अज्ञात
दिल्ली । कॉमरेड बोधिसत्व का नाम जुड़ने के बाद रामायण को लेकर फिल्म निर्माता के नियत पर संदेह होना स्वाभाविक है। जहां यह और देवदत्त पटनायक हों वहां कूड़ा एजेंडा न हो ऐसा हो नहीं सकता। जो यह मान्यता को मानने वाला हो कि प्रयागराज कभी था नहीं, बाबरी वास्तुकला की मिसाल है, वह क्या ही फिल्म में रिसर्च करेगा समझा जा सकता है।
ऐसा कहा गया है कि इस फिल्म में “300 से अधिक रामायणों” और मौखिक परंपराओं के तत्व शामिल किए गए हैं। बोधि जैसे लेखक वाल्मिकी में नहीं एके रामानुजन की विवादित पुस्तक थ्री हंड्रेड रामायणाज में विश्वास रखते हैं।
हंड्रेड रामायणज की मै बात न ही करूँ तो अच्छा है। इन लोगों को पेरियार की सच्ची रामायण से प्रेरणा लेना है तो किस बात का कथानक, किस बात की आस्था। आस्थावान क्यों देखेगा फिल्म को।
जब रिसर्च और स्क्रीनप्ले टीम में ऐसे लोगों का प्रभाव माना जाता है जो इस दृष्टिकोण के समर्थक रहे हों, तो आस्थावान दर्शक स्वाभाविक रूप से पूछते हैं कि फिल्म ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ की कथा कहेगी या ‘एक से बढ़कर एक’ वैकल्पिक कहानियों का मिश्रण प्रस्तुत करेगी।
जब रिसर्च टीम में ऐसे नाम जुड़ते हैं जिनके राम ‘कभी हुए ही नहीं’ या जो बौद्ध-जातक या वैकल्पिक कथाओं को प्राथमिक मानते हैं, तो सेतु निर्माण में गिलहरी का योगदान बताना ‘पचास लीटर दूध में चुटकी भर नमक’ जैसा लगता है। कॉमरेड बोधिसत्व जैसे नामों का उल्लेख होते ही कई रामभक्तों के मुंह से निकलता है – क्या यही दिन देखना बाकी था?
बोधिसत्व और देवदत्त पटनायक का नाम पढ़ने के बाद फिल्म कैसी होगी, यह समझ में आ जाता है।



