प्रणय विक्रम सिंह
दिल्ली । भारतीय लोकतंत्र का सौंदर्य उसकी विविधता, वैचारिक बहुलता और संवाद की परंपरा में निहित है। यहां असहमति को स्थान मिला है, आलोचना को भी। किंतु जब राजनीतिक विरोध मर्यादा की सीमा लांघकर राष्ट्रसेवा से जुड़े संगठनों, नेतृत्व और करोड़ों नागरिकों की वैचारिक आस्था को ‘गद्दारी’ जैसे शब्दों से परिभाषित करने लगे, तब वह केवल राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं रह जाती, वह उस गहरी वैचारिक बेचैनी का उद्घाटन बन जाती है, जो लंबे समय से भारत की सांस्कृतिक राष्ट्रवादी चेतना के प्रति एक विशेष राजनीतिक मानसिकता के भीतर विद्यमान रही है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति राहुल गांधी की अमर्यादित टिप्पणी को इसी व्यापक संदर्भ में समझना होगा। यह विवाद केवल एक बयान का विवाद नहीं है। यह भारत की राजनीति में चल रहे उस गहरे वैचारिक संघर्ष का प्रतिबिंब है, जिसमें एक ओर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, सभ्यतागत आत्मविश्वास और ‘राष्ट्र प्रथम’ की चेतना है, जबकि दूसरी ओर वह राजनीति है, जिसने दशकों तक भारतीय समाज को जाति, क्षेत्र, तुष्टीकरण और प्रतीकात्मक धर्मनिरपेक्षता की रेखाओं में बांटकर सत्ता का गणित साधने का प्रयास किया।
विडंबना यह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रश्न वही कांग्रेस उठा रही है, जिसका राजनीतिक इतिहास स्वयं लोकतांत्रिक संस्थाओं के केंद्रीकरण, आपातकाल, तुष्टीकरण और वोटबैंक की राजनीति से जुड़ा रहा है। भारतीय राजनीति का यह शायद सबसे बड़ा विरोधाभास है कि जिसने लोकतंत्र पर आपातकाल थोपकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटा, वही दल आज लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रभक्ति का प्रमाणपत्र बांटने का प्रयास कर रहा है।
राहुल गांधी की टिप्पणी को यदि केवल चुनावी बयान मानकर छोड़ दिया जाए, तो यह अधूरा विश्लेषण होगा। दरअसल यह उस वैचारिक असहजता का परिणाम है, जो पिछले एक दशक में भारत की राजनीति में आए बड़े परिवर्तन के कारण उत्पन्न हुई है। लंबे समय तक राष्ट्रवाद को संदेह और संकोच के घेरे में रखने वाली राजनीति अब स्वयं वैचारिक रक्षात्मकता में खड़ी दिखाई दे रही है।
नरेंद्र मोदी का उदय केवल एक नेता का उदय नहीं था। वह उस भारत के पुनरुत्थान का प्रतीक था, जो दशकों तक अपनी सांस्कृतिक पहचान को राजनीतिक संकोच में जीता रहा। पहली बार राष्ट्रवाद केवल चुनावी नारा नहीं रहा, वह शासन का दर्शन बना।
विदेश नीति से लेकर सुरक्षा नीति तक, सांस्कृतिक पुनर्जागरण से लेकर आत्मनिर्भरता तक, भारत ने स्वयं को एक आत्मविश्वासी राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करना शुरू किया।
यही वह बिंदु है, जहां कांग्रेस की वैचारिक बेचैनी सबसे अधिक स्पष्ट होती है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर कांग्रेस की असहजता नई नहीं है। स्वतंत्रता के बाद से ही संघ को संदेह की दृष्टि से देखने का एक स्थायी राजनीतिक आग्रह कांग्रेस के भीतर रहा। क्योंकि संघ सत्ता आधारित संगठन नहीं है, वह समाज आधारित वैचारिक शक्ति है। उसकी जड़ें चुनावी राजनीति में नहीं, बल्कि सामाजिक संगठन, सेवा और सांस्कृतिक चेतना में हैं।
विश्व के सबसे विशाल सांस्कृतिक संगठन ‘संघ’ ने शाखा की अनुशासित पंक्ति में राष्ट्रप्रेम के संस्कार बोये, समाज के प्रत्येक क्षेत्र में सेवा, समरसता और संगठन का भाव जगाया।
भारत की आत्मा को आत्मविश्वास दिया, बिखरे समाज को एकात्मता के सूत्र में पिरोया, राष्ट्रवाद को जीवन का आधार बनाया और अखंड भारत के निर्माण के दिव्य संकल्प से जन-जन को जोड़ने का कार्य किया।
यही कारण है कि संघ को केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की तरह परिभाषित करना संभव नहीं रहा। आपदा हो, महामारी हो, बाढ़ हो, भूकंप हो या सामाजिक संकट, संघ के स्वयंसेवक बिना प्रचार और राजनीतिक लाभ की अपेक्षा के सबसे पहले मैदान में दिखाई देते हैं। गांवों, वनवासी क्षेत्रों, सीमांत समाज और शिक्षा के क्षेत्र में दशकों से चल रहे कार्यों ने संघ को समाज के भीतर गहरी स्वीकार्यता दी है। यही सामाजिक स्वीकार्यता कांग्रेस की सबसे बड़ी वैचारिक असहजता का कारण बनती रही है।
दरअसल कांग्रेस की राजनीति लंबे समय तक ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ पर आधारित रही। इफ्तार राजनीति, तुष्टीकरण आधारित भाषण, पहचान-आधारित गठजोड़ और वोटबैंक की रणनीतियों को धर्मनिरपेक्षता का पर्याय बना दिया गया। इस राजनीति में राष्ट्रवाद को अक्सर संदेह की दृष्टि से देखा गया, सांस्कृतिक प्रतीकों को ‘बहुसंख्यकवाद’ कहकर खारिज किया गया और भारत की सभ्यतागत चेतना को राजनीतिक विमर्श में हाशिए पर रखने का प्रयास हुआ।
लेकिन भारत का सामाजिक मानस बदल चुका है। आज का भारत अपनी सांस्कृतिक पहचान को लेकर अपराधबोध में नहीं जीता। वह काशी विश्वनाथ धाम के पुनरुत्थान को भी स्वीकार करता है और चंद्रयान की सफलता पर भी गर्व करता है। वह राम मंदिर को भी अपनी सभ्यता का प्रतीक मानता है और ‘आत्मनिर्भर भारत’ को भी राष्ट्रीय स्वाभिमान का विस्तार समझता है। यही ‘नया भारत’ कांग्रेस की पुरानी राजनीतिक भाषा को अप्रासंगिक बना रहा है।
यही कारण है कि जब भारत सर्जिकल स्ट्राइक करता है, सीमाओं पर निर्णायक रुख अपनाता है, आतंकवाद पर कठोर नीति लागू करता है और वैश्विक मंचों पर आत्मविश्वास से अपनी बात रखता है, तब कांग्रेस का वैचारिक संकट और गहरा होता जाता है।
सवाल यह भी है कि ‘गद्दारी’ का नैतिक अधिकार किसके पास है? क्या राष्ट्रभक्ति पर उपदेश देने का अधिकार उन लोगों को है, जिन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक पर सेना से सबूत मांगे? क्या नैतिकता का दावा वे लोग कर सकते हैं, जिन्होंने विदेशी मंचों पर भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं और छवि को कठघरे में खड़ा किया? क्या राष्ट्रवाद पर प्रश्न उठाने वाले यह भूल सकते हैं कि वर्षों तक अलगाववादी राजनीति और तुष्टीकरण आधारित समीकरणों ने देश को कितनी बड़ी वैचारिक क्षति पहुंचाई?
कश्मीर में वर्षों तक अलगाववादी तत्वों के प्रति दिखाई गई राजनीतिक नरमी, यासीन मलिक जैसे चेहरों के प्रति सत्ता प्रतिष्ठानों की अस्वाभाविक सहजता और पंजाब में अस्थिरता के दौर में वोटबैंक आधारित राजनीतिक समीकरणों ने देश की एकता को गहरी चोट पहुंचाई। विडंबना यह है कि राष्ट्रवाद पर प्रश्न वही राजनीति उठा रही है, जिसने कई बार राष्ट्रीय सुरक्षा और वैचारिक स्पष्टता के स्थान पर तुष्टिकरण और राजनीतिक सुविधा को प्राथमिकता दी।
भारत की जनता अब इन प्रश्नों को समझती है। यही कारण है कि कांग्रेस की भाषा जितनी तीखी होती जा रही है, उसका जनाधार उतना ही सिमटता जा रहा है। क्योंकि राजनीतिक आक्रोश और वैचारिक आत्मविश्वास में अंतर होता है। आत्मविश्वास संवाद करता है, हताशा आरोप लगाती है। राहुल गांधी की टिप्पणी को इसी राजनीतिक अधैर्य और वैचारिक संकट के संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए।
राष्ट्रसेवा, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और भारत की एकात्म चेतना को निरंतर सशक्त कर रहे प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और ‘संघ’ के प्रति कांग्रेस की वैचारिक असहजता स्वाभाविक है।
दरअसल लोकतंत्र में आलोचना आवश्यक है। नरेंद्र मोदी की नीतियों का विरोध भी लोकतांत्रिक अधिकार है। अमित शाह के निर्णयों पर प्रश्न उठाना भी राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है। किंतु आलोचना और अवमानना के बीच एक स्पष्ट रेखा होती है। जब राजनीतिक संवाद तथ्य और विचार से हटकर अपमानजनक विशेषणों पर उतर आए, तब वह लोकतांत्रिक परिपक्वता नहीं, बल्कि वैचारिक असंतुलन का संकेत बन जाता है।
राष्ट्रवादी विचारधारा से मतभेद हो सकते हैं, लेकिन करोड़ों स्वयंसेवकों की राष्ट्रनिष्ठा पर प्रश्न उठाना अंततः भारत की उस सामाजिक चेतना का अपमान है, जिसने सेवा, संगठन और समर्पण को राजनीति से ऊपर रखा है।
आज भारत एक निर्णायक संक्रमण काल से गुजर रहा है। यह केवल सत्ता परिवर्तन का दौर नहीं है, यह राजनीतिक संस्कृति के परिवर्तन का दौर है। यहां राजनीति अब केवल चुनावी समीकरणों का खेल नहीं रह गई। वह सभ्यतागत दिशा, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और राष्ट्रीय पहचान का विमर्श बन चुकी है।
यही कारण है कि कांग्रेस और राहुल गांधी की भाषा में बढ़ती आक्रामकता दरअसल उस वैचारिक असहजता का संकेत है, जो बदलते भारत को समझने में असमर्थता से उत्पन्न हुई है।
लेकिन भारत अब बदल चुका है। यह ‘नया भारत’ राष्ट्रवाद को संकोच से नहीं, स्वाभिमान से देखता है। यह सांस्कृतिक चेतना को विभाजन नहीं, एकात्मता का आधार मानता है। यह ‘राष्ट्र प्रथम’ को राजनीतिक नारा नहीं, राष्ट्रीय चरित्र का आधार मानता है। यही परिवर्तन आज भारत की राजनीति की नई धुरी है। और शायद यही वह सत्य है, जिसे स्वीकार करने में जाति, क्षेत्र और तुष्टीकरण की विभाजक रेखाओं पर खड़ी जनाधारहीन, मुद्दाविहीन और नीतिविहीन कांग्रेस सबसे अधिक असहज महसूस कर रही है और उसकी कुंठा हास्यास्पद बयानों के रूप में सामने आ रही है। कांग्रेस को समझना होगा कि…
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