– डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भोपाल । भारत की अर्थव्यवस्था बदल रही है और उसके साथ बैंक की भूमिका भी। आज बैंक रुपये जमा करने और निकालने के साथ ही वेतन, पेंशन, किसान भुगतान, व्यापारिक लेन-देन, ऋण, निवेश, सरकारी योजनाओं की राशि और डिजिटल भुगतान, सबकी धुरी बन चुका है। ऐसे समय में सप्ताह में दो दिन बैंक शाखाओं को बंद करने की मांग पर एक बुनियादी सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह बदलती आर्थिक जरूरत का उत्तर है या कर्मचारी सुविधा का विस्तार?
मान लीजिए किसी छोटे दुकानदार की दुकान सोमवार से शनिवार तक खुलती है। किसी निजी कर्मचारी को भी सप्ताह में छह दिन काम करना पड़ता है। किसी श्रमिक के पास रविवार ही एकमात्र अवकाश है। वह बैंक की शाखा में कब जाए? उसे यह कह देना कि मोबाइल बैंकिंग या इंटरनेट बैंकिंग का इस्तेमाल करे। वास्तव में समझना होगा कि यह हर समस्या का समाधान नहीं है। भारत का बड़ा हिस्सा आज भी शाखा आधारित बैंकिंग पर निर्भर है। वरिष्ठ नागरिकों, छोटे कारोबारियों, ग्रामीण ग्राहकों और जटिल दस्तावेजी कार्यों वाले लोगों के लिए बैंक की भौतिक शाखा आज भी आवश्यक है, इसलिए शनिवार बैंक के लिए एक कार्यदिवस से कहीं बढ़कर वह ग्राहक के लिए एक अतिरिक्त सेवा-दिवस भी है।
फिर बैंक कर्मचारियों को यह भी याद रखना ही चाहिए कि सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए नियमानुसार विभिन्न अवकाश पहले से उपलब्ध हैं, इसलिए हर सप्ताह दो दिन का स्थायी अवकाश मांगते समय वह यह भी विचारें कि इससे नागरिक को मिलने वाली सेवा पर क्या असर पड़ेगा। सार्वजनिक संस्थान का मूल उद्देश्य जनता को सेवा देना है। यहीं पांच दिवसीय बैंकिंग के पक्ष में दिया जाने वाला यह तर्क भी अधूरा लगता है कि सोमवार से शुक्रवार तक रोजाना अतिरिक्त समय देकर शनिवार की भरपाई हो जाएगी। कर्मचारी के कुल कार्यघंटे संतुलित हो सकते हैं, किंतु उस ग्राहक के लिए शनिवार की सेवा वापस कैसे आएगी जो सप्ताह के बाकी छह दिनों में काम करता है? अतः कर्मचारी के समय और ग्राहक की सुविधा को एक ही पैमाने से नहीं मापा जा सकता, जिसमें कि शाम चार बजे के बाद बैंक किसी भी ग्राहक को बैंक के अंदर नहीं घुसने देती हों!
वस्तुत: बैंकिंग व्यवस्था का महत्व इस तथ्य से समझा जा सकता है कि सरकार को मौजूदा सितंबर के घटनाक्रम में रविवार को भी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को खोलने की व्यवस्था करनी पड़ी है। 28 से शुरू की गई और 30 सितंबर तक चलने वाली हड़ताल के बीच यह भी देखें कि 30 सितंबर को अर्धवार्षिक लेखा समापन भी है। सप्ताहांत और हड़ताल के लगातार पड़ने से बैंकिंग सेवाओं पर कई दिनों तक प्रभाव पड़ने की आशंका स्वभाविक ही है। जब सरकार को बैंकिंग व्यवस्था सुचारु रखने के लिए रविवार को बैंक खोलने पड़ रहे हों, तब यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी इस सेवा को नियमित रूप से एक और दिन बंद करने की मांग को किस आधार पर उचित माना जाए?
बैंक से जुड़े कर्मचारी यह समझें कि श्रम का सम्मान उस जिम्मेदारी में भी है जिसके लिए कर्मचारी को समाज भुगतान करता है। डॉक्टर, पुलिसकर्मी, अग्निशमनकर्मी, बिजलीकर्मी या परिवहनकर्मी यह तय नहीं कर सकते कि समाज की जरूरत सप्ताहांत में समाप्त हो गई। बैंकिंग भी आज धीरे-धीरे ऐसी ही अनिवार्य सेवा बनती जा रही है, यदि नागरिक को शनिवार की बैंकिंग सेवा की जरूरत है तो वह उसे मिलनी ही चाहिए।
इस संबंध में भारतीय मजदूर संघ का वर्तमान रुख जरूर संतुलित नजर आया है। बीएमएस ने कार्य-जीवन संतुलन, महिला कर्मचारियों की समस्याओं, पेंशनभोगियों, चिकित्सा सुविधाओं, शिकायत निवारण और स्थानांतरण नीति जैसे मुद्दों को भी उठाया है और संवाद के रास्ते को प्राथमिकता देने की बात कही है। यहां एक व्यापक प्रश्न सामने आता है: क्या कर्मचारी हितों की रक्षा के लिए हड़ताल ही सबसे प्रभावी रास्ता है? क्या यह बैंक कर्मचारियों को नहीं समझ आता कि बैंकिंग जैसे क्षेत्र में हड़ताल का असर उस आम नागरिक पर पड़ता है जो विवाद में शामिल ही नहीं है? वस्तुतः व्यापारी का भुगतान अटक सकता है, पेंशनभोगी परेशान हो सकता है, जरूरी नकदी की समस्या पैदा हो सकती है और कारोबार की गति प्रभावित हो सकती है, इसलिए बैंकिंग क्षेत्र में आंदोलन का प्रत्येक निर्णय लोकहित की कसौटी पर भी देखा जाना चाहिए।
आज यह हड़ताल करनेवालों से अवश्य पूछा जाए कि भारत की अर्थव्यवस्था सप्ताहांत पर बंद नहीं होती, बाजार खुले रहते हैं, कारोबार चलता है, परिवहन चलता है, ऑनलाइन भुगतान चलता है, वित्तीय लेन-देन चलता है। ऐसे में बैंकिंग की शाखा-व्यवस्था को लगातार कम उपलब्ध कराना बदलती अर्थव्यवस्था के साथ कितना संगत है, क्या यह उपभोक्ता के साथ न्याय है, जिसके रुपयों की दम पर बैंकिंग सेवा में कर्मचारियों के घर चल रहे हैं?
फिर पांच दिवसीय बैंकिंग की बहस को सिर्फ शनिवार की छुट्टी की मांग के रूप में देखने से उसका सबसे महत्वपूर्ण पक्ष छूट जाता है। यह प्रश्न है कि सार्वजनिक बैंक किसके लिए हैं? कर्मचारी के लिए वे रोजगार हैं, बैंक प्रबंधन के लिए संस्था हैं, मगर नागरिक के लिए वे उसकी आर्थिक जिंदगी का आधार हैं, इसलिए बैंक कर्मचारियों की उचित कार्यस्थितियां सुनिश्चित हों, उन्हें पर्याप्त विश्राम मिले और उनका सम्मान बना रहे, यह जरूरी है, ये कौन मना कर रहा है? पर साथ ही यह भी उतना ही जरूरी है कि बैंकिंग सेवा नागरिक की बदलती जरूरतों के अनुरूप उपलब्ध रहे।
वस्तुत: भारत को ऐसी बैंकिंग व्यवस्था चाहिए जिसमें कर्मचारी को मशीन की तरह काम करने के लिए बाध्य न किया जाए, मगर नागरिक को भी अपने बैंक तक पहुंचने के लिए पांच दिनों की सीमा में कैद न होना पड़े। अर्थव्यवस्था जब सातों दिन चल रही है, जब कई शासकीय संस्थानों के कर्मचारी भी सप्ताह में रविवार छोड़कर छह दिन अपना कार्य पूर्ण जिम्मेदारी के साथ कर रहे हैं, तब बैंक कर्मचारियों को अपने कार्य में क्यों दिक्कत आना चाहिए ?
ऐसे में यह स्वभाविक है कि बैंकिंग सेवा को पांच दिनों में सीमित करने का औचित्य सिर्फ कर्मचारी सुविधा से तय नहीं हो सकता। इसका उत्तर लोकहित, सेवा की आवश्यकता और बदलते आर्थिक भारत की वास्तविक जरूरतों में निहित है।यदि संपूर्ण भारत श्रमरत है, तब बैंक कर्मचारी यह नहीं कह सकते कि उन्हें अतिरिक्त अवकाश चाहिए। फिर सबके साथ से ही सबका विकास होना है और सबके विकास से ही विकसित भारत बनना है, इसलिए भी अच्छा यही होगा कि बैंक यूनियनें एवं कर्मचारी हर सप्ताह में दो दिन अवकाश की अपनी जिद छोड़ें। वैसे भी उनके पास हर साल तमाम सिंचित अवकाश रहते ही हैं जिनका कि वह समय-समय पर उपयोग करते हैं, तब अतिरिक्त शनिवार का बोझ देश की अर्थव्यवस्था पर डालना कहीं से भी उचित नहीं है।


