– डॉ. मयंक चतुर्वेदी
दिल्ली । भारत एक ऐसी सभ्यता है जिसकी आत्म-चेतना उसके सांस्कृतिक प्रतीकों, आध्यात्मिक परंपराओं और लोकविश्वासों में बसती है। संविधान भारत को राजनीतिक एकता देता है, जबकि संस्कृति उसे वह ‘स्व’ की चेतना प्रदान करती है, जिसके माध्यम से राष्ट्र संचालित है, इसलिए जब ‘राजनीति’ संस्कृति के प्रतीकों को अपने क्षणिक संघर्ष का औजार बना लेती है, तब यह किसी स्तर का विवाद न होकर सीधे राष्ट्रीय चेतना पर प्रहार हो जाता है।
अभी कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के दिल्ली आन्दोलन को बहुत समय नहीं बीता है, वहां सभी ने देखा कि कैसे हिन्दू मानबिन्दुओं को अपमानित किया गया। हिन्दू सभ्यता, सनातन संस्कृति, बाह्मण न जाने कितने ही मुद्दे रहे जो नीट को छोड़कर थे और जिसके केंद्र में हिन्दू घृणा थी। यह कोई उम्मीद नहीं कर रहा था कि विरोध के नाम पर, छात्र आन्दोलन के बहाने जो कीचड़ जंतर-मंतर पर उछाली जा रही थी, वही संसद में हिन्दू आस्था और प्रतीकों पर भद्र कहे जानेवाले कथित सांसदों द्वारा भी उछाली जाएगी !
वस्तुत: संसद परिसर में भगवा वस्त्र धारण कर विपक्ष के कुछ सांसदों द्वारा राम मंदिर के चढ़ावे की कथित अनियमितताओं को लेकर किया गया प्रदर्शन इसी दृष्टि से गंभीर प्रश्न खड़े करता है। किसी भी लोकतंत्र में सरकार से प्रश्न पूछना विपक्ष का धर्म है, किंतु धर्म निभाने और धर्म का प्रतीक पहनकर राजनीतिक अभिनय करने में मूलभूत अंतर है।
राजनीतिक में अक्सर देखा गया है कि जब भी विचार समाप्त होने लगते हैं, तब प्रतीकों का नाटकीय उपयोग बढ़ने लगता है। तर्कों के स्थान पर दृश्य रचे जाते हैं, तथ्यों के स्थान पर अभिनय प्रस्तुत किया जाता है और फिर भावनाओं को झकझोरने का प्रयास होता है, जिसमें कि मूल विषय आधारित विमर्श कहीं बहुत पीछे छूट चुका होता है।
संसद परिसर में दानपेटी रखकर, भगवा वस्त्र पहनकर और उस वेशभूषा को कथित भ्रष्टाचार के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करना इसी प्रवृत्ति का उदाहरण है। यदि किसी ट्रस्ट, संस्था या व्यवस्था पर वित्तीय अनियमितता का संदेह है तो उसका समाधान जांच, प्रमाण और विधिक प्रक्रिया से होगा। संसद में प्रश्न पूछे जा सकते हैं, दस्तावेज रखे जा सकते हैं, जांच की मांग की जा सकती है, किंतु नहीं, कथित भद्र सांसदों को तो संन्यासी के वेश को राजनीतिक नाटक का हिस्सा बनाना था, सो बना दिया गया!
यहां एक प्रश्न विपक्ष से भी पूछा जाना चाहिए। यदि लोकतंत्र में समानता का सिद्धांत सर्वोपरि है, तो क्या वही राजनीतिक प्रयोग किसी अन्य धर्म के अत्यंत पवित्र धार्मिक परिधान के साथ भी किया जाता? यदि इस संदर्भ में उत्तर नकारात्मक है, तो यह हिन्दू और गैर हिन्दू के लिए मापदंड अलग-अलग क्यों है? कथित सांसद ये कैसे भूल गए, धर्मनिरपेक्षता का वास्तविक अर्थ सभी आस्थाओं के प्रति समान सम्मान है, न कि चयनात्मक संवेदनशीलता।
क्योंकि किसी में हिम्मत नहीं है कि चर्च आधारित व्यवस्था- नन और पास्टर का चोंगा पहनकर इस तरह का नाटक किया जाता? क्या जालीदार टोपी लगाकर कुर्ता-पजामा पहनकर ऐसा नाटक संसद में किया जाना संभव है? क्या ईसाई एवं इस्लाम में अपराध नहीं घट रहे? क्या देश की दूसरी और तीसरी सबसे बड़ी जनसंख्या में सभी ईमानदार हैं?
बिशप फ्रैंको मुलक्कल मामला, मलंकरा ऑर्थोडॉक्स चर्च ब्लैकमेल केस, फादर रॉबिन केस व सख्त रवैया, फादर अर्लीनो डी मेलो और फादर विक्टर रोड्रिगेज, जैसे अनेकों बड़े प्रकरण गिनाए जा सकते हैं, जोकि चर्च से, मिशनरी से जुड़े हुए हैं। इस्लाम और मुस्लिम समुदाय में भी मदरसों, मस्जिदों, मुल्ला-मौलवियों और वक्फ बोर्ड से जुड़े यौन शोषण, बलात्कार और बड़े पैमाने पर भूमि विवाद के संबंधित भ्रष्टाचार के कई गंभीर मामले हैं। तो क्या ये प्रबुद्ध कथित सांसद उनके प्रतीक बनाएंगे?
यह समझना आवश्यक है कि भगवा रंग का महत्व किसी राजनीतिक दल ने निर्धारित नहीं किया। यह महत्व हिन्दू सनातन धर्म में हजारों वर्षों की तपस्या से अर्जित साधना का परिणाम है। ऋग्वेद का प्रथम मंत्र अग्नि को समर्पित है। वही अग्नि, जिसकी ज्वाला केसरिया है, भारतीय चिंतन में शुद्धि, समर्पण और तप की प्रतीक बनी। उपनिषदों ने संन्यासी को अग्नि के समान बताया है। जिसके लिए कहा गया कि वह स्वयं तपता है और समाज को प्रकाश देता है, इसलिए भगवा वस्त्र धारण करना अपने अहंकार का विसर्जन कर लोकमंगल के लिए स्वयं को समर्पित करने की प्रतिज्ञा है।
महाभारत के अनुशासन पर्व में संन्यास को आत्मसंयम की सर्वोच्च अवस्था कहा गया है। परंपरा में संन्यास ग्रहण करने वाला व्यक्ति अपने सांसारिक जीवन का प्रतीकात्मक अंत करता है। उसके बाद उसे भगवा धारण करने का अधिकार मिलता है, इसलिए भारतीय समाज में भगवा वस्त्र किसी अभिनय का परिधान कभी नहीं हो सकता, यह त्याग का सार्वजनिक व्रत है।
इसी कारण भारतीय जनमानस में भगवा के प्रति श्रद्धा धर्म से जुड़ी होने के साथ ही सांस्कृतिक भी है। भगवान श्रीराम के ध्वज से लेकर अर्जुन के कपिध्वज तक, आदि शंकराचार्य की दिग्विजय से लेकर स्वामी विवेकानंद के विश्वधर्म सम्मेलन तक, छत्रपति शिवाजी महाराज के जरिपटके से लेकर गुरु गोविंद सिंह के निशान साहिब तक ‘केसरिया रंग’ भारतीय आत्मविश्वास, आत्मबल और आत्मत्याग का ध्वज रहता आया है। यह भारत की सभ्यतागत स्मृति जो चिरकाल तक रहनेवाली है, जब तक कि इस धरा पर सनातन हिन्दू धर्म को माननेवाले एक व्यक्ति भी जीवित है।
वस्तुत: विश्व हिंदू परिषद और अनेक संतों ने आज इसी कारण इस प्रदर्शन पर तीखी आपत्ति जताई है। उनकी आपत्ति का मूल बिंदु यह है कि यदि किसी धार्मिक प्रतीक का उपयोग व्यंग्य या राजनीतिक आरोपों के मंचन के लिए किया जाएगा, तो इससे करोड़ों लोगों की आस्था प्रभावित होगी और यह सच भी है, इससे जुड़े आज हमारे सामने अनेक उदाहरण भी मौजूद हैं। धार्मिक प्रतीकों का राजनीतिक नाट्यरूपांतरण स्वाभाविक रूप से विवाद को जन्म देता है।
अच्छा होता, इस तरह से भगवा का स्वांग करने के स्थान पर कथित सांसद पहले भगवा वस्त्र के भाव को समझने का प्रयास करते। वैसे अभी भी समय नहीं बीता है, वे इसे जानें, आखिर इसका महत्व क्या है? वे अपने भारतीय इतिहास के कठिनतम क्षणों में याद करें। विदेशी आक्रमणों के समय यही भगवा ध्वज प्रतिरोध का प्रतीक बना। संन्यासियों ने अनेक अवसरों पर समाज और संस्कृति की रक्षा के लिए संघर्ष भी किया और बड़ी संख्या में हुतात्मा भी हुए। इसी कारण यह रंग श्रद्धा और बलिदान दोनों का प्रतिनिधि है।
यह भी ध्यान रखने योग्य है कि बौद्ध भिक्षुओं का काषाय चीवर, जैन तपस्वियों की परंपराएं और सिख पंथ का केसरिया निशान जैसी अनेक धाराएं हैं, सभी भारतीय आध्यात्मिक धारा में इसी रंग की प्रतिष्ठा को पुष्ट करते हैं। अर्थात यह किसी एक संगठन, संप्रदाय या राजनीतिक विचारधारा का प्रतीक न होकर संपूर्ण भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की साझा विरासत है।
संसद लोकतंत्र का मंदिर कही जाती है। मंदिर में प्रवेश करने वाला व्यक्ति अपने व्यवहार पर संयम रखता है; संसद में भी वही अपेक्षा होनी चाहिए। वहां विरोध हो, सरकार की कठोर आलोचना हो, किंतु तथ्यों पर आधारित हो। यह लोकतंत्र के लिए आवश्यक है। पर यदि विरोध की भाषा इस सीमा तक पहुंच जाए कि वह किसी सभ्यता के पूज्य प्रतीकों को राजनीतिक अभिनय का उपकरण बना दे, तो लोकतंत्र का स्तर ऊंचा नहीं होता, बल्कि सार्वजनिक विमर्श की गरिमा घटती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि संसद स्वयं यह संदेश दे कि भारत की विविध आस्थाओं के पवित्र प्रतीकों को दलगत संघर्ष का हथियार नहीं बनने देंगे। सरकारें बदलती रहेंगी, विपक्ष भी बदलता रहेगा, लेकिन भारत की सभ्यता और उसके प्रतीकों का सम्मान राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से ऊपर रहना चाहिए। यदि यह मर्यादा टूटती है, तो क्षति किसी व्यक्ति, समाज, समूह या दल की नहीं होगी, वास्तव में यह क्षति उस राष्ट्रीय चेतना की होगी, जिसने हजारों वर्षों से इस देश को सिर्फ एक भू-भाग मानने तक कभी सीमित नहीं रखा है, यह वही राष्ट्रीय चेतना है जिसके लिए भारत एक सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में सदैव प्राणवान रहता आया है ।
(लेखक फिल्म सेंसर बोर्ड एडवाइजरी कमेटी के पूर्व सदस्य एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं)



