कॉकरोच आशुतोष रांका, साधन की शुचिता के बिना गांधी का नाम केवल नारा है

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दिल्ली। गांधी का नाम दशकों से राजनीतिक उत्तराधिकार का विषय रहा है, पर उनकी विचारधारा पर किसी एक धारा का पक्का दावा अब तक बन नहीं पाया है। कांग्रेस गांधी सरनेम का इस्तेमाल जनता को भ्रमित करने के लिए करती रही। गांधी परिवार का फिरोज जहांगीर के परिवार से कोई रिश्ता नहीं रहा। अब तक वह पेपर सार्वजनिक भी नहीं की गई, जिसमें यह बात लिखी हो कि फिरोज जहांगीर के परिवार का सरनेम जहांगीर से गांधी होगा। विचारधारा के नाम पर दूसरी पार्टी आम आदमी पार्टी ने तीन बंदरों को उठा लिया लेकिन उसके संदेश पर कभी अमल नहीं किया। अन्ना आंदोलन जब अरविन्द केजरीवाल पार्टी बनी तो उसने इन तीन बंदरों के संदेश को हमेशा उलटा ही पढ़ा और उसे उलटकर ही अमल में लाया।
आम आदमी पार्टी के नेताओं ने ही अन्ना हजारे को दूसरा गांधी बताकर प्रचारित किया था, और अब उनमें से ही एक आशुतोष रांका कॉकरोच जनता पार्टी का प्रतिनिधित्व करते हुए गांधी शांति प्रतिष्ठान पहुंच गए भाषण देने। तीन अक्टूबर को प्रतिष्ठान की व्याख्यानमाला में आशुतोष रांका का ‘जेनजी के गांधी’ विषय पर बोलने के लिए जाना, गांधी की विचारधारा पर दावे की पहल जैसा ही था। मंच से आशुतोष ने एक तरफ सोनम वांगचुक को तीसरा और अभिजीत दीपके को चौथा गांधी साबित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। दूसरी तरफ गांधीवाद का चोला ओढ़ने के प्रयास में वे गांधीवादियों के बीच कॉकरोच की ब्रांडिंग करने में भी सफल रहे।
इस ब्रांडिंग की जड़ 15 मई 2026 की सुप्रीम कोर्ट की मौखिक टिप्पणी में है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने एक याचिका की सुनवाई में उन लोगों की तुलना कॉकरोच और परजीवियों से की थी, जो रोजगार या पेशे में जगह न पाकर मीडिया, सोशल मीडिया या आरटीआई कार्यकर्ता बनकर व्यवस्था पर हमला करते हैं। अगले दिन उन्होंने स्पष्ट किया कि टिप्पणी फर्जी या बोगस डिग्री लेकर पेशे में घुसे लोगों के बारे में थी, युवाओं की सामान्य आलोचना नहीं। फिर भी उसी शब्द को राजनीतिक पहचान बना लिया गया और अब उसे आशुतोष रांका पीटरमैरिट्जबर्ग की घटना से जोड़ रहे हैं। जहां वैध टिकट के बावजूद नस्लीय अपमान सहकर गांधी ने कानून के भीतर सत्य और अहिंसा का रास्ता चुना था। मौखिक टिप्पणी को उत्पीड़न का प्रमाण बनाना और उससे ‘सत्य के लिए लड़ाई’ का दावा करना दोनों घटनाओं को एक कर देता है, जबकि संदर्भ बिल्कुल अलग हैं। जो कॉकरोच की मंशा पर संदेह पैदा करता है।
गांधी साधन और साध्य की एकता पर जीवन भर अड़े रहे। उन्होंने कहा कि अन्यायपूर्ण साधन से न्यायपूर्ण साध्य नहीं निकलता। सत्याग्रह में सूचना, खुला संवाद और स्वयं पर अनुशासन अनिवार्य थे। कॉकरोच आशुतोष रांका जो जीपीएफ में गांधी और कॉकरोच के बीच साम्य तलाश रहे थे, उन्हें समझना चाहिए कि भीड़ बढ़े तो नेता उसे संभाले, न कि भीड़ नेता को। अनुमति न मांगने की बात गांधी नागरिक अवज्ञा के नैतिक दायरे में कहते थे, जहां गिरफ्तारी स्वीकार करना, हिंसा से दूर रहना और अपने आचरण की जवाबदेही लेना शर्त थी। पारदर्शिता उनके लिए नारा नहीं, रोजमर्रा का नियम था।
जो भीड़ ‘कॉकरोच’ नाम से जुट रही है, उसमें ये शर्तें नहीं दिखतीं। जंतर मंतर पर नेता बढ़ती भीड़ को अनुशासित नहीं रख पाए। प्रदर्शनकारी अराजक झुंड में बदल गए। सरकार को सूचना देने लेकिन अनुमति न लेने की घोषणा सत्याग्रह नहीं, अवज्ञा का ‘शॉर्टकट’ है। जब अनुशासन टूटता है, हिंसा या अव्यवस्था की आशंका बनती है और प्रतीकों की होड़ चलती है, तब उसे गांधी मार्ग कहना हास्यास्पद है। गांधीवाद भीड़ का ब्रांड नहीं, साधन की शुचिता और आत्मसंयम का नाम है। नाम और व्याख्यान से वह दावा पक्का नहीं होता।

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