दिल्ली। पिछला एक हफ्ता लगातार प्रवास में बीता । सात दिन में सात जगह जाना हुआ। हर रात एक नई जगह पर बीती।चंडीगढ़ , देहरादून , दिल्ली,भुवनेश्वर,मुंबई ,अहमदाबाद और फिर दिल्ली। ऐसी यात्राओं के भी अपने कष्ट है और अपने मजे भी। लेकिन इस श्रृंखला के अंतिम चरण में ऐसा कुछ चमत्कार होगा ये तो सोचा भी नहीं था।
मुंबई में दिनभर के काम निबटा कर अहमदाबाद की फ्लाइट पकड़नी थी। मुंबई के एयर पोर्ट पर भारी भीड़ थी और लोग फ्लाइटें लेट होने से हलाकान हो रहे थे। एक कोने में जगह बना कर मैं अपनी एयर इंडिया की फ्लाइट के इंतजार में था। एक घंटे की देरी के बाद फ्लाइट अनाउंस हुई और बोर्डिंग की बारी आई। चूंकि सबके सब्र का बांध टूट ही रहा था इसलिए लोग भी एयर लाइंस की जोन के अनुसार बैठने की व्यवस्था के बजाय अपनी व्यवस्था लागू करने पर आमादा थे। तभी व्हील चेयर के यात्रियों के बोर्डिंग का सिलसिला शुरू हुआ। चार या पांच होंगे । उन्हीं में एक क्षण को ही सही उनमें से एक चेहरा परिचित सा दिखा। जब तक सही पहचान पाता तब तक व्हील चेयर के यात्री जा चुके थे।

जब अपनी बोर्डिंग की बारी आई और विमान में बोर्ड किया तो आश्चर्य और खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वो परिचित चेहरा साथ वाली सीट पर ही बैठा था। अपने भाग्य को स्वयं ही सराहते हुए मैं उनके पास बैठा और उन्हें प्रणाम किया। वो परिचित चेहरा और कोई नहीं बाँसुरी के सम्राट पंडित हरि प्रसाद चौरसिया जी थे।
आरंभिक अभिवादन के बाद मैने उन्हें अपना परिचय दिया। उन्हें यह भी स्मरण दिलाया कि कुछ वर्ष पूर्व कला केंद्र में ” दीक्षा ” कार्यक्रम के अंतर्गत उनका उनके शिष्यों के साथ आना हुआ था। उन्होंने याद किया भी और बड़े प्रेम से मेरे हाथ पकड़ कर आश्वस्त किया कि उन्हें याद आ गया है। हालांकि पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि उन्हें याद नहीं आया होगा लेकिन मेरा मन रखने के लिए उन्होंने ऐसा कह दिया। बातचीत का क्रम शुरू हुआ तो ऐसा लगा कि पंडित जी एकदम सहज सरल हैं और उनसे बात चीत का क्रम आगे बढ़ाया जा सकता है।मुझे तो ऐसा लग रहा था कि इनसे क्या क्या कहूँ , कितना कहूँ। ढेर सारी बातें थी मन में।
कॉलेज के दिन जब खचाखच भरे हाल में जमीन पर बैठ कर इन्हें सुना था। जब खोज खोज कर इनकी रिकॉर्ड्स को कैसेट में भरवाते थे। कॉल ऑफ द वैली, शिव हरि का शिवरंजनी और झिंझोटी, सिलसिला के संगीत की एक एक तान , सब कुछ एकदम वैसा ही था तरोताज़ा। अपने अभिन्न मित्र सुपरिचित बाँसुरी वादक अभय फगरे के साथ हरि जी की बाँसुरी पर की गई घंटों की बहसें एकदम कानों में गूंजने लगी।
बात कहां से शुरू करूं इसी ऊहापोह में मुँह से निकल गया ” एक फोटो खींचे साथ में। ” लेकिन जैसे ही फोटो खींचने के लिए मोबाइल निकाला पंडित जी बोले ” रुकिए। किसी और को बोलते हैं, ताकि फोटो अच्छी आए। ” और फिर उन्होंने एयर होस्टेस को कहा फोटो खींचने के लिए।
मेरे मोबाइल में तो मैने उनके कई सारे राग डाउनलोड कर रखे थे जो मैं अक्सर फ्लाइट के दौरान सुनता था। उनकी नजर उस पर गई तो बोले ” अरे आप तो बहुत सुनते हैं।” मैने कहा ” जी आपको ही सुनता हूँ ज्यादातर।” फिर उनके गुरु पंडित भोलानाथ जी की बात हुई , भोलानाथ जी के बेटे अजय प्रसन्ना जी की भी बात हुई जो एक बहुत अच्छे बाँसुरी के कलाकार हैं। उनकी गुरु माता अन्नपूर्णा जी की बात हुई , शिव कुमार शर्मा जी की बात हुई। उन्हें यह भी स्मरण दिलाया कि कैसे उन्होंने नए संसद भवन की संगीत दीर्घा में रखने के लिए अपनी बाँसुरी सहर्ष दी है।

मैने कहा ” आप भी परफॉर्म करेंगे?” तो पंडित जी ने नटखट से अंदाज़ में कहा” हम ही हम तो हैं।”
मन में लालच था और स्वयं पंडित जी का स्वयं आग्रह था इसलिए फ्लाइट शनिवार सुबह की करवाई ताकि शुक्रवार की शाम का शो टैगोर हाल में देख सकूँ।
मुंबई अहमदाबाद एक घंटे की ही उड़ान है लेकिन लग रहा था कि ये सफ़र यूँ ही चलता रहे। इतनी सारी बातें थी करने को लेकिन सारा क्रम उलट पलट हो रहा था।तभी पायलट ने लैंडिंग की सूचना दी। पंडित जी ने मेरा हाथ पकड़ कर कहा ” आप कल वापिस मत जाइए। कल का हमारा शो देखकर जाइये। बहुत अलग है आपको अच्छा लगेगा।” मेरे मन में दुविधा थी। शनिवार के काम सामने दिखाई दे रहे थे। मैं कुछ कहता इससे पहले पंडित जी बोले ” मान लीजिए कि कल की फ्लाइट कैंसिल हो गई या देरी से गई। हम कहते हैं एक बार देखिए। अलग है। “

मैने कहा ” आप भी परफॉर्म करेंगे?” तो पंडित जी ने नटखट से अंदाज़ में कहा” हम ही हम तो हैं।”
मन में लालच था और स्वयं पंडित जी का स्वयं आग्रह था इसलिए फ्लाइट शनिवार सुबह की करवाई ताकि शुक्रवार की शाम का शो टैगोर हाल में देख सकूँ।
अहमदाबाद उतरते ही पंडित जी ने अपनी पुत्रवधू पुष्पांजलि जी से परिचय करवाया और उनसे कहा कि वे कल के शो में मेरे बैठने की व्यवस्था करें। पुष्पांजलि जी ने तुरन्त ही निमंत्रण मेरे मोबाइल पर भेज दिया।
टैगोर हाल में पंडित जी के साथ वाली कुर्सी पर बैठ कर उन्हीं की जीवन गाथा को उनके बनाए गीतों और संगीत के माध्यम से साकार होते देखने का स्वर्णिम अवसर था वो। शो के पहले , शो के बीच मध्यांतर में और शो के बाद जिस तरह लोग पंडित जी से मिलकर उनसे आशीर्वाद ले रहे वो मानो भारत के सांस्कृतिक वैभव के शीर्ष बिंदु गुरु शिष्य परंपरा का प्रत्याक्षिक था। पंडित जी भी सभी को असीम स्नेह और ममता से आसीस रहे थे। पंडित जी की दूसरी ओर उनके शिष्य प्रसाद भंडारकर बैठे थे जो एक आय टी विशेषज्ञ हैं और फेस बुक मेटा जैसे संस्थानों में वरिष्ठ पद पर कार्य करने के बाद सैन होसे यूएसए में स्थायी हैं। वे सिर्फ यह कार्यक्रम देखने वहाँ से आए थे ।

थोड़ी देर के बाद ” बाँसुरी जब गाने लगे ” का शो शुरू हुआ और कि लगा हम एक अलग ही संगीतमय विश्व में पहुंच गए हैं। कहा नहीं जा सकता कि वह नाटक था या म्यूजिक कंसर्ट या संगीत रूपक था । जो भी था सब हरि मय था। अचानक कबीर दास जी याद आ गये ।
” जब मैं था तब हरि नहीं
अब हरि हैं मैं नाही”

थोड़ी देर के बाद ” बाँसुरी जब गाने लगे ” का शो शुरू हुआ और कि लगा हम एक अलग ही संगीतमय विश्व में पहुंच गए हैं। कहा नहीं जा सकता कि वह नाटक था या म्यूजिक कंसर्ट या संगीत रूपक था । जो भी था सब हरि मय था। अचानक कबीर दास जी याद आ गये ।
” जब मैं था तब हरि नहीं
अब हरि हैं मैं नाही”
और मुझे इस बात का कोई भ्रम नहीं कि ऐसी स्थिति सिर्फ मेरी थी। ऑडिटोरियम में बैठा हर एक व्यक्ति शायद उसी भाव में चला गया था। मुझे हरि जी के पास बैठने की वजह से हो सकने वाला अहंकार भी जाता रहा, क्योंकि हरि जी तो सिर्फ भौतिक रूप से मेरे पास बैठे थे। मन से तो वो ऑडिटोरियम में बैठे हर एक के पास पहुँच चुके थे। हम सब एक अलग ही सृष्टि का अनुभव कर रहे थे। पता नहीं कितनी बार आंखें नम हुई, गला भर आया, कितनी बार नाच उठने को जी मचला, थाप देने को हाथ बेकरार हुए। लगता था कि ये सिलसिला खत्म ही न हो । लेकिन सिलसिला के ” ये कहाँ आ गए हम ” से ये आवर्तन पूर्णता को प्राप्त हुआ। कहा तो है ही कि ” हरि अनंत हरि कथा अनन्ता” । इसलिए हरि की इस कथा को तो अनवरत रहना ही है। इसलिए जो हो रहा था या हुआ था उसे आवर्तन की संज्ञा दी।
ईस्टर्न हार्मोनी द्वारा निर्मित इस पूरे प्रस्तुतीकरण में पंडित जी की पुत्रवधू पुष्पांजलि जी , राजीव चौरसिया जी का अथक परिश्रम दिख रहा था। पुष्पांजलि जी ने सुहैल अब्बासी के साथ मिलकर इसकी पटकथा लिखी है। निर्देशन कुणाल विजयकर और भूषण कोरगांवकर का है। नाट्य के रूप में दो अभिनेता हैं जो अलग अलग पात्रों के रूप में प्रकट होते हैं। विकास रावत और रेशमा शेट्टी दोनों ने ही चमत्कृत करने वाला अभिनय किया है। इस प्रस्तुतीकरण की जान इसका संगीत है। बाँसुरी वादन पंडित जी की सुयोग्य शिष्य शुचिस्मिता चटर्जी का था। ऐसी प्रस्तुतियों में गायन बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है और ये काम आसान भी नहीं होता क्योंकि एकदम बीच से सही सुर लय और ताल में गाना उठाना पड़ता है। आयशा मुखर्जी और सर्वेश ने बहुत ही सुंदर तरीके से अपने सुरों से इसे सजाया। इसका पहला प्रदर्शन 19 जनवरी 2025 को मुंबई में हुआ था। इस बात का खेद रहेगा कि इसके बारे में इतने दिनों बाद मालूम पड़ा और वो भी पंडित जी को स्वयं ही बताना पड़ा।
शो खत्म होने के पंडित जी ने हाथों में हाथ लेकर शरारत पूर्ण लहजे में कहा “आप ज़्यादा बोर तो नहीं हुए। नहीं तो कहेंगे खामखा फ्लाइट छुड़वा दी। ”
मेरे पास तो उनकी इस शरारत भरे सवाल का कोई जवाब नहीं था। मेरे मुँह शब्द नहीं निकल पा रहे थे और मेरे सजल नेत्र पंडित जी की बात का उत्तर दे रहे थे।



