दिल्ली । इंदिरा गांधी ने असंवैधानिक रूप से भी सत्ता में बने रहने के लिए ही इमरजेंसी लगाई थी। यह बात करोड़ों लोगों को पता है। अतः यह सबक नहीं कहा जा सकता। इंदिरा गांधी ने अपने स्वार्थ के लिए इमरजेंसी लगाई और संविधान उनके लिए खिलवाड़ की वस्तु थी, यह जानकारी बार-बार देना कोई सबक सीखना या सबक बताना या सबक लेना नहीं कहा जा सकता।
सबक है इमरजेंसी का दुरुपयोग कर राज्य की लोकतांत्रिक संरचना बदलकर उसे socialism नामक बर्बर पैशाचिक मतवाद से नियंत्रित राज्य बना देना और लोक जीवन विशेषतः हिन्दू जीवन को मतवाद नियंत्रित धर्म शून्य बनाने का योजना बद्ध कार्य। वह अभी तक जारी है। इस सबक को सीख कर यह आवश्यक था कि भारत के लोकतंत्र को संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य पुनः बनाया जाए जैसा संविधान में प्रतिज्ञा की गई थी। परंतु ऐसा कुछ नहीं किया गया इसका अर्थ है कि वस्तुत : कोई सबक नहीं लिया गया।
कोई सबक नहीं लिया गया क्योंकि यह पैशाचिक मॉडल हर नए शासक को भाता है। अनन्त अधिकार जो देता है।
देश बहुत बड़ा है इसमें भांति 2 के प्रतिभाशाली और मेधावी ,त्यागी और तपस्वी, चिंतनशील और मननशील लोग हैं।
अतः किसी भी महत्वपूर्ण विषय पर विविध मत होना सहज स्वाभाविक है। उनमें परस्पर आमने-सामने संवाद होने पर शायद कुछ सामान्य बातें स्पष्ट हो सके।
कल इमरजेंसी के सबक पर कई जगह गोष्ठियां हुई ।
दिल्ली में भी एक बड़ी गोष्ठी हुई।
उसमें क्या सबक बताए गए यह अभी तक रिपोर्टिंग में पढ़ने को नहीं मिला है।
जहां तक मेरा अध्ययन और अनुभव है और मैं स्वयं संपूर्ण क्रांति आंदोलन में अधिकृत रूप से सक्रिय था ।मेरे पास दायित्व भी था। छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का मैं प्रांतीय कार्यकारिणी सदस्य था। वर्तमान में उच्च न्यायालय में कार्यरत एक माननीय न्यायाधीश उस समय हमारे प्रांतीय संयोजक थे।
जयप्रकाश नारायण जी से हमारा निजी आत्मीय संबंध था और उन्होंने जनता पार्टी के समय में स्वयं हमारा लेख अपने द्वारा संपादित पत्रिका समग्रता में छापा था जो कि मधु लिमए आदि के पार्टी तोड़क प्रयास के विरुद्ध बहुत कड़ा लेख था। उन्होंने स्वयं वह लेख छापने कुमार प्रशांत जी से कहा यह कुमार प्रशांत जी ने मुझे बताया था।
अतः अपने अधिकृत अनुभवों और विस्तृत अध्ययन के आधार पर मेरा सुचिंतित मत है कि इमरजेंसी से उन लोगों ने कोई सबक नहीं लिया जिन्होंने इमरजेंसी में पीड़ा सही, कष्ट सह कर अविचलित रहे।जो जेल गए तथा सताए गए।
उनकी पीड़ा तपस्या का ही एक रूप थी इसलिए वह पीड़ा सम्मान के योग्य है परंतु उससे कोई सबक उन्होंने नहीं लिया ।
क्योंकि एकमात्र सबक जो लेने योग्य था वह था भारत के राज्य को पहले की तरह संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य पुनः बना देना।
इंदिरा गांधी ने इसे सोशलिस्ट बनाकर लोकतंत्र की हत्या की थी। साथ ही शरारतन सेक्यूलर शब्द जोड़ा जो ईसाइयत से जुड़ा शब्द है जबकि भारत ईसाई नेशन स्टेट नहीं है।
उन शब्दों को न हटाने का अर्थ है कि पीड़ित लोगों ने शासक बनने पर उत्पीड़क लोगों को अपना आदर्श माना और यह पाप पूर्ण संशोधन जारी रखा क्योंकि इसके कारण ही वे हिंदू धर्म का दमन जारी रख सकते हैं। हिंदू मंदिरों पर अपना कब्जा बनाए रख सकते हैं।
हिंदू धर्म के व्यवस्थित दमन करने के लिए और उसके द्वारा हिंदू समाज को धीरे-धीरे एक नास्तिक भीड़ में रूपांतरित करने के लिए ही सोशलिस्ट शब्द जोड़ा गया था और सेकुलर भी इसी के लिए जोड़ा गया था।
अतः उन दोनों शब्दों को जारी रखने का अर्थ है इंदिरा गांधी इन पीड़ित लोगों को बहुत ही अनुकरण योग्य शासक लगी और बाद में अपनी सत्ता पाने के बाद उन्हें उनका ही अनुकरण आदर्श लगा है ।
इसलिए इमरजेंसी पर चर्चा में केवल उनके अन्याय और अपने शोषण का वर्णन तो कोई सबक सीखने जैसी बात नहीं।
अगर कोई सबक सीख जाएगा तो उस पाप पूर्ण संशोधन को सर्वप्रथम बदला जाएगा जिसने भारत के लोकतंत्र को हिंदू धर्म का विरोधी बना दिया और हिंदू समाज को धीरे-धीरे नास्तिक भीड़ बनाने की दिशा में जिसमें प्रावधान समाहित किए गए ।
वे प्रावधान यथावत जारी हैं और मोदी जी भी उन प्रावधानों का सम्यक उपयोग कर रहे हैं ।
अतः स्पष्ट है कि इमरजेंसी से कोई सबक किसी ने नहीं लिया है।
इमरजेंसी में बहुत से लोगों ने बहुत कष्ट सहा यह उनकी तपस्या थी। यह सत्य है ।
सबक तो किसी ने नहीं लिया।
Post Views: 8