डॉ. मयंक चतुर्वेदी
दिल्ली । असदुद्दीन ओवैसी का समान नागरिक संहिता का विरोध करना कोई नया राजनीतिक रुख नहीं है। 15 सितंबर को भोपाल में आयोजित सभा में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) प्रमुख ने एक बार फिर यूसीसी पर सवाल उठाते हुए कहा, “मुसलमानों के अपने मजहबी कानून और पहचान हैं तथा संविधान के अनुच्छेद 14, 25, 26 और 29 के तहत मिले अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।” उनका तर्क है कि समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के नाम पर हिंदू व्यक्तिगत कानूनों की संरचना दूसरे समुदायों पर नहीं थोपी जा सकती।
यह बहस लोकतंत्र में पूरी तरह वैध है। धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यक अधिकार और व्यक्तिगत कानून संविधान के गंभीर विषय हैं। चलो हमने यह एक बार को मान भी लिया, किंतु क्या इसकी आड़ लेकर मुस्लिम महिलाओं के समानता, गरिमा, स्वतंत्रता और सुरक्षा के अधिकार से खिलवाड़ किया जाता रहना चाहिए? ऐसे में एडवोकेट औवेसी और उन तैसे तमामों से सवाल सीधा है- जब व्यक्तिगत कानून या धार्मिक परंपरा के नाम पर किसी महिला की इच्छा, गरिमा अथवा शारीरिक स्वायत्तता प्रभावित होती है, तब उसकी सुरक्षा का रास्ता क्या होगा?
निकाह हलाला से जुड़े हालिया मामलों ने यह बार-बार सोचने पर मजबूर किया है कि क्या मुस्लिम महिला की गरिमा का ध्यान नहीं रखा जाना चाहिए, क्या उसका सम्मान, सम्मान नहीं है? उत्तर प्रदेश के अमरोहा मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जुलाई 2026 में उस एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया, जिसमें एक महिला ने आरोप लगाया था कि उसके नाबालिग रहते हुए और बाद में वयस्क होने पर भी निकाह हलाला के नाम पर उसके साथ यौन अपराध किए गए। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आपराधिक कृत्य को व्यक्तिगत कानून की आड़ नहीं दी जा सकती। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके समक्ष हलाला की संवैधानिक वैधता का प्रश्न विचाराधीन नहीं था।
वस्तुत: यहां यह समझना जरूरी है कि धार्मिक आस्था और आपराधिक कृत्य एक ही चीज नहीं हो सकते हैं। किसी भी समुदाय की धार्मिक (मजहबी, रिलीजियस) पहचान का सम्मान लोकतांत्रिक समाज में होना ही चाहिए, इससे मना कौन करता है, किंतु किसी महिला के साथ जबरदस्ती, यौन शोषण अथवा हिंसा को मजहबी या अन्य किसी भी स्तर पर शब्दावली गढ़कर वैध नहीं माना जा सकता। यह तो सीधे तौर पर मजहब की आड़ लेकर किसी महिला के साथ बलात्कार करना है!
उत्तराखंड में यूसीसी लागू होने के बाद मई 2026 में हलाला से जुड़ा पहला मामला सामने आया। हरिद्वार के बुग्गावाला क्षेत्र में एक महिला की शिकायत पर पुलिस ने उसके पति और ससुराल पक्ष के लोगों के खिलाफ कार्रवाई की और आरोप-पत्र दाखिल किया। महिला ने बताया था कि उस पर निकाह हलाला के लिए दबाव बनाया गया। यदि किसी महिला को उसके वैवाहिक जीवन में वापस लौटने के लिए किसी दूसरे पुरुष से विवाह और फिर संबंध-विच्छेद की प्रक्रिया से गुजरने के लिए मजबूर किया जाता है, तो सबसे पहले उसकी स्वतंत्र इच्छा और गरिमा का प्रश्न सामने आता है, इसीलिए ओवैसी सहित उन सभी नेताओं से सवाल पूछा जाना चाहिए जो यूसीसी का विरोध करते हैं कि वे मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए कौन-सा स्पष्ट वैकल्पिक विधिक ढांचा चाहते हैं।
यदि उनका तर्क है कि व्यक्तिगत कानूनों की रक्षा होनी चाहिए, तो क्या उस संरक्षण के भीतर महिला की समानता और गरिमा की भी उतनी ही मजबूत गारंटी होगी? यदि कोई महिला स्वयं अपने अधिकारों के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाती है, तो क्या उसकी आवाज को मजहबी पहचान के प्रश्न के नीचे दबा दिया जाना चाहिए?
ध्यातव्य हो कि सर्वोच्च न्यायालय में भी बहुविवाह और निकाह हलाला से जुड़े संवैधानिक प्रश्नों पर विधिक प्रक्रिया जारी है। 31 जुलाई 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने महिला अधिकार कार्यकर्ता जकिया सोमन, डॉ. नूरजहाँ सफिया नियाज और अन्य की याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा और उसे पहले से लंबित मामलों के साथ जोड़ दिया। वस्तुत: यह घटनाक्रम बताता है कि प्रश्न अब महज राजनीतिक भाषणों तक सीमित नहीं रह गया है। यह संविधान के उन मूल्यों तक पहुंच चुका है जिनमें समानता, गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता शामिल हैं।
बेशक, भारत का संविधान नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता देता है, पर उसी संविधान में समानता और जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार भी है, यह भी किसी अधिवक्ता या अन्य औवेसी जैसे व्यक्तियों को नहीं भूलना चाहिए, इसलिए किसी भी व्यक्तिगत कानून की चर्चा करते समय यह प्रश्न अनिवार्य है कि उसका वास्तविक प्रभाव उस व्यक्ति पर क्या पड़ रहा है जो उस व्यवस्था के भीतर सबसे कमजोर स्थिति में है।
यहां सभी को यह भी समझना चाहिए कि मुस्लिम महिला को सिर्फ मुस्लिम पहचान के प्रतिनिधि के रूप में देखने की दृष्टि भी अधूरी है, क्योंकि एक देश के लिए वह पहले एक नागरिक है, फिर एक महिला है और उसके बाद उसकी अन्य सामाजिक तथा मजहबी पहचानें आती हैं। उसके अधिकारों का निर्धारण उसकी मजहब पहचान के कारण कम या अधिक नहीं हो सकता। तब ऐसे में यूसीसी हो या व्यक्तिगत कानून, कसौटी एक ही होनी चाहिए कि क्या कानून नागरिक को समान सुरक्षा देता है? क्या वह महिला की सहमति और गरिमा की रक्षा करता है? क्या वह हिंसा और शोषण के विरुद्ध प्रभावी सुरक्षा देता है?
ओवैसी को यूसीसी का विरोध करने का लोकतांत्रिक अधिकार है। उन्हें शरीया और मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के पक्ष में तर्क रखने का भी अधिकार है, वह उसे रख भी रहे हैं, किंतु उसी लोकतांत्रिक अधिकार के साथ उनसे यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि उन मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की गारंटी कैसे होगी जो व्यक्तिगत कानून की किसी व्याख्या या उसके दुरुपयोग से स्वयं को पीड़ित मानती हैं?
आज उनसे पूछा जाना चाहिए कि यदि शरिया की आड़ लेकर मुस्लिम महिलाओं पर अत्याचार किया जा रहा है तो एक वकील होने के बाद भी उन तमाम शरिया नियमों की वकालात आखिर वह क्यों कर रहे हैं और अपनी कौम को गुमराह क्यों कर रहे हैं ? यदि शरिया से मुस्लिम महिला अपने को असुरक्षित महसूस करती है, तब वह उसके पक्ष में क्यों खड़े हैं ? और यदि किसी महिला को अपनी ही वैवाहिक जिंदगी में सम्मान, सहमति और न्याय के लिए संघर्ष करना पड़े, तो उसकी पीड़ा को मजहबी पहचान की आड़ देकर उसे नहीं देखना, क्या यह संविधान की भावना के अनुरूप हो सकता है?
व्यक्तिगत कानून की बहस में यदि महिला की आवाज गायब हो जाए, तो वह बहस अधूरी है। यह बात भी ओवैसी और उन तमाम लोगों को समझना चाहिए जोकि आज यूसीसी का विरोध कर रहे हैं। भारतीय संविधान की नजर में प्रत्येक नागरिक समान हैं। जिसमें कि जो कमजोर हैं उनके लिए समान होने के बाद फिर कुछ विशेष अधिकार दिए गए हैं, किंतु इसका मतलब यह नहीं हैं कि कोई किन्हीं नियमों का हवाला देकर परस्पर शोषण ही करने लगे। इस संबंध में हिन्दू कानून अपने आप में आदर्श हैं, और जो आदर्श होता है, अनुसरण समाज में उन्हीं का किया जाता है, यही सदियों से परंपरा रही है, इसलिए अच्छा हो कि यूसीसी के विरोध में माहौल बनाने के स्थान पर उसके समर्थन के लिए मुस्लिम समाज आगे आए, यही वक्त की नजाकत है और यही समय की आवश्यकता भी…।



