सर्वेश कुमार तिवारी गोपालगंज के कुचायकोट प्रखंड के करवतही गांव के रहने वाले हैं। वे अहियापुर के प्राथमिक विद्यालय में विशिष्ट शिक्षक हैं। उनका देसीपन ओढ़ा हुआ नहीं है। वे गांव की मिट्टी को अच्छी तरह जानते हैं और उसे दिखाने के लिए अनावश्यक रूप से गमछा नहीं पहनते। हिंदी साहित्य में ऐसे साहित्यकार उंगलियों पर गिने जाते हैं, जिनके प्रशंसक उनकी रचना पढ़कर उनसे बात करने आते हैं। वे इंस्टा वाले सेलिब्रिटी नहीं हैं। कीबोर्ड घिसकर उन्होंने यह नाम बनाया है।
उनकी रचनाओं में माटी से जुड़ी संवेदना और सांस्कृतिक स्वाभिमान प्रमुख है। ‘परत’, ‘पुण्यपथ’ और ‘पूर्णाहुति’ जैसे उपन्यासों में ठेठ देहाती जीवन और समकालीन मुद्दों का समन्वय दिखता है। ‘परत’ ग्रामीण यथार्थ और कुछ संवेदनशील विषयों एक तरफ उठाती है। दूसरी तरफ ‘पुण्यपथ’ विस्थापित हिंदू परिवार की व्यथा को केंद्र में रखता है। ‘पूर्णाहुति’ चित्तौड़ के शौर्य की गाथा है। वे सरल भाषा में गद्य-पद्य दोनों लिखते हैं और हर आयु वर्ग के पाठकों तक पहुंचते हैं। प्रतिवर्ष ‘सदानीरा महोत्सव’ के आयोजन से वे क्षेत्र में साहित्यिक गतिविधि बढ़ाते हैं। उनसे पहला परिचय मित्र जलज के माध्यम से हुआ था। वे सर्वेश की किताबों के प्रकाशक भी रहे हैं।

समाज का कांग्रेसी वर्ग नेहा बोरा पर लिखी उनकी कुछ पंक्तियां पढ़कर लाल हो रहा है। इससे अच्छा कोई क्या लिख सकता है नेहा के लिए, कि उसे पढ़कर नेहा का प्रशंसक भी ‘लाल’ हो जाए। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती। नेहा पर लिखे पर इतनी तीखी प्रतिक्रिया देने वालों ने यदि लेखक का ध्रुव राठी पर लिखा हुआ यह साहित्य पढ़ लिया होता तो क्रांति होकर रहती। बात लाल होने पर खत्म न हो जाती। कवि लिखता है:
सब मिट जाएगा कौन धराया, कौन कौन बदहाल हुआ।
इतिहास याद रखता है कि कितनों का चूतड़ लाल हुआ।
हर हुड़दंगी को पकड़-पकड़ जब-जब भी गांव कुटाई हो,
अंबर से फूल बरसते हैं, जनता का मन खुशहाल हुआ।
सत्ता का भाग्य लिखा जाता है, सिर्फ पुलिस के डंडे से।
जिसने भी गांव नहीं तोड़ी, वह शासक खस्ताहाल हुआ।
एक सभ्य देश की सत्ता को इतना तो दिखलाना होगा,
नेपाल बनाना चाहा उन सब का फट कर नेपाल हुआ।
जो शत्रुबोध से आंख चुरा कर दूध पिलाए दुश्मन को,
ऐ भकचोन्हर, अपराध यही उन सब मूर्खों का काल हुआ।
ये पंक्तियां इंडिया अलायंस के कंटेंट क्रिएटर ध्रुव राठी पर लिखी गई हैं। व्यंग्य की धार इतनी तीखी है कि ‘लाल’ होना तो न्यूनतम प्रतिक्रिया है। सर्वेश की कलम ऐसी है—न तो शहर की आबोहवा में सिमटी, न वैचारिक सुविधा के अनुसार चुप। वे लोक-अस्मिता और समय के सत्य को बिना डरे लिखते हैं। कुछ लोग इसे बर्दाश्त नहीं कर पाते। रायपुर के पंकज कुमार झा जैसे वरिष्ठजनों ने भी ईर्ष्या जाहिर की कि फेसबुक पर भी महफिल लूट लेने वाले लेखक को पुरस्कार कैसे मिल सकता है। यह बात अलग है कि उनका अंदाज व्यंग्यात्मक था। उन्होंने जो भी लिखा सर्वेश के लिए स्नेहवश लिखा। बहुसंख्यक समाज में उनको मिला यह सम्मान गर्व का विषय बना है।
सर्वेश कुमार तिवारी वर्तमान समय के अग्रगण्य युवा साहित्यकारों में हैं। उनकी मौलिक सोच, गांव से जुड़ाव और निडर लेखनी उन्हें महत्वपूर्ण बनाती है। जब साहित्य अक्सर शहरों तक सीमित रहता है, तब ऐसी कलम दुर्लभ है। इफको सम्मान उनकी मेहनत की स्वीकृति है। साहित्य अमर है। जो माटी से जुड़ी कलम समय के मुद्दों पर व्यंग्य की धार से लिखती है, उसे सम्मान मिलना ही चाहिए। ऐसे लेखकों के कारण हिंदी साहित्य की जड़ें और मजबूत होती हैं।



