गौरव कुमार मिश्र
दिल्ली। एक हालिया रिपोर्ट ने सीजेपी और विपक्षी आंदोलन को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इंडियन प्रेस यूनियन जैसी संस्थाओं के माध्यम से ₹599 से ₹1799 तक के दाम पर प्रेस कार्ड, फर्जी प्रोफाइल और माइक बांटे गए, जिनमें कई लोगों के पास कोई मीडिया अनुभव नहीं था। दंगों को भड़काने और दिल्ली पुलिस तथा सरकार को बदनाम करने के लिए एडिटेड सीसीटीवी फुटेज तथा भाड़े के पत्रकारों का इस्तेमाल करने का दावा भी किया गया है। मकसद कानून-व्यवस्था को नुकसान पहुंचाना और एक खास नैरेटिव को सोशल मीडिया पर ट्रेंड कराना बताया गया है। ऐसे आरोपों के बीच पत्रकारिता की विश्वसनीयता, संस्थागत भूमिका और मैदान में खड़े लोगों की जवाबदेही पर चर्चा जरूरी हो गई है।
संस्थाओं की भूमिका और विचारधारा का सवाल
मीडिया स्कैन और कला प्रेमी लेखक संघ के तत्वावधान में रविवार को हरियाणा भवन में होने वाला आयोजन इन्हीं सवालों को केंद्र में रखेगा। कार्यक्रम में उन मुद्दों पर चर्चा होगी जो प्रेस क्लब, एडिटर्स गिल्ड और आईडब्ल्यूपीसी जैसी संस्थाओं की कार्यशैली से जुड़े हैं। ये संस्थाएं पत्रकारों के हितों की रक्षा के लिए बनी हैं, लेकिन अक्सर आरोप लगते रहे हैं कि वे एक खास राजनीतिक और वैचारिक इकोसिस्टम के साथ काम करती हैं। जिस तरह देश के नागरिक प्रधानमंत्री से अपेक्षा करते हैं कि वे केवल एक दल के नेता नहीं, बल्कि 140 करोड़ नागरिकों के प्रधानमंत्री बनकर काम करें, उसी तरह इन संस्थाओं से भी अपेक्षा की जाती है कि वे अर्णब गोस्वामी और अजीत अंजुम जैसे पत्रकारों के बीच फर्क न करें। दोनों ही पत्रकार हैं और दोनों के संघर्ष को एक जैसा महत्व मिलना चाहिए। जब संस्थाएं किसी खास विचारधारा के एजेंट की तरह व्यवहार करती हैं, तो पूरे पत्रकार समुदाय का संघर्ष कमजोर होता है। हरियाणा भवन में होने वाली चर्चा में इन संस्थाओं की निष्पक्षता, सदस्यता प्रक्रिया और जवाबदेही जैसे मुद्दों पर उन पत्रकारों के अनुभव सुने जाएंगे जो जंतर मंतर के दौरान मैदान में मौजूद थे।
जंतर मंतर से सिटीजन जर्नलिज्म तक: पत्रकार कौन है?
जंतर मंतर प्रदर्शन के दौरान सबसे बड़ा सवाल यही उठा कि पत्रकार आखिर कौन होता है। क्या केवल औपचारिक प्रशिक्षण और किसी संस्थागत जवाबदेही वाले व्यक्ति को पत्रकार माना जाए, या हर वह व्यक्ति जो जानकारी साझा करता है, पत्रकार की श्रेणी में आ सकता है? कंटेंट क्रिएटर और पारंपरिक पत्रकार के बीच रेखा कहां खिंचती है, यह भी चर्चा का विषय होगा। सिटीजन जर्नलिज्म लोकतंत्र को मजबूत कर सकता है, लेकिन जब आम नागरिक बिना जांच-पड़ताल और संपादकीय प्रक्रिया के समाचार फैलाता है, तो गलती, पूर्वाग्रह या जानबूझकर गलत सूचना का खतरा बढ़ जाता है। इसकी जवाबदेही कैसे तय हो-सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी है या हर व्यक्ति की-यह सवाल आज के मीडिया परिदृश्य के लिए केंद्रीय है।
कार्यक्रम में जंतर मंतर को ग्राउंड जीरो से कवर करने वाले पत्रकार अपने अनुभव साझा करेंगे। वे बताएंगे कि मैदान में क्या हो रहा था और कैसे सूचनाओं का प्रसार हुआ। यह चर्चा किसी तुरंत निष्कर्ष तक पहुंचने की कोशिश नहीं है, बल्कि गहरी और खुली बातचीत की शुरुआत है। पत्रकारिता की परिभाषा, संस्थागत पूर्वाग्रह और डिजिटल युग में जवाबदेही जैसे मुद्दे जब मैदान के अनुभवों के साथ जुड़ते हैं, तभी स्पष्टता आती है। हरियाणा भवन का यह आयोजन इन्हीं सवालों को गंभीरता से उठाने और विभिन्न दृष्टिकोणों को सामने लाने का प्रयास है।



