इंदुशेखर तत्पुरुष
ये उजड्ड है, वज्रमूर्ख है,
जगह–जगह ठुकराया है।
फिर भी इसकी अकड़ तो देखो,
राजवंश का जाया है।।
जब भी इसको दौरा पड़ता,
अल्ल–बल्ल कुछ बकता है।
जब–जब ये पिटता चुनाव में,
तब विदेश जा छुपता है।।
कभी भागता थाईलैंड ये,
जाता कभी मलेशिया।
अबकी बार सुना था मस्कट,
कैसा कष्ट कलेसिया।।
सबको निपटाकर बतला रे!
अब किसको निपटाएगा?
गिरने की भी हद होती है,
कितना गिरता जाएगा?
देशद्रोहियों का पिछलग्गू ,
सोरोसी पिट्ठू लगता।
कौवे जैसी वाणी इसकी
बड़ा मियाँ मिट्ठू बनता।।
जिनकी देशभक्ति जगजाहिर,
उनको ये कहता गद्दार।
असल मूर्ख तो वे जो अब भी
करते हैं इसको स्वीकार।।



