ब्रिक्स सम्मेलन और भारत: दुनिया की उम्मीदें अब नई दिल्ली से

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डॉ० कुँवर पुष्पेंद्र प्रताप सिंह  

दिल्ली। युद्धों और आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच नई दिल्ली से निकलेगा वैश्विक दक्षिण की नई
आवाज का संदेश दुनिया इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां शक्ति का पुराना संतुलन तेजी से बदल रहा है। पश्चिम एशिया में युद्ध, यूक्रेन संकट, ऊर्जा बाजार में उथल-पुथल, व्यापारिक
प्रतिबंध, आपूर्ति शृंखला की अस्थिरता और महाशक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने वैश्विक
व्यवस्था के सामने गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। ऐसे समय में भारत की राजधानी नई दिल्ली में
हो रहा ब्रिक्स शिखर सम्मेलन सामान्य कूटनीतिक आयोजन से कहीं बड़ा महत्व रखता है।
भारत की अध्यक्षता में हो रहे 18वें ब्रिक्स सम्मेलन पर दुनिया की निगाहें इसलिए टिकी हैं
क्योंकि आज ब्रिक्स केवल पांच देशों का समूह नहीं रहा। इसके 11 सदस्य देश—ब्राजील, रूस,
भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, इंडोनेशिया
और सऊदी अरब—विश्व राजनीति और अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण शक्ति बन चुके हैं।
भारत सरकार के अनुसार ये देश दुनिया की लगभग 49.5 प्रतिशत आबादी, करीब 40
प्रतिशत वैश्विक जीडीपी और लगभग 26 प्रतिशत वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं।
यही आंकड़े बताते हैं कि ब्रिक्स अब केवल विकासशील देशों की चर्चा का मंच नहीं, बल्कि
वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने की क्षमता रखने वाला समूह है।
भारत से क्यों हैं इतनी उम्मीदें?
भारत को ब्रिक्स की अध्यक्षता ऐसे समय मिली है, जब वैश्विक व्यवस्था में संवाद की
आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। भारत की विदेश नीति का मूल स्वभाव टकराव के
बजाय संवाद, रणनीतिक स्वायत्तता और बहुपक्षीय सहयोग पर आधारित रहा है। यही कारण
है कि रूस और पश्चिम, दोनों के साथ संवाद बनाए रखने की भारत की क्षमता को दुनिया
अलग दृष्टि से देखती है। नई दिल्ली सम्मेलन में आर्थिक सहयोग के साथ खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा, प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य, आपदा-रोधक क्षमता और महत्वपूर्ण आपूर्ति शृंखलाओं को मजबूत करने जैसे मुद्दे
प्रमुख हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत ब्रिक्स को किसी एक देश अथवा पश्चिम-विरोधी
गठबंधन में बदलने के बजाय समावेशी वैश्विक दक्षिण के मंच के रूप में स्थापित करना
चाहता है। यही भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक पूंजी भी है। आधी दुनिया की आबादी, मगर आवाज कितनी?

ब्रिक्स की सबसे बड़ी ताकत उसका आकार है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी चुनौती भी यही है।
लगभग आधी दुनिया की आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था के करीब 40 प्रतिशत हिस्से का
प्रतिनिधित्व करने वाले इस समूह में राजनीतिक व्यवस्थाएं, आर्थिक हित और सामरिक
प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं।
रूस और पश्चिम के बीच तनाव है। चीन और अमेरिका के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है।
भारत और चीन के बीच सीमा तथा व्यापार से जुड़े प्रश्न हैं। ईरान और पश्चिम एशिया के
अन्य देशों के बीच गंभीर मतभेद हैं। मौजूदा ईरान युद्ध ने तो ब्रिक्स के भीतर भी कठिन
कूटनीतिक संतुलन की परीक्षा ले ली है। रॉयटर्स के अनुसार इस संकट ने विशेष रूप से ईरान
और संयुक्त अरब अमीरात के बीच मतभेदों को बढ़ाया है। ऐसे में नई दिल्ली की सबसे बड़ी परीक्षा यही है कि वह मतभेदों को दबाए बिना सहमति का रास्ता निकाले।
युद्ध के बीच शांति का संदेश आज दुनिया को सबसे ज्यादा जरूरत युद्धों के विस्तार को रोकने की है। पश्चिम एशिया का संघर्ष ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित कर रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान ने वैश्विक तेल बाजार की चिंता बढ़ा दी है और कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाने
की स्थिति में पहुंची हैं।
भारत के लिए यह केवल विदेश नीति का विषय नहीं है। भारत दुनिया के बड़े ऊर्जा
आयातकों में है। तेल की कीमतों में तेज वृद्धि का असर परिवहन, उद्योग, महंगाई और
आम उपभोक्ता तक पहुंचता है। इसलिए भारत का शांति और संवाद पर जोर सीधे उसके
राष्ट्रीय हित से भी जुड़ा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ बातचीत में भी संघर्षों के समाधान के लिए संवाद और कूटनीति की आवश्यकता पर जोर दिया।
भारत की यही भूमिका उसे अन्य शक्तियों से अलग बनाती है-वह किसी खेमे का पिछलग्गू
बनने के बजाय सभी पक्षों से बात करने की क्षमता रखता है। अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर बड़ा अवसर
ब्रिक्स की चर्चा अक्सर डॉलर और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था के संदर्भ में होती है, लेकिन
भारत के लिए इसका अर्थ इससे कहीं व्यापक है। भारतीय उद्योग के लिए ब्रिक्स बाजार
दवाओं, कृषि उत्पादों, इंजीनियरिंग वस्तुओं, डिजिटल सेवाओं, ऊर्जा, खनिजों और प्रौद्योगिकी
सहयोग के बड़े अवसर खोल सकता है।
नई दिल्ली सम्मेलन में ब्रिक्स स्टार्टअप इनोवेशन फंड, ब्रिक्स इनक्यूबेटर नेटवर्क और
लॉजिस्टिक्स सप्लाई-चेन सहयोग ढांचे जैसी पहलों को आगे बढ़ाने पर भी जोर है।
भारत के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। दुनिया जब आपूर्ति शृंखलाओं को चीन-केंद्रित
निर्भरता से बाहर निकालने और अधिक विविध बनाने की कोशिश कर रही है, तब भारत
विनिर्माण, डिजिटल अर्थव्यवस्था, फार्मा और तकनीकी सेवाओं में बड़ा विकल्प बन सकता है।
ब्रिक्स को घोषणाओं से आगे ले जाने की जरूरत हालांकि किसी भी अंतरराष्ट्रीय संगठन की वास्तविक सफलता घोषणाओं की संख्या से नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाले परिणामों से तय होती है। ब्रिक्स के सामने यही चुनौती है।
यदि यह समूह केवल संयुक्त वक्तव्यों तक सीमित रहा तो उसकी विश्वसनीयता कमजोर
होगी। लेकिन यदि वह सदस्य देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, सुरक्षित भुगतान
प्रणालियों, आपूर्ति शृंखला, ऊर्जा सहयोग, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और डिजिटल तकनीक में
ठोस व्यवस्था खड़ी कर पाया, तो इसकी प्रासंगिकता कई गुना बढ़ सकती है।
इसी संदर्भ में नई दिल्ली से दुनिया को केवल एक और घोषणा नहीं, बल्कि कार्यान्वयन का
रोडमैप चाहिए।
भारत के लिए भी यह अवसर, परीक्षा भी ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत के लिए वैश्विक नेतृत्व का अवसर है, लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी है। भारत को यह साबित करना होगा कि वह केवल अपने आर्थिक हितों का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि वैश्विक दक्षिण की व्यापक आकांक्षाओं का विश्वसनीय प्रवक्ता बन सकता है। विकासशील देशों की मांग स्पष्ट है—वैश्विक संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व, वित्तीय संस्थानों में सुधार, विकास के लिए सुलभ पूंजी, तकनीक तक न्यायपूर्ण पहुंच और ऐसी वैश्विक
व्यापार व्यवस्था जिसमें विकासशील देशों के हितों की अनदेखी न हो। ब्रिक्स इसी असंतुलन को चुनौती देने की कोशिश है। भारत की प्राथमिकता इसलिए किसी नए ध्रुव की स्थापना नहीं, बल्कि बहुध्रुवीय और अधिक न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था का निर्माण होनी चाहिए।
दुनिया की नजर नई दिल्ली पर ब्रिक्स के भीतर मतभेद हैं और उन्हें नजरअंदाज करना भूल होगी। लेकिन मतभेदों के बावजूद संवाद का मंच बचाए रखना ही बहुपक्षवाद की असली परीक्षा है। आज जब दुनिया में संवाद के दरवाजे बंद होने और युद्ध के मोर्चे खुलने का खतरा बढ़ रहा है, तब भारत के
पास एक दुर्लभ अवसर है।
नई दिल्ली यदि ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, व्यापार, तकनीक और शांति के मुद्दों पर
व्यावहारिक सहमति का रास्ता निकाल पाती है, तो ब्रिक्स की भूमिका नई ऊंचाई पर पहुंच
सकती है। दुनिया भारत से किसी चमत्कार की अपेक्षा नहीं कर रही। अपेक्षा इससे कहीं अधिक
व्यावहारिक है—भारत मतभेदों के बीच संवाद, प्रतिस्पर्धा के बीच सहयोग और संकट के बीच
समाधान का रास्ता दिखाए।
यही भारत की सभ्यतागत शक्ति भी है और आज की कूटनीतिक आवश्यकता भी।
ब्रिक्स का दिल्ली सम्मेलन इसलिए केवल राष्ट्राध्यक्षों की बैठक नहीं है। यह उस बदलती
दुनिया का आईना है जिसमें वैश्विक दक्षिण अब दर्शक बनकर नहीं रहना चाहता। और इस
नई आकांक्षा की अगुवाई करने के लिए दुनिया की निगाहें आज भारत पर हैं।
नई दिल्ली के पास अवसर है कि वह ब्रिक्स को केवल ‘बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का समूह’ नहीं,
बल्कि ‘बड़ी समस्याओं के समाधान का मंच’ बनाने की दिशा में निर्णायक कदम उठाए।
(डॉ० सिंह, भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद, शिक्षा मंत्रालय,
भारत सरकार, नई दिल्ली से सम्बद्ध हैं)

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