भारत को पुनः वैभवशाली बनाने हेतु संघ द्वारा प्रयासों में तेजी लाई जा रही है

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Caption: HerZindagi

ग्वालियर । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी स्थापना के 101 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। संघ ने अपनी स्थापना की शताब्दी हाल ही में पूर्ण की है एवं संघ अब अपने अगले चरण में प्रवेश कर रहा है। शताब्दी वर्ष के दौरान संघ एवं समाज द्वारा मिलकर कई बड़े कार्यक्रमों का सफलतापूर्वक आयोजन किया गया। इन कार्यक्रमों को समाज में अच्छा प्रतिसाद भी मिला। इन विभिन्न कार्यक्रमों में स्वयंसेवकों एवं समाजजनों की बढ़ चढ़ कर भागीदारी रही। संघ की 100 वर्षों की यह एक अभिनव यात्रा है एवं समाज को साथ लेकर चलने की यात्रा है। साथ ही, समाज की सेवा के अथक प्रयासों की भी यह यात्रा है। इन 100 वर्षों में संघ ने क्या पाया, इसका सिहावलोकन एवं मूल्यांकन करना आवश्यक है। 100 वर्ष अपने आप में एक पर्याप्त कालावाधि है, जब किसी संगठन के कार्यों का मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

पिछले 100 वर्षों के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए एक बड़ी उपलब्धि यह रही है कि राष्ट्र में व्यक्ति निर्माण की अभिनव पद्धति के रूप में संघ की शाखा को देश एवं समाज के बीच में मान्यता मिली है। इसे संघ की बहुत बड़ी सफलता के रूप में देखा जा सकता है। शाखा की कार्यपद्धति के माध्यम से ही भारत के लाखों युवाओं में राष्ट्रत्व का भाव जगाया जा सका है एवं स्वयसेवकों का निर्माण कर उनके जीवन में परिवर्तन लाया जा सका है। आज नगरों एवं महानगरों के साथ ही सुदूर ग्रामीण इलाकों में भी संघ की शाखाएं लगाई जा रही हैं एवं इनमें समाज के समस्त घटकों की भागीदारी दिखाई दे रही है। मन में देश भक्ति का भाव लेकर भारत का युवा, स्वयंसेवक बनता है एवं प्रतिदिन शाखा में आकर शाखा की कार्यपद्धति का अनुपालन करते हुए कब उसमें राष्ट्रत्व की भावना जागृत हो जाती है उसे पता ही नहीं चलता है। आज हिंदू स्वयंसेवक संघ के माध्यम से कई अन्य देशों में भी शाखाएं लगाई जा रही है। विश्व में समस्त स्थानों पर लगाई जाने वाली शाखाओं की कार्यपद्धति समरूप है। भारत में आज अत्यंत समर्पित स्वयसेवकों की शृंखला खड़ी हो गई है एवं आज कई परिवारों की 5वीं एवं 6वीं पीढ़ी स्वयंसेवक के रूप में कार्य करते हुए दिखाई दे रही हैं। इस प्रकार, केवल स्वयंसेवक ही नहीं बल्कि उनके परिवार के सदस्य भी देश के लिए समर्पण की भावना के साथ संघ से जुड़े हुए हैं।

संघ की कार्यपद्धति में दो श्रेणियों के माध्यम से कार्य सम्पन्न होते हैं। एक, संगठन श्रेणी, जिसके माध्यम से शाखा लगाई जाती है एवं स्वयंसेवक गढ़े जाते हैं। दूसरी, जागरण श्रेणी, जिसके माध्यम से स्वयसेवकों द्वारा समाज के बीच जाकर समाज परिवर्तन के प्रयास किए जाते हैं। समाज को जागृत करने के उद्देश्य से कुछ जागरण पत्रिकाओं का प्रकाशन भी किया जाता है, जिनकी पहुंच आज 3 लाख से अधिक गावों तक है। इसी प्रकार संघ के सम्पर्क विभाग के द्वारा समाज का नेतृत्व करने वाले संभ्रांत नागरिकों से सम्पर्क किया जाता है एवं इन्हें राष्ट्रीय विचारों से अवगत कराया जाता है जिसके चलते ही आज बड़ी मात्रा में समाज की सज्जन शक्ति संघ के साथ जुड़ गई है। संघ द्वारा 6 गतिविधियां भी प्रारम्भ की गई है – सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, समग्र ग्रामविकास, गोसेवा, कुटुंब प्रबोधन एवं धर्मजागरण। इन गतिविधियों के माध्यम से भी समाज को संघ के साथ जोड़ने के प्रयास किए जाते हैं। इस बीच, पंच परिवर्तन (स्व के भाव का जागरण, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन एवं नागरिक कर्तव्य) के प्रयोग भी संघ द्वारा चलाए गए ताकि समाज के आचरण में परिवर्तन लाया जा सके। विभिन्न प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच भी संघ पिछले 100 वर्षों के दौरान निरंतर आगे बढ़ता रहा क्योंकि संघ द्वारा शाखा पद्धति के रूप में एक अभिनव पद्धति का निर्माण एवं प्रयोग किया था। दूसरे, संघ व्यक्ति निरपेक्षता की नीति पर चलता आया है, अर्थात, स्वयसेवकों ने अपने आप को संगठन से सदैव नीचे रखा है। आज संघ की एक व्यापक संगठनात्मक रचना खड़ी हो गई है।

संघ का लक्ष्य अपने संगठन को बड़ा बनाने का नहीं है बल्कि अपने संगठन को समाजव्यापी बनाने का लक्ष्य लेकर संघ आगे बढ़ रहा है। हिंदू समाज बड़ा बने एवं भारत एक बार पुनः परम वैभव की स्थिति पर आ जाए, यही संघ का मुख्य ध्येय है। भारतीय समाज पूर्ण रूप से एक रस हो जाए, इससे भी संघ की स्थापना के उद्देश्य की पूर्ति हो जाती है। संघ ने 100 वर्षों की एक लम्बी यात्रा सफलतापूर्वक तय कर ली है परंतु अभी भी बहुत कुछ कार्य शेष है। इस दृष्टि से आगे आने वाले समय में संघ के स्वयसेवकों के लिए करणीय कार्य क्या हो सकते हैं, इसका वर्णन हाल ही में संघ के माननीय सह सरकार्यवाह श्री अतुल लिमये जी द्वारा प्रदत्त एक उदबोधन में मिलता है। इन करणीय कार्यों को तेजी से सम्पन्न करने की आज आवश्यकता है क्योंकि इस दृष्टि से संघ की प्रतिस्पर्धा आज किसी अन्य संगठन के साथ नहीं बल्कि समय के साथ है।

राष्ट्र में व्यक्ति निर्माण की प्रक्रिया चलाने वाली शाखाओं का विस्तार तेजी से करने की आज आवश्यकता है। आज पूरे देश में लगभग 72.42 प्रतिशत बस्तियों एवं 69 प्रतिशत मंडलों में संघ की शाखाएं एवं साप्ताहिक मिलन चलाए जा रहे है। इसका आशय यह है कि देश में लगभग 30 प्रतिशत बस्तियां एवं 31 प्रतिशत मंडल अभी भी संघ कार्य विहीन हैं। अतः प्रथम लक्ष्य है कि तेज गति से उक्त शेष बस्तियों एवं मंडलों में शखाएं खड़ी हो जाए। राम मंदिर निधि संकलन अभियान के समय लगभग 14 करोड़ परिवारों से सम्पर्क किया गया था, एक परिवार में यदि 5 सदस्य माने जाय तो लगभग 70 करोड़ नागरिकों के साथ उस समय सम्पर्क हुआ था। अतः देश की कुल जनसंख्या के 50 प्रतिशत नागरिकों के साथ केवल 45 दिनों में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सम्पर्क किया गया था। हालांकि इस अभियान में स्वयसेवकों के साथ समाज के अन्य संगठन एवं नागरिक भी जुड़े थे। अतः शेष बस्तियों एवं मंडलों में संघ की शाखा की स्थापना के कार्य को समाजजन के सहयोग से गति दी जा सकती है।

भारत में आज संघ के स्वयंसेवकों के गुणों के चलते उनकी एक अलग पहिचान है। सादगी, मितव्यितता, प्रामाणिकता, अनुशासन, समर्पण का भाव आदि तत्व स्वयसेवकों के गुणों में शामिल हैं। समाज जीवन में संघ की पहिचान संघ के स्वयंसेवक के माध्यम से ही बनती है। मीडिया सहित प्रचार के विभिन्न माध्यमों से संघ के विरोध में बहुत कुछ चलता भी रहता है परंतु समाज में इसका प्रभाव दिखाई नहीं देता है, क्योंकि स्वयंसेवक के गुण कुछ अलग ही कहानी वर्णित करते हैं। शाखा के गुणवत्ता पूर्ण कार्यक्रम स्वयंसेवक में राष्ट्रत्व का जो भाव गढ़ते हैं वह स्वयंसेवक में स्पष्ट रूप से दिखाई भी देता है। इस भाव को आज आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। शाखा विस्तार के साथ साथ स्वयसेवकत्व के उक्त गुणों को भी बनाए रखना आवश्यक है।

आज संघ के विचार को समाज के बीच ले जाने की भी महती अवस्यकता है। इसके लिए स्वयसेवकों को समाज के बीच में जाकर कार्य करने पड़ेंगे। समाज में वैचारिक विमर्श का निर्माण करने की आवस्यकता है। भारत को यदि परम वैभवशाली देश बनाना है तो समाज का मन अनुकूल रखना होगा। देश की अपनी व्यवस्थाओं के प्रति आस्था रखने वाला समाज तैयार करना होगा। नागरिक कर्तव्य के बोध को बढ़ावा देने वाला समाज होना चाहिए। आज भारत में कुछ शक्तियां समाज में छोटे छोटे विभेद को बड़ा करने का प्रयास करती हुई नजर आ रही है। समाज के बीच अनास्था का निर्माण करने का प्रयास किया जा रहा है। इस कार्य को समाज के बीच फैलाने के लिए प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, सोशल मीडिया, आदि माध्यमों का उपयोग किया जा रहा है। अतः समाज के बीच राष्ट्रीय विचारधारा से ओतप्रोत विचार प्रसारित करने हेतु अकादमिंक जगत के नागरिकों को अपने साथ जोड़ना होगा एवं विमर्श तैयार करना होगा ताकि समाज को राष्ट्रानुकूल बनाया जा सके।

आज समाज का प्रत्यक्ष आचरण बदलने की भी आवश्यकता है। समाज के बीच आपस में विषमता एवं कटुता के कुछ उदाहरण आज भी दिखाई देते हैं। इससे समाज में समरसता प्रभावित होती हुई दिखाई देती है। आचरण बदलने के लिए अपनी एक व्यवस्था खड़ी करने की आवश्यकता है, जिससे समाज को समरस बनाया जा सके। विभिन्न समाजों के बीच कटुता फैलाने के लिए कुछ बाहरी शक्तियां भी सक्रिय बनी हुई हैं। पंच परिवर्तन की प्रक्रिया को बल देकर समाज जीवन का आचरण बदलने के प्रयास किए जा सकते हैं। समाज में व्याप्त कुरीतियों को समाप्त करना होगा। पंच परिवर्तन की प्रक्रिया को स्वयं के आचरण में लाकर ही नागरिकों का स्वभाव भी बदला जा सकता है। इस संदर्भ में कुछ रचनाएं खड़ी करने एवं कार्यपद्धती विकसित करने की आवश्यकता भी होगी।

यह सही है कि आज समाज जीवन में कुछ समस्याएँ भी दिखाई देती हैं। जैसे, भ्रष्टाचार, युवाओं में नशे का बढ़ता प्रभाव, कुटुंब विच्छेद,, जमीन के जल स्तर में कमी, रासायनिक खाद का बढ़ता उपयोग, महंगी हो रही शिक्षा, आदि। इन समस्याओं का समाधान कैसे करना है, इस विषय पर भी भी आज विचार करने की आवश्यकता है। इसी प्रकार समाज में आज कुछ चुनौतियां भी मुंह बाये खड़ी है, जैसे मतांतरण, बड़ी मात्रा में जनसंख्या असंतुलन, सीमावर्ति क्षेत्रों में जनसंख्या का परिवर्तन, आदि। हम हिंदू नहीं है इस भाव को भी समाज के बीच फैलाने के प्रयास हो रहे है। विच्छेद निर्माण करने वाले आंदोलन हो रहे हैं एवं समाज के बीच अलगाव को बढ़ावा देने के प्रयास कुछ विदेशी ताकतों द्वारा किए जा रहे हैं। इन चुनौतियों का उत्तर भी देने की आज आवश्यकता है। शासन तो अपना काम कर ही रहा है परंतु समाज को भी इस संदर्भ में आज जगाने की आवश्यकता है। इस महती कार्य में सम्पूर्ण समाज की सहभागिता आवश्यक है। समाज जीवन में वैचारिक विमर्श को लेकर सम्पूर्ण समाज को जोड़ना होगा। इस पुनीत कार्य में समाज की सहभागिता कैसे बढ़ाना इसके लिए गम्भीरता से काम करने की आज आवश्यकता है। देश के लिए कुछ अच्छा करने का भाव समाज के बीच जागृत हुआ है एवं एवं समाज में कुछ नागरिक देश के लिए अच्छा काम करना चाहते हैं। परंतु, इस प्रकार का भाव रखने वाले नागरिकों के बीच समन्वय किस प्रकार स्थापित हो, इसके बारे में आज विचार करने की आवश्यकता है। बहुत से नागरिक देश के हित में बहुत कुछ करना चाहते हैं, उन्हें अलग अलग कामों की रचनाओं के साथ किस प्रकार जोड़ा जाए, इस विषय पर भी विचार करने की आज आवश्यकता है। देश में विभिन्न धार्मिक संगठन, सामाजिक संगठन, सांस्कृतिक संगठन आदि भी भारत को परम वैभव तक ले जाने के उद्देश्य से कार्य कर रहे हैं, इन समस्त संगठनों के बीच समन्वय का कार्य किस प्रकार स्थापित किया जा सकता है, इस संदर्भ में भी कार्य करने की आज आवश्यकता है।

आज सम्पूर्ण समाज को साथ लेने की मन:स्थिति समस्त स्वयसेवकों एवं समाज के जागरूक नागरिकों को बनाने की आवश्यकता है। सम्पूर्ण समाज को साथ लेने की कार्यपद्धती भी विकसित करने की आवश्यकता है। समाज जीवन में परिवर्तन के लिए समस्त समविचारी संगठनों को साथ में आना होगा। हिंदू धर्म एवं हिन्दू समाज की रक्षा करने का दायित्व इन समस्त संगठनों का है। इन संगठनों के बीच तालमेल विकसित करने की आज महती आवश्यकता है।

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