एक दीप, एक दर्शन और हजारों वर्षों की सनातन स्मृति

images-5.jpeg

दीपक कुमार द्विवेदी

दिल्ली । दीपावली को हम सामान्यतः प्रकाश का पर्व कहते हैं। हम यह भी जानते हैं कि भगवान श्रीराम चौदह वर्ष का वनवास पूर्ण करके, अधर्म के प्रतीक रावण का वध करके अयोध्या लौटे थे और अयोध्यावासियों ने उनके स्वागत में दीप जलाकर अपनी प्रसन्नता प्रकट की थी। किंतु क्या दीपावली का अर्थ केवल इतना ही है? क्या यह केवल अंधकार पर प्रकाश, अथवा राम की अयोध्या-वापसी का उत्सव मात्र है? नहीं। दीपावली का वास्तविक स्वरूप इससे कहीं अधिक विराट है। यह हिंदू समाज की उस अद्भुत उत्सवधर्मिता का प्रकटीकरण है, जिसमें आध्यात्म और भौतिकता, धर्म और अर्थ, प्रकृति और मनुष्य, परिवार और समाज, श्रम और संपन्नता, साधना और आनंद—सब एक साथ दिखाई देते हैं।

दीपावली वस्तुतः एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि एक ऐसी पंचदिवसीय सांस्कृतिक संरचना है जिसमें भारतीय जीवन-दर्शन की अनेक धाराएँ एक साथ प्रवाहित होती हैं। धनतेरस से आरंभ होकर नरक चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा और भाई दूज तक इसकी परंपरा विभिन्न क्षेत्रों में अपने-अपने लोकाचार के साथ विकसित होती रही है। भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल पर भी दीपावली के पाँच दिनों में गृह-स्वच्छता, धनतेरस, दीप प्रज्ज्वलन, लक्ष्मी-पूजन, पारिवारिक मिलन और भाई-बहन के संबंधों को प्रमुख परंपराओं के रूप में वर्णित किया गया है।

इस पूरे उत्सव को ध्यान से देखिए। इसमें केवल दीप नहीं हैं; इसमें स्वच्छता है। केवल लक्ष्मी नहीं हैं; गणेश हैं। केवल धन नहीं है; धर्मसम्मत धन की आकांक्षा है। केवल बाजार नहीं है; श्रम का सम्मान है। केवल परिवार नहीं है; गोवर्धन के माध्यम से प्रकृति, कृषि और पशुधन के प्रति कृतज्ञता है। केवल पूजा नहीं है; व्यापार का पुनरारंभ है। केवल आनंद नहीं है; आत्मशुद्धि का भाव भी है। यही कारण है कि दीपावली को केवल धार्मिक कर्मकांड समझ लेना उसके विराट सांस्कृतिक अर्थ को अत्यंत छोटा कर देना होगा।

दरअसल दीपावली के भीतर हिंदू जीवन-दर्शन का पुरुषार्थ चतुष्टय जीवंत दिखाई देता है—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। मनुष्य को केवल धन कमाने वाला प्राणी मानना भारतीय दृष्टि नहीं है। मनुष्य केवल भोग के लिए पैदा नहीं हुआ और न ही संसार से पलायन करके मोक्ष प्राप्त करना ही जीवन का एकमात्र प्रयोजन है। हिंदू चिंतन जीवन को चार परस्पर संबद्ध पुरुषार्थों में देखता है। धर्म जीवन को मर्यादा देता है, अर्थ जीवन को साधन देता है, काम जीवन में आनंद और सृजन की आकांक्षा जगाता है और मोक्ष मनुष्य को अंतिम आध्यात्मिक मुक्ति की ओर ले जाता है। इन चारों को एक-दूसरे से काटकर नहीं, बल्कि एक समन्वित जीवन-दृष्टि के रूप में समझना चाहिए। धर्म से रहित अर्थ लोभ बन सकता है, धर्म से रहित काम विकृति बन सकता है और अर्थ-काम से पूर्णतः विमुख जीवन भी समाज के सामान्य दायित्वों से पलायन का रूप ले सकता है।

दीपावली इसी संतुलन का पर्व है।

धनतेरस में धन का स्वागत है, लेकिन धन को देवत्व से जोड़कर। लक्ष्मी की पूजा है, परंतु उनके साथ गणेश की पूजा भी है। अर्थात् संपदा के साथ बुद्धि और विवेक की आवश्यकता है। व्यापारिक प्रतिष्ठानों में लक्ष्मी-गणेश पूजन की परंपरा इसलिए केवल व्यापारिक सफलता की कामना नहीं है; उसके भीतर यह सांस्कृतिक संदेश छिपा है कि अर्थ की साधना विवेक और मंगलबुद्धि के साथ हो। कुबेर का स्मरण भी इसी अर्थ-जगत के दैवी अनुशासन की ओर संकेत करता है।

अथर्ववेद के एक मंत्र में आता है—

“रमन्तां पुण्या लक्ष्मीर्या: पापीस्ता अनीनशम्।”

अर्थात् पुण्यकारी लक्ष्मी रमण करें और पापमयी लक्ष्मी का नाश हो।

यहाँ लक्ष्मी केवल धन की मात्रा नहीं हैं। प्रश्न यह है कि धन आया कहाँ से? वह किस कर्म से अर्जित हुआ? उसका उपयोग किसके लिए होगा? भारतीय चिंतन धन का विरोध नहीं करता; वह अधर्मपूर्वक अर्जित धन का विरोध करता है। यह अंतर आज समझना अत्यंत आवश्यक है। जिस सभ्यता ने लक्ष्मी को देवी के रूप में प्रतिष्ठित किया हो, उसे धन-विरोधी सभ्यता कह देना भारतीय समाज की मूल प्रकृति को समझने में असफल होना है।

इसीलिए दीपावली के समय भारत का बाजार अचानक जीवंत हो उठता है। गाँव का कुम्हार मिट्टी के दीप बनाता है, कारीगर सजावटी सामग्री तैयार करता है, किसान अपनी उपज बाजार में लाता है, स्वर्णकार आभूषण बनाता है, वस्त्र विक्रेता कपड़े बेचता है, मिठाई बनाने वाला अपनी भट्ठी जलाता है, फूल वाला फूल बेचता है, परिवहनकर्ता सामान पहुँचाता है और छोटे-बड़े व्यापारी महीनों से प्रतीक्षित बिक्री की तैयारी करते हैं। यह केवल उपभोग नहीं है; यह करोड़ों मनुष्यों के श्रम, कौशल और उद्यम को एक साथ गतिमान करने वाली सामाजिक-आर्थिक प्रक्रिया है।

2025 में कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स अर्थात् CAIT के अध्ययन के अनुसार नवरात्रि से दीपावली तक देश में लगभग ₹6.05 लाख करोड़ का व्यापार हुआ, जिसमें लगभग ₹5.40 लाख करोड़ वस्तुओं और ₹65,000 करोड़ सेवाओं का व्यापार शामिल था। यह अध्ययन 60 प्रमुख वितरण केंद्रों, राज्य की राजधानियों तथा टियर-2 और टियर-3 शहरों को सम्मिलित करके किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार मुख्यधारा के पारंपरिक और गैर-कॉरपोरेट खुदरा व्यापार का हिस्सा लगभग 85 प्रतिशत रहा।

इन आँकड़ों को केवल बाजार की भाषा में पढ़ना भूल होगी। इनके भीतर भारतीय समाज की आर्थिक जीवंतता दिखाई देती है। दीपावली का बाजार किसी एक बड़ी कंपनी का बाजार नहीं है। उसके भीतर छोटे व्यापारी हैं, कारीगर हैं, गृह-उद्यम हैं, स्थानीय बाजार हैं, गाँव हैं, कस्बे हैं और करोड़ों उपभोक्ताओं की सामूहिक आर्थिक गतिविधि है। इसलिए दीपावली भारतीय अर्थव्यवस्था के उस विकेंद्रीकृत स्वरूप का भी उत्सव है जिसमें धन का प्रवाह केवल ऊपर से नीचे नहीं आता, बल्कि समाज की अनेक परतों में घूमता रहता है।

हमारे गाँव की वह वृद्ध दादी, जिसने अर्थशास्त्र की कोई पुस्तक नहीं पढ़ी, समाजशास्त्र का कोई सिद्धांत नहीं पढ़ा, भौतिकी और रसायन का कोई औपचारिक अध्ययन नहीं किया, दीपावली के पाँच दिनों में ऐसा क्या करती है कि उसके भीतर जीवन का इतना विराट संतुलन सहज रूप से उपस्थित हो जाता है? वह घर की सफाई करती है, अनावश्यक वस्तुओं को हटाती है, आँगन लीपती है, दीप बनाती या खरीदती है, अन्न और मिठाई तैयार करती है, लक्ष्मी-गणेश का पूजन करती है, गोवर्धन की पूजा करती है, परिवार को एकत्र करती है, संबंधों को पुष्ट करती है और अपने श्रम से उत्सव को पूर्ण करती है।

वह अर्थशास्त्र की भाषा नहीं जानती, पर अर्थ का मर्म जानती है।

वह समाजशास्त्र नहीं पढ़ी, पर परिवार और समुदाय को जोड़ने की शक्ति जानती है।

वह पर्यावरणीय सिद्धांतों पर व्याख्यान नहीं देती, पर गोवर्धन, गौ, अन्न, जल, भूमि और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना जानती है।

यही भारतीय संस्कृति की शक्ति है—उसने जीवन के गहन दार्शनिक सिद्धांतों को केवल ग्रंथों में बंद नहीं किया; उन्हें लोकजीवन की आदतों, संस्कारों और उत्सवों में उतार दिया।

और यहीं से दीपावली हमें उस बड़े प्रश्न की ओर ले जाती है कि हिंदू समाज को संसार और इतिहास को देखने के लिए कौन-सी दृष्टि प्राप्त हुई है।

आज आधुनिक विचारधाराओं के प्रभाव में मानव इतिहास को समझने के अनेक प्रतिमान हमारे सामने रखे गए हैं। कहीं इतिहास को मुख्यतः आर्थिक शक्तियों का परिणाम बताया गया, कहीं वर्ग-संघर्ष को इतिहास की मूल गति माना गया, कहीं मनुष्य की यात्रा को केवल भौतिक विकास की रैखिक प्रक्रिया में समझाया गया। आधुनिक विज्ञान ने मानव-विकास, जैविक परिवर्तन और सभ्यताओं के विकास के संबंध में अत्यंत महत्वपूर्ण ज्ञान दिया है; किंतु समस्या तब उत्पन्न होती है जब किसी एक भौतिक प्रतिमान को संपूर्ण अस्तित्व का अंतिम और सर्वग्राही सत्य मान लिया जाता है।

हिंदू चिंतन संसार को केवल एक बार बनी हुई और एक दिन समाप्त हो जाने वाली रचना के रूप में नहीं देखता। यहाँ सृष्टि की चक्रीयता का विचार अत्यंत प्राचीन है। सृष्टि, स्थिति और प्रलय—यह चक्र चलता रहता है। उपनिषदों से लेकर पुराणों तक भारतीय चिंतन में काल की विराट अवधारणा मिलती है। भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—

“सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्॥”

अर्थात् कल्प के अंत में समस्त प्राणी मेरी प्रकृति में लीन होते हैं और कल्प के आरंभ में मैं उन्हें पुनः प्रकट करता हूँ।

यह दृष्टि मनुष्य को इतिहास के अहंकार से मुक्त करती है। सभ्यताएँ बनती हैं, विकसित होती हैं, संकट में पड़ती हैं और नष्ट भी होती हैं; किंतु अस्तित्व की विराट धारा उनसे कहीं बड़ी है। इसलिए हिंदू मनुष्य के लिए सभ्यता कोई अंतिम उपलब्धि नहीं है। वह स्वयं को सृष्टि का स्वामी नहीं, सृष्टि का सहभागी मानता है।

इसीलिए हिंदू कालबोध में राम पहली बार नहीं हैं, कृष्ण पहली बार नहीं हैं और मनुष्य भी सृष्टि का अंतिम सत्य नहीं है। रामायण और महाभारत केवल अतीत की घटनाएँ नहीं हैं; वे धर्म और अधर्म के शाश्वत संघर्ष के सांस्कृतिक प्रतीक हैं। उनका संदेश किसी एक कालखंड में समाप्त नहीं होता।

दीपावली इसी शाश्वत संघर्ष का उत्सव है।

रावण का अंत केवल एक ऐतिहासिक व्यक्ति के अंत की स्मृति नहीं है। वह उस अहंकार, अनाचार और अधर्म के अंत का प्रतीक है जो मनुष्य के भीतर और समाज के भीतर बार-बार जन्म लेता है। इसलिए दीपावली प्रत्येक वर्ष आती है और हमें पुनः स्मरण कराती है कि अधर्म कभी स्थायी रूप से समाप्त नहीं होता; धर्म की रक्षा के लिए सजगता भी नित्य आवश्यक है।

भगवान श्रीकृष्ण का गीता में स्पष्ट वचन है—

“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥”

और आगे—

“परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ”

यहाँ भगवान केवल किसी दूरस्थ आकाश में बैठे हुए God या अल्लाह नहीं हैं। हिंदू दृष्टि में परम सत्ता सृष्टि के भीतर भी व्याप्त है और उससे परे भी। वही निराकार सत्ता आवश्यकता के अनुसार साकार रूप ग्रहण करती है। वह कभी पुत्र बनती है, कभी पिता, कभी भाई, कभी सखा, कभी पति, कभी गुरु, कभी राजा और कभी योद्धा। वह ऋषियों की वाणी में प्रकट होती है, संतों की करुणा में दिखाई देती है और धर्म की रक्षा के लिए अवतार लेकर अधर्म का विनाश भी करती है।

इसलिए ‘भगवान’ को केवल पश्चिमी धार्मिक शब्दावली के ‘गॉड’ के बराबर रख देना हिंदू अवधारणा को अत्यधिक सीमित कर देता है। ‘भगवान’ शब्द की पारंपरिक व्याख्या में ‘भग’ के छह गुण—ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य—का उल्लेख विष्णुपुराण 6.5.74 में मिलता है। इन छहों से पूर्ण सत्ता को भगवान कहा गया है।

इसलिए भगवान हमारे लिए सातवें आसमान पर बैठा हुआ कोई दूरस्थ अधिपति मात्र नहीं है। वह सर्वव्यापी ब्रह्म है। वह हमारे भीतर भी है और समस्त चराचर में भी। उपनिषदों की उद्घोषणा है—

“ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।”

समस्त जगत् ईश्वर से आवृत है।

यही हिंदू दृष्टि दीपावली में दीप बनकर प्रकट होती है। छोटा-सा दीपक मानो कहता है कि विराट ब्रह्मांड में मेरा प्रकाश नगण्य हो सकता है, लेकिन अंधकार को कोसने से बेहतर है कि मैं स्वयं प्रकाश बनूँ।

और यही बात हिंदू धर्म के धर्मबोध को समझने के लिए भी आवश्यक है। धर्म का अर्थ केवल पूजा-पद्धति नहीं है। धर्म किसी संप्रदाय का नाम नहीं है। धर्म वह धारण करने वाली व्यवस्था है जो व्यक्ति, परिवार, समाज, राज्य और सृष्टि को संतुलित रखती है। राजा का राजधर्म है, पिता का पितृधर्म है, विद्यार्थी का विद्यार्थीधर्म है, गुरु का गुरुधर्म है और नागरिक का नागरिकधर्म है। धर्म का मूल भाव कर्तव्य, मर्यादा, न्याय, संतुलन और लोकमंगल से जुड़ा है।

इस अर्थ में ‘धर्मनिरपेक्षता’ को यदि धर्म-विरोध या धर्म-विमुखता के अर्थ में ग्रहण किया जाए तो वह भारतीय जीवन-दृष्टि से मेल नहीं खाती। भारत की मूल सभ्यता धर्म को जीवन से बाहर करने की नहीं, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को धर्मसम्मत बनाने की बात करती है। राज्य को भी राजधर्म चाहिए, अर्थव्यवस्था को भी धर्म चाहिए और व्यक्ति को भी धर्म चाहिए। धर्महीन अर्थव्यवस्था अंततः केवल शक्ति और उपभोग की व्यवस्था बन सकती है।

यही कारण है कि दीपावली में लक्ष्मी की पूजा होती है, पर लक्ष्मी अकेली नहीं होतीं। गणेश भी साथ होते हैं। धन चाहिए, लेकिन विवेक के साथ। ऐश्वर्य चाहिए, लेकिन वैराग्य की स्मृति के साथ। कामना चाहिए, लेकिन धर्म की मर्यादा के भीतर। अर्थ चाहिए, लेकिन अधर्म से अर्जित नहीं। यही पुरुषार्थ चतुष्टय का वास्तविक संतुलन है।

आधुनिक आर्थिक विचारों में पूँजी, बाजार, उत्पादन और उपभोग को अलग-अलग सिद्धांतों के माध्यम से समझा गया। आधुनिक राजनीतिक विचारों ने समाज को दाएँ, बाएँ और मध्य जैसे वैचारिक खाँचों में बाँटकर देखने की प्रवृत्ति विकसित की। पूँजीवाद, समाजवाद, साम्यवाद, उदारवाद और अन्य अनेक विचारधाराएँ आधुनिक इतिहास की महत्वपूर्ण बौद्धिक धाराएँ हैं। किंतु हिंदू जीवन-दर्शन को इनमें से किसी एक खाँचे में पूरी तरह बंद नहीं किया जा सकता।

क्योंकि हिंदू दृष्टि में धन स्वयं पाप नहीं है।

लक्ष्मी देवी हैं।

व्यापार अधर्म नहीं है।

अर्थ पुरुषार्थ है।

उद्यम कोई अपराध नहीं है।

परंतु धन, व्यापार और उद्यम धर्म से विमुख हो जाएँ तो उनका स्वरूप बदल जाता है। यही भारतीय अर्थचिंतन की विशिष्टता है। यहाँ धन का निषेध नहीं, धन का संस्कार है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम दीपावली को केवल खरीदारी और आतिशबाजी के त्योहार में सीमित न करें। यह पर्व हमें यह पूछने के लिए विवश करता है कि हमारा अर्थ कहाँ से आता है, हमारा उपभोग किस प्रकार का है, हमारे परिवार कितने जीवंत हैं, हमारी प्रकृति के प्रति हमारी कृतज्ञता कितनी है और हमारे भीतर धर्म कितना जीवित है।

दीपावली की वास्तविक चुनौती यही है कि हम प्रकाश केवल अपने घर में न जलाएँ, अपने भीतर भी जलाएँ।

हम केवल पुराने घर की सफाई न करें, अपने भीतर जमी हुई ईर्ष्या, लोभ, अहंकार और द्वेष की धूल भी हटाएँ।

हम केवल नया वस्त्र न पहनें, नई दृष्टि भी धारण करें।

हम केवल लक्ष्मी से धन न माँगें, धन को धर्मसम्मत बनाने का संस्कार भी माँगें।

हम केवल भगवान राम के अयोध्या लौटने की कथा न सुनाएँ, अपने भीतर के रावण से भी युद्ध करें।

क्योंकि हिंदू समाज की उत्सवधर्मिता पलायन नहीं है। यह जीवन के प्रति गहरी स्वीकृति है। यह संसार को मिथ्या कहकर उससे भाग जाने की प्रवृत्ति नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए धर्मपूर्वक पुरुषार्थ करने की साधना है। यही कारण है कि दीपावली में दीप भी है और बाजार भी; पूजा भी है और व्यापार भी; परिवार भी है और समाज भी; प्रकृति भी है और पुरुषार्थ भी; आनंद भी है और आत्मचिंतन भी।

इसीलिए दीपावली केवल हिंदुओं का एक पर्व नहीं, हिंदू सभ्यता की जीवन-दृष्टि का एक जीवंत दस्तावेज है।

यह हमें बताती है कि अर्थ को धर्म से अलग मत करो।

काम को मर्यादा से अलग मत करो।

भौतिक समृद्धि को आध्यात्मिक चेतना से अलग मत करो।

मनुष्य को प्रकृति से अलग मत करो।

परिवार को व्यक्ति से अलग मत करो।

और जीवन को परमात्मा से अलग मत करो।

दीपावली का दीप इसी अखंडता का प्रतीक है।

हम उस सभ्यता के उत्तराधिकारी हैं जिसने हजारों वर्षों की स्मृति में मनुष्य को केवल उपभोक्ता नहीं माना, उसे पुरुषार्थी माना; केवल शरीर नहीं माना, उसे आत्मा का अधिष्ठान माना; केवल इतिहास का उत्पाद नहीं माना, उसे ब्रह्म की अभिव्यक्ति माना।

इसलिए दीपावली हर वर्ष केवल अयोध्या में दीप नहीं जलाती। वह हिंदू चेतना में एक प्रश्न जलाती है—क्या हमारे भीतर धर्म का प्रकाश अभी जीवित है?

यदि उत्तर हाँ है, तो दीपावली केवल कैलेंडर पर आने वाला पर्व नहीं है।

वह हमारे जीवन का संकल्प है।

अधर्म के अंधकार के विरुद्ध धर्म का दीप।

अज्ञान के विरुद्ध ज्ञान का दीप।

अव्यवस्था के विरुद्ध मर्यादा का दीप।

दारिद्र्य के विरुद्ध पुरुषार्थ का दीप।

विभाजन के विरुद्ध परिवार और समाज का दीप।

और अंततः उस सनातन सत्य का दीप कि सृष्टि में अंधकार चाहे जितना विराट क्यों न दिखाई दे, प्रकाश की एक छोटी-सी लौ भी उसे चुनौती देने के लिए पर्याप्त है।

यही दीपावली है।

यही हिंदू समाज की उत्सवधर्मिता है।

और यही पुरुषार्थ चतुष्टय के विराट चिंतन का वह जीवंत उत्सव है, जो हमें बताता है कि धर्म के मार्ग पर अर्जित अर्थ, मर्यादित कामना और अंततः मोक्ष की साधना—मनुष्य जीवन को पूर्णता की ओर ले जाने वाली एक ही अखंड यात्रा है।

राम की अयोध्या-वापसी इसी प्रकाश की स्मृति है। रावण का अंत केवल अतीत की कथा नहीं, वर्तमान के लिए चेतावनी है। और दीपावली केवल बीते हुए विजय-दिवस का स्मरण नहीं—हर पीढ़ी को यह आह्वान है कि वह अपने समय के अंधकार के सामने धर्म का दीप स्वयं जलाए।

तभी प्रत्येक दीपावली वास्तव में राम की वापसी होगी।

तभी प्रत्येक घर अयोध्या बनेगा।

और तभी हमारे भीतर का प्रकाश केवल दीपक में नहीं, जीवन में दिखाई देगा।

Share this post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

scroll to top