राज्य विस्तार करना है तो असम वैली से सुरमा वैली (सिल्हट) तक सीधा रास्ता तैयार करना होगा। इसके लिए 1827 में डेविड स्काउट ने नानखलाऊ के राजा उ तिरोत सिंह से संपर्क किया व संधि किया जो कि दोनों राज्यों के बीच से नानखलाऊ से होकर सड़क निर्माण कि अनुमति देता है। अंग्रेजों की चाल भोले भाले खासी समझ नही पाए।
उ तिरोत सिंह को थोड़े ही समय में समझ आ गया कि अंग्रेजों की संधि ऑगलाल टेटन सिओक्स के प्रमुख रेड क्लाउड के कथन के अनुसार है जिन्होंने कहा था कि “उन्होंने हमसे बहुत सारे वादे किए। इतने सारे वादे कि हम उतने याद भी नही रख सकते। पर सिर्फ उन्होंने एक ही वादा निभाया जो उन्होंने हमारी जमीन लेने का किया था। अन्ततः उन्होंने हमारी जमीन ले ली।” अप्रैल 1829 यानी संधि के दो वर्ष के भी पहले नानखलाऊ राज दरबार ने निर्णय लिया कि धोखेबाज अंग्रेज एवं उनके समर्थकों को यहाँ से खदेड़ा जाय एवं संधि को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाय। यह निर्णय अंग्रेज अधिकारियों के बदले रवैये, उनका नानखलाऊ राज्य कि शासक कि तरह व्यवहार एवं खासी जनता पर शोषण व अत्याचार के कारण लंबी चर्चा के बाद लिया गया। जनता पर अत्याचार की खबरें लगातार सिल्हट व गुवाहाटी से भी प्राप्त हो रहीं थी।
अंग्रेजों से संधि टूटने के बाद अपरिहार्य संघर्ष के लिए मंच सज चुका था क्योंकि दोनों पक्ष समझौते के लिए तैयार नही थे। युद्ध की घोषणा हो गयी थी व अन्य खासी राज्य ने भी युद्धनाद कर दिया था। तीर धनुष से सुसज्जित खासी जनजाति ने सबसे पहले एक ब्रिटिश सैन्य दुर्ग पर हमला किया जिसकी सुरक्षा बंगाल फौज के लेफ्टिनेंट बेफिंगफील्ड और लेफ्टिनेंट बुरीटोन कर रहे थे। अंग्रेजों के ऊपर हुए अचानक हमले से उनका काफी नुकसान हुआ, जिसमें बहुत ही बड़े बड़े अधिकारी मारे गए। अंग्रेजों ने इसे नानखलाऊ हत्याकांड नाम दिया। स्वाभाविक रूप से ब्रिटिश ने इसकी जबाबी कार्यवाही की। 44 वी असम लाइट इन्फेंट्री जिसका नेतृत्व कैप्टन लिस्टर कर रहे थे एवं 43 वीं असम लाइट इन्फेंट्री जिसका नेतृत्व नेतृत्व लेफ्टिनेंट वेच कर रहे थे उन्हें खासी पहाड़ पर हमले के लिए आदेश दिया गया। खासी राज्य के लोग संख्या व अस्त्र-शस्त्र के मामले में अंग्रेजों से कम थे,परंतु कभी भी सिपाहियों का साहस व उत्साह उ तिरोत सिंह ने कम नही होने दिया।
उ मोन भुट्ट, उ लूरशाई जारेन और उ खेन खारखंगोर उ तिरोत सिंह के कुछ खास सिपहसलार थे, जो उनके कुशल नेतृत्व में अंग्रेजी सेना से लोहा ले रहे थे। यह युद्ध चार वर्षों तक लंबा चला और खासी सिपाहियों के निरंतर संघर्ष के कारण खासी पहाड़ अंग्रेजी आधिपत्य से अप्रभावित रहा। खासी पहाड़ पर शिकंजा कसने के लिए अंग्रेजों द्वारा आर्थिक नाकेबंदी की गई। जिसके कारण अन्न का आयात निर्यात थम सा गया। किन्तु इसके बावजूद खासी सिपाहियों के हौसले बुलंद थे। यहाँ तक कि का फान नोंगलेट जो महिला सैन्य टुकड़ी का नेतृत्व कर रही थी उन्होंने अपने साथियो के साथ अनेक ब्रिटिश सिपाहियों को मार गिराया। उ तिरोत सिंह बहुत हीं तेजी से जब भी मौका मिलता तो अंग्रेजों को अपने गृह पहाड़ियों पर छापामार युद्ध से दांत खट्टे करते रहते।
आर्थिक प्रतिबंध का दुष्प्रभाव खासी राज्य पर पड़ने लगा था और यह युद्ध का एक नया मोड़ साबित हुआ। इस मौके का फायदा अंग्रेजों ने तोलमोल व धमकाने के लिए उठाया। डेविड स्कोट के परवर्ती आये अधिकारी ओबर्स्टन ने गोआलपाड़ा, सिहबंदीश , मॉन्स (बर्मा के बंदूकधारी) और मणिपुरी घुड़सवारों को अधिकृत किया और उसी समय आर्थिक नाकेबंदी को और भी कड़ा किया। सारी खेती बारी बंद हो गयी और अन्न का आयात भी पूरी तरह से बंद हो गया। इंग्लिश नाम का एक अधिकारी जो खासी पहाड़ के ही मिलयम पोस्ट का कमांडर था उसने देखा कि खासी लोग आर्थिक रूप से बहुत हीं कमजोर हो चुके हैं और यही सही मौका है उ तिरोत सिंह को बंदी बनाने का। उसने 13 जनवरी 1833 को उ तिरोत सिंह से बातचीत का प्रस्ताव रखा और खासी रीति के अनुसार तलवार की धार पर नमक रखकर कसम भी खाया कि वह राजा को कोई भी क्षति नही पहुंचाएगा। भोले भाले खासी लोगों को धोखे में रखा गया। 13 जनवरी 1833 को उ तिरोत सिंह मिलयम के लूम मैदान इंग्लिश से बातचीत के लिए गए।इंग्लिश ने उन्हें अभिवादन किया एवं एक बार फिर तलवार की धार से नमक खाकर विश्वास दिलाया। लेकिन अपनी योजना अनुसार अंग्रेजों ने छल से उ तिरोत सिंह को बंदी बना लिया।
राबर्टसन की योजना फलीभूत होने वाली थी। उनका असली उद्येश्य खासी पहाड़ को एक यूरोपियन उपनिवेश बनाने का था और इसके लिए वर्मा के बंदूकधारियों एवं तेजतर्रार मणिपुरिओं को खासी पहाड़ में तैनात करने की योजना बनाई ताकि मणिपुरिओं एवं खासी में संघर्ष बना रहे और इसका लाभ अंग्रेज उठाये। लेकिन खासी मुखिया एवं वहाँ के लोग बड़े ही दूरदर्शी थे उन्होंने इस असमान युद्ध को जारी न रखने में ही अपनी भलाई समझी। अपने लोगों से ही युद्ध का परिणाम हार या पूरे खासी पहाड़ का खोना हो सकता था।
अंग्रेजी हुकूमत की यह योजना जिसमे पूरे पूर्वोत्तर को अपना उपनिवेश बनाया जाय इसका प्रयास आज भी जारी है। हाल फिलहाल में नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा FCRA: Foreign Contribution Regulation Act को निरस्त किया गया। जिसका विरोध पूर्वोत्तर राज्यों के कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा की जाती है। इस एक्ट के माध्यम से वे बे-रोकटोक विदेशी धन पूर्वोत्तर में भारत विरोधी गतिविधियों में खर्च हो रहा था। इसके विरोध का स्वर हमें फिर से राबर्टसन ने जो स्वप्न देखा था उसको पूरा करने के लिए ताकतें प्रयासरत प्रतीत होती हैं।
उ तिरोत सिंह को बंदी बनाये जाने के बावजूद खासी राज्य के ज्यादातर भाग को आजाद करा लिया गया था। यद्यपि उन्हें मजबूरीवश रास्ता बनाने के लिए एक अंग्रेजी एजेंट को अनुमति देनी पड़ी। कैप्टन लिस्टर जो सिल्हट के लाइट इन्फेंट्री से था वो उ तिरोत सिंह के अंग्रेजों की ओर से मध्यस्त थे। अंग्रेजी में कहा जा सकता है: Discretion is the perfection of reason ,and guide to us all in all the duties of life, It is only found in men of sound sense and good understanding.
चेन से बांधकर बन्दी बनाकर उ तिरोत सिंह को गुवाहाटी लाया गया। जहाँ उनके मध्यस्त को टेनासेरिम (वर्मा) सुपुर्द करने का आदेश दिया गया। लेकिन कलकत्ता काउंसिल ने उन्हें निर्वासन के लिए डेक्का भेज दिया गया। एक उपयुक्त लेकिन मजबूत घर उनके लिए ढूंढा गया एवं उन्हें महीने का तिरेसठ रुपये और दो नौकर साथ रखने की अनुमति दी गयी। उन्हें कैद में बहुत यातना दी गयी। यहाँ तक कि यातना के पश्चात अंग्रेज अधिकारियों ने उन्हें प्रलोभन भी दिया और उनके समक्ष पेशकश की कि आप वापस अपने राज्य जा सकते हैं और अंग्रेजी हुकूमत को सर्वोच्च मानकर शासन कर सकते हैं। लेकिन उन्होंने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया और कहा कि “गुलाम राजा के जीवन से बेहतर है मैं आजाद रहकर मरूँ।” उ तिरोत सिंह अंतिम स्वतंत्र राजा थे, जिन्होंने अपनी शहादत 1835 के पूर्व अपना जीवन कैद एवं एकाकीपन में व्यतित किया। इस तरह से एक बहुत हीं वीर लेकिन भारतीय इतिहास के किसी पन्ने में खोए हुए स्वतंत्रता सेनानी की जीवन यात्रा समाप्त होती है।
उनकी शहादत के 186 वर्ष पूरे हो चुके हैं। नमन है मेघालय के खासी जनजाति का जिन्होंने ऐसे वीर सपूत को जन्म दिया जिन्होंने देश कि संस्कृति,परंपरा और अपना भारतीय धर्म बचाने के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। आज भी देश के बहुत से नागरिक ऐसे वीर हुतात्मा के बारे में नही जानते। आइये हम सब मिलकर उ तिरोत सिंह सियम की जीवन से प्रेरणा ले व उनके संदेश को जन-जन तक पहुँचाए।
(लेखक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के उत्तर-पूर्व क्षेत्र के क्षेत्रीय विश्वविद्यालय कार्य प्रमुख हैं।)
एक मामला सामने आया है, जिसमें नोएडा स्थित एक हिंदी न्यूज चैनल के प्रधान संपादक के खिलाफ शिकायत दर्ज की गई है। दरअसल, मामला जयपुर का है, जहां मीणा समुदाय की भावनाओं को आहत करने के सिलसिले में पुलिस ने यह शिकायत दर्ज की है।
हाल में कथित रूप से जयपुर के ट्रांसपोर्ट नगर थाने में अंबागढ किले से भगवा झंडा हटाने के विवाद में मीणा समुदाय की भावनाओं को आहत करने के सिलसिले में सुदर्शन टीवी के प्रधान संपादक सुरेश चव्हाण के खिलाफ शुक्रवार को प्राथमिकी दर्ज करवाई गई है।
पुलिस के अनुसार मीणा का आरोप है कि चैनल में मीणा समुदाय को अपशब्द कहे गए और पूरे समुदाय की भावनाओं को आहत किया गया है, जिसके बाद चव्हाण के खिलाफ मामला दर्ज करवाया गया।
आदर्शनगर के सहायक पुलिस आयुक्त नील कमल ने बताया कि प्राथमिकी भारतीय दंड संहिता तथा सूचना प्रौद्योगिकी कानून की संबंधित धाराओं और अनुसूचित जाति-जनजाति (उत्पीड़न से निवारण) कानून के तहत दर्ज की गयी है। उन्होंने कहा कि किसी को भी इलाके में सद्भाव और कानून व्यवस्था को बिगाडने नहीं दिया जायेगा।
उन्होंने बताया कि इलाके में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है और शनिवार को फ्लैग मार्च भी निकाला गया है।
राज कुंद्रा के कारण अभी ओटीटी की काफी चर्चा है. हालांकि अभी तक शायद फिल्म देखने के लिए यह प्लेटफॉर्म हमारे जन-जीवन का हिस्सा नहीं हो पाया है लेकिन, फिर भी जैसा कि कहते हैं, गांव बसा नहीं पर चोर हाज़िर हो गए, यही हाल इस प्लेटफोर्म का भी हो गया है. पोर्न आदि तो खैर ऐसी चीज़ है समाज में जो कभी ख़त्म हो भी नहीं सकती. वह कितना जायज या नाजायज़, कानूनी या गैर कानूनी होना चाहिए, वह अलग से विश्लेषण का विषय है. लेकिन ओटीटी पर भी जिस तरह से वैचारिक दुराग्रहियों, बेईमानों ने पैठ बना लिया है, जिस तरह जातीय ज़हर वे परोस रहे हैं, उसके आगे पोर्न आदि का ख़तरा कोई ख़तरा ही नहीं है. प्रशासन और पुलिस को इन सफेदपोश वैचारिक अपराधियों पर नज़र रखने की अधिक ज़रूरत है. नक्सल प्रेरित, वाम समर्थित, इप्टा गिरोहों द्वारा रचित सामग्रियों की आने वाले समय में इस पर भरमार होने वाली है,जिसे अभी से ध्यान देकर विनियमित करने की आवश्यकता है.
मुट्ठी भर भी वेब सीरिज नहीं देख पाया हूं, अभी तक लेकिन हाल में बिहार पर आधारित एक सीरिज ‘महारानी’ पर नज़र गयी. तमाम वामपंथियों ने गिरोहबंदी कर जिस तरह की हरकत इस सीरिज में की है, जिस तरह दुनिया भर का झूठ, हर तरह की कमीनगी, तमाम तरह के ज़हर को फैलाने का काम इस सीरिज में हुआ है, मुझे आश्चर्य लग रहा है कि लोगों की अभी तक इस पर उस तरह से नज़र क्यों नहीं पड़ी. इन अपराधियों आतंकियों के आगे तो कुंद्रा का अपराध काफी कम है. इन लुच्चों पर मुकदमा क्यों नहीं कायम हुआ अभी तक, अभी तक ये लोग बाहर कैसे हैं, सोच कर अजीब लगता है.
कहानी बिहार के सीएम रहे लालू यादव के चारा घोटाला में जेल जाने के बाद अपनी अनपढ़ पत्नी को सीएम बना देने के विषय पर आधारित है. लेकिन इस कहानी के बहाने ऐसे-ऐसे नैरेटिव, ऐसे-ऐसे झूठ गढ़े गए हैं, इस तरह नक्सलियों का महिमामंडन किया गया है, इस तरह जातीय निष्ठा और विष्ठा को इसमें उड़ेल दिया गया है, जिसकी सड़ांध लम्बे समय तक समाज में कायम रहती अगर ओटीटी जनता का माध्यम होता तो. लेकिन आज भले न हो,पर आने वाला समय तो निस्संदेह वेब फिल्मों का ही है. ऐसे में शासन को इस मीडिया पर अतिरिक्त ध्यान देने की ज़रूरत है. सबसे पहले तो सेल्युलाइड फिल्मों की तर्ज़ पर एक अलग से इसका सेंसर बोर्ड होना चाहिए. भारत में वेब पर स्ट्रीम होने वाले सभी कंटेंट के लिए सेंसर बोर्ड बनाने का काम उच्च प्राथमिकता पर किये जाने की ज़रूरत है. अन्यथा यह गाली-गलौज का अड्डा तो बना ही है, हत्यारों-आतंकियों के लिए वैचारिक पैकेज के भीतर हिंसक गंदगी उड़ेलने का माध्यम भी इसे होते देर नहीं लगेगी.
सबसे पहले आलोच्य ‘महारानी’ की बात. सीधे तौर पर यह फिल्म बिहार की ‘पहली महिला और अकेली महिला सीएम’ के बारे में बताया गया है. तब के चारा घोटाला समेत सभी वास्तविक घटनाक्रम का जिक्र होने के बाद इसे केवल किसी घटना से प्रेरित होकर काल्पनिक चित्रण नहीं माना जा सकता. साथ ही क्योंकि सब कुछ लगभग दस्तावेज़ की तरह दिखाया है, ऐसे में ‘रचनात्मक आज़ादी’ जैसे बहाने की गुंजाइश ही नहीं बचती. या तो उसे प्रदेश आदि का नाम सही नहीं बताना था और अगर सही ही दिखाना था तो तथ्यों के प्रति इमानदारी बरतते हुए काम करना था. इस मामले में बुरी तरह बेइमानी और रचनात्मक कमीनगी का परिचय इस फिल्म में दिया गया है. जितनी भी लानत इसके निर्माताओं को भेजा जाय, वह कम है.
अव्वल तो यह सबको पता है कि बिहार का सीएम रहते हुए बेदर्दी से प्रदेश को लूटने और चारा घोटाला करके पशुओं का चाराखा जाने के मामले में लालू यादव को जेल हुई थी. हालात इतने खराब थे कि उसे तब गिरफ्तार करने के लिए सेना तक को बुलाना पड़ गया था. ऐसे हालात में जेल जाते-जाते उसने अपनी पत्नी राबडी देवी को जो अनपढ़ थी, उसे बिहार का सीएम बना दिया. और उस निरक्षर महिला के कंधे पर बंदूख रख कर न केवल लालू यादव बिहार का शासन जेल से चलाता रहा बल्कि प्रदेश के भविष्य को भी इस तरह रौंदता रहा जिसकी भरपाई के लिए अनेक पीढियां कम साबित होंगी. लेकिन फिल्म में इतने बड़े तथ्य को ही निगल कर यह दिखाया गया है कि ‘सवर्णों की सेना’ द्वारा सीएम को गोली मार दी गयी थी. वह गोली सवर्ण राज्यपाल ने एक बाबा के सहयोग से मरवाई ताकि चारा घोटाला चलता रह सके. लालू इस घोटाले का विरोध करने लगा था, इसलिए उसकी ह्त्या की साज़िश रच ऐन छठ की शाम गोपालगंज के उसके गांव में गोली मारी गयी. फिर ‘माइल्ड लकवाग्रस्त’ लालू ने पत्नी को सीएम बना दिया. उसे सीएम बनाने के लिए जिन रणनीतियों को दिखाया गया है, वह भी बेसिकली लालू के खुद के सीएम बनते समय दलित रामसुंदर दास (शायद यही नाम था उस नेता का जितना स्मरण है मुझे) को रोकने के लिए किया था. जैसे वीपी सिंह ने धोखा देकर पीएम बनने के लिए देवीलाल के साथ किया था. जबकि फिल्म में ‘सवर्ण नीतीश’ कुमार (नवीन कुमार) को रोकने के लिए पत्नी को सीएम बनाने की बात है. खैर.
इसके बाद तो खैर फिल्मों का सड़ांध तो ऐसे निकलता है कि पूछिए मत. ऐसा लगता है मानो बिहार का उद्धार करने नक्सली देवता लोग आये थे जिन्होंने प्रदेश को बचा लिया. फिल्म के अनुसार चारा घोटाला से लालू यादव का कोई लेना-देना नहीं था. हां.. उसने कुछ ‘मासूम सी’ ग़लती की थी जो आज़ादी की इस नयी लड़ाई के लिए निहायत ही ज़रूरी था. फिल्म के अनुसार चारा घोटाले का मास्टरमाइंड वहां का सवर्ण राज्यपाल था जो फिल्म के नितीश कुमार का मौसा लगता था. कि चारा घोटाला किये ही इसलिए गए थे ताकि ‘रणवीर सेना’ को फंड मुहय्या कराते हुए दलितों का कत्ल ए आम कराया जा सके. और यह सभी काम वहां के सवर्ण राज्यपाल की देख-रेख में उसी के इशारे पर किया जा रहा था. राज्यपाल ने लालू यादव से पशुपालन विभाग की तरफ आंखे भी नहीं उठाने का वचन उसके बीबी-बच्चों की शपथ देकर ले लिया था, उसी कारण घोटाला होते रहे. दलितों का संहार होता रहा. पैसा सब सवर्ण राज्यपाल के खा जाने के कारण विकास ठप पड़े हुए थे. वेतन का भी सारा पैसा सवर्ण राज्यपाल जो कि नितीश कुमार का मौसा था, खा जाता था. जिस कारण वर्षों तक वेतन नहीं मिलते थे सरकारी बाबुओं को. और जब इसे रोकने की कोशिश की लालू ने तब उसे सवर्ण राज्यपाल ने सवर्ण महंत की मदद से लगभग मरवा ही दिया था लेकिन अपनी जीजिविषा से फैंटम महोदय बच गए.
उसके बाद घायल मसीहा स्वास्थ्य लाभ करता है. अनपढ़ पत्नी गद्दी सम्हालती है. कुछ दिनों में ही हस्ताक्षर करना सीख कर फिर ऐसी चमत्कारी सीएम बन जाती हैं राबडी जी कि न केवल चारा घोटाला का उद्भेदन कर देती हैं बल्कि इतनी बड़ी त्यागी साबित होती हैं कि मासूम सी अपराध के लिए अपने पति लालू यादव को भी जेल भेज देती हैं, भरे सदन से उठवा कर. सवर्ण पशुपालन मंत्री को भी उससे पहले जेल भिजवा कर फिर सत्ता की लगाम खुद के हाथ में सम्हालती हैं. और यह ‘चंडी’ जैसी बन कर बेऊर जेल में भी धमकी दे आती हैं पति लालू को कि पति बन कर घर आना तो ठीक, ‘सीएम’ के रास्ते में आये तो अच्छा नहीं होगा.
हँसे तो खूब होंगे आप इस फिलिम का संक्षिप्त विवरण पढ़ कर? लेकिन बात महज इतनी सी ही होती तब भी छोड़ देते इसके निर्माता अभागों को. सोचते कि पान-बीडी के मुहताज हो गए इप्टा के अभागों को कोई देखता नहीं है अब, तो यही नौटंकी सही. पर नहीं. बात इतनी भी नहीं थी. सीधे तौर पर ‘सवर्ण’ नितीश कुमार वाले पात्र से पराजित होने की स्थिति में बिहार को सवर्ण आतंकियों के हाथ में छोड़ देने से बेहतर रास्ता लालू ने यह तलाशा कि ‘संघर्ष’ किये जाएं और इस लिए उस मसीहा ने अपने मित्र नक्सल सरगना शंकर महतो से हाथ मिला कर बिहार में जातीय सफाए की शुरुआत की. इस सफाए को आज़ादी की कीमत के रूप में दिखाया गया है. वह इसलिए करना पड़ा क्योंकि स्वर्ग देने का वादा कर चुके बिहार की सात करोड़ आबादी को कम से कम ‘स्वर’ दिया जा सके. यह कीमत स्वर देने की थी, और वह कथित तौर पर वैसी ही थी, जैसा स्वतन्त्रता संग्राम.
नैरेटिव यहां भी नहीं रुक जाता है. ‘फिलिम’ के बीचोबीच यह भी साथ-साथ दिखाते रहा जाता है कि सवर्ण भले किसी भी छोटे पद पर भी हो लेकिन वह पिछड़ी जातियों को गुदानता नहीं है. कोई सवर्ण एसपी भी पिछड़े डीजीपी को सीधे कह सकता है कि आप हमारा …. भी नहीं कबार पाइयेगा. यह भी कि सवर्णों की सेना तो इतनी निष्ठुर थी कि वह नरसंहार करते समय बच्चे-बच्चे तक का बेदर्दी से क़त्ल करता है, नयी ब्याही महिला से रेप करना पाप लेकिन उसके पीठ में गोली मार कर ह्त्या कर देने को पुण्य समझता है लेकिन, लेकिन नक्सली इतने कोमल ह्रदय हैं कि वे बच्चों की ह्त्या से साफ़ इनकार कर देते हैं, कि सरगना शंकर महतो इतना पढ़ा लिखा है कि किरांति के बीचों-बीच भी लाइब्रेरी में ही बसेरा डाले रहता है लेकिन सारे सवर्ण शोषक इतने मूर्ख कि एसपी-मंत्री हो कर भी मां-बहन की गालियां निकालते, रम-रांड-रोहू में मस्त होकर मसीहा के खिलाफ षड्यंत्र रचता रहता है. ह्त्या पर ह्त्या करता रहता है. फिल्म का अंत जैसे ऊपर बताया गया है, मसीहा के जेल पहुंच जाने पर होता है. और ‘तेजस्वी मां’आंखों में आसूं लेकिन दिल में पिछड़ों की भलाई की आग, बिहार की सात करोड़ जनता को ब्राम्हण शोषकों से मुक्त कराने का संकल्प लिए वापस सीएम हाउस लौटती हैं. बिहार को एक लेडी मसीहा अर्थात मसीही सीएम मिलता है…….
सीरिज में अभिनय करने वाले कुछ लोगों को निजी तौर पर भी जानता हूं. और क्योंकि उनकी निष्ठा पता है, तो और बेहतर समझ सकता हूं कि किस भावना से यह निर्माण किया गया होगा. जैसे इसमें रणवीर सेना के मुखिया बरमेसर मुखिया का किरदार निभाने वाले आलोक चटर्जी जी. एनएसडी के गोल्ड मेडलिस्ट चटर्जी हमें दो दशक पहले थियेटर पढ़ाने माखनलाल विश्वविद्यालय भोपाल आते थे. तब जवान थे तो अधिक वामी थे. पूरा का पूरा बीडी का एक पैकेट एक क्लास में ही धूक देते थे और अक्सर पूरे क्लास के दौरान मुझसे ही बहस करते-करते डेढ़-दो पीरियड ख़त्म हो जाता था. वे कट्टर वामी थे और अपन तब विचारधारा का छात्र ही हुआ करते थे लेकिन बहसें दिलचस्प होती थी. तब के अपने सहपाठी बता सकते हैं कि कुछ के लिए बड़ा रोचक होता था वह विमर्श और कुछ होशियार टॉप करने की इच्छा रखने वाले छात्रों को वह समय की बर्बादी लगता था, ऐसे टॉपर आकांक्षी छात्रों पर सरोकारी छात्र हंसते भी थे, गोया यहां का नंबर ही उन्हें आगे रवीश कुमार बनाता. अद्वितीय प्रतिभाशाली लेकिन वामी आलोक जी को लम्बे समय बाद अपने उसी एजेंडे को साधते हुए इस फिल्म में देखना रोचक लगा जिसके खिलाफ छात्र जीवन में अपन क्लास का क्लास उनसे बहस में गुजार देते थे. ऐसे परिचित कुछ और चेहरे इस सीरिज में दिखे, जिनका जिक्र फिर कभी. बहरहाल!
ये जहां भी जायेंगे गंदगी फैलायेंगे, कमीनों का कोई जहां नहीं होता. ऐसे कमीनों-कुटिलों ने ओटीटी प्लेटफॉर्म के रूप में एक नया ‘बस्तर’ तलाश लिया है. वहां से शहरी नक्सली और इप्टाई अब बौद्धिक गुरिल्ला वार इसी तरह अंजाम देंगे. सरकार को सचेत होते हुए अभी से ध्यान देना शुरू कर देना चाहिए. कुंद्रा की नीली फ़िल्में समाज को हल्का-फुल्का भी नुकसान नहीं पहुचा पाएंगी लेकिन ये ‘लाल फ़िल्में’ फ़िल्में फिर से नस्लें तबाह कर देंगी. फिर से लक्ष्मनपुर बाथे, बारा नरसंहार से लेकर बस्तर तक को लहुलुहान करने के लिए उत्प्रेरक का काम करने लगेंगी. फिर से कोई फिल्म बस्तर पर भी बनेगा जिसमें दंतेवाड़ा की डेढ़ वर्ष की बची ज्योति कुट्टयम तक को 65 अन्य के साथ ज़िंदा जला देने को ये क्रान्ति कहते-दिखाते रहेंगे, रानीबोदली से लेकर चिंतलनार तक जैसी कार्यवाहियों के महिमामंडन करते, ऐसे हर संहार को स्वतन्त्रता संग्राम, इसे खाद-पानी देने वाले हर लालू को ये मसीहा ऐसे ही साबित करते रहेंगे, प्रतिरोध में फिर कोई बरमेसर मुखिया, फिर कोई सलवा जुडूम पैदा होते रहेगा. इस कलातंकियों की यहीं गर्दन मरोड़ दीजिये सरकार प्लीज़. कल को फिर से काफी देर हो जायेगी.आज़ादी के पहले साठ वर्ष इन्होंने सांप्रदायिक विभेद पैदा कर सत्ता हासिल की और कायम रखा उसे. अब साम्प्रदायिकता इनके लिए घाटे का सौदा हो गया है क्योंकि उसके विरुद्ध होता सनातन ध्रुवीकरण इन्हें शून्य तक पर ला देता है. तो इन्हें सत्ता फिर से हासिल करने और छग जैसे राज्यों में मिल गयी सत्ता को कायम रखने हेतु ऐसे ही जातीय-वैचारिक आतंक को बढ़ाना होगा जिसमें ये नए माध्यमों के साथ जुट गए हैं. इस संकट पर समय रहते ध्यान देना होगा. ये किस तरह हमारे ही संसाधनों का इस्तेमाल हमारे ही खिलाफ कर जाते हैं, यह हर सीरिज के अंत में मध्यप्रदेश के सीएम, उत्तराखंड के राज्यपाल, जम्मू-कश्मीर के उप राज्यपाल को उनके सहयोग के लिए दिये जाने वाले धन्यवाद से भी पता चलता है. हमें पता भी नहीं चलता और वे हमें उपयोग कर ले जाते हैं. नारे फिर वही पुराने दुहराने की ज़रूरत है….. कांगरेडों से लड़ने का ज़ज्बा तो ले आओगे, कमीनापन कहां से लाओगे…..!