जयपुर । प्रश्न यह है कि राहुल गांधी कांग्रेस से और कांग्रेस राहुल से चाहते क्या हैं ? और ये भी कि सोनिया गांधी और प्रियंका वाडरा के अलावा *कांग्रेस में अपना राजनीतिक भविष्य तलाश या संघर्ष कर रहे राजनेता राहुल और कांग्रेस के भविष्य को लेकर क्या सोचते हैं ? प्रश्न यह भी है कि क्या कांग्रेस का राजनीतिक उदय हो भी पाएगा ?* या फिर वह राष्ट्रीय पार्टी होते हुए भी कुछ क्षेत्रों में सिमट कर रह जाएगी ?
क्या वह *बंगाल, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, जम्मू कश्मीर,पंजाब, दिल्ली, गुजरात, तमिलनाडू जैसे राज्यों में कभी राजनीति की मुख्यधारा में लौट पाएगी ? या यह दल 10 जनपथ की आकांक्षाओं और अपेक्षाओं की कश्मकश में ही दम तोड़ देगी ?* यह प्रश्न तब और भी महत्वपूर्ण हो जाता है *जब मोदी सरकार के प्रति आक्रमक रहने वाले राहुल गांधी क्षेत्रिय नेताओं के सामने नतमस्तक हो जाते हैं, जैसा कि पिछले दिनों पंजाब में या दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनावों में हुआ। दरअसल कांग्रेस में ही राहुल गांधी के नेतृत्व को स्वीकारा नहीं जा रहा है। वो सिर्फ इसलिए ढोये जा रहे हैं क्योंकि वो इंदिरा गांधी के पोते और राजीव गांधी के पुत्र हैं। एक राजनेता के रूप में उनको जनमानस की अंतरधारा को समझने और उसको पकड़ने पाने की क्षमता का अभाव दिखता है।* इसीलिए वो जो भी मुद्दा उठाते हैं वो उनका अपना व्यक्तिगत मामला बन जाता है। *देश के मतदाता की तो छोड़ो कांग्रेस नेता भी उसको स्वीकार नहीं कर पाते। इसीलिए चौकीदार चोर है से लेकर वोट चोरी के आरोप तक वे अलग थलग पड़ जाते हैं।*
*विदेशों में जाकर देश की संवैधानिक संस्थाओं की आलोचना करना, भारत के आंतरिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप को आमंत्रित करना राहुल गांधी के ऐसे अपराध हैं जो उनकी हीन भावनाओं को सतह पर ले आते हैं। अदालतों में कई बार माँगी गई बिना शर्त माफ़ी इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि राहुल गांधी की बात को ज़िम्मेदारी से कहा हुआ नहीं माना जा सकता।* इसी बात का प्रतिफल राहुल के साथ साथ कांग्रेस को भी भुगतना पड़ रहा है। कमोबेश यही स्थिति आगे भी रहने की संभावना प्रबल है।
तो फिर कांग्रेस का उदय कैसे होगा ? इस प्रश्न का जवाब तो अभी भविष्य के गर्भ में हैं। जहाँ भाजपा के पास पार्टी और देश का नेतृत्व कर सकने वाले नेताओं की लंबी लाइन है, वहीं कांग्रेस 2014 में सत्ता से बाहर होने के बाद भी राहुल गांधी में ही उम्मीद की किरण देख रही है। यही वो वजह है जिसके कारण इंडी गठबंधन भी राहुल को अपना नेता मानने को तैयार नहीं है। *कांग्रेस के साथ दिक्कत यह है कि उसका नेतृत्व राहुल गांधी कर रहे हैं। वो एक ज़िद्दी बच्चे की तरह हैं, जिसको लगता है कि वो सही हैं और सिर्फ़ वो ही सही हैं बाक़ी सब ग़लत, क्योंकि वो उनकी तरह नहीं सोचते !* यही वो मूल कारण है कि राहुल और कांग्रेस एक दूसरे के ख़िलाफ़ खड़े नज़र आते हैं।
जब तक कांग्रेस सोनिया, राहुल और प्रियंका वाडरा से आगे जाकर अपना नेतृत्व तलाश नहीं लेती तब तक कांग्रेस का भाग्योदय होने में शंका ही है। चाहे फिर राहुल अपने बारे में कुछ भी चाहें या सोचें।



