अल्बानिया का उदाहरण और संवैधानिक मर्यादा

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दिल्ली। विपक्ष कुछ समय से हाथ में संविधान लेकर राजनीति कर रहा है। लेकिन व्यवहार में संवैधानिक संस्थाओं पर एक के बाद एक हमला जारी है। चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट और चुनावी प्रक्रिया पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। अप्रैल 2024 में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम चुनाव आयोग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम और वीवीपैट संबंधी याचिकाओं को खारिज कर दिया था। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि ईवीएम सुरक्षित, सरल और उपयोगकर्ता-अनुकूल हैं। 100 प्रतिशत वीवीपैट सत्यापन या बैलट पेपर की वापसी की मांग को अस्थिर बताया गया। किसी बड़े स्तर की छेड़छाड़ का कोई ठोस सबूत नहीं मिला। कोर्ट ने चेताया कि बिना सबूत के बार-बार संदेह पैदा करना लोकतंत्र में अविश्वास बढ़ाता है और मतदाता भागीदारी घटा सकता है।
इसके बावजूद विपक्ष चुनाव आयोग पर हमला जारी रखे हुए है। मुख्य कारण राजनीतिक रणनीति है। जब वे जीतते हैं-कर्नाटक, तेलंगाना जैसे उदाहरणों में-तो ईवीएम ठीक लगती है। हारने पर-महाराष्ट्र, हरियाणा आदि में-धांधली का आरोप लग जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस दोहरे मापदंड पर टिप्पणी की थी। ‘वोट चोरी’ या मतदाता सूची संशोधन (SIR) जैसे मुद्दों को ईवीएम से जोड़कर चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया जा रहा है। उद्देश्य चुनावी जनादेश को कमजोर दिखाना, अपने समर्थनकर्ताओं को एकजुट करना और संस्थागत विश्वास कम करना है। अब तक कोई ठोस सबूत नहीं दिया गया। कोर्ट ने अतिरिक्त सुरक्षा-सिंबल लोडिंग यूनिट सील करना और पांच प्रतिशत माइक्रोकंट्रोलर जांच-के आदेश दिए, फिर भी आरोप जारी हैं।
ऐसे हमले बिना सबूत के लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर अविश्वास फैलाते हैं। ईवीएम ने बूथ कैप्चरिंग और अमान्य वोट जैसी पुरानी समस्याएं कम की हैं। विपक्ष हाथ में संविधान रखकर संवैधानिक संस्थाओं का अपमान कर रहा है। पवन खेरा और संजय राउत जैसे नेता अल्बानिया के सुप्रीम कोर्ट जलने का वीडियो और संदेश शेयर कर रहे हैं। राउत ने लिखा कि अल्बानिया की जनता ने सुप्रीम कोर्ट को इसलिए जलाया क्योंकि वह भ्रष्ट प्रधानमंत्री की मदद कर रहा था, संसद और सरकारी दफ्तरों पर हमले हुए, और सभी देशों को-खासकर भारत को-इससे सबक लेना चाहिए। यह क्रांति नहीं, अपराध है। अल्बानिया में सैकड़ों लोग गिरफ्तार हुए, सैकड़ों घायल हुए हैं। संजय देश को किस आग में झोंकने की भूमिका तैयार कर रहे हैं विपक्ष में बैठकर!
एक भारतीय सांसद के रूप में ऐसा संदेश देना कि भारत को भी ऐसा सबक लेना चाहिए, क्या सुप्रीम कोर्ट, संसद जलाने का आह्वान है? यह लोकतंत्र है या अराजकता? जिनकी राजनीति संविधान हाथ में लेकर चल रही है, उन्हें संस्थाओं का सम्मान करना चाहिए। अगर उनके व्यवहार से यह संदेश जाता है कि वे हाथ में संविधान रखकर उसकी मूल भावना की बार-बार हत्या कर रहे हैं, तो समाज में गलत संदेश जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने हाल में राउत को अवमानना संबंधी नोटिस दिया है, फिर भी ऐसे पोस्ट जारी हैं।
‘वोट चोरी’ के आरोप की परतें खोलें तो साफ है-यह हार की राजनीति है। जीत पर चुप, हार पर संस्थाओं पर वार। मतदाता सूची में सुधार के नाम पर संदेह पैदा करना, ईवीएम को लक्ष्य बनाना, और विदेशी हिंसक घटनाओं को भारत के लिए सबक बताना-यह लोकतंत्र मजबूत करने की नहीं, कमजोर करने की कोशिश है।
बिना सबूत के बार-बार संदेह पैदा करना मतदाता का विश्वास घटाता है। विपक्ष को Regime Change के किसी संविधान विरोधी षड्यंत्र का हिस्सा बनने से बेहतर है कि जितनी जल्दी हो, अपने व्यवहार में सुधार लाए। हाथ में संविधान रखने वाले को उसकी रक्षा करनी चाहिए, न कि संस्थाओं को निशाना बनाकर उसकी आत्मा को चोट पहुंचानी चाहिए। लोकतंत्र सबूत, संवाद और सम्मान पर टिकता है, अराजकता के संदेशों पर नहीं।

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