(साक्षात्कार) : भारत में हो धर्म-परिषद की स्थापना, मंदिर व्यवस्था के लिए बने ‘सनातन बोर्ड’: शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती महाराज

b0c14225fdb5992f9d189cc90d1987e5.jpg.webp

डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली । भारत की महान धार्मिक संस्थाएं केवल प्रशासनिक निकाय नहीं हैं; वे करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और सनातन परम्परा की प्रतिनिधि हैं, इसलिए ऐसी संस्थाओं में समय-समय पर धर्म, शास्त्र और परम्परा के आलोक में मार्गदर्शन देने के लिए देश के चारों आम्नाय पीठों के शंकराचार्य, पीठों के प्रमुख वैष्णव आचार्य, अन्य मान्य एवं प्रतिष्ठित आचार्य तथा प्रमुख संतों की एक मार्गदर्शक धर्म-परिषद का होना अत्यन्त हितकारी होगा। इसके साथ ही देश के मंदिरों की व्यवस्था के लिए ‘सनातन धर्म संरक्षण समिति’, अर्थात् ‘सनातन बोर्ड’ का गठन किया जाए। यह बातें श्रीद्वारका शारदा पीठ के पीठाधीश्वर, जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती महाराज ने विशेष बातचीत में कहीं।

अयोध्या श्रीराम मंदिर दान प्रकरण के बीच देशभर में उठ रहे प्रश्नों, शंकाओं तथा भक्तों के मन के भावों में आ रहे अनेक नकारात्मक विचारों के बीच जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती का कहना है कि धर्माचार्यों का कार्य प्रशासन चलाना नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा और शास्त्रसम्मत दिशा प्रदान करना है। यदि ऐसी मार्गदर्शक परिषद समय-समय पर अपने सुझाव दे, तो इससे न केवल मंदिर की गरिमा और परम्परा सुरक्षित रहेगी, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं का विश्वास भी और अधिक दृढ़ होगा। श्रीराम का मंदिर सम्पूर्ण हिन्दू समाज की आस्था का केन्द्र है; इसलिए उसके संचालन में धर्म का प्रकाश निरन्तर बना रहना चाहिए।

‘सनातन बोर्ड’ के माध्यम से हो मंदिरों का व्यवस्थापन

उन्होंने कहा, “मंदिरों का संचालन धर्माचार्यों, वेदविद् विद्वानों तथा समाज के श्रद्धालु, योग्य और निष्कलंक व्यक्तियों के मार्गदर्शन में होना चाहिए। सरकार यदि सहयोग करे तो स्वागत योग्य है, किन्तु धार्मिक नियंत्रण उसका कार्य नहीं है। हम चाहते हैं कि पूरे देश के मंदिरों की व्यवस्था के लिए ‘सनातन धर्म संरक्षण समिति’, अर्थात् ‘सनातन बोर्ड’ का गठन किया जाए। इस बोर्ड में देश के चारों आम्नाय पीठों के शंकराचार्य, पाँचों प्रमुख वैष्णव आचार्य तथा अन्य मान्य एवं प्रतिष्ठित धर्माचार्यों को सम्मिलित किया जाए और समस्त मंदिरों का धार्मिक व्यवस्थापन उनके मार्गदर्शन एवं संरक्षण में हो।”

जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती का कहना है, “ऐसा करना इसलिए जरूरी है, क्योंकि सरकार के पास न तो शास्त्रीय ज्ञान होता है, न आध्यात्मिक अनुभूति; और धर्मनिरपेक्ष शासन-व्यवस्था होने के कारण मंदिरों के धार्मिक संचालन का नैतिक अधिकार भी उसके पास नहीं है।” वे कहते हैं, “यह बोर्ड मंदिरों की धार्मिक मर्यादा, परम्परा, देवद्रव्य की पारदर्शिता, धर्मप्रचार, वेद-रक्षा, गोसंरक्षण, संस्कृत-प्रचार तथा लोककल्याण के कार्यों का मार्गदर्शन करे। इससे मंदिर राजनीति का नहीं, धर्म का केन्द्र बने रहेंगे और समाज का विश्वास भी अधिक दृढ़ होगा।”

मंदिरों में प्राप्त देवद्रव्य का शास्त्रोक्त सदुपयोग हो

उन्होंने कहा, “हम यह भी चाहते हैं कि मंदिरों में प्राप्त देवद्रव्य का उपयोग मुख्यतः उसी जनपद एवं क्षेत्र के धार्मिक, शैक्षिक और सामाजिक उत्थान के लिए किया जाए, जहाँ वह मंदिर स्थित है। जैसे कि पाठशालाएँ, गुरुकुल, वेद विद्यालय, गोशालाएँ, चिकित्सालय, अन्नक्षेत्र, धर्मशालाएँ तथा निर्धन, असहाय एवं पीड़ित जनों की सेवा जैसे लोककल्याणकारी कार्यों में किया जाए। यही सनातन धर्म की परम्परा भी है और यही देवद्रव्य का शास्त्रोक्त सदुपयोग भी है।”

मंदिरों का धार्मिक संचालन सरकार के हाथ में नहीं होना चाहिए

जगद्गुरु शंकराचार्य यहां जोर देकर यह भी कहते हैं, “मेरा स्पष्ट मत है कि मंदिरों का धार्मिक संचालन सरकार के हाथ में नहीं होना चाहिए। शासन का कार्य प्रशासन, सुरक्षा, न्याय और जनकल्याण है; जबकि मंदिर आध्यात्मिक, धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना के केन्द्र हैं। सरकार के पास न शास्त्रज्ञान है, न धार्मिक परम्पराओं का अनुभव और न ही आध्यात्मिक उत्तरदायित्व। धर्मनिरपेक्ष शासन व्यवस्था में राज्य को किसी भी धर्म के धार्मिक कार्यों का संचालक नहीं बनना चाहिए।”

कहने का तात्पर्य यह है कि शासन के पास न तो शास्त्रीय ज्ञान है और न ही धर्म को जीने वाले धर्मानुभवी अधिकारी। धर्मनिरपेक्ष शासन का कार्य जन-सुविधाएँ देना है, न कि आध्यात्मिक अनुष्ठानों का संचालन करना। अतः शासन धार्मिक प्रबन्धन में कभी न्याय नहीं कर सकता। मर्यादा का ह्रास करने वाले सरकारी अधिकारी मंदिरों को “पर्यटन केन्द्र” मानते हैं, तपोभूमि नहीं। इससे गर्भगृह की पवित्रता और परम्परागत पूजन-पद्धति में बाधा आती है।

भगवान को समर्पित द्रव्य है देवद्रव्य

एक प्रश्न के उत्तर में जगद्गुरु शंकराचार्य शास्त्रों का हवाला देते हुए कहते हैं कि “देवद्रव्यं न हर्तव्यं नोपभोग्यं कदाचन।” यानी कि भगवान को समर्पित द्रव्य देवद्रव्य बन जाता है। यदि वास्तव में उसमें चोरी हुई है, तो यह केवल आर्थिक अपराध नहीं, अपितु भगवान श्रीराम और करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था के साथ विश्वासघात है। इसकी निष्पक्ष, शीघ्र और निर्भीक जाँच होनी चाहिए तथा दोषियों को कठोर दण्ड मिलना चाहिए।

मेरी केवल यही अपेक्षा है कि जाँच किसी पद, प्रभाव, प्रतिष्ठा या राजनीतिक दबाव से प्रभावित न हो। सत्य जहाँ तक ले जाए, वहीं तक जाँच पहुँचे; निर्दोष की रक्षा हो और दोषी, चाहे वह कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो, न्याय के समक्ष उत्तरदायी बने। यही धर्म है, यही न्याय है और यही भगवान श्रीराम की मर्यादा के अनुरूप भी है।

उन्होंने कहा, सनातन धर्म में देवद्रव्य को भगवान का स्वरूप माना गया है। उस पर किसी व्यक्ति का अधिकार नहीं होता। इसलिए देवद्रव्य का अपहरण या दुरुपयोग केवल चोरी नहीं, अपितु धर्म का भी गंभीर अपराध है। प्रश्न तो यह उठता है कि अयोध्या धर्मनगरी है, संस्कारों की नगरी है और भगवान श्रीराम की पावन जन्मभूमि है। ऐसे पवित्र स्थान पर ऐसा कुकृत्य कैसे संभव हुआ? यह तो वैसा ही है जैसे चन्दन के वन में विषवृक्ष का निवास हो।

पुराणों में कहा गया है, “देवद्रव्यं ब्राह्मणस्वं च लोभेनोपहिनस्ति यः। स पापात्मा निरये घोरे ब्रह्महत्यासमं व्रजेत्॥” अर्थात् जो लोभवश देवद्रव्य का अपहरण करता है, वह अत्यन्त पाप का भागी होता है। अतः यदि भगवान श्रीराम के चरणों में अर्पित दान के साथ छल हुआ है, तो यह करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था पर भी आघात है।

श्रीराम का मंदिर व्यवस्था सभी के लिए आदर्श और अनुकरणीय हो

राम मंदिर ट्रस्ट के ढाँचे को बदलने से संबंधित प्रश्न के उत्तर में जगद्गुरु शंकराचार्य का स्पष्ट कहना है, “मेरा आग्रह व्यक्तियों को बदलने का नहीं, बल्कि नियम बदलने की जरूरत है, व्यवस्था तंत्र को आदर्श बनाने का है। अर्थात् योग्य व्यक्तियों को व्यवस्थापन सौंपना चाहिए। कोई भी संस्था व्यक्तियों से नहीं, उसके सिद्धान्तों और पारदर्शी व्यवस्था से महान बनती है। यदि कहीं प्रशासनिक या संरचनात्मक कमियाँ हैं, तो उनका साहसपूर्वक परिमार्जन होना चाहिए। साथ ही ऐसी व्यवस्था बने, जिसमें धर्माचार्यों का मार्गदर्शन, वित्तीय पारदर्शिता, नियमित लेखा परीक्षा तथा जन-उत्तरदायित्व, ये सभी स्थायी रूप से सुनिश्चित हों। श्रीराम का मंदिर सम्पूर्ण हिन्दू समाज का है; इसलिए उसकी व्यवस्था भी आदर्श और अनुकरणीय होनी चाहिए।

दान की पारदर्शिता बनाए रखने के संबंध में पूछे गए प्रश्न के जवाब में जगद्गुरु शंकराचार्य का कहना था कि देवद्रव्य के प्रबन्धन के लिए पाँच सिद्धान्त अनिवार्य होने चाहिए, प्रत्येक दान का डिजिटल एवं लिखित अभिलेख। प्रतिवर्ष स्वतंत्र और निष्पक्ष ऑडिट। नियमित सार्वजनिक आय-व्यय विवरण (श्वेतपत्र)। धर्माचार्यों एवं वित्त विशेषज्ञों की संयुक्त निगरानी व्यवस्था। प्रत्येक व्यय का उद्देश्य स्पष्ट रूप से श्रद्धालुओं के समक्ष प्रस्तुत किया जाए।

उन्होंने कहा, “धर्म में गोपनीयता नहीं, पवित्रता और पारदर्शिता ही विश्वास का आधार है। जहाँ लेखा स्पष्ट होता है, वहीं लोकश्रद्धा और भी प्रगाढ़ होती है।” जब उनसे पूछा गया कि इस बारे में आपकी क्या मांग है? जगद्गुरु शंकराचार्य ने कहा कि मेरी किसी व्यक्ति या दल के विरुद्ध कोई मांग नहीं है; मेरी मांग केवल धर्म, सत्य और लोकविश्वास की रक्षा के लिए है। भगवान श्रीराम के चरणों में समर्पित समस्त दान की आय-व्यय का प्रमाणिक एवं सार्वजनिक श्वेतपत्र समय-समय पर प्रकाशित किया जाए, जिससे श्रद्धालुओं का विश्वास और अधिक दृढ़ हो।

दान का उपयोग वेद-विद्या, गुरुकुल, गोसंरक्षण, संस्कृत, धर्मप्रचार, अन्नदान और लोककल्याण में हो

उन्होंने कहा, “मंदिरों में प्राप्त दान का यथाशक्ति उपयोग वेद-विद्या, गुरुकुल, गोसंरक्षण, संस्कृत, धर्मप्रचार, अन्नदान और लोककल्याण के कार्यों में हो, जिससे भगवान का प्रसाद सम्पूर्ण समाज तक पहुँचे। भगवान श्रीराम केवल एक ऐतिहासिक पुरुष नहीं, बल्कि धर्म, सत्य, मर्यादा और लोकमंगल के शाश्वत आदर्श हैं। यदि हम वास्तव में श्रीराम के भक्त हैं, तो केवल मंदिर निर्माण ही नहीं, बल्कि राम के आदर्शों का भी निर्माण अपने जीवन में करें। धर्म की रक्षा केवल नारों से नहीं होती; सत्य, ईमानदारी, पारदर्शिता, सेवा, त्याग और मर्यादा से होती है।”

अंत में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती कहते हैं, “भगवान श्रीराम केवल मंदिरों में प्रतिष्ठित विग्रह नहीं हैं; वे भारत की आत्मा हैं। उनके जीवन का प्रत्येक प्रसंग सत्य, मर्यादा, करुणा, त्याग, न्याय और लोकमंगल का आदर्श प्रस्तुत करता है। इसलिए मैं समस्त देशवासियों से निवेदन करता हूँ कि भगवान श्रीराम के प्रति अपनी श्रद्धा को केवल उत्सव तक सीमित न रखें, बल्कि उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारें। मंदिरों की पवित्रता, पारदर्शिता और मर्यादा की रक्षा को अपना सामूहिक दायित्व समझें। देवद्रव्य को ईश्वर की संपत्ति मानकर उसके सदुपयोग के प्रति सजग रहें। धर्म के नाम पर किसी प्रकार के भ्रष्टाचार, छल या स्वार्थ को कभी स्वीकार न करें। समाज में सत्य, सेवा, सदाचार, गोसंरक्षण, वेद-विद्या, संस्कृत तथा भारतीय संस्कृति के संरक्षण के लिए सक्रिय योगदान दें।”

शास्त्रों में कहा गया है- धर्मो रक्षति रक्षितः। अर्थात् जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। भगवान श्रीराम सम्पूर्ण राष्ट्र को सत्य, मर्यादा, सद्बुद्धि और धर्मनिष्ठा प्रदान करें तथा भारत पुनः विश्व में धर्म, संस्कृति और आध्यात्मिक नेतृत्व का आलोक फैलाएं, यही मंगलकामना है।॥ श्रीरामचन्द्रार्पणमस्तु ॥

Share this post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

scroll to top