2014 का बचपन अब जवान हो रहा है

unnamed-1-3.jpg
सुरेंद्र चतुर्वेदी

जयपुर । दिल्ली में हुए छात्रों के प्रदर्शन ने *देश के नीति निर्माताओं के सामने एक बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया है। वो है हमारे युवाओं के भविष्य की चुनौती !! यह एक ऐसा प्रश्न है जो राजनीतिक विचारधारा, जातीय आरक्षण और धार्मिक मान्यताओं से परे हर परिवार के लिए चिंता का कारण बन चुका है।* यही कारण है कि पेपर लीक के मुद्दे को मोदी सरकार के भरोसेमंद मतदाताओं ने भी स्वीकार किया और इस वर्ग में असंतोष की लहर दिखी। यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि भारत में युवाओं की संख्या 37.1 करोड़ है, जो कुल आबादी का लगभग 27 प्रतिशत है।

पिछले दिनों नीति आयोग की एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई। यह रिपोर्ट भारत में रोजगार और शिक्षा के आंकड़े प्रस्तुत करती है। इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में 19 करोड़ लोग नौकरीपेशा हैं, इसका मतलब यह हुआ कि उनके घर में वेतन के रूप में नियमित आय होती है। 29 करोड़ लोग खेती किसानी करते हैं। साढ़े सात करोड़ लोग निर्माण कार्य में ठेकेदारी या मजदूरी करते हैं और 7 करोड़ 20 लाख लोग उत्पादन फेक्ट्रियों में श्रमिक हैं। *इस प्रकार लगभग 62 करोड़ लोग किसी ना किसी प्रकार से अपना परिवार पाल रहे हैं।*

दूसरी तरफ़ *देश में बेरोजगारों की संख्या 2 करोड़ है। जो अपने लिए उचित अवसर की तलाश में हैं। लेकिन इन सबके बीच खतरनाक तथ्य यह है कि 8 करोड़ 70 लोग ऐसे हैं जो ना तो पढ़ रहे हैं, ना कोई पेशेवर ट्रेनिंग ले रहे हैं और ना ही रोजगार की तलाश में हैं। वे खाली हैं, उनको कुछ नहीं करना !!* नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि शिक्षा को लेकर भारत की तरुणाई में कोई खास उत्साह नहीं है। *145 करोड़ की जनसंख्या वाले भारत में केवल साढ़े चार करोड़ युवा बारहवीं से आगे पढ़ रहे हैं। कक्षा 9 से 12 तक पढ़ने वालों की संख्या मात्र साढ़े छह करोड़ है।* इसी अनुपात में बच्चे निचली कक्षाओं में पढ़ाई कर रहे हैं। तो *असल समस्या यह है कि कुछ भी नहीं करने वाले 8 करोड़ 70 लाख युवाओं के सामने जिंदगी जीने का कोई लक्ष्य नहीं है। ये तरुणाई दिग्भ्रमित है, और जिस तरह की स्थिति नीति आयोग के आंकड़े बता रहे हैं उसके अनुसार इनकी संख्या बढ़ती ही जाएगी ! विडंबना यह है कि इनमें से अधिकांश के हाथों में आधुनिक फ़ोन और सोशल मीडिया तक पहुँच है।*

तो *मोदी सरकार के सामने ऐसे युवाओं की शक्ति के दुरुपयोग को रोकने की भी चुनौती है। इन युवाओं में अधिकतर ऐसे हैं जो 2014 में 4 साल से 8 साल की उम्र में रहे होंगे और अपनी आवाज में अबकी बार मोदी सरकार का नारा लगाते हुए घर गली मोहल्ले में चक्कर लगाते होंगे। तो 2014 का बचपन अब जवान हो रहा है और उसको जीवन के लिए किसी सार्थक उद्देश्य की राह पर ले जाना देश के लिए भी आवश्यक है। वरना ये भटकी हुई और दिग्भ्रमित तरुणाई बदलते सामाजिक परिवेश में अपराध, नशा और हुल्लड़बाजी के विषैले वातावरण में भारत की संस्कृति और आत्मा को ही घायल करेगी।

Share this post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

scroll to top