भ्रष्टाचार के इस जहरीले पेड़ की जड़ों में अब मट्ठा डाला जाए

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दिल्ली। भारत में भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी होती जा रही हैं। बड़े घोटालों में अपराधी बच निकलते हैं, जबकि छोटे-मोटे मामले अखबारों की सिंगल कॉलम खबर बनकर खत्म हो जाते हैं। कॉमनवेल्थ घोटाले में किसी को 20 साल की सजा नहीं हुई। 1.76 लाख करोड़ रुपये के 2G घोटाले और 1.86 लाख करोड़ रुपये के कोयला घोटाले में भी यही स्थिति रही। रोज चीटिंग, फ्रॉड, फर्जरी, घूसखोरी, कमिशनखोरी, जमाखोरी, मिलावटखोरी, कालाबाजारी और नशातस्करी की खबरें आती हैं, लेकिन फॉलो-अप शून्य। आरोपी या तो बच निकलते हैं या हल्की सजा पाकर निकल जाते हैं।

यदि किसी सरकारी अधिकारी की भ्रष्टाचार के कारण किसी की जान चली जाती है, तो उसके खिलाफ हत्या का मुकदमा क्यों नहीं चलता? यह सवाल आज हर ईमानदार नागरिक पूछ रहा है। अपराध की रोकथाम के लिए कठोर कानून जरूरी हैं। अमेरिका का फेडरल पीनल कोड देखें तो अपराध कम होने के बावजूद वह मोटी किताब है। वहीं भारत में अपराध ज्यादा होने के बावजूद भारतीय न्याय संहिता (पूर्व IPC) अपेक्षाकृत पतली है। समाज को इस पर गंभीर चर्चा करनी चाहिए कि क्या अमेरिका के फेडरल पीनल कोड को भारत में अपनाया या अनुकूलित किया जा सकता है।

सजा मात्र कागजी नहीं होनी चाहिए। अपराधी को सजा मिलते हुए समाज को दिखाई भी देनी चाहिए। यदि भ्रष्टाचारियों को कठोर दंड मिले और वह दंड सार्वजनिक रूप से दिखे, तो ईमानदारी पर समाज का विश्वास बढ़ेगा। दुर्भाग्य से आज युवा अधिकारी लायजनिंग और दलाली की ओर आकर्षित हो रहे हैं। उन्हें लगता है कि कम समय में अधिक कमाई के साथ पकड़े जाने पर सजा भी नगण्य है। गांव-गांव में जमीन से लेकर सरकारी कामों तक दलाल थोक भाव में मिल रहे हैं। इनकी सेटिंग तहसीलदार, थानेदार, एसीपी से लेकर कलेक्टर तक फैली हुई है।
केंद्र या राज्य सरकार से इस पर लगाम लगाने की उम्मीद करना मुश्किल है, क्योंकि बड़े नेता खुद इन अपराधों में कथित तौर पर शामिल होते हैं। उनका कमिशन हर स्तर पर चलता है।

समय आ गया है कि भ्रष्टाचार के इस जहरीले पेड़ की जड़ों में मट्ठा डाला जाए। भ्रष्टाचार के मामलों में एक साल के अंदर फैसला आना चाहिए। दोषी पाए जाने पर उनकी पूरी संपत्ति (100%) जब्त की जाए। उन्हें अपराधी के रूप में चिह्नित किया जाए। उनके आधार कार्ड, वोटर आईडी, पासपोर्ट और सभी सरकारी दस्तावेजों में यह दर्ज हो कि वे भ्रष्ट हैं। नाम सर्च करते ही सबसे पहले उनकी भ्रष्टाचार की जानकारी सामने आए। सारी संपत्ति छीनने के बाद उनकी नागरिकता भी छीन ली जाए। ऐसे दीमकों को समाज पालने का क्या फायदा?

कठोर कानून, तेज न्याय, संपत्ति जब्ती और सामाजिक बहिष्कार जैसी सजाओं से ही भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सकता है। युवा पीढ़ी को ईमानदारी का रास्ता आकर्षक लगे, इसके लिए सिस्टम को बदलना होगा। बिना राजनीतिक इच्छाशक्ति के यह संभव नहीं। जनता को जागरूक होकर दबाव बनाना होगा। तभी भ्रष्टाचार मुक्त भारत का सपना साकार हो सकेगा।

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आशीष कुमार अंशु

आशीष कुमार अंशु

आशीष कुमार अंशु एक पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों से मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान स्टेप से जुड़े हुए हैं

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