आत्मनिर्भर हरियाणा की नई तस्वीर

114-8.jpg

मुकेश वशिष्ठ

संकट कभी भी समाधान के प्रयासों से बड़ा नहीं हो सकता। कुशल नेतृत्व की दृढ़ इच्छाशक्ति, सामूहिक प्रयास और चुनौतियों से टकराने का साहस हो तो संकट इतिहास के पन्नों में समेट सकते हैं। कोरोना काल के अनुभव ने इसे समझने और सीखने का मौका दिया है। हरियाणा जैसे राज्य के लिए एक अलग मायने में अवसर भी है, जिसमें वह अग्रणी राज्य बनने की अपनी योग्यता से आत्मनिर्भर हरियाणा की नई तस्वीर तैयार कर सकता है। इसकी झलक बजट में साफ दिखती है, जो करीब 10 महीने के कोरोना काल में ठप आर्थिक गतिविधियों के बाद पेश किया गया है। आंकड़ों में प्रदेश के विकास का खाका है, तो उन अरमानों का ताना-बाना भी, जो उस हरियाणा को आत्मनिर्भर बनाकर नई ऊंचाइयों पर ले जाने को उत्साहित है, जिसकी स्थापना हुए 54 साल बीत गए, लेकिन श्रम, संसाधन और अवसरों के बाद भी अग्रणी राज्यों की कतार में पीछे ही रहा।

इसमें कोई संदेह नहीं कि मनोहर सरकार बीते छह साल के कार्यकाल में प्रदेश की आर्थिक, सामाजिक हालत को सुधारने के लिए चरणबद्व तरीके से काम कर रही है। इसलिए विधानसभा चुनाव 2019 में जनता ने एकबार फिर मनोहर सरकार को सकारात्मक नीयत, प्रयास, ईमानदारी के साथ ई-गर्वनेंस के रूप में स्वीकारा। अपने दूसरे कार्यकाल के पहले बजट 2020—21 में सरकार ने एकबार फिर बुनियादी ढांचे पर पुर्ननिर्माण का कार्य शुरू किया। जिसमें खासकर कृषि, महिला सशक्तिकरण और आम लोगों तक सरकारी सेवाओं को आनलाइन तरीके से पहुंचाने के यशस्वी काम हुए। लेकिन, कोविड—19 महामारी ने अप्रत्याशित चुनौतियों को जन्म दिया। लॉकडाउन के दौरान पर्यटन समेत राजस्व प्राप्ति के लगभग सारे स्रोत बंद रहने से प्रदेश की आर्थिक सेहत बुरी तरह बिगड़ गई। वित्त वर्ष में सरकार को 20856.25 करोड़ की राजस्व हानि उठानी पड़ी। प्रति व्यक्ति आय में करीब 8093 रुपये की कमी आई। विकास दर में भी करीब 2.5 फीसद कम रही। अन्य मोर्चों पर भी ऐसी ही आर्थिक चुनौती दिख रही है। सरकार का राजकोषीय घाटा 24912.63 करोड़ रुपये रहा। लेकिन, आर्थिक स्रोत की कमी के बावजूद सरकार द्वारा पेश बजट दिल नहीं तोड़ता बल्कि समाज के गरीब एवं कमजोर वर्गों का उत्थान पर विशेष फोकस रखा गया।

वर्ष 2021—22 के लिए सरकार ने 1 लाख 55 हजार 645 करोड़ रूपये का बजट पेश किया। जो वर्ष 2020—21 से 13 प्रतिशत अधिक है। बजट के जरिये सरकार ने आम आदमी पर कोई नया टैक्स नहीं थोपा है। सरकार ने अंत्योदय पर पूरा ध्यान केंद्रित किया है। मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने नई योजना मुख्यमंत्री अंत्योदय उत्थान अभियान की शुरू करने की घोषणा की। जिसके अंतर्गत 1.80 लाख रुपये वार्षिक आमदनी वाले दो लाख निर्धनतम परिवारों की पहचान की जाएगी। सरकार उनके आर्थिक उत्थान को सुनिश्चिचत करने हेतु शिक्षा, कौशल विकास, रोजगार और स्व—रोजगार के लिए प्रयास करेंगी।बजट में कृषि एवं कृषि आधारित उद्योगों को मजबूत बनाए जाने का भी प्रस्ताव है। विशेष तौर पर फसल बीमा योजना को लेकर सरकार उत्साहित है। इस योजना के तहत, अब तक 13 लाख 27 हजार किसानों को क्लेम के रूप में 2980.74 करोड़ रूपये की राशि वितरित की गई। हरियाणा सरकार की “किसान मित्र योजना” की शुरूआत भी एक स्वागतयोग्य फैसला है। इस योजना में बैंकों की साझेदारी से प्रदेश में 1000 किसान एटीएम स्थापित करने की परिकल्पना है। हरियाणा सरकार वर्तमान में गेंहू, चना, सरसों, सूरजमुखी, धान, मक्का, बाजरा, मूंग और मूंगफली पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) दे रही है। कोविड—19 महामारी में भी सरकार ने रबी 2020—21 में 74.01 लाख मीट्रिक टन गेंहू और 7.49 लाख मीट्रिक टन सरसों की खरीद की। इसी तरह खरीफ 2020—21 के दौरान सरकार ने 56.07 लाख मीट्रिक टन धान और 7.76 लाख मीट्रिक टन बाजरे की खरीद की। सरकार ने बजट में एमएसपी पर खरीद जारी रखने का प्रावधान किया है। साथ ही 6.60 लाख मीट्रिक टन के अतिरिक्त कृषि उत्पाद भंडारण क्षमता को बढाने का निर्णय लिया है। सरकार प्रदेश के एक बड़े तबके को कृषि संबंधी गतिविधियों से बाहर निकालने का प्रयास कर रही है। बागवानी को लेकर प्रदेश सरकार की तैयारी इसी दिशा में जाता महत्वपूर्ण कदम है। बीते कुछ सालों में प्रदेश में 80.67 लाख मीट्रिक टन उत्पादन के साथ बागवानी क्षेत्र बढकर 4.78 लाख हेक्टेयर हो गया है। बजट में इस उत्पादन को तीन गुणा करने का लक्ष्य रखा गया है। मनोहर सरकार ने बजट के माध्यम से गुणवत्तापरक स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने का संकल्प दोहराया है। दवाईयों की उपलब्धता बढाने के साथ—साथ बुनियादी सुविधाएं, मानव संसाधन, उपकरणों को बढाया गया है। मनोहर सरकार ने वर्ष 2021—22 में सभी नागरिक अस्पतालों में कैथ लैब, एमआरआई और सीटी स्कैन की सेवाएं मुहैया कराने के साथ—साथप्रदेश में हेल्थ वेलनेस सेंटरों की स्थापना करने का प्रस्ताव है। वित्त मंत्री ने वर्ष 2021—22 के लिए 7731 करोड़ रूपये आवंटित करने का प्रस्ताव रखा है। यह प्रस्तावित परिव्यय वर्ष 2020—21 के अनुमान परिव्यय पर 20.2 प्रतिशत ज्यादा है। मनोहर सरकार ने बजट में 12वीं कक्षा तक फ्री शिक्षा व्यवस्था करने की घोषणा की है। इसके अलावा तीन से पांच आयु वर्ग के बच्चों के लिए सरकार की ओर से 4000 प्ले—वे स्कूल, 500 नए क्रैच, सभी खंडों में आदर्श संस्कृति स्कूल, अंग्रेजी माध्यम के राजकीय आदर्श संस्कृति स्कूल शुरू करने का प्रस्ताव रखा है। सरकारी स्कूलों के सौदर्यकरण करने एवं इन्हें आकर्षक बनाने के लिए उपयुक्त धनराशि, सभी स्कूलों की चारदीवारी, आरओ से शुद्व पेयजल मुहैया कराना भी सरकार की प्राथमिकता में है।

सुखद बात ये है कि, कठोर वित्तीय विवेकपूर्ण उपायों के कारण सरकार ने 8585 करोड रुपये का उधारी क्षमता का उपयोग नहीं किया। इसका शत-प्रतिशत श्रेय मुख्यमंत्री के अनुभव और विजन को दिया जाना चाहिए। असाधारण परिस्थितियों में असाधारण नीतियों की आवश्यकता होती है। चूंकि कोविड—19 महामारी के चलते सरकार ने अप्रत्याशित चुनौतियों का सामना किया। सरकार को आय और व्यय के अभूतपूर्व असंतुलन का सामना करना पड़ा। बावजूद इसके सरकार ने कोरोना पीड़ितों की मदद में अपने खजाने से भरपूर मदद की। इस पृष्ठभूमि में बजट गढ़ते हुए मनोहर सरकार के पास अवसर था कि वह कोरोना के सिर पर ठीकरा फोड़कर खुद बच निकलती, मगर सरकार ने इसके बजाय प्रदेश की उम्मीदों में रंग भरने का हौसला जुटाया। बजट में प्रधानमंत्री के आत्मनिर्भर भारत से प्रेरित आत्मनिर्भर हरियाणा के लक्ष्य को आकार देने के प्रयास में कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, इंफ्रास्ट्रक्चर और महिला विकास जैसी प्राथमिकताओें के लिए स्थायी भाव की योजनाएं पेश करके सरकार ने चौंकाया ही है। यह कतई आसान नहीं था। जाहिर है, मनोहर लाल को एक तरफ प्रदेश के संसाधनों, खासकर कृषि पर भरोसा है, तो दूसरी ओर केंद्र सरकार पर। यह विश्वास भी बजट प्रस्ताव में साफ झलक रहा है।

(यह लेखक के निजी विचार है)

HC ने केंद्र से डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के नए नियमों के खिलाफ दायर याचिका पर मांगा जवाब

115-1.jpg

दिल्ली हाई कोर्ट ने नेटफ्लिक्स, अमेजॉन प्राइम और हॉटस्‍टार जैसे प्लेटफॉर्म्स और डिजिटल मीडिया पर केंद्र सरकार के न‌ए नियमों को चुनौती देने वाली एक याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस डीएन पटेल और जस्टिस जश्मीत की बेंच ने केंद्र सरकार को यह नोटिस जारी किया है। कोर्ट इस मामले की अगली सुनवाई 16 अप्रैल को करेगी।

मालूम हो कि यह याचिका ‘फाउंडेशन फॉर इंडिपेंडेंट जर्नलिस्ट’ ट्रस्ट की ओर से दायर की गई है। यह ट्रस्ट ‘द वायर’ व ‘द न्यूज मिनट’ के संस्थापक और प्रधान संपादक धन्या राजेंद्रन और ‘द वायर’ के संस्थापक संपादक एमके वेणु द्वारा बनाया गया है।  

केंद्र सरकार ने 25 फरवरी को OTT प्लेटफॉर्म और डिजिटल मीडिया के लिए तकनीकी सूचना रूल्स, 2021 जारी की थी।

मीडिया खबर के अनुसार, याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट नित्या रामाकृष्णन ने कोर्ट से कहा कि सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की तरफ से नए नियमों को लेकर दिए गए हलफनामे और गूगल के नियम अलग हैं। नियमों में अखबारों और समाचार-संस्थाओं के बारे में नहीं बताया गया है। ऐसा नहीं है कि समाचार माध्यम नियंत्रण से परे हैं, लेकिन इसका नियंत्रण एक कानून के माध्यम से किया जाना चाहिए।

 पिछले शुक्रवार को इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि केंद्र सरकार द्वारा जारी की गई गाइडलाइंस में अनुचित कार्यक्रम दिखाने वाले या नियमों का उल्लंघन करने वाले डिजिटल प्लेटफॉर्म के खिलाफ अभियोजन या सजा को लेकर उपयुक्त कार्रवाई करने के लिए कोई प्रावधान नहीं है।

सरकार ने गाइडलाइंस की घोषणा करते हुए कहा था कि नए नियमों से सोशल मीडिया कंपनियों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को अधिक जिम्मेदार और जवाबदेह बनाने की जरूरत है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इन प्लेटफॉर्म पर अनुपयुक्त सामग्री को नियंत्रित करने के लिए नियमों में कुछ भी नहीं है और बगैर किसी कानून के इसे नियंत्रित करना संभव नहीं हो सकता। बेंच ने अपने आदेश में कहा था, ‘नियमों का अवलोकन करने से यह संकेत मिलता है कि नियम दिशानिर्देश के रूप में हैं और दिशानिर्देशों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ छानबीन या उपयुक्त कार्रवाई के लिए कोई प्रभावी तंत्र नहीं है।’

Google को न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन ने लिखा लेटर

114-7.jpg

अमेरिका की दिग्गज टेक्नोलॉजी कंपनी ‘गूगल’ से निजी टेलिविजन न्यूज चैनल्स का प्रतिनिधित्व करने वाले समूह ‘न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन’ ने फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय देशों की तरह भारतीय न्यूज पब्लिशर्स को भी उनके कंटेंट को इस्तेमाल करने से होने वाली कमाई में हिस्सेदारी देने का आग्रह किया है।

मीडिया खबर के अनुसार, इस बारे में एनबीए ने गूगल इंडिया के कंट्री मैनेजर संजय गुप्ता को एक लेटर लिखा है। एनबीए प्रेजिडेंट रजत शर्मा की ओर से लिखे इस लेटर में कथित रूप से कहा गया है, ‘ऐडवर्टाइजिंग रेवेन्यू का असमान वितरण और एडवर्टाइजिंग सिस्टम में पारदर्शिता की कमी से डिजिटल न्यूज बिजनेस काफी दबाव में आ रहा है।’

इस लेटर के हवाले से मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है, ‘विश्वसनीय जानकारी जुटाने, सत्यापित करने और वितरित करने के लिए एंकर्स, पत्रकारों और रिपोर्टर्स को नियुक्त करने में न्यूज ऑर्गनाइजेशंस काफी निवेश करते हैं, लेकिन उन्हें पर्याप्त रूप से रेवेन्यू नहीं मिल पाता है। एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू का एक बड़ा हिस्सा असमान रूप से गूगल, यूट्यूब, फेसबुक जैसे टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म्स को चला जाता है।’ लेटर के अनुसार, ‘इस कड़ी में गूगल अपने ऑडियंस को न्यूज कंटेंट उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और रेवेन्यू जुटाता है, लेकिन न्यूज पब्लिशर्स को इस रेवेन्यू में हिस्सेदारी नहीं मिल पाती है। गूगल ने पिछले दिनों फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय देशों के न्यूज पब्लिशर्स को उनका कंटेंट इस्तेमाल करने के बदले रेवेन्यू में हिस्सेदारी देने पर सहमति जताई है। उम्मीद है कि एक बहुराष्ट्रीय ऑर्गनाइजेशन होने के नाते गूगल वैश्विक सिद्धांतों का पालन करेगा और भारतीय न्यूज पब्लिशर्स को भी उनका न्यूज कंटेंट दिखाने के ऐवज में भुगतान करेगा।’

आंदोलनों में लगे दीमक हैं आंदोलनजीवी

113.1-2.jpg

 डॉ. सुजाता मिश्र

आज़ादी का संघर्ष भारतीय समाज में पुनर्जागरण का एक ऐसा दौर था जिसमें  नये भारत का भविष्य लिखा जा रहा था। तमाम तरह की समाजिक विसंगतियों से मुक्ति, रुढिवाद से मुक्ति और नये – बेहतर कल के इस राष्ट्रीय कायाकल्प का आधार ही “राष्ट्रवाद” था। समाज का बुद्धिजीवी  वर्ग इस बदलाव का पथ प्रदर्शक था, जिसमें स्वामी दयानंद सरस्वती, राजाराम मोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर , स्वामी विवेकानंद जैसे राष्ट्रभक्त शामिल थे। इसके साथ ही साहित्यकारों , पत्रकारों का देशभक्त वर्ग भी नवजागरण के इस प्रकाश को गांव – कस्बों सहित समस्त देश में फैला रहा था। मकसद था विदेशी शासन से मुक्ति…. स्वराज्य की स्थापना, इसीलिये आत्मगौरव , राष्ट्र्गौरव के भाव को जन – जन में जगाने का प्रयास शुरु हुआ। ये सभी राष्ट्र्भक्त बुद्धिजीवी , सजग समाजिक समूह ही समाज सेवक कहलाये। जनता के मार्गदर्शक के रूप में इनका स्थान सत्ता से , पुलिस प्रशासन से यहां तक की अंग्रेजी कानूनों से भी ऊपर था।

वर्ष 1947 में देश आज़ाद हो गया, लेकिन तब तक पत्रकारों, साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों का एक वर्ग पुन: रीतिकालीन दरबारी परिवेश में लौट गया था। ब्रिटिश हुकूमत के रहते यह वर्ग अंग्रेजों को खुश करने हेतु, उनका दिल जीतने हेतु साहित्य सृजन करता था, बदले में बडे – बडे सम्मान, पुरस्कार और पद प्राप्त करता था। इसी कथित बुद्धिजीवी अवसरवादी वर्ग ने अंग्रेजी शासन से विरुद्ध संघर्ष की दिशा बदलकर धर्म, जाति , गरीबी, अमीरी पर केंद्रित कर दी। परिणामत: देश आज़ाद तो हुआ किंतु मज़हबी आधार पर बंटवारे के साथ। समाज को धर्म- मज़हब , अमीर – गरीब और जातिगत वर्गो में बांटने वाले झंडाबरदार अब समाज सुधारक कहलाये जाने लगे। साहित्य, सिनेमा,  गीतों के माध्यम से बडे जतन और चालाकी के साथ आमजन के मन से पत्रकारों और एनजीओ धारी व्यावसायिक समाज सेवकों को समाज के सच्चे हितैषी के रूप में स्थापित किया गया। ये जो कहे वही सौ आना सच। ये जब चाहे, जिसके खिलाफ मोर्चा खोल दें। गांधी जी को अपना “ब्रांड अम्बेसडर” बनाकर इन लोगों ने इस देश में अहिंसा पूर्वक विरोध के नाम पर धरना, प्रदर्शन , अनशन को एक राजनीतिक तमाशा बनाकर रख दिया। बात – बात पर लोकतंत्र और संविधान की दुहाई देना किंतु स्वयं को जनता द्वारा चुनी गयी सरकार से भी ऊपर मानना! व्यक्तिवाद, क्षेत्रवाद,जातिवाद के पहिये पर सवार होकर खुद को समाज सुधारक कहने वाले इस वर्ग का सीधा विरोध  राष्ट्र के हर उस तत्व  से है जिनपर आज़ादी से पूर्व के समाज सुधारकों को गर्व था। राष्ट्रभाषा, राष्ट्र सेना, राष्ट्र की प्रशासनिक व्यवस्था, राष्ट्र की कानून व्यवस्था , राष्ट्र के वो व्यवसायी जिनके उद्योगो के दम पर करोडों लोगों को रोजगार मिला हुआ है…. जिनके दम पर राष्ट्र की अर्थव्यवस्था चलती है। राष्ट्र की अवधारणा के विरुद्ध चलने वाले ये कैसे समाज सुधारक हैं? यह विमर्श का मुद्दा है!

  आज़ादी के बाद इस देश में एक लम्बे समय तक लोकतंत्र के नाम पर एक ही परिवार का राजतंत्र चलता रहा। यह इन कथित समाज सुधारकों के लिये स्वर्ण काल था। धडल्ले से लाखों प्रकार के एनजीओ इस देश में बने….लेकिन समाज की स्थिति वही की वही रही …. एक वक्त ऐसा था कि चार बेरोजगार दोस्त मिलकर यह सोचकर ही एनजीओ बना लेते थे कि “यार बहुत कमाई है इसमें” …. एनजीओ की आड में कितनी समाज सेवा हुई यह तो समाज की स्थिति ही देखकर समझ आ जाता है। पर जब सईयां भये कोतवाल तो डर काहे का? कांग्रेसी शासन में इन कथित समाज सेवियों को राष्ट्रीय – अंतराष्ट्रीय सम्मानों से नवाज़ा गया…. बडे – बडे पद दिये गये। रणनीतिकार के रूप में ये समाज से सहयोगी बने रहे और बढियां मलाई खाते रहे। गरीबी भुखमरी में उलझी जनता इन्हें “मसीहा” के रूप में देखती रही। गरीबों के जीवन से जुडे जो सुधार कार्य जो सरकार को करने थे वो सरकार की छ्त्रछाया में पलने वालें पत्रकार और एनजिओं कर रहे थे…. यहीं से इनकी जडे फैलती चली गयी, और अब सिनेमा जगत के लोग भी इनके झंडे थाम कर खडे हो गये।

2014 में इस देश में दो बडे बदलाव हुए, एक तरफ जहां एक कर्मठ प्रधानमंत्री  देश को मिला, तो वहीं एनजिओ से जन्मा एक मुख्यमंत्री देश की राजधानी दिल्ली को मिला। कर्मठ प्रधानमंत्री ने अपनी इच्छाशक्ति , संकल्पशक्ति और रणनीति के दम पर देश में अनेक क्रांतिकारी परिवर्तन किये। जम्मू कशमीर से अनुच्छेद 370 को हटाना, मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक के खौफ से मुक्ति, घर – घर बिजली,गरिबों को आवास,गैस चूल्हा  वितरण …. सब ऐसे कार्य जिनके दम पर बरसों से सामाज सेवकों की दुकानें चलती थी।

दूसरी ओर एनजीओ और आंदोलन  से जन्मी दिल्ली की सरकार है, जिसने दिल्ली को आंदोलनकारियों  की नयी प्रयोगशाला बना दिया है। देश के तमाम मुद्दे अब दिल्ली की सडकों पर ही उठाये जाते हैं….विद्यार्थियोंकी समस्या हो या किसानों की, बेरोजगारों की समस्या हो या पेंशनधारियों की, स्त्रीयों की सुरक्षा का मुद्दा हो या समलैगिकों के अधिकारों की लडाई हो…. कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक देश के हर मुद्दे को आवाज़ देने वाले वही गिने – चुने चेहरे …. ये प्रोफेशनल समाज सेवी हैं! हर वक्त नये मुद्दों की तलाश में रहते हैं! आंदोलन ही इनका व्यवसाय है…. प्रोपोगैंडा इनका हथियार …. भय का व्यापार करते हैं और दिल्ली के आस – पास मौजूद तमाम मीडिया हॉउस 24 घंटे इनके प्रोपोगैंडा को ही राष्ट्रीय विमर्श का मुद्दा बनाकर दिखाते हैं! आंदोलनजीवियों का यह खेल तब तक चलता रहेगा , जब तक जनता स्वयं जिम्मेदार बनकर इनके दावों और हकीकत का मेल करना नहीं सीखेगी। मोदी जी ने शुरुआत की है, अब जनता को पहचानना होगा …. इन परजीवी आन्दोलनजीवी व्यावसायिक समाज सेवियों को।

(लेखिका भोपाल रहती हैं। पेशे से प्राध्यापक हैं। अध्ययन और लेखन उनके रुचि का क्षेत्र है।)
scroll to top