कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल
दिल्ली । वर्तमान समय में देश-समाज में एक विकृतिपूर्ण चलन हमारी सभ्यता, संस्कृति और सामाजिकता को ग्रसने के लिए अपने उफान पर देखने को मिल रहा है। इसके भविष्यगत संकट को जाने-पहचाने, सोचे-समझे बिना समूचा समाज उसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से बढ़ावा दे रहा है। आजकल महापुरुषों, ईश्वरीय अवतारों—सबकी जाति देखी जाने लगी है। उन्हें जातियों से नत्थी किया जाने लगा है। और विध्वंसक समूह अपनी-अपनी जाति व समुदाय के आधार पर महापुरुषों और भगवानों का बँटवारा कर, उन्हें सर्वश्रेष्ठ बताने में जुटे हुए हैं।
जहाँ इन सबके पीछे एक ओर दूषित और घृणित राजनीति दिख रही है, जो अपने वोट बैंक के लिए समाज को किसी भी स्तर तक बाँटकर अपना राजनीतिक वर्चस्व स्थापित करना चाहती है, तो दूसरी ओर भारत की महान संस्कृति को खण्डित करने का षड्यन्त्र भी प्रतीत हो रहा है।
अचानक से ही एक नई तरह की धारा और नए लोगों का प्रादुर्भाव होने लगा है, जो राष्ट्र की सभ्यता एवं संस्कृति के आधारस्तंभ मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम और कृष्ण सहित धार्मिक-पौराणिक ग्रन्थों तथा सनातन संस्कृति के आराध्यों की भी जाति ढूँढ़ने के अभियान में जुटे हैं। आराध्य देवताओं को अपनी जाति का भगवान बताकर मिथ्यादम्भ का परचम लहरा रहे हैं।
ऐसी धारा के लोगों का मानना है कि भगवान राम क्षत्रियों के, भगवान कृष्ण अहीरों के, भगवान परशुराम ब्राह्मणों के, भगवान चित्रगुप्त कायस्थों-बनियों के, भगवान विश्वकर्मा लुहारों-बढ़इयों के हैं और ऐसा ही वे समस्त देवी-देवताओं को लेकर अपनी-अपनी धारणाएँ बनाते हैं। देवी-देवताओं को अपनी-अपनी जाति या वर्ग का बताने व स्थापित करने की ख़तरनाक मुहिम चल रही है। जिन आराध्य देवताओं को समूचा समाज अपनी संस्कृति का मूल मानकर पूजता था। अब उन्हें जातीय खाँचे में ढालकर अपनी-अपनी जाति के अहं के रूप में प्रदर्शित करने का घोर पाप किया जाने लगा है।
समाज में यह चलन कहाँ से और कैसे आया? इसका किसी को भी अता-पता नहीं है। लेकिन सब अपने-अपने आपको सर्वेसर्वा व वर्चस्ववादी दिखाने के प्रयास में अपनी पूरी संस्कृति के विरोध में खड़े होते दिखाई दे रहे हैं।
यहाँ तक तो बात ठीक मानी जाती है कि आप उनका पूजन करिए। उनके अवतरण पर्व में हर्षोल्लास मनाइए; किन्तु जब इसके इतर अपने अहं को सिद्ध करने के प्रयास में परस्पर आराध्य देवी-देवताओं को एक-दूसरे के विरुद्ध व श्रेष्ठ दिखाने का पाखण्ड किया जाता है । उन्हें जाति के तराजुओं में देखा व तौला जाता है, तब इसे किसी भी दृष्टिकोण से सही नहीं माना जाना चाहिए।
लेकिन समाज के बीच से इन विकृतियों के विरोध में आवाज़ का न उठना भी समाज के सुप्त पड़े होने और पतनोन्मुखी होने की ओर संकेत कर रहा है। समाज को इस विषय पर गम्भीर विचार-विमर्श ही नहीं, अपितु अचानक बन रही इस बीमारी को जड़ से ख़त्म करने का साहस दिखाना पड़ेगा।
इतना ही नहीं, षड्यन्त्र के तहत समूचे देश में महापुरुषों, स्वतन्त्रता सेनानियों, चिन्तकों-विचारकों को भी जातीय अस्मिता से जोड़कर उन्हें सिर्फ अपनी जाति का महापुरुष या महान नेता बताने-सिद्ध करने का अभियान भी जोरों-शोरों से चल रहा है। जबकि कोई भी महापुरुष किसी जाति, समुदाय या वर्ग विशेष का नहीं होता। यह अलग बात है कि किसका जन्म किस जाति, समुदाय या वर्ग में हुआ।
हाँ, इसके लिए अवश्य गर्व करना चाहिए। लेकिन जिन महापुरुषों, वीर पुरोधाओं ने समूचे राष्ट्र के लिए अपने महान व्यक्तित्व एवं कृतित्व से अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किए। यदि उन्हें सिर्फ अपनी जाति, वर्ग या समुदाय से जोड़कर दिखाने का कार्य किया जाता है तो यह उनका घोर अपमान है। यह संकीर्ण सोच की मदान्धता व उच्छृंखलता के अलावा और कुछ नहीं है।
देखिए, यह कितनी घृणित बात है कि – महात्मा गांधी, राजेन्द्र बाबू, लालबहादुर शास्त्री जी को बनिया तो सरदार वल्लभभाई पटेल को कुर्मी, पाटीदार या पटेल; चन्द्रशेखर आजाद, मंगल पाण्डेय को ब्राह्मण या इन सभी को सवर्ण घोषित करना। वहीं इनके बरक्स बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर को दलितों की जाति से जोड़ना। ऐसे ही महात्मा बुद्ध, महावीर स्वामी, दशम गुरुओं सहित भारतवर्ष के सभी महान आदर्शों के ऊपर अब जातीय विमर्श होने शुरू हो गए हैं।
सन्त रविदास को चर्मकार, महर्षि वाल्मीकि को वाल्मीकि, गोस्वामी तुलसीदास, आचार्य चाणक्य इत्यादि को ब्राह्मणों का शिरोमणि घोषित किया जा रहा है। तो वहीं महाराणा प्रताप, राजा भोज सहित अनेकानेक क्षत्रिय वीरों को केवल क्षत्रियों का महानायक बताने की मुहिम भी चल रही है।
इससे बिल्कुल भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि जाति सत्य नहीं है। भारत की सनातनी व्यवस्था की प्रत्येक जाति मूलतः ऋषि-महर्षियों की सन्तानें हैं। प्रत्येक व्यक्ति का जन्म किसी न किसी कुल, वंश, जाति में अवश्य होता है। किन्तु जब वह व्यक्ति अपने कृतित्व से इतना बड़ा बन जाता है कि उसे समूचा देश अपना आदर्श-पथप्रदर्शक मानने लगता है, तब वह केवल अपने घर-परिवार, गाँव-समाज, जाति, धर्म या विशेष समाज का नहीं, अपितु वह सामाजिक जीवन की राष्ट्रीय पूँजी या विरासत बन जाता है।
ऐसे में उन्हें किसी भी संकीर्ण दायरे में खींचकर लाने या अपने क्षुद्र स्वार्थों, राजनीतिक अभिमान को तुष्ट या पुष्ट करने का यत्न-प्रयत्न करना सभ्य समाज के लिए किसी भी तरह से सही नहीं है।
इन उदाहरणों को प्रस्तुत करने के पीछे का मन्तव्य यह है कि समाज का पतन या सोचने का दायरा कितने निचले स्तर तक आता जा रहा है? जहाँ सन्तों-महापुरुषों, क्रान्तिकारियों, स्वातन्त्र्य सेनानियों, ऋषि-महर्षियों की जाति को खोदकर उन्हें अपने जातीय स्वाभिमान से जोड़कर केवल अपनी जाति-वर्ग या सम्प्रदाय के घेरे में प्रस्तुत कर, गर्व के मारे लोग फूले नहीं समा रहे हैं।
किसी के भी अवदान को अपने-अपने पैमाने से सिर्फ इसलिए स्वीकार या अस्वीकार कर देना कि फलाँ महापुरुष दूसरी जाति का है, इसलिए उसे स्वीकार नहीं किया जाएगा? वहीं किसी महापुरुष का सिर्फ इसलिए अभिनन्दन-महिमामण्डन करना कि उसे हमने अपनी जाति से नत्थी कर लिया है ; इसी आधार पर उनके अवदानों को कम या अधिक आँकने की दुष्प्रवृत्ति का चलन भी चल रहा है।
ऐसे विचार महापुरुषों व राष्ट्र के आदर्शों का अपमान तो हैं ही, साथ-साथ यह प्रवृत्ति राष्ट्रीयता के लिए घातक व विखण्डनकारी वातावरण को तैयार करने की मंशा लेकर समाज को अपना ग्रास बनाने की ओर उद्यत है। यह सब हमारी संस्कृति पर आक्रमण के प्रयोग हैं, जो धीरे-धीरे समाज में विषाक्तता उत्पन्न कर रहे हैं।
ऐसा करने वाले राष्ट्र-समाज की विविधता में एकता की अद्वितीय समरसता को कहाँ ले जाकर डुबाना चाहते हैं? जब राष्ट्र के आदर्शों, महापुरुषों का जातीय आधार पर आकलन और उसी आधार पर उन्हें आदर्श मानने या न मानने, या किसी को सशक्त-महान तो किसी को छोटा बताने-सिद्ध करने का अभियान चलाया जाएगा, तब राष्ट्र किस ओर जाएगा?
जरा सोचिए, जब हमारे पास दिशाबोध के लिए संस्कृति के ये तत्व, विरासत, महापुरुष नहीं होंगे, तब हम किस ओर जाएँगे?
स्वामी विवेकानन्द कहते थे कि—“हमारी इस पवित्र भूमि का मेरुदण्ड, मूलभित्ति या जीवन-केन्द्र एक मात्र धर्म ही है।”
और फिर वे चेतावनी देते हुए एक स्थान पर यह भी कहते हैं—“यदि कोई राष्ट्र अपनी स्वाभाविक जीवनी-शक्ति को दूर करने का प्रयास करे—शताब्दियों से जिस दिशा की ओर उसकी विशेष गति हुई है, उससे मुड़ जाने का प्रयत्न करे—और यदि वह इसमें सफल हो जाए, तो वह राष्ट्र मर जाता है। अतः यदि तुम धर्म को फेंककर राजनीति, समाज-नीति या किसी अन्य नीति को अपनी जीवन-शक्ति का केन्द्र बनाने में सफल हो जाओ, तो इसके फलस्वरूप तुम्हारा अस्तित्व तक मिट जाएगा।”
हम स्वामी विवेकानन्द की चेतावनी और उनके उपदेशों के आलोक में जब विचार करते हैं, तो क्या इन सब घटनाक्रमों, विमर्शों के पीछे भारत को विखण्डित करने का षड्यन्त्र समझ नहीं आता है?
जब हमारे पास धार्मिकता, संस्कृति, एकता-समरसता की महान विरासत नहीं होगी; जब समाज केवल इस बात को लेकर लड़ता-झगड़ता रहेगा कि मैं श्रेष्ठ—तुम हेय, तब कैसा देश व समाज आगामी पीढ़ी के समक्ष छोड़कर जाएँगे?
क्या अपने-अपने क्षुद्र स्वार्थों के लिए इस तरह के अपराधों को जायज ठहराया जा सकता है? सोचिए, समझिए और इन बिन्दुओं पर कठोरतापूर्वक कार्य करिए। क्योंकि हमारे ईश्वरीय अवतार, आदर्श-राष्ट्रनायक, सन्त-महात्मा, ऋषि-महर्षि, विचारक, स्वातन्त्र्य सेनानी, महान राजनेता किसी के भी जातीय दम्भ का विषय नहीं हैं, बल्कि वे हमारे राष्ट्र की नीति व नियति के पथप्रदर्शक हैं।



