प्रणय विक्रम सिंह
दिल्ली । मई, भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का वह रक्तरंजित दिन, जब पहली बार संगठित रूप से बंदूक को संविधान से ऊपर रखने की कोशिश की गई थी।
वह दिन, जब मतपत्र को ‘बुर्जुआ ढकोसला’ कहकर बारूद को परिवर्तन का माध्यम घोषित किया गया। वह दिन, जब भारत की लोकतांत्रिक आत्मा पर हिंसक वर्ग-संघर्ष के नाम पर पहली वैचारिक गोली दागी गई।
जिसे आज भी कुछ वामपंथी संगठन ‘महान नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह’ कहकर महिमामंडित करते हैं, वह वस्तुतः लोकतांत्रिक भारत के विरुद्ध सशस्त्र हिंसा की संगठित प्रस्तावना थी। यह केवल एक किसान आंदोलन नहीं था, बल्कि भारतीय राज्य, भारतीय संविधान और भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था को हिंसा के माध्यम से चुनौती देने का उद्घोष था।
विडंबना यह है कि जो लोग आज ‘फासीवाद’ के विरुद्ध सबसे ऊंची आवाज़ में नारे लगाते हैं, उनकी वैचारिक जड़ें स्वयं उस विचार में धंसी हुई हैं, जो लोकतंत्र को छल, चुनाव को भ्रम और संविधान को वर्गीय औजार मानता रहा है।
नक्सलबाड़ी कोई रोमानी कविता नहीं थी। वह रक्त, भय और बंदूक से लिखी गई वैचारिक हिंसा की शुरुआत थी। उस दिन जो चिंगारी जली, उसने आने वाले दशकों में भारत के अनेक हिस्सों को बारूद, बंदूक और रक्त से भर दिया। जंगलों में समानांतर सत्ता खड़ी करने की कोशिश हुई।
जन-अदालतों के नाम पर हत्याएं हुईं। गरीब आदिवासियों को ‘क्रांति’ के नाम पर बंदूक थमा दी गई। विकास को ‘राज्य का षड्यंत्र’ बताकर स्कूल उड़ाए गए, सड़कें तोड़ी गईं, रेलवे लाइनें बिछने नहीं दी गईं और अस्पतालों तक को संदेह की दृष्टि से देखा गया।
यह कैसी क्रांति थी, जिसने सबसे पहले शिक्षा पर हमला किया? यह कैसी मुक्ति थी, जिसमें आदिवासी बच्चों के हाथों में किताबों की जगह कारतूस थमा दिए गए? यह कैसी समानता थी, जिसमें गांवों के गरीब युवक मरते रहे और वैचारिक नेतृत्व महानगरों के परिसरों में ‘क्रांति’ पर सेमिनार करता रहा?
भारत के इतिहास में यह शायद पहली ऐसी विचारधारा थी, जिसने लोकतंत्र के भीतर रहते हुए लोकतंत्र को ही नष्ट करने का स्वप्न देखा। संसद को खारिज किया गया। चुनाव को मज़ाक कहा गया। न्यायपालिका को वर्गीय संस्था बताया गया। और अंततः बंदूक को ही अंतिम सत्य घोषित कर दिया गया।
लेकिन भारत की आत्मा बारूद से नहीं चलती। भारत की आत्मा बहस से चलती है। विविधता से चलती है। मतभेद से चलती है। मतपत्र से चलती है।
यही कारण है कि जिन क्षेत्रों में दशकों तक नक्सली प्रभाव रहा, वहां अंततः जनता ने विकास, सड़क, शिक्षा और लोकतांत्रिक भागीदारी की मांग की। आदिवासी समाज ने भी यह समझ लिया कि बंदूक केवल मृत्यु देती है, भविष्य नहीं।
आज भी नक्सलवाद के समर्थक ‘जल-जंगल-जमीन’ की भाषा बोलते हैं, लेकिन यह नहीं बताते कि जिन क्षेत्रों को उन्होंने दशकों तक अपनी हिंसक प्रयोगशाला बनाए रखा, वहां सबसे अधिक गरीबी, अशिक्षा और भय क्यों पनपा?
क्यों हजारों गरीब आदिवासी युवक ‘क्रांति’ के नाम पर मारे गए? क्यों सुरक्षा बलों के जवानों की लाशों पर वैचारिक उत्सव मनाए गए? क्यों गांवों को लोकतंत्र और विकास से काटकर ‘रेड कॉरिडोर’ में बदल दिया गया?
सच्चाई यह है कि भारत के वंचित समाज को जितना प्रतिनिधित्व लोकतंत्र ने दिया, उतना किसी माओवादी बंदूक ने नहीं दिया। पंचायत से संसद तक, संविधान ने दलित, आदिवासी, पिछड़े और गरीब समाज को आवाज़ दी। आज भारत का आदिवासी राष्ट्रपति भवन तक पहुंचता है, संसद तक पहुंचता है, प्रशासन और न्यायपालिका तक पहुंचता है। यह परिवर्तन हिंसा से नहीं, लोकतंत्र से आया है।
नक्सलबाड़ी की सबसे बड़ी त्रासदी यह थी कि उसने असंतोष को सुधार की दिशा में नहीं, विनाश की दिशा में मोड़ दिया। उसने युवाओं को यह विश्वास दिलाया कि परिवर्तन बहस, संगठन और जनमत से नहीं, हत्या और हिंसा से आएगा। यही वह वैचारिक विष था, जिसने हजारों परिवारों को उजाड़ा। और सबसे बड़ा विरोधाभास देखिए, जो विचारधारा स्वयं स्टालिन, माओ और पोल पॉट जैसे रक्तरंजित इतिहासों से प्रेरणा लेती रही, वही आज मानवाधिकार की सबसे बड़ी व्याख्याता बनने का अभिनय करती है।
भारत का किसान आज बंदूक नहीं, बाजार चाहता है। भारत का आदिवासी आज बारूद नहीं, बेहतर स्कूल चाहता है। भारत का युवा आज क्रांति नहीं, अवसर चाहता है।
25 मई किसी ‘हिंसक रोमांच’ की नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक भूल को याद करने की है, जिसने लोकतंत्र के विरुद्ध हिंसक अधैर्य को वैचारिक सम्मान देने की कोशिश की थी।
यह दिन हमें याद दिलाता है कि जब विचारधारा मनुष्य से बड़ी हो जाती है, तब शवों पर घोषणापत्र लिखे जाते हैं। और जब लोकतंत्र को ‘कमजोरी’ कहा जाने लगता है, तब समाज अंततः रक्त और भय की सुरंग में धकेल दिया जाता है।
बंदूकें कुछ समय के लिए भय पैदा कर सकती हैं, लेकिन वे सभ्यताएं नहीं बनातीं। बारूद रास्ते जला सकता है, भविष्य नहीं गढ़ सकता। जिन विचारों की शुरुआत हत्या से होती है, उनका अंत भी प्रायः राख, वीरानी और पछतावे में ही होता है।
भारत ने अंततः उस रास्ते को अस्वीकार किया, जहां मतभेद का उत्तर गोली हो और परिवर्तन का माध्यम रक्त। भारत ने मतपत्र का मार्ग चुना। संविधान का मार्ग चुना। और यही कारण है कि नक्सलबाड़ी आज इतिहास की एक हिंसक प्रतिध्वनि भर रह गया है, जबकि भारतीय लोकतंत्र आज भी जीवित, गतिशील और निरंतर विकसित हो रहा है।
आज जब कुछ लोग 25 मई को ‘क्रांति’ का प्रतीक बताने का प्रयास करते हैं, तब आवश्यक है कि राष्ट्र उस मौन पीड़ा को भी याद करे, जो दशकों तक नक्सली हिंसा से जले गांवों, उजड़े परिवारों, अनाथ बच्चों और शहीद जवानों के घरों में पसरी रही।
भारत का भविष्य किसी लाल आतंक में नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना, विकास, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय एकता में निहित है। क्योंकि अंततः राष्ट्र बंदूक से नहीं चलते… विश्वास से चलते हैं। सभ्यताएं बारूद से नहीं बचतीं… संवाद, संवेदना और लोकतंत्र से बचती हैं।



