मोदी के उत्तराधिकारी को चुनने में अभी समय है

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सुरेंद्र चतुर्वेदी
जयपुर: देश के अभिजात्य वर्ग में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उत्तराधिकारी को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। *ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में कोई कमी आई है या जनता में उनके प्रति निराशा है लेकिन अधिकांश वर्ग में यह धारणा है कि 2029 के बाद मोदी किसी और राजनेता को अपना उत्तराधिकारी बना कर जा सकते हैं।* भाजपा के लिए आज भी मोदी बड़ा और विश्वसनीय चेहरा हैं। लेकिन मोदी को भी ऐसे उत्तराधिकारी की तलाश होगी जो उनके 2047 में महाशक्ति और विकसित भारत बनाने के उनके संकल्प को साकार कर सके।

*ये भी आश्चर्यजनक है कि ये चर्चा भी भाजपा को लेकर ही है, कांग्रेस या अन्य क्षेत्रिय दलों में तो ये प्रश्न भी नहीं उठता।* तो अब प्रश्न यह उठता है कि ऐसे कौन कौन से भाजपा नेता हैं जिनमें मोदी के बाद की संभावनाएं देखी जा रही हैं। 2013 में जब मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया था, उस समय भाजपा के पास सुषमा स्वराज, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, शिवराज सिंह और वसुंधरा राजे जैसे जननेता थे जिनके प्रति कार्यकर्ताओं और मतदाताओं का प्रबल आकर्षण था। हालांकि उस समय अरुण जेटली, वैंकय्या नायडू और अनंत कुमार जैसे नेता भी थे लेकिन वो चुनाव और पार्टी प्रबंधन में माहिर खिलाड़ी थे। इसीलिए लंबी ऊहापोह और मंथन के बीच भाजपा ने मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित कर दिया।

तेरह साल बाद अब स्थिति बदल चुकी है। *भाजपा का नया नेतृत्व तैयार है। गृह मंत्री अमित शाह, योगी आदित्यनाथ और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस पर सबकी निगाहें हैं। इनके अलावा राजनाथ सिंह और शिवराज सिंह को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता परंतु उनकी उम्र उनको थका रही है।* इसके अलावा अभी कोई और नजर नहीं आता। तो अब प्रश्न उठता है कि क्या मोदी के बाद का निर्णय सहजता से हो जाएगा ?

दरअसल *मोदी के बाद के चुनाव में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण है। इसके बाद ही भाजपा संगठन या अन्य वर्ग की भूमिका तय होती है। इसलिए ये देखना महत्वपूर्ण होगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किसके साथ खड़ा है। उत्तर प्रदेश का चुनाव इस दिशा में पहला पड़ाव है।* जहाँ योगी आदित्यनाथ के साथ संघ मजबूती से खड़ा है। यह चुनाव दोनों आपसी तालमेल के साथ ही लड़ रहे हैं। *यदि भाजपा को उत्तरप्रदेश में विशाल अंतर वाली जीत मिलती है तो योगी की संभावनाएं दिल्ली में मजबूत होंगी। लेकिन यदि भाजपा की सरकार मामूली बहुमत के साथ बनती है तो योगी की दिल्ली की दावेदारी कमजोर हो जाएगी।*

इसी प्रकार *महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस भी भाजपा में उभरते नए चेहरों में से हैं। लेकिन अभी तक उनकी चमक वैसी नहीं बनी है जैसी योगी आदित्यनाथ की है। उनका अंदाज़ शहरी है। अभी देश में अपनी पहचान बनाने के लिए उनको कम से कम पाँच साल महाराष्ट्र छोड़ दिल्ली में टिकना पड़ेगा, जिसके लिए वो स्वयं तैयार नहीं दिखते हैं। केवल संघ के आशीर्वाद से मोदी के उत्तराधिकारी बन पाना उनके लिए संभव नहीं होगा।* ऐसा ही प्रयोग नितिन गडकरी के साथ हो चुका है, जिनकी स्थिति सबके सामने ही है।

तीसरे व्यक्ति *गृह मंत्री अमित शाह हैं। ये कहना ग़लत नहीं होगा कि पिछले तेरह वर्षों से भाजपा को वो ही चला रहे हैं। वर्तमान भाजपा की उभरते हुए नेतृत्व को उन्होंने ही तराशा और सम्हाला है। योगी आदित्यनाथ हों, देवेंद्र फड़नवीस, हेमंत बिस्वा सरमा, शुभेंदु अधिकारी जैसे राजनेता हों या विनोद तावड़े, सुनील बंसल जैसे संगठकर्ता सब अमित शाह की ही देन हैं।* गृह मंत्री के रूप में वे अपनी कार्यकुशलता का लोहा मनवा चुके हैं। संसद में उनका प्रदर्शन विपक्षी नेताओं को मौन कर देता है, लेकिन दिक्कत यह है कि उनको राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में उतनी स्वीकार्यता नहीं है जितनी मोदी, योगी या फड़नवीस को है। इसका कारण भी स्पष्ट है कि शाह ने भाजपा को संघ की परिपाटी से उलट आक्रमक राजनीतिक दल में बदल दिया।

इसलिए अभी इस प्रश्न का जवाब दूर है कि मोदी के बाद कौन ? लेकिन ये जरूर है कि उत्तरप्रदेश चुनाव के परिणाम इस बहस में तेजी लाएंगे कि मोदी का उत्तराधिकारी योगी आदित्यनाथ होने जा रहे हैं या अमित शाह।

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