राजीव तुली
दिल्ली। भारत एक जीवंत लोकतंत्र है, जहाँ असहमति, विरोध और राजनीतिक विरोध सार्वजनिक जीवन के आवश्यक अंग हैं। सरकारों से सवाल पूछे जाने चाहिए, संस्थाओं को जवाबदेह बनाया जाना चाहिए और नागरिकों को बदलाव की माँग करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। लेकिन एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न तब उठता है जब विरोध स्थायी हो जाए, हर संस्था पर संदेह किया जाए और आंदोलन उस व्यवस्था का कोई विश्वसनीय विकल्प न दें जिसका वे विरोध कर रहे हैं। इस प्रवृत्ति को अराजक-निहिलवाद की अवधारणा से समझा जा सकता है—एक कट्टर राजनीतिक दृष्टिकोण जो स्थापित सत्ता के विरोध को स्वीकार किए गए मूल्यों और संस्थागत व्यवस्थाओं की अस्वीकृति के साथ जोड़ता है। इसके सबसे विनाशकारी रूप को चार शब्दों में समेटा जा सकता है: कुछ मत सुझाओ, सबका विरोध करो।
अराजकतावाद थोपी गई सत्ता और जबरदस्ती वाली पदानुक्रमों पर सवाल उठाता है, जबकि निहिलवाद अर्थ, नैतिकता या मूल्य की स्थापित नींव को चुनौती देता है या अस्वीकार करता है। इन दोनों का मेल मौजूदा राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्थाओं की कट्टर अस्वीकृति पैदा कर सकता है। हालाँकि अराजकतावाद का मतलब जरूरी नहीं कि अराजकता हो और निहिलवाद का मतलब स्वतः हिंसा नहीं। चिंता तब पैदा होती है जब अस्वीकृति स्वयं साध्य बन जाए और समाज को संगठित करने का कोई रचनात्मक कार्यक्रम न हो। कोई आंदोलन सरकार, नौकरशाही, अदालतों, आर्थिक नीतियों और प्रचलित सांस्कृतिक मूल्यों का विरोध कर सकता है। लेकिन जब वह हर संस्था की वैधता को अस्वीकार कर दे और कोई व्यावहारिक विकल्प न दे तो क्या होता है? विरोध लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन रचनात्मक उद्देश्य के बिना स्थायी विरोध बाधा डालने की राजनीति बन सकता है।
भारत की दार्शनिक परंपराएँ हजारों वर्षों से सांसारिक आसक्ति, भौतिक लालसाओं और स्थापित धारणाओं पर सवाल उठाती रही हैं। लेकिन आध्यात्मिक जिज्ञासा को राजनीतिक निहिलवाद से नहीं जोड़ना चाहिए। बौद्ध धर्म अनित्यता, स्थायी स्वतंत्र आत्मा की अनुपस्थिति, करुणा और दुःख से मुक्ति सिखाता है। हिंदू दार्शनिक परंपराएँ धर्म, आत्म-अनुशासन, जिम्मेदारी और लोकसंग्रह—संसार के कल्याण के लिए कार्य—जैसे विचारों पर बल देती हैं। ये परंपराएँ आसक्ति और सत्ता के दुरुपयोग पर सवाल उठाती हैं, लेकिन नैतिक जिम्मेदारी या सामाजिक व्यवस्था को अनिवार्य रूप से अस्वीकार नहीं करतीं। भारतीय अध्यात्म अहंकार पर सवाल उठाता है; राजनीतिक निहिलवाद अपने चरम रूप में सामूहिक जीवन की नींव पर ही सवाल खड़ा कर सकता है। अन्याय को चुनौती देना निहिलवाद नहीं है, न ही आमूल सुधार की खोज। समस्या तब शुरू होती है जब कोई आंदोलन हर स्थापित सिद्धांत को अस्वीकार कर दे लेकिन उसके स्थान पर कुछ विश्वसनीय विकल्प न सुझाए।
शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों ने भारत के लोकतांत्रिक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन्होंने भ्रष्टाचार, सामाजिक अन्याय, बेरोजगारी और प्रशासनिक विफलताओं की ओर ध्यान खींचा है। नागरिकों को असहमति व्यक्त करने की स्वतंत्रता बनी रहनी चाहिए। लेकिन विरोध तब समस्या बन जाता है जब वह किसी निश्चित उद्देश्य को प्राप्त करने का साधन न रहकर स्थायी राजनीतिक पहचान बन जाए। कोई आंदोलन चुनी हुई सरकार को अस्वीकार कर सकता है, चुनावी नतीजों पर सवाल उठा सकता है, न्यायपालिका पर अविश्वास कर सकता है और नौकरशाही की निंदा कर सकता है। अगर वह साथ ही यह भी न बताए कि विवाद कैसे सुलझाए जाएँगे या देश कैसे शासित होगा तो वह एक मौलिक विरोधाभास पैदा करता है। लोकतंत्र नागरिकों को चुनावों के जरिए सरकारें बदलने की अनुमति देता है। नीतियों को कानून, अदालतों और सार्वजनिक बहस के माध्यम से चुनौती दी जा सकती है। जब विश्वसनीय सबूत हों तो चुनावी अनियमितताओं की जाँच होनी चाहिए, लेकिन केवल नतीजा प्रतिकूल होने के कारण चुनावी प्रक्रिया को अस्वीकार करना लोकतांत्रिक वैधता को कमजोर करता है। लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता की असली परीक्षा यह है कि कोई आंदोलन मतदाताओं को मना सके, वैध प्रक्रियाओं को स्वीकार करे और विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत करे।
भारत ने कट्टर राजनीति के विभिन्न रूप देखे हैं। नक्सलवाद 1967 में नक्सलबाड़ी के किसान विद्रोह से उभरा और कुछ बाद की माओवादी धाराओं ने मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के लिए सशस्त्र क्रांतिकारी तरीकों को अपनाया। आज राजनीतिक लामबंदी कई रूप ले सकती है—छात्र सक्रियता, नागरिक समाज अभियान, डिजिटल आंदोलन और चुनावी विरोध। कुछ संगठन रचनात्मक सुधार चाहते हैं; कुछ मौलिक संरचनात्मक बदलाव की वकालत करते हैं। यह जाँच करना वैध है कि क्या कुछ व्यक्ति या संगठन अवैध समूहों के साथ तालमेल रखते हैं या संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने की कोशिश करते हैं। लेकिन समूचे नागरिक समाज को क्रांतिकारी अतिवाद के बराबर नहीं ठहराया जा सकता। गैर-सरकारी संगठन, मानवाधिकार समूह, पर्यावरण संगठन और सामुदायिक संघ विविध काम करते हैं, जिनमें से कई जवाबदेही और जनकल्याण को मजबूत करते हैं। इसी तरह यह भी आरोप लगाया जाता है कि ‘डीप स्टेट’ औपचारिक संस्थाओं के पीछे गुप्त नेटवर्क संचालित करता है। ऐसे आरोपों के पीछे विशिष्ट सबूत, संबंध, फंडिंग और कार्रवाइयों के संकेत होने चाहिए। संगठनों के बीच वैचारिक समानता समन्वय का कोई विशिष्ट पैटर्न स्थापित करती हो तो उसकी जाँच होनी चाहिए।
एक अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न विदेशी शक्तियों और फंडिंग की भूमिका का है जो घरेलू विरोधों को बढ़ावा दे सकती है। यह चिंता बढ़ रही है कि बाहरी तत्व आंतरिक विभाजनों का फायदा उठाकर वित्तीय सहायता दे सकते हैं, सरकार-विरोधी कथानकों को बढ़ा सकते हैं और डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर सार्वजनिक असंतोष को तीव्र कर सकते हैं। जहाँ विदेशी फंडिंग, वित्तीय संबंध या समन्वित प्रभाव अभियानों के सबूत मौजूद हों, वहाँ यह गंभीर प्रश्न उठता है कि कुछ विरोध केवल घरेलू शिकायतों से प्रेरित हैं या बाहरी हितों की सेवा भी कर रहे हैं। ऐसे संबंधों की जाँच सत्यापित वित्तीय रिकॉर्ड, विश्वसनीय डिजिटल सबूत और विदेशी संस्थाओं तथा संबंधित संगठनों के बीच दस्तावेजित संबंधों के माध्यम से होनी चाहिए। मुद्दा यह नहीं है कि नागरिकों को विरोध करने का अधिकार है—उन्हें निस्संदेह है—बल्कि यह है कि क्या बाहरी हित किसी आंदोलन को वित्तपोषित या हेरफेर कर भारत की संस्थाओं में जनता का विश्वास कमजोर करने, शासन को बाधित करने या भू-राजनीतिक उद्देश्य आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। जहाँ सबूतों से ऐसी गतिविधि स्थापित हो, वहाँ पारदर्शी जाँच और उचित कानूनी कार्रवाई जरूरी है।
नागरिकों के मौलिक अधिकार हैं, जिनमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा और संघ बनाने की स्वतंत्रता शामिल है। ये स्वतंत्रताएँ उन्हें सत्ता पर सवाल उठाने और जवाबदेही की माँग करने में सक्षम बनाती हैं। संविधान अनुच्छेद 51क के तहत मौलिक कर्तव्य भी निर्धारित करता है, जिनमें संविधान का सम्मान, सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा और सद्भाव को बढ़ावा देना शामिल है। मौलिक अधिकार और मौलिक कर्तव्य कानूनी रूप से समान नहीं हैं, लेकिन दोनों संवैधानिक नागरिकता के महत्त्वपूर्ण पहलुओं को दर्शाते हैं। कोई आंदोलन सरकार से पारदर्शिता की माँग करे तो उसे अपने मामलों में भी उचित पारदर्शिता दिखानी चाहिए। जो हिंसा की निंदा करते हैं उन्हें अपने समर्थकों द्वारा की गई हिंसा को भी क्षमा नहीं करना चाहिए। इसी तरह सरकारों को भी शांतिपूर्ण असहमति का सम्मान करना चाहिए और वैध आलोचना को दबाने के लिए राष्ट्रीय जिम्मेदारी की भाषा का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। संवैधानिक जिम्मेदारी पारस्परिक होनी चाहिए।
व्यवस्था-विरोधी आंदोलन अलग-अलग रणनीतियाँ अपना सकते हैं। कुछ चुनाव और कानून के जरिए सुधार चाहते हैं। कुछ राजनीतिक सत्ता हासिल कर संस्थाओं को भीतर से बदलना चाहते हैं। क्रांतिकारी समूह प्रचलित संवैधानिक व्यवस्था को उखाड़ फेंकने की कोशिश कर सकते हैं। इन रणनीतियों को एक ही षड्यंत्र का हिस्सा मानने के बजाय अलग-अलग समझा जाना चाहिए। महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जब कोई आंदोलन सत्ता हासिल कर ले तो क्या होता है। क्या वह न्यायिक स्वतंत्रता, चुनावी प्रतिस्पर्धा, संस्थागत जवाबदेही और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करता है? या सत्ता को केंद्रित करता है और उन सुरक्षा उपायों को कमजोर करता है जिनकी वह कभी माँग करता था? किसी आंदोलन की लोकतांत्रिक साख उसके नारों से नहीं, बल्कि उसके कार्यों से आँकी जाती है।
किसी गंभीर राजनीतिक आंदोलन को अंततः अपना वैकल्पिक एजेंडा बताना ही होगा। उसका आर्थिक कार्यक्रम क्या है? वह रोजगार कैसे पैदा करेगा, शिक्षा और स्वास्थ्य कैसे सुधारेगा और अपने वादों का वित्तपोषण कैसे करेगा? किन संस्थाओं में सुधार की जरूरत है और उनकी स्वतंत्रता कैसे सुरक्षित रहेगी? सार्वजनिक विवाद कैसे सुलझाए जाएँगे? उसकी अपनी नेतृत्व में भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग को रोकने के क्या तंत्र होंगे? हर विरोध को पूर्ण राष्ट्रीय शासन कार्यक्रम की जरूरत नहीं होती। उदाहरण के लिए किसी परीक्षा पेपर लीक के खिलाफ अभियान का वैध उद्देश्य हो सकता है। लेकिन जो आंदोलन देश के क्रांतिकारी रूपांतरण का दावा करे, उसे यह बताना होगा कि वह क्या बनाना चाहता है। भारत की प्रतिक्रिया बेहतर शासन, शांतिपूर्ण असहमति की सुरक्षा, मजबूत संस्थागत जवाबदेही, विदेशी हस्तक्षेप की कठोर जाँच और संवैधानिक तरीकों के प्रति प्रतिबद्धता पर आधारित होनी चाहिए। वास्तविक शिकायतों को दूर करना स्वयं विनाशकारी कट्टरता के खिलाफ महत्त्वपूर्ण सुरक्षा है।
अराजक-निहिलवाद नकारात्मकता से परिभाषित राजनीति के खतरे को रेखांकित करता है। अगर हर संस्था अस्वीकृत हो, हर चुनाव बिना सबूत के सवालों के घेरे में हो और हर स्थापित मूल्य खारिज कर दिया जाए तो उस समाज को कौन-से सिद्धांत दिशा देंगे जो इसके बाद आएगा? भारत को सत्ता के प्रति अंध आज्ञाकारिता की जरूरत नहीं है। उसे ऐसी संस्थाओं की जरूरत है जो काम करें, ऐसी सरकारों की जो जवाबदेह रहें और ऐसे नागरिकों की जो बिना भय के सुधार की माँग कर सकें। इसी तरह उसे ऐसे राजनीतिक आंदोलनों की भी जरूरत है जो नारों से आगे बढ़कर व्यावहारिक, नैतिक और लोकतांत्रिक विकल्प प्रस्तुत कर सकें। लोकतंत्र हर आलोचक को चुप कराकर मजबूत नहीं होता, लेकिन वह तब भी नहीं फल-फूल सकता जब हर संस्था को दुश्मन समझा जाए। किसी भी विरोध आंदोलन की अंतिम परीक्षा यह नहीं है कि वह मौजूदा व्यवस्था का कितना प्रभावी विरोध करता है, बल्कि यह है कि क्या वह उससे बेहतर व्यवस्था दे सकता है। अगर वह कुछ नहीं सुझाता और सबका विरोध करता है तो वह सार्थक बदलाव का माध्यम न बनकर स्थायी व्यवधान का औजार बनने का जोखिम उठाता है। हर व्यवस्था-विरोधी आंदोलन को एक सरल प्रश्न का उत्तर देना होगा: व्यवस्था को अस्वीकार करने के बाद तुम उसके स्थान पर क्या बनाओगे?
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)



