अवधेश कुमार
दिल्ली । भारत सहित सारे विश्व में जो-जो भद्रता, मांगल्य, सांस्कृतिक व मानवीय संस्कार है, वह सारा नष्ट-भ्रष्ट उद्धवस्त करने की आसुरी प्रतिज्ञा लेकर पश्चिम से एक आंधी चली है। विश्व भर के तथाकथित प्रगत देश भी उस से त्रस्त, असहाय हैं। परन्तु, पिछले दशकों में भारत ने स्वयं की शक्ति तथा सुनीति के कारण विश्व में धीरे-धीरे अपना स्थान बनाया है। भारत के समाज का पुरुषार्थ, सुदृढ़ नीतियाँ, नेतृत्व, देशाभिमान तथा विश्व के प्रति अपने दायित्व के बोध की जागृति के कारण सभी क्षेत्रों में यशस्वी हो रहा है। भारत की इस प्रकार की प्रगति के कारण विश्व के राष्ट्रों में अराजगता खड़ी कर अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए सहायक हो सकने वाले अपने पिट्ठुओं को वहां स्थापित करने का षडयंत्र करने वाली ताकतों के खेल बंद होंगे।
इस वस्तुस्थिति को ये आसुरी ताकतें जानती हैं। इसलिए भारत ही उस का निर्णायक व सब से बलवान प्रतिस्पर्धी और अंतिम एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण लक्ष्य है। भारत, हिन्दू व संघ को किस प्रकार तोड़ सकते हैं (dismantling), इसका विचार कर, योजना बना कर वे कार्य करती हैं। उन्हीं की प्रकृति के कुछ लोग इसमें उन्हें सहायता के लिये मिल जाते हैं। क्षुद्र सत्ता स्वार्थ तथा विवेकहीनता के कारण कुछ महत्वाकांक्षी नेता लोग भी शामिल होते हैं। अपने इतने बड़े समाज में समस्याएँ तो हैं। व्यवस्था की कमियाँ भी ढेर सारी होंगी। उनके चलते आंदोलनों का होना भी स्वाभाविक ही है। परन्तु आंदोलन समाधान देने के लिए होने चाहिए। आन्दोलन करने वाला समाज का कोई समूह हो, शांति व सुव्यवस्था कायम रखने के लिए कार्यवाही करने वाला शासन-प्रशासन या राजनीतिक नेतागण हो, अपने एक अखंड समाज में हमारी करनी के कारण किसी प्रकार की अनबन, द्वेष, त्वेष, मलाल या विभाजन पैदा नहीं होना चाहिए, भावनाएं तीव्र होने पर भी हमारे संविधान कानून की मर्यादा में, बोल चाल के भद्र व्यवहार के संकेतों की मर्यादा में हमारी कृतियाँ हों, यह ध्यान रखना चाहिए। वोट, सस्ती लोकप्रियता अथवा राजनीतिक लाभ का लोभ हमारे विवेक व सद्भावना पर हावी न हो, यह चिंता करनी ही पड़ेगी।
समाज के उद्यम से समाधान
समाज की सब समस्याएं शासन ही सुलझा सकता है अथवा आन्दोलनों से ही समस्याएं सुलझती हैं, ऐसा भी अनुभव नहीं है। समाज की सक्रियता व आपसी संवाद के आधार पर भी समस्याओं का समाधान निकल सकता है।



