जनवरी 2019 में इंडियन जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (यूरोप) द्वारा आयोजित कार्यक्रम में स्वयंभू साइबर विशेषज्ञ सैयद शुजा स्काइप के जरिए अमेरिका से जुड़ा।। चेहरा ढका था। उसने दावा किया कि 2014 लोकसभा चुनाव ईवीएम हैकिंग से प्रभावित हुए, कांग्रेस करीब 200 सीटें हारीं, गोपिनाथ मुंडे की मौत इसलिए हुई क्योंकि वे जानते थे, और गौरी लंकेश को भी निशाना बनाया गया। कोई लाइव प्रदर्शन नहीं हुआ, कोई तकनीकी सबूत नहीं दिया गया। ईसीआईएल ने साफ कहा कि शुजा उनका नियमित कर्मचारी नहीं था और ईवीएम डिजाइन-विकास से जुड़ा नहीं था। चुनाव आयोग ने इसे ‘प्रेरित स्लगफेस्ट’ (Motivated Slugfest) कहा और आईपीसी 505(1)(बी) के तहत दिल्ली पुलिस से एफआईआर दर्ज कराने को कहा। फॉरेन प्रेस एसोसिएशन ने इस विवाद से खुद को अलग कर लिया।
कार्यक्रम के आयोजक कांग्रेसी रुझान वाले पत्रकार अशीष रे (आईजेए, यूरोप अध्यक्ष) थे, जिन्होंने कपिल सिब्बल को व्यक्तिगत निमंत्रण भेजा। सिब्बल मौजूद रहे और जांच की मांग की। आयोजन पर कांग्रेस प्रायोजित होने का आरोप लगा था। रे के नेशनल हेराल्ड जैसे कांग्रेस से जुड़े मंचों से संबंध रिपोर्टों में आए। तकनीकी विशेषज्ञों और चुनाव आयोग के अनुसार, ईवीएम स्टैंडअलोन मशीनें हैं, वायरलेस या रेडियो फ्रीक्वेंसी से जुड़ी नहीं होतीं, केवल केबल के जरिए पब्लिक व्यू में जुड़ती हैं। शुजा के ‘मिलिटरी ग्रेड मॉड्यूलेटर’ या ‘फ्रीक्वेंसी आइसोलेशन’ वाले दावे असंगत हैं।

इसी इको सिस्टम की कड़ी अवि डांडिया से जुड़ती है। डांडिया इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के सोशल मीडिया चीफ / चीफ इन-चार्ज हैं। एनआरआई वीडियो ब्लॉगर और यूट्यूब इन्फ्लुएंसर के रूप में वे संगठन की डिजिटल उपस्थिति संभालते हैं। 2023 में नियुक्ति पर उन्होंने राहुल गांधी और सैम पित्रोदा का धन्यवाद किया। 2019 में उन्होंने शुजा के ईवीएम हैकिंग दावों को आगे बढ़ाया, लाइव प्रसारण और संबंधित वीडियो जारी किए। साथ ही पुलवामा हमले और ईवीएम हैकिंग पर फर्जी ऑडियो क्लिप फैलाईं, जिन पर दिल्ली पुलिस ने एफआईआर दर्ज की और फैक्ट-चेकर्स ने इन्हें मनगढ़ंत बताया। अशीष रे और कपिल सिब्बल के माध्यम से इस कांग्रेसी इको सिस्टम के छूछूंदर को तलाशना चाहिए। अवि से पूछताछ की जाए तो शुजा की जानकारी मिल सकती है, क्योंकि दोनों के बीच 2019 में ही सार्वजनिक संवाद और प्रचार दिखता है।
2024 में भी पैटर्न दोहराया गया। महाराष्ट्र चुनाव से पहले इंडिया टुडे स्टिंग में शुजा ने ‘फ्रीक्वेंसी आइसोलेशन’ का हवाला देकर करीब 53-54 करोड़ रुपये में ईवीएम हैक करने की पेशकश की। कोई सबूत नहीं। मुंबई साइबर पुलिस ने एफआईआर दर्ज की। सूत्रों के अनुसार वह किसी तीसरे देश में छिपा है। 2019 का मामला भी लंबित है। यानी ‘कांग्रेस का दुलारा’ भारतीय कानूनी प्रक्रिया से बच रहा है।
यह एसआईआर विरोध से जुड़ता है। एसआईआर मृत, डुप्लिकेट या अयोग्य नाम हटाने की प्रक्रिया है। यदि ईवीएम ही समस्या है, तो साफ सूची से क्या आपत्ति? कांग्रेस अक्सर मतदाता बहिष्करण का डर दिखाती है, जबकि हैकिंग के आरोप में वोटरों के अधिकार का हवाला देती है। दोनों जगह चयनात्मकता: परिणाम प्रतिकूल हों तो मशीन पर शक, सूची साफ हो तो प्रक्रिया पर शक।

ऐतिहासिक रूप से कांग्रेस की स्थापना में एलन ऑक्टेवियन ह्यूम (ब्रिटिश सिविल सेवक, बाद में लंदन) की प्रमुख भूमिका थी। वे जनरल सेक्रेटरी रहे। दशकों की सत्ता के कारण शुरुआती उद्देश्य की समीक्षा कम हुई। आज बिना सबूत के ईवीएम पर आरोप और लंदन जैसे मंचों का इस्तेमाल अविश्वास फैलाने जैसा लगता है। ध्रुव राठी भारत के मामले में प्रदर्शन के लिए दिल्ली पुलिस से मुंह छुपाकर, भागकर लंदन गया। जबकि वह रहता जर्मनी में है। कांग्रेस के जन्म से लेकर कांग्रेस प्रायोजित षडयंत्रों तक के तार लंदन से क्यों जुड़ते हैं?
सैयद शुजा आज भी सामने नहीं आया है। उसके खिलाफ एफआईआर हैं, वह विदेश में बताया जाता हैं, और दावे बिना सत्यापन के प्रचार का हिस्सा बना रहता है। आज की बहस में उस कांग्रेस समर्थित झूठे, मक्कार भगोड़े को भूलना नहीं चाहिए।
कांग्रेस को आज या तो ठोस सबूत पेश करने चाहिए या ईवीएम की विश्वसनीयता और एसआईआर जैसी प्रक्रियाओं को स्वीकार करना चाहिए। वर्ना कांग्रेस पार्टी और उसके समर्थित सैयद शुजा में क्या फर्क रह जाएगा?
चुनाव आयोग और तकनीकी समिति बार-बार स्पष्ट कर चुके हैं कि ईवीएम छेड़छाड़-रोधी हैं। अब आरोप लगाने वाले पक्ष को भी उसी मानक पर खरा उतरना होगा।



