दिल्ली । वैश्विक स्तर पर, विशेष रूप से आर्थिक क्षेत्र में, परिस्थितियां तेजी से रसातल में जाती हुई दिखाई दे रही हैं। विभिन्न देशों (रूस-यूक्रेन, इजराईल-हम्मास, ईरान-अमेरिका एवं सऊदी अरब-हूथी) के बीच चल रहे युद्ध ने उन देशों के आर्थिक क्षेत्र को भी विपरीत रूप से प्रभावित करना प्रारम्भ कर दिया है, जो प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से इस युद्ध में किसी भी प्रकार से नहीं जुड़े हैं। इस श्रेणी के देशों में भारत का नाम सबसे ऊपर उभर कर सामने आ रहा है। दरअसल, भारत अपनी कुल खपत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल अन्य देशों से आयात करता है। उक्त युद्ध प्रारम्भ होने के बाद से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं एवं यह 100 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल से ऊपर निकल गईं हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह स्थिति किसी भी कीमत पर उचित नहीं है, क्योंकि भारत को महंगी दरों पर कच्चे तेल का आयात करना पड़ रहा है और इससे महंगे कच्चे तेल के साथ साथ भारत में मुद्रा स्फीति भी आयातित हो रही है। साथ ही, भारत को महंगे कच्चे तेल के आयात का अमेरिकी डॉलर में भुगतान करना होता है, जिससे भारतीय रुपए की कीमत पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में दबाव बढ़ता जा रहा है एवं भारतीय रुपए का लगातार अवमूल्यन होता हुआ दिखाई दे रहा है। भारतीय रुपए के अवमूल्यन से भारत द्वारा आयात किए जाने वाले समस्त उत्पाद महंगे हो जाते हैं।
उक्त वर्णित युद्ध प्रारम्भ होने के पूर्व, भारतीय अर्थव्यवस्था (सकल घरेलू उत्पाद के आधार पर) वैश्विक स्तर पर अमेरिका, चीन, जर्मनी के पश्चात चौथे स्थान पर पहुंच गई थी। परंतु, अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय रुपए की कीमत में आए परिवर्तन के चलते भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक स्तर पर छठे स्थान पर पहुंच गई है, जबकि सकल घरेलू उत्पाद उसी स्तर पर बना रहा है। इसका मुख्य कारण, अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी डॉलर का भारतीय रुपए की तुलना में लगातार मजबूत होते जाना है।
जैसे जैसे रूस-यूक्रेन युद्ध और अधिक आक्रामक होता जा रहा है, वैसे वैसे अब यह सम्भावना बलवती होती जा रही है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं एवं अन्य खाद्य पदार्थों के दामों में भी भारी वृद्धि देखने में आ सकती है, क्योंकि यूक्रेन गेहूं का बड़ा उत्पादक देश है। यूक्रेन ने रूस के कच्चे तेल को संसाधित कर पेट्रोल एवं डीजल बनाने वाली उत्पादन इकाईयों को भी भारी नुक्सान पहुंचाया है। इससे रूस ने गैस एवं ईंधन की आपूर्ति को यूरोपीयन देशों को स्थगित कर दिया है। सर्दी के मौसम में यूरोपीयन देशों को गैस एवं ईंधन की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। परंतु, इस वर्ष यूरोपीयन देशों को सर्दी के मौसम में गैस एवं ईंधन की आपूर्ति प्रभावित होने वाली है इससे इन देशों के नागरिकों को सबसे अधिक कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है।
अमेरिका ने ईरान के साथ युद्ध प्रारम्भ करके विश्व के कई देशों को भारी परेशानी में डाल दिया है। न केवल कच्चा तेल बल्कि फर्टिलाइजर, खाद्य पदार्थ, गैस, आदि की आपूर्ति प्रभावित हुई है। साथ ही, वित्तीय क्षेत्र में भी कई देशों को भारी कठिनाईयों के बीच में धकेल दिया है। यदि यह युद्ध कुछ समय और चलता है, जिसके कि आसार दिखाई दे रहे हैं, तो कई देशों के दिवालिया होने की सम्भावना बनती नजर आ रही है। अमेरिका में मुद्रा स्फीति को नियंत्रित करने के उद्देश्य से यू एस फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों में 25 आधार बिंदुओं की बढ़ौतरी की है। अक्टोबर 2026 एवं दिसम्बर 2026 माह में भी पुनः 25 आधार बिंदुओं की वृद्धि की सम्भावना व्यक्त की जा रही है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें उच्च स्तर पर बनी रहने की प्रबल सम्भावना है एवं इसके चलते अमेरिका में भी मुद्रा स्फीति पर नियंत्रण मुश्किल है। ब्याज दरों में वृद्धि के चलते अमेरिका में यू एस बांड यील्ड में भी लगातार वृद्धि हो रही है एवं यह अपने लगभग उच्चतम स्तर 5.25 प्रतिशत तक पहुंच गई है। बांड यील्ड के उच्च स्तर पर पहुंचने के चलते अमेरिकी निवेशक तेजी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं से अपना निवेश निकाल कर अमेरिकी बांड में निवेश कर रहे हैं क्योंकि अपेक्षाकृत यह सुरक्षित निवेश है एवं ब्याज दर भी अधिक मिल रही है। भारत जैसी तेजी से आगे बढ़ रही अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह स्थिति ठीक नहीं है। भारत सहित अन्य विकासशील देशों से निकल रहे विदेशी निवेश से इन देशों की अपनी मुद्रा का अवमूल्यन हो रहा है, जिससे इन देशों में विभिन्न पदार्थों के आयात महंगे हो रहे हैं एवं इन देशों में मुद्रा स्फीति फैलने का खतरा उत्पन्न हो गया है। भारत सहित इन विकासशील देशों को भी मुद्रा स्फीति को नियंत्रित करने के उद्देश्य से ब्याज दरों में वृद्धि करनी होगी। कुल मिलाकर अमेरिका ने ईरान के साथ युद्ध प्रारम्भ कर विश्व के कई देशों के लिए विशेष रूप से आर्थिक क्षेत्र में समस्याएं खड़ी कर दी हैं।
भारत अभी तक तो अपनी आर्थिक सेहत को सम्हाले हुए है, क्योंकि भारत के पास 75,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक का विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है एवं भारत में आर्थिक गतिविधियों में रफ्तार के चलते प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों में वसूली प्रभावी बनी हुई है। परंतु, युद्ध यदि और अधिक लंबे समय तक चलता है तो भारत में भी आर्थिक क्षेत्र में कुछ परेशनियां आ सकती हैं। बहुत सम्भव है कि भारतीय रिजर्व बैंक अपनी अक्टोबर 2026 माह में होने वाली बैठक में रेपो दर में 25 आधार बिंदुओं की वृद्धि करने को मजबूर हो। ब्याज दरों में वृद्धि का सीधा प्रभाव भारत के आर्थिक विकास की गति पर पड़े बिना नहीं रह सकेगा। भारत द्वारा आयात की जाने वाली विभिन्न वस्तुओं की कीमतें यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ रही हैं तो भारत को इन वस्तुओं को उच्च कीमतों पर खरीदने को मजबूर होना पड़ेगा। भारतीय शेयर बाजार भी विपरीत रूप से प्रभावित हो सकता है क्योंकि विदेशी संस्थागत निवेशक भी भारतीय पूंजी बाजार से अपने निवेश को निकाल कर अमेरिकी बांड में अपना निवेश बढ़ा रहे है। इससे भारतीय रुपए पर अतिरिक्त दबाव उत्पन्न होगा और अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुपए की कीमत और अधिक कम हो सकती है।
विभिन्न देशों के बीच चल रहे युद्ध के बीच, भारतीय नागरिकों को भी अपने कर्तव्य का निर्वहन करने हेतु आगे आना होगा। इस संदर्भ में केंद्र एवं समस्त राज्य सरकारें तो अपना कार्य पूरी ईमानदारी से सम्पन्न करने का प्रयास कर ही रही हैं, परंतु नागरिकों को भी स्वदेशी अपनाकर एवं विभिन्न उत्पादों का संयम के साथ उपयोग कर अन्य देशों से उत्पादों के आयात को कम करने के प्रयास करने होंगे। भारत में उत्पादित वस्तुओं के उपयोग को बढ़ावा देना होगा एवं आयातित वस्तुओं के उपयोग को कम करना होगा ताकि विदेशी मुद्रा को बचाया जा सके। भारतीय नागरिकों द्वारा यदि भारत में उत्पादित वस्तुओं के उपयोग को बढ़ावा दिया जाता है तो भारतीय विनिर्माण इकाईयों को विस्तार में जाना होगा एवं इससे भारत में ही रोजगार के नए अवसर निर्मित होंगे। कुल मिलाकर अब अन्य देशों से आयातित वस्तुओं के उपयोग को समाप्त करना होगा, यदि समाप्त नहीं कर सकते हैं तो कम तो करना ही होगा।
भविष्य में, भारत सहित विकासशील देशों के लिए विशेष रूप से आर्थिक क्षेत्र में आने वाली कठिनाईयों के हल के लिए इन देशों के नागरिकों को अपनी महती भूमिका निभाने के लिए अपने आप को अभी से तैयार करना होगा। बहुत सम्भव है कि इन देशों के केंद्रीय बैकों को ब्याज दरों में वृद्धि करना पड़े एवं इन देशों में पेट्रोल, डीजल, फर्टिलाईजर, गैस एवं अन्य खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि देखने को मिले, ऐसे समय में इन देशों के नागरिकों को अपने देश के हित में इस कठिन समय को सहज बनाने के लिए अपने आप को अभी से तैयार करना होगा।



