आनंद स्वरूप काशिव
भोपाल। सोशल मीडिया पर अक्सर एक सवाल घूमता है—“अगर नीम करौली बाबा इतने शक्तिशाली थे, तो उन्होंने अंग्रेजों को भारत से क्यों नहीं निकाल दिया?” पहली नजर में यह सवाल तार्किक लगता है। थोड़ा गहराई से देखें तो समस्या सवाल में नहीं, शक्ति की परिभाषा में है।इसी मानसिकता से दूसरा सवाल भी निकलता है—“RSS का आजादी की लड़ाई में क्या योगदान है?” दोनों के पीछे एक ही धारणा है: जिसने किसी ऐतिहासिक घटना को तत्काल और सीधे नहीं बदला, उसने इतिहास में कुछ किया ही नहीं।यह इतिहास को मशीन समझने जैसा है—एक व्यक्ति ने लीवर खींचा और परिणाम निकल आया। समाज और सभ्यताएँ ऐसे नहीं बदलतीं। वे विचारों, संगठनों, संस्थाओं, अर्थव्यवस्था, सामाजिक चेतना, नेतृत्व, तकनीक, जनसंगठन, अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और सबसे बढ़कर सामूहिक मानसिकता के परस्पर प्रभाव से बदलती हैं।
शक्ति हमेशा हेडलाइन में नहीं दिखती
एक व्यक्ति संविधान लिखता है। दूसरा संस्था बनाता है। तीसरा विचार देता है। चौथा लोगों को संगठित करता है। पाँचवाँ आर्थिक क्षमता पैदा करता है। छठा समाज में आत्मविश्वास जगाता है। सातवाँ इन सबको सत्ता-परिवर्तन में बदलने वाला राजनीतिक नेतृत्व तैयार करता है। भूमिकाएँ अलग हैं, परिणाम सामूहिक होता है।हेडलाइन में जो शक्ति दिखती है, वह अक्सर उन हजारों अनदेखी प्रक्रियाओं का अंतिम फल होती है जिन्हें हेडलाइन कभी नहीं बताती। संतों और सामाजिक नेताओं को भी इसी पैमाने से देखा जाना चाहिए। अगर कोई संत लोगों के जीवन, आत्मविश्वास, संबंधों और मानसिक संसार को बदलता है, तो उसका प्रभाव इस बात से नहीं नापा जा सकता कि उसने किसी औपनिवेशिक अधिकारी को जाकर चुनौती दी या नहीं।यहाँ एक साफ फर्क समझना जरूरी है। व्यक्तिगत आध्यात्मिक प्रभाव और राजनीतिक-सैन्य शक्ति एक श्रेणी की चीजें नहीं हैं। अनुयायी किसी संत को अत्यंत शक्तिशाली मान सकते हैं—नैतिक, आध्यात्मिक या मनोवैज्ञानिक रूप से। इससे यह निष्कर्ष अपने आप नहीं निकलता कि वह व्यक्ति किसी औपनिवेशिक राज्य को सैन्य रूप से समाप्त कर सकता था। यह श्रेणी-दोष है। जैसे किसी महान वैज्ञानिक से पूछना—“अगर आप इतने बुद्धिमान थे तो युद्ध क्यों नहीं जीता?” सवाल ही गलत है। बुद्धिमत्ता और सैन्य शक्ति अलग हैं। आध्यात्मिक प्रभाव और राज्य-शक्ति भी अलग हैं।
अब यही सवाल RSS पर
“RSS आजादी के आंदोलन में क्या कर रही थी?” इसका जवाब देने से पहले पूछिए-स्वतंत्रता आंदोलन से आप क्या समझते हैं?अगर इसका अर्थ केवल उन संगठित राजनीतिक अभियानों से है जिनका लक्ष्य ब्रिटिश शासन पर तत्काल दबाव बनाना था, तो कांग्रेस, क्रांतिकारी संगठन, किसान और श्रमिक आंदोलन, आजाद हिंद फौज और अन्य धाराओं की भूमिकाएँ अलग-अलग देखनी पड़ेंगी। लेकिन अगर स्वतंत्रता को सिर्फ 15 अगस्त 1947 की सत्ता-हस्तांतरण की घटना मान लिया जाए, तो बड़ा प्रश्न गायब हो जाता है-भारत को स्वतंत्र होने के लिए केवल अंग्रेजों को हटाना था, या भारतीय समाज को भीतर से भी पुनर्गठित करना था?यहीं बहस का दूसरा आयाम खुलता है। RSS की स्थापना 1925 में हुई। उसने स्वयं को मूलतः सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन के रूप में विकसित किया। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का जोर संगठन और समाज के दीर्घकालीन निर्माण पर था। इसका अर्थ यह नहीं कि RSS को स्वतंत्रता आंदोलन के हर चरण की प्रत्यक्ष राजनीतिक गतिविधि बना दिया जाए। ऐसा करना ऐतिहासिक रूप से ठीक नहीं होगा। लेकिन यह कहना भी उतना ही सरल है कि जिसने अंग्रेजों के खिलाफ प्रत्यक्ष राजनीतिक आंदोलन नहीं किया, उसका स्वतंत्रता या राष्ट्रनिर्माण में कोई योगदान नहीं था। तब राष्ट्रनिर्माण की अवधारणा ही फिर से परिभाषित करनी पड़ेगी।
राष्ट्र केवल राजनीतिक सत्ता का नाम नहीं है
आधुनिक पश्चिमी राजनीतिक कल्पना में राष्ट्र अक्सर राज्य, भूभाग और संप्रभुता के फ्रेम में समझा जाता है। भारतीय सभ्यता की दृष्टि में समाज राज्य से पैदा नहीं होता। राज्य समाज की एक संस्थागत अभिव्यक्ति है। समाज की अपनी स्मृति, संस्कृति, संस्थाएँ, भाषा, परंपराएँ, तीर्थ, परिवार, समुदाय और साझे प्रतीक होते हैं।यदि कोई सभ्यता लंबे समय तक राजनीतिक पराधीनता में रही हो, तो उसकी मुक्ति केवल सत्ता-परिवर्तन का प्रश्न नहीं होती। सबसे बड़ी चुनौती यह होती है—क्या वह अपने बारे में फिर से स्वयं सोचना शुरू कर सकती है? औपनिवेशिक शासन की सबसे गहरी शक्ति केवल पुलिस या सेना नहीं थी। वह यह भी समझाने की कोशिश करता था कि तुम्हारा अतीत पिछड़ा था, संस्थाएँ अवैज्ञानिक थीं, ज्ञान आदिम था और आधुनिकता बाहर से आएगी। इसलिए राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ सभ्यतागत आत्मविश्वास का प्रश्न भी जुड़ा था। सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों का महत्व यहीं उभरता है।
अंग्रेजों को हराना और समाज को तैयार करना—दो अलग काम
कल्पना कीजिए, किसी कंपनी को प्रतिस्पर्धी से बाजार वापस लेना है। एक टीम बिक्री करेगी, दूसरी उत्पाद बनाएगी, तीसरी आपूर्ति श्रृंखला ठीक करेगी, चौथी प्रतिभा तैयार करेगी, पाँचवीं तकनीक बनाएगी। अब कोई कहे—“उत्पाद बेचने वाली टीम ने प्रतिद्वंद्वी को हराया, बाकी लोगों ने क्या किया?” तो वह संगठन को सिर्फ बिक्री विभाग मान रहा है।राष्ट्र भी ऐसा ही जटिल तंत्र है। स्वतंत्रता की अंतिम राजनीतिक लड़ाई में कुछ चेहरे सामने दिखते हैं। उनके पीछे समाज की संगठनात्मक क्षमता, आर्थिक क्षमता, सामाजिक चेतना और नेतृत्व की नई पीढ़ियाँ तैयार होती हैं। राजनीतिक स्वतंत्रता एक घटना हो सकती है; राष्ट्रनिर्माण एक प्रक्रिया है। ऐतिहासिक बहसों में यही फर्क रखना चाहिए।
इसलिए बाबा वाला सवाल भी बदलिए
अगर कोई पूछे—“अगर बाबा इतने शक्तिशाली थे तो अंग्रेजों को क्यों नहीं भगा दिया?” तो आस्था का मजाक बनाने की जरूरत नहीं। बस पूछिए—“आप शक्ति को केवल राज्यसत्ता बदलने की क्षमता क्यों मान रहे हैं?”एक शिक्षक की शक्ति क्या है? विचारक की? संत की? वैज्ञानिक की? उद्यमी की? संगठन-निर्माता की? इनमें से किसी का प्रभाव दूसरे की कसौटी से नहीं नापा जा सकता। धीरूभाई अंबानी से नहीं पूछा जा सकता कि उन्होंने संविधान क्यों नहीं लिखा। होमी भाभा से नहीं पूछा जा सकता कि उन्होंने गरीबी क्यों नहीं मिटाई। विवेकानंद से नहीं पूछा जा सकता कि उन्होंने अंग्रेजों को सैन्य रूप से क्यों नहीं हराया। और किसी सामाजिक संगठन से नहीं पूछा जा सकता कि उसने वही काम क्यों नहीं किया जो किसी राजनीतिक आंदोलन का घोषित उद्देश्य था।हर ऐतिहासिक शक्ति का अपना क्षेत्र होता है। असली प्रश्न है—किसने क्या बनाया? किसी व्यक्ति का मूल्य केवल इस आधार पर तय नहीं होता कि उसने स्वयं सत्ता प्राप्त की या नहीं। कभी सबसे बड़ा योगदान यही होता है कि वह ऐसी संस्थागत क्षमता बना दे जिसमें बाद की पीढ़ियाँ काम कर सकें। व्यक्ति का आकर्षण उसकी आयु के साथ समाप्त हो सकता है। लेकिन अगर वह नेतृत्व की पाइपलाइन बना दे, तो संस्था उसके बाद भी चलती है। भाषण खत्म हो जाता है; विचार पीढ़ियों तक चलता है। आंदोलन समाप्त हो जाता है; संगठनात्मक संस्कृति का प्रभाव कहीं लंबा रहता है। व्यक्ति की शक्ति उसकी जीवनकाल में नापी जा सकती है; संस्था की शक्ति उसकी उत्तर-जीवन में दिखाई देती है।इतिहास पढ़ते समय केवल यह नहीं पूछना चाहिए—“उसने उस दिन क्या किया?” यह भी पूछना चाहिए—“उसने आने वाले पचास वर्षों के लिए क्या क्षमता पैदा की?”
इतिहास व्हाट्सएप फॉरवर्ड नहीं, पारिस्थितिकी है
सोशल मीडिया ने इतिहास को भी छोटी क्लिप बना दिया है-“इसने अंग्रेजों को मारा।” “उसने जेल काटी।” “उसने आंदोलन किया।” “इसने नहीं किया।” फिर फैसला तैयार। सभ्यताओं का इतिहास तीस सेकंड का रील नहीं है। उसमें कई समानांतर पटरियाँ चलती हैं-राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, संस्थागत, आर्थिक। इनके मिलने से समाज की दिशा बदलती है।किसी व्यक्ति या संगठन को समझने का ईमानदार तरीका यही है कि उसकी दर्ज भूमिका को उसी संदर्भ में देखा जाए जिसमें वह काम कर रहा था। न किसी को अनावश्यक रूप से स्वतंत्रता संग्राम का नायक बना देना चाहिए, न यह मान लेना चाहिए कि जो सीधे राजनीतिक मोर्चे पर नहीं था, वह इतिहास में अप्रासंगिक था। योगदान का सवाल द्विआधारी नहीं है-“आजादी की लड़ाई में था या नहीं था।” सही सवाल है-किसने क्या किया, किस उद्देश्य से किया, किस सीमा में किया, और उसका प्रभाव किस समय-सीमा में दिखाई दिया?यही दृष्टि भावनात्मक इतिहास से निकालकर बौद्धिक इतिहास की ओर ले जाती है। और शायद सबसे महत्वपूर्ण बात यही है-अंग्रेजों को भारत से निकालना स्वतंत्रता का एक अध्याय था; भारतीय समाज को अपने पैरों पर खड़ा करना उससे कहीं लंबी कहानी थी।



