भारतीयों की मौत पर सन्नाटा क्यों? ईरान के लिए मुखर रहने वालों से देश पूछ रहा है सवाल ?

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मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली । भारत और ईरान के संबंध सदियों पुराने रहे हैं। सांस्कृतिक विरासत, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, चाबहार बंदरगाह और सामरिक सहयोग जैसे अनेक क्षेत्रों में दोनों देशों ने एक-दूसरे का साथ दिया है। हालांकि यह भी सामने आया है कि इस्‍लाम के नाम पर ईरान ने हमेशा पाकिस्‍तान का साथ निभाया है, लेकिन अपने व्‍यापारिक हितों को देखते हुए वह आर्थ‍िक मामलों में भारत के साथ खड़ा दिखा है।

यही कारण भी रहा जो भारत ने हमेशा यह साबित किया कि वह अपने मित्र देशों का संकट की घड़ी में भी साथ देता है। आज जब ‘हॉर्मुज जलडमरूमध्य’ में भारतीय नाविकों की मौत और कई भारतीयों के घायल होने की घटना सामने आई है, तब यह प्रश्न पूरे देश के सामने खड़ा है कि क्या भारत के इस मित्रता पूर्ण व्‍यवहार एवं सम्मान का मान ईरान ने भी रखा है?

विदेश मंत्रालय ने स्वयं स्वीकार किया है कि पश्चिम एशिया में समुद्री जहाजों पर हाल में हुए हमलों में सबसे अधिक भारतीय नागरिक प्रभावित हुए हैं। मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि इस सप्‍ताह हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे दो व्यापारी जहाज, ‘एमटी अल बहियाह’ और ‘एमटी मोम्बासा’ हमले का शिकार बने। इन दोनों जहाजों पर कुल 46 चालक दल के सदस्य थे, जिनमें 30 भारतीय नाविक शामिल थे।

‘एमटी अल बहियाह’ पर सवार 12 भारतीयों में से एक भारतीय नागरिक की मृत्यु हो गई, जबकि एक अन्य घायल हुआ। ‘एमटी मोम्बासा’ पर सवार 18 भारतीयों में से 9 भारतीय घायल हुए, जिनमें दो की स्थिति गंभीर बनी हुई है, वह जीवित भी बचेंगे, इसमें संदेह है। हालांकि भारत सरकार ने तत्काल नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास के मिशन उप प्रमुख को विदेश मंत्रालय तलब कर कड़ा विरोध दर्ज कराया और इन हमलों की तीखी निंदा की।

यदि भारत जैसा संतुलित कूटनीतिक देश किसी मित्र राष्ट्र के राजनयिक को तलब करता है, तो यह अत्यंत गंभीर संदेश होता है। पर क्‍या इससे भारत की वह जनता समझेगी, जो कल तक ईरान के समर्थन में सड़कों पर उतर रही थी, चंदा इकट्ठा कर मदद के नाम पर ईरान भेज रही थी?

हकीकत में तो आज यह सभी के लिए याद करना आवश्यक है कि भारत ने ईरान के लिए क्या किया। जब ईरान अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, युद्ध और आर्थिक संकट से जूझ रहा था, तब भारत ने सिर्फ उसके पक्ष में जहां संभव रहा, अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर बयान जारी किए, साथ ही मानवीय सहायता का बड़ा अभियान भी चलाया।

जीवनरक्षक दवाइयाँ, चिकित्सा उपकरण और आवश्यक मेडिकल सामग्री, वैध और कानूनी माध्यमों से ईरानी रेड क्रिसेंट सोसाइटी तक पहुँचाई गईं। जिसके परिणाम में ईरान सरकार और उसके राजदूत ने सार्वजनिक रूप से भारत सरकार तथा भारतीय जनता के इस सहयोग के लिए आभार भी व्यक्त किया। यानी भारत ने सहानुभूति का प्रदर्शन करने के स्‍थान पर संकट की घड़ी में ईरान की वास्तविक मदद की।

ईरान के पक्ष में जब भारत में रह रहे शिया मुसलमान धन इकट्ठा कर रहे थे, तब कश्मीर घाटी से लेकर मेरठ, लखनऊ, अमरोहा, हैदराबाद, मुंबई, कारगिल और अन्य क्षेत्रों से नकद राशि के साथ-साथ सोने के आभूषण, चांदी के बर्तन और अन्य मूल्यवान वस्तुएँ ईरान को आर्थ‍िक सहायता के रूप में उपलब्‍ध कराई गईं। यानी जो भी ईरान के पक्ष में संभव हो सकता था, वह सभी कुछ भारत सरकार ने अपने स्‍तर पर किया। जहां तक कि भारत के तमाम गैर मुसलमानों ने भी शियाओं के आह्वान पर यथासंभव मदद अपनी ओर से मुहैया कराई।

अमेरिकी प्रतिबंधों और वैश्विक दबाव के बावजूद भारत ने चाबहार बंदरगाह परियोजना को कभी नहीं छोड़ा। यह परियोजना ईरान की अर्थव्यवस्था और उसके अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। जब अनेक अंतरराष्ट्रीय कंपनियाँ ईरान से दूरी बना रही थीं, तब भारत ने निवेश जारी रखा। यह कदम भरोसे और रणनीतिक साझेदारी के आधार पर उठाया गया, किंतु आज सवाल जवाबदेही का है।

वस्‍तुत: जब भारतीय नागरिकों की जान जाती है, तब भारत को यह पूछने का पूरा अधिकार है कि ऐसी घटनाएँ क्यों हुईं?यदि अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती, यदि नागरिक जहाजों पर हमले होते हैं और उनमें सबसे अधिक भारतीय प्रभावित होते हैं, तो सिर्फ “दुख व्यक्त” कर देना पर्याप्त नहीं हो सकता। ऐसे में भारत के प्रत्‍येक नागरिक को यह जानने का अधिकार है कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ईरान क्या ठोस कदम उठा रहा है।

भारतीय नाविक किसी युद्ध का हिस्सा नहीं

यह भी ध्‍यान देने योग्‍य है कि भारत विश्व के सबसे बड़े समुद्री मानव संसाधन प्रदाताओं में शामिल है। हजारों भारतीय व्यापारी जहाजों पर कार्य करते हैं। वे किसी सैन्य अभियान का हिस्सा नहीं होते। वे वैश्विक व्यापार की रीढ़ हैं। ऐसे निर्दोष नागरिकों का किसी भी संघर्ष में शिकार बनना अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून और मानवीय सिद्धांतों, दोनों के विपरीत है। यदि सबसे अधिक भारतीय नाविक ही प्रभावित हो रहे हैं, तो यह भारत के लिए स्‍वभावि‍क तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न बन गया है।

अब स्‍वभाविक है कि इस पूरे घटनाक्रम ने देश के भीतर भी एक गंभीर बहस छेड़ दी है। जैसा कि बताया गया, जब ईरान संकट में था, तब भारत में अनेक स्थानों पर उसके समर्थन में प्रदर्शन हुए। सोशल मीडिया पर अभियान चलाए गए। मानवाधिकारों और अंतरराष्ट्रीय कानून की दुहाई दी गई। करोड़ों रुपये का चंदा जुटाया गया। लोगों ने अपने आभूषण तक दान कर दिए, किंतु आज जब एक भारतीय नागरिक की मृत्यु हुई, अनेक भारतीय घायल हुए और भारत सरकार को स्वयं ईरानी राजनयिक को तलब कर विरोध दर्ज कराना पड़ा, तब वही मुखर आवाजें शांत हैं!

क्या भारतीय नागरिक का जीवन किसी अन्य देश के नागरिक से कम मूल्यवान है? क्या मानवाधिकारों की आवाज तब उठेगी, जब पीड़ित कोई दूसरा होगा? क्या संवेदना भी वैचारिक पसंद और नापसंद देखकर व्यक्त की जाएगी? वस्‍तुत: ये प्रश्न उन सभी लोगों के लिए हैं जो अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर नैतिकता और मानवाधिकार की बात करते हैं। उन्‍हें भी आज यह समझना चाहिए कि यदि सिद्धांत सार्वभौमिक हैं, तो भारतीय नागरिक के लिए भी वही संवेदना दिखाई देनी चाहिए।

भारत की विदेश नीति को स्पष्ट संदेश देना होगा

यहां केंद्र की मोदी सरकार से भी ईरान के प्रति कड़ा रुख अपनाने का आग्रह है। बेशक; भारत की विदेश नीति संतुलित है। भारत अमेरिका से भी संबंध रखता है, रूस से भी, इजराइल से भी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह किसी देश को ये छूट दे कि वह उसके नागरिकों की हत्‍या करेगा या उसके यहां हिंसा एवं हत्‍या होंगी ।

अब यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि ईरान भी उसी स्पष्टता से भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे, इन घटनाओं की निष्पक्ष जांच कराए, जिम्मेदारी तय करे और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस एवं विश्वसनीय कदम उठाए। इसके साथ ही भारत में रह रहे सभी श‍िया मुसलमानों एवं उन सभी से जो कल तक ईरान के साथ खड़े दिखे, उन सभी से अपील है कि वह भारतीयों पर ईरान के समुद्री क्षेत्र में हो रही हिंसात्‍मक कार्रवाइयों का मुखर विरोध करें।

केंद्र सरकार भी ध्‍यान रखे, किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति का अंतिम उद्देश्य उसके नागरिकों की सुरक्षा और सम्मान होता है। यदि भारतीय नागरिकों का रक्त बहता है, तो भारत का कठोर प्रश्न पूछना उसका अधिकार से अधिक उसका कर्तव्य भी है। मित्रता सम्मान पर टिकी होती है और सम्मान की पहली शर्त आज भारत-ईरान संबंधों के बीच यही है कि हर देशवासी, भारतवासी का जीवन सर्वोपरि है।

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