दिल्ली। दोपहर के कनाट प्लेस में ऐसी सन्नाटा छाया था जैसे किसी ने प्रदर्शनकारियों को आज छुट्टी’ का संदेश भेज दिया हो। मैदान खाली और पुलिस वाले एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा रहे थे-काम नहीं था तो दो-चार कैमरेवालों को पकड़कर डिटेन कर लिया, ताकि शाम को साहब हिसाब मांगे तो कह सके: “आज चार पकड़े, साहब?”
प्रदर्शनकारी कहाँ गए? सब नेहा बोरा के पीछे आरके आश्रम की तरफ निकल गए। मैदान में एक प्रदर्शनकारी पर तीन पत्रकार का हिसाब था। जैसे ही पुलिस किसी को उठाती, चालीस कैमरे वाले दौड़ पड़ते। दृश्य रोमांचक था-जैसे जमीन से रिपोर्टिंग नहीं, बल्कि किसी को पकड़ने का वीडियो बनाना मकसद हो।
उधर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आशुतोष रांका, रत्ना सिंह और सौरभ दास की प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकारों की भीड़ लगी हुई थी। सारे कॉकरोच-समर्थक पत्रकार वहाँ जमा थे। कनाट प्लेस इसलिए सुना-सुना था क्योंकि असली ‘कवरेज’ प्रेस क्लब में हो रहा था। जो आज डिटेन हुए, वे पत्रकार नहीं, एक्टिविस्ट थे।
जिनकी रिपोर्टिंग से पता चलता है कि वे पत्रकार हैं। जैसे कॉमरेड श्रीनिवासन जैन। उनके आस-पास के दो-चार उठ गए, जैन को किसी ने हाथ नहीं लगाया। अजीत अंजुम के साथ वालों को सुरक्षा नहीं मिली, लेकिन जब सीपी में दो दिन पहले उनके पीटने की नौबत आई तो सुरक्षा बलों ने बचा लिया। यह बात उन्होंने किसी वीडियो में नहीं बताई।
और सबसे मजेदार बात। आज के प्रेस कांफ्रेन्स में सारे गांधी परिवार के दरबारियों को न्योता था। वहां एक भी पत्रकार में इतनी हिम्मत नहीं थी कि सौरव दास से उनकी कंपनी ‘क्लाइमेट एक्शन फ्रंट’ और उनकी विदेशी फंडिंग के बारे में पूछे। प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवालों की बारिश हो रही थी, लेकिन सारे सवाल पीएम मोदी से वहां मौजूद लोगों की नफरत को और अधिक प्रामाणिक बना रहा था। लेकिन जिसे सवाल कहते हैं। जिन्हें किसी भी पत्रकार को पूछना चाहिए। वह सवाल वहां नहीं था।
जो कन्टेंट क्रिएटर खुद इस कथित आंदोलन के beneficiary हैं। वह क्यों सवाल पूछेंगे। वे तो अपना अगला assignment पूछने के लिए वहां इकट्ठे हुए होंगे।
कनाट प्लेस खाली था, प्रेस क्लब भरा था, और आज असली सवाल अभी भी हवा में लटका हुआ था।



