एसीवाईपीएल, सीआईए और प्रधानमंत्री मोदी

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डॉ पवन विजय

दिल्ली । पिछले दो हफ्तों से एक तस्वीर वायरल है। साल 1993, एक युवा भारतीय नेता अमेरिका में खड़ा है। तस्वीर पर लिखा है – एसीवाईपीएल। और नीचे कैप्शन – “सबूत मिल गया, प्रधानमंत्री सीआईए एजेंट हैं।”

हमने 10 दिन इस दावे के दस्तावेज खंगाले।एसीवाईपीएल की वेबसाइट, फॉर्म 990, ट्रंप का बयान, अलुमनाई लिस्ट। जो तथ्य सामने आया उसे आप सभी देखिए।

1. एसीवाईपीएल मतलब अमेरिकन काउंसिल ऑफ यंग पॉलिटिकल लीडर्स। 1966 में बना एक ओपन यूथ एक्सचेंज प्रोग्राम जिसका काम – दुनिया के 25 से 40 साल के युवा नेताओं को दो हफ्ते अमेरिका घुमाना, अमेरिकी सिस्टम दिखाना।

इसकी पूरी जानकारी पब्लिक है। इसकी वेबसाइट: http://acypl.org है, इसका सीईओ लिब्बी रोजेनबॉम है और चेयरमैन का नाम जोसेफ जोन्स है। इसका 2023 बजट में 31 लाख डॉलर, यानी 26 करोड़ रुपये था जिससे दिल्ली में अक्षरधाम खेलगांव के आप केवल चार अपार्टमेंट खरीद सकते हैं। इसका स्पॉन्सर वॉलमार्ट, अमेजन, फाइजर, यूएस स्टेट डिपार्टमेंट है।

सीआईए अपना बजट, बोर्ड और स्पॉन्सर वेबसाइट पर नहीं डालती।

जोसेफ जोन्स कौन हैं? कोई जनरल नहीं, कोई जासूस नहीं। आयोवा के एक कम्युनिटी ऑर्गनाइजर हैं। ग्रेटर डेस मोइनेस पार्टनरशिप में सीनियर वाइस प्रेसिडेंट रहे, फिर यूनाइटेड वे ऑफ सेंट्रल आयोवा जैसे नॉन-प्रॉफिट में काम किया। पॉडकास्ट में खुद बताते हैं – 8 साल की उम्र में लिफाफे बांट कर करियर शुरू किया। भाषणों का टॉपिक सिर्फ तीन है – यूथ लीडरशिप, पड़ोसियों से बात करो, संवाद करो।

अगर ये सीआईए का फ्रंट होता, तो इसका चेयर एक रिटायर्ड जनरल होता, न कि एक चैरिटी में पैसा जुटाने वाला आदमी।

2. बीजेपी ने अकेले मोदी को नहीं भेजा था। 1993 वाला प्रोग्राम 10 जुलाई से 23 जुलाई 1993 तक चला था। उसमें अमेरिकी विदेश विभाग और एसीवाईपीएल ने भारत से एक सर्वदलीय डेलिगेशन बुलाया था। नरेंद्र मोदी उसमें बीजेपी के एक कार्यकर्ता के तौर पर बाजपेई जी द्वारा भेजे गए थे, तब उनका कोई बड़ा पद नहीं था।

एसीवाईपीएल हर साल 5-6 भारतीय नेताओं का मिक्स बैच बुलाता है – बीजेपी, कांग्रेस, क्षेत्रीय दल सब मिलाकर। इसी पैटर्न से 2018 में भी अमेरिकी डेलिगेशन इंडिया आया था, जिसमें डेमोक्रेट और रिपब्लिकन दोनों थे।

1993 में मोदी के साथ उसी बैच में और कौन भारतीय थे, इसकी पूरी ऑफिशियल लिस्ट एसीवाईपीएल ने कभी पब्लिक नहीं की है। वो एक प्राइवेट नॉन-प्रॉफिट है, आरटीआई में भी नहीं आती।

उसी ट्रिप में मोदी वाशिंगटन डीसी में विश्व हिंदू परिषद के स्वामी विवेकानंद शताब्दी समारोह में भी शामिल हुए थे, जहां 15-20 हजार लोग आए थे। उनके साथ रहे आरएसएस प्रचारक हसमुख पटेल ने बताया कि मोदी ने वहां यूथ कॉन्फ्रेंस ऑर्गनाइज किया था।

3. क्या एसीवाईपीएल ने किसी देश को कंट्रोल किया?

इसका उत्तर है एक भी नहीं।

कंट्रोल के लिए तीन चीजें चाहिए – कर्ज, हथियार, तेल। एसीवाईपीएल के पास इनमें से कुछ नहीं है। 26 करोड़ के बजट से देश कंट्रोल नहीं होते।

एसीवाईपीएल 1966 से अब तक 100 देशों के 8000 से ज्यादा नेताओं को बुला चुका है। फिलिस्तीन को भी, चीन को भी, पाकिस्तान को भी, क्यूबा को भी।

क्या फिलिस्तीन अमेरिका से कंट्रोल है? नहीं। क्या चीन अमेरिका से कंट्रोल है? नहीं।

भारत से ही 120 से ज्यादा नेता गए हैं। भाजपा से अरुण जेटली, स्मृति ईरानी, रोहित चहल, प्रज्वल बुस्ता। बीजेडी से सस्मित पात्रा, जिनका सर्टिफिकेट 2020 का पब्लिक है।

अगर एसीवाईपीएल में जाना सीआईए का एजेंट होना है, तो भारत समेत विश्व की पूरी पॉलिटिकल लीडरशिप अमेरिका की एजेंट है।

4. अलुमनाई में कौन है? वामपंथी भी, दक्षिणपंथी भी।

एसीवाईपीएल की ऑफिशियल लिस्ट http://acypl.org/notable-alumni पर देखिए।

वामपंथी / डेमोक्रेट में – जेनेट मिल्स, गवर्नर मेन। जेबी प्रित्जकर, गवर्नर इलिनोइस। एंड्रिया कैंपबेल, अटॉर्नी जनरल मेसाचुसेट्स। एरोन फोर्ड, अटॉर्नी जनरल नेवादा, जो इंडिया 2018 में आए थे।

दक्षिणपंथी / रिपब्लिकन में – किम रेनॉल्ड्स, गवर्नर आयोवा, ट्रंप की करीबी। टॉड रोकिता, अटॉर्नी जनरल इंडियाना। ट्रे हर्गेट, सेक्रेटरी ऑफ स्टेट टेनेसी।

अगर ये सीआईए का प्रोग्राम होता, तो सीआईए एक ही फ्लाइट में ट्रंप समर्थक और बर्नी समर्थक को क्यों बिठाती?

5. तो क्या प्रधानमंत्री अमेरिका से नियंत्रित हैं? अमेरिका क्या कहता है इस संदर्भ में यह जानना महत्वपूर्ण है।

20 जून 2026 को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक्सियोस को कहा –

“मुझे लगता है मोदी बहुत अच्छे हैं। वो युद्धों से दूर रहते हैं, जो समझदारी है। वो 1.5 अरब लोगों के नेता हैं। वो वास्तव में सबसे बड़े हैं। भारत वास्तव में सबसे बड़ा है। और मोदी एक महान नेता हैं।”

“हम उनके साथ बहुत व्यापार करते हैं, लेकिन अब हम बराबरी का व्यापार करते हैं। वो पहले हमें बहुत लूटते थे।”

“वो युद्धों से दूर रहते हैं” – अमेरिका चाहता था भारत रूस पर बैन लगाए। प्रधानमंत्री ने तेल 1 परसेंट से 40 परसेंट कर दिया। ये एजेंट का काम नहीं है।

ट्रंप ने उन्हें टफ कुकी कहा। एजेंट को टफ नहीं, आज्ञाकारी कहा जाता है।

अंतिम बात

अमेरिका का प्रभाव थिंक टैंक, फंडिंग, एफसीआरए के जरिए होता है, एक 1993 की फोटो से नहीं।

आप मोदी से सहमत हों, असहमत हों चलेगा लेकिन मोदी को देशद्रोही बताना आपका उन शक्तियों के प्रभाव। में आना माना जाएगा जिन्होंने मोदी को 2002 से आजतक घृणा का पात्र बताया, हिंदुत्व का जहरीला पोस्टर बॉय बताया और जाने क्या क्या कहा, जो सत्ता में मोदी को एक पल नहीं देखना चाहते।

मोदी को सीआईए का एजेंट बताना यह सिद्ध करता है कि जिन शक्तियों से मोदी लड़ते रहे, उन शक्तियों ने अब मोदी से सीधा लड़ना छोड़ मोदी के पूर्व समर्थकों की ढाल लेकर लड़ने की रणनीति पर काम करने लगी हैं। यह रणनीति काफी कारगर है। मुखौटा बदलने में वामपंथी माहिर होते हैं।

अब मुखौटा मोदी समर्थक का है। इससे पार पाना बहुत मुश्किल प्रतीत होता है क्योंकि सच और झूठ के बीच की लाइन धुंधली करने में वामपंथी सफल हो रहे हैं।

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