चंपत राय का सच

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विष्णु शर्मादिल्ली। एक बार गांधी जी के सामने एक अनोखा मामला आया, मोतीलाल नेहरू लेकर आए. गांधीजी को उन्होंने बताया कि ढाका के नवाब के एक रिश्तेदार को अपने अखबार का संपादक बनाया गया था, लेकिन उसने अपने से आधी उम्र की मेरी बेटी सरूप को अपने मोह जाल में जकड़ किया है. आप ही बचा सकते हैं. मुस्लिम घर में बेटी नहीं ब्याह सकता. कुछ लोग दावा करते हैं कि दोनों का निकाह हो गया था. गांधीजी ने दो काम किए, पहले तो बेटी को अपने आश्रम में बुला लिया और दूसरे उस व्यक्ति को किसी भी तरह दवाब में लाकर खिलाफत आंदोलन के प्रतिनिधि मंडल में लंदन भेजकर आने से रुकवा दिया, भगवान जाने कैसे? ऐसे एक प्रेमी जोड़ा बिछड़ गया, नेहरू परिवार लव जेहाद से बच गया और बेटी सरूप का नाम विजय लक्ष्मी पंडित रखकर रंजीत पंडित से शादी करवा दी गई. पंडित जी गुजरात के राजकोट के ही रहने वाले थे, जहाँ गांधी जी पले बढ़े.

कहानी में बड़ा बदलाव तब आया जब रंजीत पंडित 1944 में गुज़र गए और देश आजाद होता देख संपादक जी फिर से भारत वापस आ गए. सरकार की कमान नेहरूजी के पास आजादी से पहले ही आ गई थो. आजादी के बाद नेहरूजी को उनका इलाज करना था तो बहन और उनके प्रेमी दोनों को अलग अलग देशों का राजदूत बनाकर भेज दिया. अब अपने देशों में मिलो या तीसरे में, लेकिन भारत से दूर रहो.

क्या गांधी जी का प्रेमी जोड़े को अलग करना नैतिक या कानूनी रूप से ठीक था? पटेल की जगह नेहरू को चुनने जैसे कई उनके निर्णय ऐसे ही विवादित रहे हैं. ऐसे ही ध्वज समिति की पसंद भगवा होने के बावजूद तिरंगा चुनना भी गांधीजी की जिद थी और उसपर ये कहकर कि अंग्रेज़ स्वेच्छा से भारत छोड़कर जा रहे हैं तो उनका झंडा यूनियन जैक तिरंगे के कोने पर हो, ये चूक की पराकाष्ठा थी. हालांकि जल्द मरने जा रहे जिन्ना को पीएम बनाने के उनके सुझाव पर नेहरू ने टाँग ना अड़ाई होती तो देश का विभाजन रुक जाता. क्या होता? जिन्ना पीएम और कैबिनेट आपके नेताओं का. एक भी ग़लत फ़ैसला नहीं लेने देते.
कई बार ये निर्णय आपके किसी व्यक्ति से करीबियों के चलते भी प्रभावित होते हैं. नेहरू जी ने भी ऐसे तमाम निर्णय लिए, ये क्या घर की खेती थी कि किसी को भी राजदूत बनाकर कहीं भी भेज दिया? जबकि उनकी बहन ने तो किसी स्कूल तक से औपचारिक शिक्षा तक नहीं ली थी. और भी सैकड़ों केस हैं उनके ऐसे निर्णयों के. याद रखिए उनके ख़ुद के बहनोई ने उनके नाम मीडिया में खुला पत्र लिखा था, जवाहर लाल इस देश का सबसे बड़ा nepotist है. (मेरी किताब में पढ़िये)

इंदिरा गांधी तो गलतियों का ख़ज़ाना थीं, उनका बेटा संजय लड़कपन में एक कर्नल की कार चुराकर भागता है, कार डिवाइडर पर चढ़ जाती है. केस पीएम हाउस पहुंचता है और रातों रात संजय फ्लाइट से लंदन, कहा यहाँ था ही नहीं और रातों रात कार की जगह बाइक हो जाती है और चोरी का तो कोई केस ही नहीं बना. आप देश के प्रधानमंत्री से ऐसी उम्मीद कर सकते हैं. महाराष्ट्र में एक बिज़नेस मेन ने एक फाइव स्टार होटल खोलने की अनुमति मांगी तो सीएम ए आर अंतुले ने कहा इंदिरा प्रतिष्ठान ट्रस्ट में 5 करोड़ सहयोग राशि जमा कर दो. सीधे पीएम देखती हैं. बिज़नेस मेन अरुण शौरी का दोस्त था. इंदिरा गांधी ने अपना पल्ला झाड़ लिया लेकिन अरुण शौरी ने इंदिरा गांधी के उस ट्रस्ट के पेपर को साइन करने का फोटो छाप दिया.

ऐसे में वित्त मंत्री केआर नारायणन को आगे किया गया. उन्होंने झूठ तक बोला. बाद में उनको राष्ट्रपति बना दिया गया. बावजूद इसके उन्होंने कोई इस्तीफ़ा नहीं दिया, ना माफ़ी माँगी.

माफ़ी तो बोफोर्स कांड के बाद राजीव गांधी ने भी नहीं माँगी, उल्टा बिग बी को फँसा दिया. मुलायम ने ख़ुद माना था कि हमने बोफोर्स की फाइल रक्षा मंत्री रहते ग़ायब करवा दी. ना कभी इंदिरा ने शिकवा किया, ना राजीव ने और ना मुलायम सिंह ने.  कितना बड़ा अपराध था कि अमेरिका में बॉम्ब फोड़ने के आरोप में बंद राजीव गांधी के दोस्त के बदले एंडरसन को छोड़ दिया गया. सबके कार्यकाल में ऐसे अपराधों, भयंकर चूकों और घोटालों को लिस्ट लंबी है . यहाँ जगह नहीं उन सबके बारे में लिखने की.

लेकिन ऐसे निर्णयों को उनकी पार्टी के नेता परिस्थिति जन्य त्वरित निर्णय या ‘एरर ऑफ़ जजमेंट’ कहकर टाल देते हैं. ऐसे में दुख तब होता है जब जिंदगी राम के नाम होम कर देने वाले प्रोफेसर रहे चंपत राय से एक ऐसा ही एरर ऑफ़ जजमेंट हुआ तो चिरकुट से लोग आकर उनके और टिन्नू के बीच सेक्सुअल रिश्तों के आरोप लगाने लगे. हज़ारों ऋषि मुनि विवाह नहीं करते थे तो क्या उन सबके बारे में आपकी यही सोच है? है तो बड़ी वीभत्स है.
ये एरर ऑफ़ जजमेंट ही तो था कि उन्होंने कुछ लोगों पर भरोसा किया और ये भी कि चोरी पकड़े जाने के बाद, पुलिस की मदद लेने के बावजूद FIR नहीं करवाई. उनको लगा कि राम का ये पावन धाम इन चोरों की वजह से बदनाम हो जाएगा. मेरे पास ऐसे १००० केस तो होंगे ही जो देश भर की सर्वोच्च हस्तियों से जुड़े हैं, जहाँ उन्होंने इस तरह की ग़लतियाँ की हैं. मैंने इस केस की पड़ताल की तो पाया MoU में साफ़ लिखा है कि गणना बैंक की ज़िम्मेदारी थी, पकड़े गए सभी कर्मचारी (टिन्नू के अलावा) बैंक से pay ले रहे थे. काउंटिंग भी मंदिर के मुख्य भाग के बजाय गेट नंबर १ के पास एक सुविधा केंद्र के बेसमेंट में बैंक का गणना कक्ष में होती थी. सीसीटीवी की जिम्मेदारी भी पुलिस की थी, ट्रस्ट की नहीं. उनकी जिम्मेदारी बस एक आदमी को वाहन सहायता के लिए रखने और बॉक्स पर दो तालों में से एक पर ताला लगाने खोलने की थी. गणना भी हाथ से नहीं बल्कि मशीन से होती थी. कर्मचारियों का काम बस मुड़े नोटों को सीधा कर मशीन में डालना भर होता था.

ऐसे में चंपत राय की ये गलती थी कि उन्होंने हर बात अपने या ट्रस्ट के सर ले ली, सीधे कह देते कि बैंक से पूछिए. यहाँ तक कि लोगों ने जब अपने अपने दान किए सामानों के बारे में पूछा तो उनका जवाब लेट था, उनको अंदाज़ ही नहीं था कि इसका मतलब क्या होगा? हर कोई ऐरा सच मानकर वीडियो बनाता रहेगा.

जबकि सच ये था कि SIT वाले रजिस्टर ही उठा ले गए थे, सारे समान की लिस्ट और कहाँ रखा है या जमा है, उसकी जानकारी भी उसी में थी. तो उनको ढूँढ ढूँढ कर दिखाया गया. यहीं ट्रस्ट के पास कोई सुधांशु त्रिवेदी या संबित पात्रा जैसा प्रवक्ता होता तो सबको अपने जवाबों से शांत कर देता. मंदिर निर्माण में कमीशन के भी आरोप लगे, मंदिर निर्माण का जिम्मा एल एंड टी के सर था, जो देश भर में मेट्रो का जाल बिछा रही है. इसके रोजमर्रा के काम का भी ट्रस्ट से कोई लेना देना नहीं, पीएम के FIR ना करवाने के अलावा जो बड़ी गलती है वो ये कि बैंक या एल एंड टी ने कुछ बंदे मांगे तो जो लोग उनसे नौकरी माँगते रहते थे, अयोध्या के दौरान जो संपर्क में आए थे उनको बढ़ा दिया. उन्हीं में से एक मुख्य अभियुक्त अनुकल्प मिश्रा था. अनुकल्प और उसके लाये 5 साथियों को बैंक ने कुंभ मेले की व्यस्तता में बैंक ने अस्थायी तौर पर रख लिया. इसलिए टिन्नू पर भी अभी कोई बड़ी बरामदगी या उसके ख़िलाफ़ सुबूत नहीं मिला. इन गिरफ्तार लोगों में वो अकेला ट्रस्ट का कर्मचारी है. लेकिन किसी ने भी चंपत राय, अनिल मिश्रा या गोविंद गिरी जी का नाम गैंग में नहीं लिया.
ऐसे में निजी क्षेत्र में सारी नौकरियां ही सिफारिश पर मिलती हैं, मेरी तो सारी ही क्योंकि न्यूज़ चैनल्स, अख़बारों में कभी कभी ही विज्ञापन निकलते या टेस्ट होते हैं और मैंने दिग्विजय सिंह तक का हाथ से लिखा हुआ सिफ़ारिशी पत्र देखा है. और FIR ना करवाना अगर अपराध है तो मैंने मीडिया चैनल्स में यौन शोषण के आरोपियों तक को दोबारा नौकरी पर रखते देखा है, ऐसे कई केस सारे मीडिया वालों को पता है. ना जाने कितने भ्रष्ट पत्रकार एचआर ने पकड़े, उनको वार्निंग देकर नौकरी से निकाला गया बस, जेल नहीं भेजा गया. हाल ही में एक चैनल में एचआर वाले भी फरजीवाड़े में पकड़े गए लेकिन किसी थाने में FIR नहीं. लेकिन वही लोग अब इस मुद्दे को उछालें तो दिलचस्प तो लगता ही है, हालांकि  मेरा मानना है कि चंपत राय जी को नैतिक जिम्मेदारी तो इस केस की लेनी ही चाहिए.

लेकिन असली कहानी तो चंपत राय के बहाने योगी, मोदी तक को निपटाने की है. सनातनियों के बीच संघ की छवि ख़राब करने की है. इसलिए ‘बिलो द बेल्ट’ वार करने में भी गुरेज नहीं. इसलिए पुराना ज़मीन ख़रीद का मुद्दा भी निकाला गया, जबकि उस मामले पर कई बार कागजों के साथ स्थिति स्पष्ट की जा चुकी है कि हर ख़रीद पारदर्शिता से हुई है. बहती गंगा में हाथ धोने के लिए कुछ वो लोग भी मैदान में उतर गए जो आजकल संघ परिवार में साइड लाइन हैं.  और वो लोग भी जो ट्रस्ट में जगह पाकर अपनी हैसियत और बढ़ाना चाहते हैं.

हो सकता है चंपत राय में लोगों को थोड़ा बहुत अहंकार दिखता हो, लेकिन किसी भी पद पर बैठा व्यक्ति सबके मन की तो नहीं कर सकता, सो किसी को भी मना करने अहंकार जैसे आरोपों को न्योता देता है.  लेकिन मुझे नहीं लगता कि चंपत राय किसी भी तरह की चोरी या स्कैम में शामिल हैं. अमिताभ बच्चन भी सात साल बाद बोफोर्स घोटाले से बरी हुए थे. ऐसे में  जबरन मीडिया ट्रायल केवल तर्क कुतर्कों के आधार पर चलाने से व्यूज़ तो आ सकते हैं, लेकिन आपकी विश्वसनीय पर सवाल भी उठाते हैं. लेकिन जिम्मेदारीपूर्ण संघ व ट्रस्ट की भी है कि जो सवाल उनकी विश्वसनीय को लेकर उठ गए हैं, उनसे भी निपटे.

(जाहिर है ये मैंने SIT रिपोर्ट आने से पहले लिखा है, रिपोर्ट आने के बाद काफ़ी कुछ स्पष्ट होगा)

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