दिल्ली । हाल ही में अमेरिकी संसद द्वारा भारत एवं चीन सहित कुछ अन्य देशों से अमेरिका को होने वाले विभिन्न उत्पादों के निर्यात पर 100 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाने सम्बंधी कानून को स्वीकृति प्रदान कर दी गई है, क्योंकि, ये देश रूस से कच्चे तेल का भारी मात्रा में आयात कर रहे हैं। अमेरिका के अनुसार, इन देशों द्वारा रूस से कच्चे तेल के आयात के चलते रूस को यूक्रेन के साथ युद्ध करने की आर्थिक शक्ति प्राप्त हो रही है। जबकि, यूरोपीयन देश एवं अमेरिका स्वयं रूस से गैस एवं अन्य उत्पादों का भारी मात्रा में आयात कर रहे हैं। अर्थात, इन देशों द्वारा रूस से अन्य पदार्थों के आयात करने से रूस को कोई आर्थिक ताकत प्राप्त नहीं होती है, केवल भारत एवं चीन सहित कुछ अन्य देशों द्वारा रूस से कच्चे तेल के आयात से रूस को आर्थिक शक्ति प्राप्त होती है। अमेरिका का यह दोहरा चरित्र अब पूरे विश्व के सामने प्रदर्शित हो रहा है। अमेरिका को अब यह समझ लेना चाहिए कि भारत से अमेरिका को होने वाले विभिन्न उत्पादों के निर्यात पर 100 प्रतिशत का अतिरिक्त टैरिफ लगाने का डर दिखा कर एवं भारत को दबाव में लाकर अमेरिका भारत से अपने मनमाफिक निर्णय करवा लेगा, तो आज की बदली हुई परिस्थितियों के बीच यह सम्भव होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है। अमेरिका एवं पूरे विश्व के सामने अब एक नया भारत खड़ा है। अमेरिका दरअसल चाहता है कि भारत उसके कृषि उत्पादों के लिए अपने बाजार खोले ताकि वह भारत को अपने कृषि एवं डेयरी उत्पाद निर्यात कर सके। यदि भारत अमेरिका के इस दबाव में आता है तो भारतीय किसानों पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ेगा और केंद्र सरकार भारत के किसानों के हितों की बलि किसी भी कीमत पर देने को तैयार नहीं है। आज, संभवत: अमेरिका को भारत की अधिक आवश्यकता है क्योंकि भारत पूरे विश्व में सबसे बड़ी आबादी वाला देश बन गया है, जिसके कारण भारत पूरे विश्व में सबसे युवा देशों की श्रेणी में उच्च स्थान रखता है। साथ ही, भारत आज विश्व में विभिन्न उत्पादों का सबसे बड़ा उपभोक्ता देश बन गया है एवं आगे आने वाले समय में भारत की यही स्थिति लम्बे समय तक बनी रहने वाली है। भारत आज विश्व के अन्य उत्पादक देशों के लिए सबसे बड़ा बाजार है।
भारत का सकल घरेलू उत्पाद आज विश्व में बड़े देशों के बीच सबसे अधिक तेज गति से आगे बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है। हाल ही में जापान ने भारत की सार्वभौमिक क्रेडिट रेटिंग को अपग्रेड किया है। और तो और, अब अमेरिकी क्रेडिट रेटिंग एजेन्सियां भी भारत की सार्वभौमिक क्रेडिट रेटिंग में सुधार करने पर विचार करने को मजबूर हो रही हैं। हाल ही में मूडीज ने वर्ष 2026 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में होने वाली वृद्धि दर को 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 7 प्रतिशत कर दिया है। साथ ही, जेफरीज ने भी अपने पूर्व अनुमान 6.7 प्रतिशत को सुधारकर 7 प्रतिशत कर दिया है। भारतीय रिजर्व बैंक ने भारत की आर्थिक विकास दर के अनुमान को 6.7 प्रतिशत कर दिया है, जबकि भारत ने वित्तीय वर्ष 2026-27 की प्रथम तिमाही में 7.8 प्रतिशत की आर्थिक विकास दर हासिल की है।
भारत के अपने विदेशी उत्पादों के लिए नए बाजार तलाशने सम्बंधित प्रयास आज सफल होते हुए दिखाई दे रहे हैं। क्योंकि, अगस्त 2026 का माह भारतीय निर्यातकों के लिए बहुत शानदार रहा है। वैश्विक स्तर पर कई प्रकार की चुनौतियों के चलते भी भारत से विभिन्न उत्पादों के निर्यात में 26.12 प्रतिशत की आकर्षक वृद्धि दर्ज हुई है। अगस्त 2025 माह में भारत के कुल निर्यात 3,474 करोड़ अमेरिकी डॉलर के रहे थे जो अगस्त 2026 में बढ़कर 4,381 करोड़ अमेरिकी डॉलर के हो गए हैं। फेडरेशन आफ इंडियन एक्सपोर्ट आरगनाईजेशन के अनुसार, भारत से विभिन्न उत्पादों के निर्यात में हो रही आकर्षक वृद्धि दर भारतीय निर्यातकों की ताकत, प्रतिस्पर्धा व बाजार के हिसाब से ढलने की क्षमता को दर्शाती है। चीन, सिंगापुर, जर्मनी, दक्षिण अफ्रीका, मलेशिया, तंजानिया, हांगकांग, आस्ट्रेलिया, स्पेन एवं श्रीलंका जैसे बाजारों में भारतीय उत्पादों की बढ़ती पहुंच भारत के निर्यात बास्केट के विस्तार का संकेत है। आटोमोबाईल निर्यात में 22.2 प्रतिशत की मजबूत बृद्धि दर्ज हुई है, इसमें दोपहिया व तिपाहिया वाहनों का दबदबा रहा है। जेम्स एंड ज्वेलरी के निर्यात में भी 3.14 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल हुई है। इलेक्ट्रॉनिक एवं इंजीनीयरिंग उत्पादों के निर्यात में लगातार वृद्धि भारत की मजबूत स्थिति को दर्शा रही है।
विदेशी व्यापार के मामले में भारत विश्व में केवल कुछ देशों (अमेरिका सहित) पर निर्भर रहने के स्थान पर अब अपने विभिन्न उत्पादों के निर्यात के लिए नए नए बाजार तलाश रहा है। केंद्र सरकार के इन प्रयासों का सुपरिणाम दिखाई भी देने लगा है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के प्रथम पांच माह (अप्रेल-अगस्त 2026) के दौरान भारत का ब्रिक्स देशों (चीन, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील एवं रूस) को निर्यात 34 प्रतिशत बढ़कर 1,990 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार कर गया है। इसी अवधि में चीन को भारत से विभिन्न उत्पादों के निर्यात में 39 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई हैं। ब्रिक्स समूह के समस्त सदस्य देशों के साथ भारत अपने आर्थिक एवं राजनैतिक सम्बंध लगातार मजबूत कर रहा है, जिसका परिणाम अब इन देशों के साथ भारत के लगातार बढ़ रहे विदेशी व्यापार के रूप में दिखाई देने लगा है। वाणिज्य मंत्रालय द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, ब्रिक्स के चार मुख्य देशों (चीन, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील एवं रूस) का भारत के कुल निर्यात में हिस्सा अप्रेल-अगस्त 2025 के दौरान 8.1 प्रतिशत से बढ़कर अप्रेल-अगस्त 2026 के दौरान 9.2 प्रतिशत हो गया है। इस वित्तीय वर्ष के प्रथम पांच माह के दौरान चीन को 960 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निर्यात किया गया है तो वहीं दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील एवं रूस को भारतीय उत्पादों के निर्यात में क्रमशः 58 प्रतिशत, 13 प्रतिशत एवं 11 प्रतिशत की आकर्षक वृद्धि दर्ज की गई है।
आज कई अमेरिकी कम्पनियां भारत में अपने वैश्विक योग्यता केंद्रों की स्थापना कर रही हैं। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं – एस्ट्रा जेनेका, बैंक ओफ अमेरिका, ट्रूब्रिज, गाइडवायर, आदि। भारत में स्थापित इन वैश्विक योग्यता केंद्रों में हजारों की संख्या में भारतीय इंजीनीयर कार्य कर रहे हैं। कहीं यह अमेरिकी प्रशासन द्वारा लगातार बदले जा रहे वीजा सम्बंधी नियमों के चलते तो नहीं हो रहा है। अमेरिकी नीतियों से केवल विश्व के अन्य देश ही नहीं बल्कि अमेरिकी कम्पनियां भी परेशानी महसूस करने लगी हैं एवं वे अपनी इकाईयों को भारत सहित अन्य देशों में स्थानांतरित कर रही हैं।
भारत “वसुधैव कुटुम्बकम” की भावना के साथ विश्व के लगभग समस्त देशों के साथ अपने सम्बंधों को सुधारने का लगातार प्रयास कर रहा है। साथ ही, वैश्विक स्तर पर नागरिकों को सनातन संस्कृति के संस्कारों से परिचित कराने के प्रयास भी भारत द्वारा किए जा रहे हैं ताकि पूरे विश्व में शांति स्थापित की जा सके। इसी कड़ी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परमपूज्य सर संघचालक डॉ मोहन भागवत जी ने हाल ही में अमेरिका, कनाडा एवं ब्रिटेन की 17 दिवसीय यात्रा सम्पन्न की है। इन देशों में आयोजित सर्व धर्म सभाओं में अन्य धर्मों के धर्माचार्यों की भी उत्साहपूर्वक भागीदारी रही है। उक्त यात्रा में न्यूयार्क में सार्वभौमिक एकात्मता, टोरंटो में विश्व से मित्रता एवं लंदन में अपनेपन के संदेश के साथ डा भागवत ने सामाजिक समरसता, सेवा, विविधता के बीच एकता और नागरिक कर्तव्य पर भी जोर दिया। प्रवासी भारतीयों से उन्होंने अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहते हुए अपनी कर्मभूमि के प्रति पूरी निष्ठा निभाने का आह्वान किया। एक तरफ भारत पूरे विश्व में सामंजस्य स्थापित कर शांति स्थापित करना चाहता है तो दूसरी ओर अमेरिका विभिन्न देशों पर अपने एकतरफा नियम थोपना चाहता है, चाहे वह टैरिफ से सम्बंधित हों अथवा अन्य देशों पर सैंक्शन लगाने से सम्बंधित हों। वेनेंजुएल जैसे कुछ छोटे देशों पर तो अमेरिका ने एक तरह से अपना पूरा नियंत्रण ही स्थापित कर लिया है एवं वहां के तेल के कुओं से निकलने वाले कच्चे तेल पर अपना पूर्ण अधिकार स्थापित करने का प्रयास किया है।
केवल अमेरिका ही क्यों, पूरे विश्व को ही आज भारत की सनातन संस्कृति के संस्कारों को जानने एवं उन पर अमल करने की आवश्यकता है। तभी, ईरान – अमेरिका, रूस – यूक्रेन एवं इजराईल – हम्मास जैसे युद्धों को टाला जा सकेगा और पूरे विश्व में शांति स्थापित की जा सकेगी।



