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हरिद्वार । तमस से भरे हुए मूर्खों के झुंड जिनके हृदय कठोर और बुद्धि अल्प है, वह परम पवित्र निश्छल हृदय परम भावमय ,भक्ति में डूबे हुए पवित्र संत श्री धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के विरुद्ध जो प्रलाप कर रहे हैं उसके द्वारा वह अपनी मूर्खता का ही परिचय दे रहे हैं .
एक चूक पूज्य बाल स्वरूप संत धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जी से भी हो गई .
दो भक्ति में डूबे हुए संत हृदय अथवा भाव में डूबे लोग परस्पर इस तरह की छेड़छाड़ करते हैं कि वह अपने इष्ट देव की महिमा बताने के क्रम में भिन्न अवतार भिन्न स्वरूप का विनोद करते हैं और उत्तर में उन्हें अपने स्वरूप के विषय में भी कुछ सुनना पड़ता है.
तो भगवान राम के पक्ष में और भगवान कृष्ण पर विनोद करने के उत्साह में शास्त्री जी बह गए परंतु जब वह दुनिया घूम आए हैं तो उन्हें ऐसा बचपना तो नहीं करना चाहिए था कि जो बात मठ और आश्रमों के भीतर या दो संतों और भक्तों के बीच में आपस में होती है उसे ऐसे सार्वजनिक माध्यम में भी प्रसारित होने दें जहां रजोगुण और तमोगुण से भरे हुए लोगों की विशाल भीड़ होती है और उनके हृदय की पवित्रता और कोमलता के भावो को पहचानने वाले शायद ही कोई विरले होते हैं .
वहां यह नहीं कहना चाहिए था .
पात्र के विषय में भी चूक हो गई .
ऐसे लोग भी कहीं हैं जो अपने पिता या अपने परिवार की कमाई के कारण अथवा उसके किसी योगदान के कारण पदों पर पहुंच गए हैं परंतु जिन्हें ना तो संस्कार प्राप्त है, ना उस भाव जगत का स्पर्श है , ना उस परंपरा का परिचय है ,वह सब शास्त्री जी पर टूट पड़े.
यह तो अच्छा हुआ कि शास्त्री जी ने सबसे उसके लिए क्षमा याचना कर ली है .
केवल एक बाल हृदय संत के एक विनोद पर इतना आग बबूला हो रहे इन लोगों ने कौन सा पुरुषार्थ धर्म के क्षेत्र में किया है ?भारत में धर्म संस्कार के जागरण के लिए आज तक क्या किया है ?भगवान कृष्ण के जन्म भूमि स्थान पर जो मंदिर है वह अभी तक तुम बना नहीं पाए .तुम्हारी कोई ना। शक्ति है, ना आकांक्षा है, ना पवित्र भाव है ,ना पुरुषार्थ का विचार है .
अरे मूर्ख ,जिस बात को जानते नहीं उसमें टांग मत लगाया करो .
इसमें तुम्हारी जांघ उघड़ती है .
शास्त्री जी पर जो तुम बोल रहे हो उससे तुम्हारे भीतर का कीचड़ कांदो,गंदगी ,सब सामने आ रहा है और तुम कितने मूढ़ हो और मंदबुद्धि हो ,यह दिख रहा है.
इसे छोड़ दो .
चोट जरूर मिलेगी बहुत प्रकार की.



