वंदेमातरम् : धर्मनिरपेक्षता की आड़ में भारत को बर्बाद करने का षड्यंत्र?

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली । वंदेमातरम् को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में चल रही सुनवाई ने भारत की धर्मनिरपेक्षता की उस बहस को फिर सामने ला दिया है, जिसे अक्सर सुविधा के अनुसार अलग-अलग अर्थों में प्रस्तुत किया जाता है। प्रश्न सिर्फ यह नहीं है कि कोई व्यक्ति वंदेमातरम् गाए या न गाए। प्रश्न यह है कि भारत में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ क्या है? क्या धर्मनिरपेक्षता अकेले धार्मिक असहमति के अधिकार की रक्षा करती है या फिर राज्य की नीतियों में सभी धार्मिक समुदायों के साथ समान संवैधानिक व्यवहार की मांग भी करती है?

जब किसी राष्ट्र की मूल चेतना और उसके राष्ट्रीय प्रतीकों पर ही सवाल खड़े किए जाने लगें, तो नागरिकों के एक बड़े वर्ग में यह संशय गहराने लगता है कि क्या धर्मनिरपेक्षता का इस्तेमाल देश को वैचारिक रूप से बांटने के लिए किया जा रहा है। इस लेख में हम इस विवाद के हर उस पहलू को तथ्यात्मक रूप से उजागर करेंगे जो सीधे तौर पर देश की कानूनी, सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े हैं।

समकालीन कानूनी परिदृश्य: सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई (2026)

22 सितंबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने कर्नाटक संगीतकार टी.एम. कृष्णा की याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा। याचिका में 2026 में किए गए उस संशोधन को चुनौती दी गई है, जिसके माध्यम से वंदेमातरम् को राष्ट्रगान के समान राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण कानून के दायरे में लाया गया। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने संकेत दिया कि धार्मिक अथवा वास्तविक अंतरात्मा संबंधी आपत्ति के कारण वंदेमातरम् न गाने वाले व्यक्ति को आपराधिक परिणाम नहीं भुगतने चाहिए और 1986 के बिजो इमैनुएल निर्णय में स्थापित सिद्धांत लागू रहेंगे।

वस्‍तुत: इस कानूनी लड़ाई ने एक बार फिर राष्ट्रीय अस्मिता को न्यायालय के कटघरे में खड़ा कर दिया है, विचार करें कि क्या राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान भी व्यक्ति की व्यक्तिगत पसंद पर निर्भर होना चाहिए? यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट होना चाहिए कि 2026 का संशोधन यह नहीं कहता कि प्रत्येक नागरिक को वंदेमातरम् गाना ही होगा और न गाने पर उसे जेल होगी। संशोधित कानून जानबूझकर राष्ट्रीय गीत के गायन को रोकने या उसके गायन में लगी सभा में व्यवधान उत्पन्न करने को दंडनीय बनाता है, इसके लिए अधिकतम तीन वर्ष तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।

दोबारा दोषसिद्धि की स्थिति में न्यूनतम एक वर्ष के कारावास का प्रावधान भी लागू होता है। अर्थात किसी व्यक्ति के शांतिपूर्ण तरीके से गीत न गाने और किसी सार्वजनिक आयोजन में जानबूझकर व्यवधान डालने के बीच कानूनी अंतर है। सर्वोच्च न्यायालय की वर्तमान सुनवाई इसी संवैधानिक सीमा की परीक्षा कर रही है।

24 जनवरी 1950 का ऐतिहासिक निर्णय

वंदेमातरम् की संवैधानिक और राष्ट्रीय स्थिति पर चर्चा करते समय 24 जनवरी 1950 की संविधान सभा की कार्यवाही को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि जन गण मन राष्ट्रगान होगा और स्वतंत्रता संघर्ष में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले वंदेमातरम् को उसके समान सम्मान और समान दर्जा दिया जाएगा। संविधान सभा की मूल कार्यवाही इसका आधिकारिक प्रमाण है।

नए कानूनी आधिकारिक तथ्य-पत्र में भी वंदेमातरम् के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित किया गया है। यह गीत बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने रचा था, 1875 में प्रकाशित हुआ और बाद में आनंदमठ में शामिल हुआ। 1896 के कांग्रेस अधिवेशन में रवींद्रनाथ ठाकुर ने इसे संगीतबद्ध कर गाया था। 1905 के स्वदेशी आंदोलन में यह राष्ट्रीय प्रतिरोध के एक महत्वपूर्ण प्रतीक के रूप में सामने आया। इसका इतना श्रेष्‍ठ इतिहास होने की स्‍थ‍िति में वंदेमातरम् को बिल्‍कुल भी धार्मिक चश्मे से नहीं देखा जा सकता है।

संवैधानिक दृष्टिकोण: अनुच्छेद 25, 26 और 27 की वास्तविक व्याख्या

संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को अंत:करण की स्वतंत्रता और धर्म मानने, आचरण करने तथा प्रचार करने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को धार्मिक और धर्मार्थ संस्थाएं स्थापित करने, धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने तथा कानून के अनुसार संपत्ति रखने और उसका प्रशासन करने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 27 किसी विशेष धर्म के प्रचार या संरक्षण के लिए विशेष रूप से लगाए गए कर के संबंध में सुरक्षा प्रदान करता है।

इसका अर्थ यह हुआ कि धर्मनिरपेक्षता किसी धर्म को मिटाने की व्यवस्था नहीं है। यह राज्य को किसी विशेष धर्म का पक्षकार बनने से रोकते हुए नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करती है, इसलिए जब वंदेमातरम् के संदर्भ में धर्मनिरपेक्षता की दुहाई दी जाती है तो यही कसौटी अन्य मामलों में भी लागू होनी चाहिए। यदि किसी धार्मिक समुदाय की आस्था, संस्था या संपत्ति से जुड़ा प्रश्न उठता है तो निर्णय समान संवैधानिक सिद्धांतों, कानून और पारदर्शिता के आधार पर होना चाहिए। आज क्‍या यह भारत में समानता के आधार पर कहीं होता दिख रहा है?

मंदिर, वक्फ और चर्च की संपत्ति पर समान कसौटी का प्रश्न

यहीं हिंदू समाज से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है। यदि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धार्मिक संस्थाओं के मामलों में राज्य की समान और निष्पक्ष भूमिका है तो मंदिरों, वक्फ संपत्तियों, चर्च संस्थाओं और अन्य धार्मिक न्यासों से जुड़े प्रशासन और संपत्ति संबंधी प्रश्नों पर भी समान संवैधानिक कसौटी लागू होनी चाहिए। वह अब तक क्‍यों नहीं की गई है?

यह प्रश्न अवश्य पूछा जाना चाहिए कि धार्मिक संस्थाओं के प्रशासन में राज्य की भूमिका का आधार सभी समुदायों के लिए समान क्यों नहीं रखा गया है? यही बात मदरसा, चर्च या मिशनरी संस्थाओं की संपत्ति पर भी लागू होती है। क्‍यों उन्‍हें छूट दी गई है? क्‍यों वक्‍फ बोर्ड बनाया गया है? वे भारत में हलाल सर्टिफिकेट कैसे चला सकते हैं?

अल्पसंख्यक आयोग और चयनित धर्मनिरपेक्षता की राजनीति

इसी प्रकार अल्पसंख्यक आयोग या अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय आखिर भारत में कर क्‍या रहे हैं? जब सभी धर्म समान होने चाहिए, राज्‍य की नजर में, फिर यह धर्मनिरपेक्षता की आड़ लेकर क्‍यों इन पर बहुसंख्‍यक हिन्‍दू समाज का धन इन अल्‍पसंख्‍यक संस्‍थानों पर खर्च किया जा रहा है?

जिसमें कि फिर संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 सांस्कृतिक अधिकारों तथा धार्मिक और भाषायी अल्पसंख्यकों को अपने शैक्षणिक संस्थान स्थापित और संचालित करने के अधिकार की रक्षा करने की जो दुहाई अक्‍सर दी जाती है, वह भी बंद होना चाहिए।

क्‍योंकि देश के प्रत्‍येक बच्‍चे को समान शिक्षा का अधिकार है, इसलिए वह अल्‍पसंख्‍यक बनाम बहुसंख्‍यक नहीं हो सकती है, पर व्‍यवहार में क्‍या हो रहा है, वह आज सामने है। अल्‍पसंख्‍यक स्‍कूल, कॉलेज उनकी अपनी व्‍यवस्‍था जिसमें कि वे आरटीई के बच्‍चों के प्रवेश भी नहीं लेते हैं! क्‍या यही चयनित धर्मनिरपेक्षता होनी चाहिए? जिसमें सिर्फ बहुसंख्‍यक होने के कारण से उस समाज के साथ दोयम दर्जे का व्‍यवहार किया जाएगा!

अरे, जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे को तो पता ही नहीं होता कि वह कहां जन्‍म ले रहा है, लेकिन यहां तो बहुसंख्‍यक समाज में जन्‍म लेने के कारण वह उन तमाम सुविधाओं से वंचित किया जा रहा है जोकि एक राज्‍य के नागरिक के रूप में उसके अन्‍य किसी दूसरे नागरिक के समान ही बराबर के अधिकार होने चाहिए थे। ऐसे में जो धर्मनिरपेक्षता के नाम पर वन्‍देमातरम् का विरोध कर रहे हैं, फिर तो उनके लिए भारत सरकार का अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय वर्तमान में मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और पारसी समुदायों को अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदायों के रूप में लेकर विभिन्न योजनाएं संचालित करता है, इस व्यवस्था को खत्म कर देना चाहिए।

हिंदू समाज के अधिकारों पर भी उतनी ही चर्चा क्यों नहीं?

वास्‍तविकता तो यही है कि भारत की सभ्यता, संस्कृति और सार्वजनिक जीवन में हिंदू परंपरा की ऐतिहासिक भूमिका को आज संपूर्ण विश्‍व स्‍वीकार्य कर रहा है। भारत की सांस्कृतिक विरासत में हिंदू दर्शन, परंपराओं, तीर्थों, साहित्य, कला और सामाजिक संस्थाओं का अत्यंत व्यापक योगदान है, इसलिए हिंदू समाज के सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा और अन्य समुदायों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा को एक-दूसरे के विरोध में खड़ा करना समस्या का समाधान नहीं है। समानता का अर्थ यही है कि बहुसंख्यक नागरिक के अधिकार भी उतने ही वास्तविक माने जाएं जितने अल्पसंख्यक नागरिक के भारत में 1950 से संविधान लागू होने के समय से माने जा रहे हैं।

वस्‍तुत: जब नीति-निर्माता सिर्फ एक वर्ग के अधिकारों के संरक्षण के प्रति अति-संवेदनशील दिखाई देते हैं और बहुसंख्यक समाज की ऐतिहासिक धरोहर व उसके मौलिक नागरिक अधिकारों की बात पर मौन साध लेते हैं, तब सामाजिक असंतोष का उत्पन्न होना स्वाभाविक है।

जनजातीय समाज और समाजशास्त्र का यथार्थ

जनजातीय समाज को लेकर भी राजनीतिक नारों के बजाय इतिहास और समाजशास्त्र के प्रमाणों के आधार पर चर्चा होनी चाहिए। अनेक जनजातीय समुदायों की अपनी विशिष्ट आस्थाएं और सांस्कृतिक परंपराएं हैं, जोकि हिन्‍दू समाज की तरह ही हैं। फिर भी उन्हें भारत का संविधान विशेष रियायतें देता है। लेकिन वन्‍देमातरम् गान के मामले में उन्‍हें भी कोई आपत्‍त‍ि नहीं है। यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि देश की मिट्टी और उसके गौरव गीत के प्रति निष्ठा का विरोध कतई स्वाभाविक या सामाजिक नहीं है, बल्कि इसके पीछे शुद्ध रूप से निहित राजनैतिक स्वार्थ और विदेशी नैरेटिव काम कर रहे हैं।

एक राष्ट्र, समान नागरिक अधिकार और पूर्ण सिद्धांत

ऐसे में कहना यही है कि वंदेमातरम् के नाम पर धर्मनिरपेक्षता को चयनात्मक ढंग से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। यदि धार्मिक स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है तो वह हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और हर दूसरे नागरिक के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है। यदि राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान आवश्यक है तो उसकी अपेक्षा भी सभी से समान होनी चाहिए। यदि धार्मिक संस्थाओं को कानून के अनुसार अपने मामलों का संचालन करने का अधिकार है तो राज्य का नियमन भी समान संवैधानिक कसौटी पर होना चाहिए।

भारत को किसी एक समुदाय की धार्मिक श्रेष्ठता या किसी दूसरे समुदाय की राजनीतिक विशेषाधिकार व्यवस्था से नहीं चलाने का प्रयास किया जाना चाहिए। जोर समान नागरिक अधिकारों और समान कानून से मजबूती पर होना चाहिए। धर्मनिरपेक्षता यदि वास्तव में संविधान का मूल्य है तो उसे आधी-अधूरी सुविधा के रूप में नहीं, पूर्ण संवैधानिक सिद्धांत के रूप में स्वीकार करना सभी के लिए समान रूप से अनिवार्य है।

किसी नागरिक की धार्मिक स्वतंत्रता सुरक्षित रहे, किसी समुदाय के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव न हो और साथ ही राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान तथा कानून के शासन की रक्षा हो, यही वह संतुलन है जिसकी भारत जैसे बहुधार्मिक लोकतंत्र को आवश्यकता है। इसमें कोई हिन्‍दू, मुस्‍लिम या अन्‍य मत,पंथ, रिलीजन, धर्म की बात नहीं है। इतना तो काश, वन्‍देमातरम् का विरोध कर रहे भारत के नागरिक समझ ही सकते हैं!

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