बीजेपी के मंच पर क्यों हो रहा है, अपनों से किनारा और गालीबाजों का सम्मान

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दिल्ली। कांग्रेस और उसके पूरे इकोसिस्टम को अच्छी तरह पता है कि जब चुनाव का मुख्य मुद्दा जाति बन जाएगा, तब नरेन्द्र मोदी सरकार के विकास कार्यों की कोई गंभीर समीक्षा नहीं होगी। विपक्ष ने सोशल मीडिया पर अपना प्रचार तंत्र इतना मजबूत कर लिया है कि सरकार की छोटी-सी चूक भी विशालकाय गलती लगने लगे। एक ट्वीट, एक क्लिप और पूरा नैरेटिव तैयार।

दूसरी ओर सत्ता पक्ष की वह ताकत, जो कभी सोशल मीडिया ही हुआ करती थी, अब बड़े पैसों और बड़ी कंपनियों के चक्कर में फंस गई है। टीम बदली, शोर बढ़ा, लेकिन काम करने का तरीका वही पुराना रहा। यदि सत्ता पक्ष इस मोर्चे पर गंभीर नहीं हुआ तो अंदर और बाहर से हो रहे हमलों की भरपाई करना मुश्किल हो जाएगा।

यहीं सत्ता और विपक्ष के कामकाज का फर्क साफ दिखता है। विपक्ष एक-एक इन्फ्लुएंसर से बात करता है और उसकी हैसियत के हिसाब से काम सौंपता है। पिछले दस सालों में कई छोटे-बड़े प्लेटफॉर्म इसी तरीके से खड़े हो गए। ऐसे-ऐसे नाम चर्चा के केंद्र में आ गए, जिन्हें कल तक कोई जानता भी नहीं था।

सत्ता पक्ष इसके उलट बड़ी-बड़ी कंपनियों को ठेके पर काम सौंप रहा है। ऐसी कंपनियां जिन्हें जमीन की हकीकत का अंदाजा नहीं, वे सिर्फ नंबर, व्यूज और लाइक्स समझती हैं। उनके लिए कैंपेन का मतलब है ज्यादा से ज्यादा लोगों तक बात पहुंचाना। पावरपॉइंट में वही आंकड़े चमकते हैं।

इसी हड़बड़ी में ये कंपनियां कभी रणवीर अल्लाहबादिया से संपर्क करती हैं, तो कभी मोहम्मद जुबैर तक पहुंच जाती हैं। समय रैना और अभिनव पांडेय को कौन बुला रहा है? यह सवाल पूछने वाला भी कोई नहीं है, जबकि भाजपा का साधारण कार्यकर्ता भी यह सुनकर पूछ रहा है —इन्हें क्यों बुलाया जा रहा है? लेकिन इससे किसे फर्क पड़ता है?

कौन विश्वास करेगा कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की सोशल मीडिया टीम में भी ठीक ठाक संख्या में लेफ्ट के लोग शामिल हैं।

जब रणबीर, जुबैर तक से संपर्क किया जा सकता है, ऐसे में इन्हीं कंपनियों द्वारा अजीत भारती, अभिषेक उपाध्याय, संदीप देव, सुरेश चिपलुनकर, रचित कौशिक, अर्चना तिवारी, आयुषी राणा या मनीष ठाकुर से बात क्यों नहीं हो सकती? तो वे आईटी सेल को उन गलतियों से आगाह कर सकते थे जो बार-बार दोहराई जा रही हैं। अपने लोगों को किनारे करके गाली बाजों को सम्मान देना-ऐसी कार्य पद्धति वाली कंपनियों से इकोसिस्टम बनाने को लेकर क्या उम्मीद रखी जा सकती है? इस पर गंभीरता से सोचना चाहिए, वरना शोर तो बढ़ेगा, असर नहीं।

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