वामपंथी रामायण किसके लिए बनाया गया 

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करुणा सागर पण्डा
रायपुर । क्या आप डॉ. अखिलेश बोधिसत्व को जानते हैं? नहीं! चलिए, मैं बताता हूँ। फिल्म जगत और साहित्यिक हलकों में लोग इन्हें आमतौर पर डॉ. बोधिसत्व के नाम से जानते हैं। इनका असली हुनर है रिसर्च के नाम पर दर्शकों को वामपंथ का चश्मा पहनाना ताकि दर्शक सिनेमा को उनके उसी एजेंडे के रंग से देखें और वही समझें जिसे बोधिसत्व समझाना चाह रहे हैं।

डॉ. बोधिसत्व इस चश्मे को स्टार प्लस के ‘महाभारत’, ‘चंद्रगुप्त मौर्य’ और ‘चंद्र नंदिनी’ जैसे धारावाहिकों के जरिए पहले भी दर्शकों को पहना चुके हैं। और अब, निर्देशक नितेश तिवारी ने चार हजार करोड़ रुपए में बनी अपनी भव्य फिल्म ‘रामायणा’ (रामायणम् हिंदी में स्क्रीन पर यही लिखा था) में इन्हें दुबारा यही करने का मौका दिया है।

आप जब स्टार प्लस वाली महाभारत यानी डॉ. बोधिसत्व की महाभारत को देखेंगे तो कर्ण आपको एक वर्ग-संघर्ष का प्रतीकपुरुष लगेगा। वह शोषित वर्ग का क्रांतिकारी योद्धा लगेगा, जबकि द्रोणाचार्य और भीष्म जातिवादी शासक लगेंगे। पारंपरिक गुरु-शिष्य परंपरा कटघरे में मिलेगी और महाभारत क्लास स्ट्रगल की एक कहानी लगेगी।

एक दूसरा उदाहरण उठाते हैं- बोधिसत्व ने महाभारत में द्रौपदी के चीर-हरण और उसके प्रतिशोध को “एक दमनकारी पुरुष सत्तात्मक समाज के विरुद्ध एक स्त्री का विद्रोह” बनाकर बड़े ही लाउड तरीके से पेश किया है। क्या द्रौपदी का कुरुसभा में किया गया प्रश्न सचमुच स्त्री बनाम पुरुष का प्रश्न था? बिल्कुल नहीं!

दरअसल, कहानी के पात्र वही होते हैं, बस उन्हें परोसने का ढंग ही एक नया नैरेटिव गढ़ देता है। मूल व्यास महाभारत में कर्ण एक महत्वाकांक्षी योद्धा था, जो सूत-पुत्र होने के बाद भी अंगराज बना था। वहीं दूसरी ओर द्रौपदी का कुरुसभा में उठाया गया यह प्रश्न कि- “जब युधिष्ठिर स्वयं को जुए में हार चुके हैं, तो मुझे दांव पर कैसे लगा सकते हैं?” यह वास्तव में धर्म की सूक्ष्मता और न्याय प्रणाली के पतन के ऊपर गहरा प्रहार था, न कि स्त्री बनाम पुरुष का कोई सामाजिक विवाद।

इनके चाणक्य वाले शो को ही देख लीजिए न! इन्होंने आचार्य चाणक्य के मुख्य उद्देश्य – ‘मगध में अधर्म का नाश कर, धर्म की स्थापना’ को पूरी तरह ढककर चाणक्य को आधुनिक सेक्युलर कूटनीतिज्ञ और सोशल इंजीनियर बना दिया है। धर्म की रक्षा के बजाय यहाँ चाणक्य को तख़्ता पलट (Regime Change) करने वाला और राजा के अत्याचारी स्वभाव के विरुद्ध जनता को भड़काने वाला एक शिखाधारी क्रांतिकारी बना दिया।

तो बताइए, है न यह साफतौर पर एक एजेंडाबाज?

इसने ‘रामायणा” में भी यही किया है। जब इस फिल्म का ट्रेलर लॉन्च हुआ, तो लोगों में फिल्म को लेकर बहुत उत्सुकता थी। मुझे भी थी। लोगों ने समर्थन और विरोध दोनों में बहुत कुछ लिखा, लेकिन फिल्म को देखे बिना उस पर कुछ भी टिप्पणी करना मुझे उचित नहीं लगा।

आज मैंने ‘रामायणा’ देख ली और बहुत भरोसे के साथ यह लिख रहा हूँ कि डॉ बोधिसत्व ने अपने इस नए प्रोजेक्ट में भी वही पुराना एजेंडा परोस दिया है। उनके अनुसार, रामायण धर्म बनाम अधर्म का युद्ध नहीं, बल्कि यह कर्तव्य बनाम अहंकार और एक भू-राजनीतिक संघर्ष था।

फिल्म के शुरुआत में ही यह नैरेटिव सेट कर दिया गया है कि रावण इतना भी बुरा नहीं था। वह तो कला और संगीत प्रेमी बालक था। राक्षसों पर हुए अत्याचार का प्रतिशोध लेने के लिए वह रावण बना। फिल्म में आरम्भ में ही राक्षस समुदाय को शोषित दिखाया गया है। देवताओं ने उनका इतना शोषण किया कि क्या ही बताऊँ? बेचारे बोरी से झरते अनाज को बिन-बिनकर खाकर अपना गुजारा करते थे। क्या आपने कभी किसी प्रामाणिक ग्रन्थ में यह प्रसंग पढ़ा है? अगर नहीं पढ़ा, तो निराश मत होइए। जाइए देख आइये नितेश तिवारी की फिल्म रामायणा। जय हो-जय बोलते सिनेमा हाल से निकलेंगे।

आगे की कहानी में वरदान पाकर रावण जब शक्तिशाली बन जाता है, तो मोटकू थुलथुल कुबेर को ‘हट बे’ कहकर रेजीम चेंज कर देता है और अपनी प्रजा से कई आगे घोषणा करता है – “आज से जो मैं खाऊंगा, वह तुम भी खाओगे। जैसा मैं रहूंगा, वैसा तुम रहोगे। यह है रावणराज।” मतलब लंका में क्लासलेस सोसाइटी बनेगी। ऐसी अनूठी घोषणा स्वयं रावण भैया ने की है। ईमान से!

खैर! लिखने को बहुत कुछ है, लेकिन क्या-क्या लिखूँ? वो माँ सीता का प्रभु राम को नाम लेकर बार-बार उनको ‘राम’ कहना लिखूँ या पुष्पक विमान से हाथों से सारे कंगन गिराकर विधवा जैसे दिखने पर लिखूँ? फिल्म में निषादराज गुह के प्रसंग को जानबूझकर छोड़ देना लिखूँ या राम-सीता के प्रणय को दिखाने की दुस्साहस पर लिखूँ ? भरत-मिलाप वाले दृश्य को तो पूछिये ही मत! वो ऐसा लगा जैसे भरत बस कहने के लिए आए थे कि अयोध्या वापस चलिए और राम जी के ‘नो मिंस नो’ कहते ही भरत भैया भी ‘ओके बिग ब्रो’ बोलकर वहाँ से कट लिए।

अच्छा सुनिए तो! फिल्म में एक गीत भी है। “कुन फाया कुन” ….. सॉरी-सॉरी! तर्ज़ वही है लेकिन गीत के बोल “रंग है, रंग…” ऐसा है। मतलब पूरा सत्यानाश ! चार हजार करोड़ खर्चा करके धनिया कैसे बोया जाता है, कोई नितेश तिवारी से सीखे…. बाकी रामायण तो भगवान राम की कथा है, जिसका महत्व और पवित्रता कहने वाले के आचरण से बहुत ऊपर है चाहे कहने वाला बोधिसत्व हो या नितेश तिवारी। बस इसी भाव से देखना है, तो जाकर देख आइये।

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