भोपाल । आज ‘घाना’ की राजधानी ‘आक्रा’ मे स्थानिय अफ्रिकन हिंदु, भजन जामिंग का बडा कार्यक्रम कर रहे हैं.
घाना, पश्चिम अफ्रीका का एक गरीब देश हैं. इसकी की जनसंख्या लगभग सवा तीन करोड़ की है. इस जनसंख्या में सत्तर प्रतिशत ईसाई एवं लगभग बीस प्रतिशत मुस्लिम धर्म को मानने वाले रहते हैं. इस गरीब देश में ‘कुमासी’ नामक महानगर के पास एक विशाल एवं भव्य हिन्दू मंदिर है. लगभग दो हजार श्रद्धालु प्रति सप्ताह इस मंदिर में दर्शन हेतु आते हैं. मजे की बात यह है कि इनमें से एक भी भारतीय नहीं है. संभवतः इन श्रद्धालुओं में से किसी ने भारत कभी देखा भी नहीं है. ये सभी लोग स्थानीय अफ्रीकन लोग हैं. इस मंदिर में होने वाली सभी धार्मिक गतिविधियों में इन अफ्रीकन-हिंदुओं का सक्रिय सहयोग रहता है.
यह अकेला ऐसा मंदिर नहीं है. देश के दक्षिणी भाग में समुद्र किनारे पर ‘आक्रा’ नामक राजधानी में भी एक विशाल हिन्दू मंदिर है. यह मंदिर भी स्थानीय अफ्रीकन हिन्दुओं का ही है. घाना देश में इस प्रकार के छः विशाल मंदिर हैं, जिनकी व्यवस्था एवं प्रबंधन अफ्रीकन हिन्दूओं के हाथ में है.
यह सारा चमत्कार, मूलतः अफ्रीकन, *स्वामी घानानंद सरस्वती* ने कर दिखाया है. हिन्दू धर्म के प्रति आकर्षण के कारण वे भारत आए थे. यहां ऋषिकेश में उनकी भेंट स्वामी कृष्णानंद सरस्वती से हुई. इस भेंट के पश्चात इन दोनों में एक आध्यात्मिक संबंध निर्माण हुआ. स्वामी घानानंद सरस्वती को यह नाम एवं दीक्षा यहीं पर प्राप्त हुई. स्वामी घानानंद, अपने देश घाना वापस लौटे एवं उन्होंने हिन्दू धर्म के प्रचार-प्रसार का काम आरम्भ किया. २०१६ में उनकी मृत्यु के पश्चात हिंदुत्व के प्रसार की सम्पूर्ण जिम्मेदारी स्थानीय अफ्रीकन हिन्दू, स्वामी सत्यानन्द जी ने अपने कन्धों पर उठा ली और स्वामी घानानंद के कार्यों को पूरे जोश के साथ आगे बढ़ाया. २८ मई २०१९ को स्वामी सत्यानन्द की भी मृत्यु हो गयी. अभी वर्तमान में ब्रह्मचारी आदिमाता इन मंदिरों की प्रमुख हैं.
*वर्तमान में घाना में साढ़े सात लाख हिन्दू रहते हैं. इनमें से लगभग साठ-सत्तर हजार लोग स्थानीय अफ्रीकन हिन्दू हैं. दिनोदिन इनकी संख्या बढ़ती जा रही है. तमाम अफ्रीकन लोग, ईसाई एवं इस्लाम धर्म छोड़कर हिन्दू जीवन पद्धति अंगीकार करते हुए हिन्दू बन रहे हैं. इन्हें हिंदुत्व के माध्यम से स्वयं के अस्तित्त्व की पहचान हो रही है.*
पिछले कुछ वर्षों मे भारतीय मूल्यों, परम्पराओं, संस्कृति के प्रति आकर्षण विश्व में बढ़ता ही जा रहा है. हमें भी अपने ‘हिन्दू’ होने की पहचान समझ में आने लगी है. संभवतः इसी कारण, शेष विश्व को ‘हिंदुत्व’ की पहचान होने लगी है. अगले पच्चीस वर्षों में बहुत कुछ बदलने जा रहा है. जब हमारा देश स्वतंत्रता के सौ वर्ष पूर्ण कर रहा होगा, तब विश्व को सच्चे अर्थों में हिंदुत्व की पहचान हो चुकी होगी, यह निश्चित है….!



