यह पूरा कॉन्टेक्स्ट बिल्कुल रडार पर सेट है। ज़रा इस नई ‘प्रोग्रेसिव रावण’ वाली बकैती का 4K में तथ्यात्मक और क्लासिक पोस्टमार्टम देखिए:
रावण या लंका का कार्ल मार्क्स?:फिल्म की शुरुआत ही देखिए देवता और राक्षस सत्ता के लिए लड़ रहे थे, कुबेर को एक मोटा, आलसी पूंजीपति दिखा दिया जिसने राक्षसों को बंधुआ मजदूर बना रखा था और उन्हें दाने-दाने को मोहताज कर दिया! जबकि पौराणिक तथ्य यह है कि पाताल और लंका स्वर्ण और संपदा से परिपूर्ण थे, और कुबेर से लंका रावण ने अपने अहंकार और बल के दम पर छीनी थी। लेकिन इन निर्देशकों ने रावण को सीधा मजदूर वर्ग का नेता बना दिया जो कहता है “सबको महल मिलेगा, सब वही खाएंगे जो मैं खाऊंगा”
यह रामायण बना रहे हैं या सोवियत संघ की स्थापना का प्रोपेगैंडा वीडियो?
रॉकी भाई की माँ का लंका री-लोकेशन:
रावण की माँ को सीधा यश की ‘KGF’ वाली माँ बना दिया जो रो-रोकर अपने बेटे को कसम देती है कि “जाओ बेटा, देवताओं के जुल्म से अपनी कौम को आज़ाद कराओ” जिस रावण ने तीनों लोकों में साधु-संतों के यज्ञ विध्वंस किए, ऋषियों का कत्लेआम किया, उस क्रूर आतातायी को ‘दबे-कुचलों का मसीहा’ बनाकर स्क्रीन पर परोसना सिर्फ कलात्मक छूट नहीं, बल्कि इतिहास और धर्मग्रंथों का खुला चीरहरण है।
फेमिनिस्ट रावण और दासी का रक्षक?
इस पूरे ड्रामे का सबसे हास्यास्पद जोक तो यह है कि रावण को ‘फेमिनिस्ट’ दिखा दिया जहाँ एक शराबी दासी का हाथ पकड़ता है और रावण बीच में कूदकर महिला सम्मान की खातिर लड़ पड़ता है!अरे अक्ल के अंधे निर्देशकों, जिस रावण पर माता वेदवती से दुर्व्यवहार करने का पाप था, जिसने रंभा के साथ बलत्कार किया था जिसके चलते उसे नलकुबेर का शाप मिला था कि अगर उसने किसी स्त्री की सहमति के बिना उसे छुआ तो उसके दसों सिर फट जाएंगे उस रावण को ‘वूमेन सेफ्टी का ब्रांड एम्बेसडर’ बनाकर पेश कर रहे हैं? वाल्मीकि रामायण का पन्ना पलटकर देखा होता तो पता चलता कि उसने कितनी नारियों का अपहरण करके अपनी अशोक वाटिका और अंतःपुर में बंदी बना रखा था!
शूर्पणखा का ‘स्वाभिमान’ और स्प्लिट पर्सनालिटी का ढकोसला:
मूल रामायण में शूर्पणखा लंका जाकर रावण के सामने माता सीता के अलौकिक सौंदर्य का ऐसा वर्णन करती है कि रावण की काम-वासना भड़क उठती है और वह काम-मोहित होकर अपहरण की योजना बनाता है। लेकिन इन बांद्रा मार्का बुद्धिजीवियों ने शूर्पणखा से सीता का नाम ही गायब करवा दिया! रावण के सीता हरण को क्या बना दिया? “स्प्लिट पर्सनालिटी डिसऑर्डर” मतलब एक सिर कह रहा है मत करो, दूसरा कह रहा है करो यानी रावण दुष्ट, कामी या अधर्मी नहीं था, बस मानसिक रूप से थोड़ा परेशान था!
यह वाल्मीकि रामायण का रूपांतरण नहीं बल्कि सनातन के सबसे बड़े खलनायक का कॉर्पोरेट PR पैकेज है। जहाँ खलनायक को विक्टिम कार्ड थमा दो, नायक के शौर्य को कमतर कर दो, और पूरे महाकाव्य को बांद्रा के वामपंथी चश्मे से रंग दो ताकि नेटफ्लिक्स और विदेशी अवॉर्ड्स में ‘प्रोग्रेसिव सिनेमा’ की ताली पीटी जा सके। इस पूरी बकैती का हर एक पॉइंट रिकॉर्ड पर दर्ज है



