राजीव मिश्रा
दिल्ली। वामपंथ की सफलता व्यक्ति को व्यक्ति ना रहने देकर उसे एक समूह का भाग बना देने में है.. उससे उसकी स्वतंत्रता और स्वतंत्र चिंतन प्रक्रिया को छीन कर एक ग्रुप थिंकिंग और ग्रुप आइडेंटिटी का सब्सक्रिप्शन पकड़ा देने में है. वह ग्रुप कितना भी असामान्य, कितना भी अप्राकृतिक हो… उसे उसके सब्सक्राइबर मिल ही जाते हैं. क्योंकि कुछ लोग होते हैं जो व्यक्तित्व हीन, आत्मबोध विहीन होते ही हैं. वे कैसी भी एक आइडेंटिटी के प्यासे होते हैं. उन्हें किसी भी एक डेमोग्राफिक ग्रुप का भाग बनना है, जिससे वे अपने स्वतंत्र एक्जिस्टेंस की पीड़ा से निकल सकें.
इस आंदोलन से एक नई आइडेंटिटी निकल कर आई है – जेन Z. आप देखें कि इस आइडेंटिटी में पैदा होने के समय के अलावा और क्या कॉमन है? कुछ भी नहीं! जो भी एक दशक के भीतर पैदा हुए, वे सभी इस एक आईडेंटिटी का भाग हो गये. उनकी सबकी क्षमताएँ, अपने जीवन से अपनी अपेक्षाएँ, सबकी पर्सनालिटी और सबकी विचार प्रक्रिया अलग अलग इंडिविजुअल की होनी चाहिए.. सबको घसीट कर एक बाड़े में डाल दिया गया – जेन Z. और उन करोड़ों बच्चों का प्रतिनिधित्व कुछ हजार अराजकतावादियों और हीन भावना से पीड़ित कुंठित लोगों ने कर लिया. सबकी इंडिविजुअल सोच को उनकी हिंसा करने की क्षमता और न्यूसेंस वैल्यू ने रिप्लेस कर दिया.
वामपंथ की समस्या के मूल में वस्तुतः मनुष्य में इंडिविजुअल एक्जिस्टेंस की अक्षमता है. अगर आप एक स्वतंत्र व्यक्ति होंगे तो आप कभी भी अपनी विचार प्रक्रिया को इस तरह एक भीड़ के हवाले नहीं करेंगे. अगर आपके बच्चे इस भीड़ में फँस रहे हैं तो यह खतरा जितना दिखाई देता है उससे बड़ा है… उनके व्यक्तित्व के डिजिंटीग्रेशन का खतरा. और ऐसा टूटा हुआ व्यक्तित्व जिस दिन सड़क से उतरेगा इस दिन मेंटल हॉस्पिटल में ही आराम करेगा.



