राम मंदिर चंदा चोरी: आस्था के साथ खिलवाड़ पर अब तक एफआई क्यों नहीं

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अयोध्या (उत्तर प्रदेश): श्री राम मंदिर करोड़ों हिंदू भक्तों की आस्था का केंद्र है। लाखों-करोड़ों लोगों ने अपनी श्रद्धा से दान दिया—किसी ने अपनी कमाई का हिस्सा, किसी ने आभूषण, किसी ने वर्षों की बचत। यह धन रामलला के निर्माण और मंदिर की गरिमा के लिए था, न कि किसी की जेब भरने के लिए। यदि इस चंदे में गबन या अनियमितताओं के आरोप सही साबित होते हैं, तो इसे मात्र प्रशासनिक लापरवाही नहीं माना जा सकता। यह आस्था के साथ सीधा विश्वासघात है। ऐसे में गोपनीय जांच या आंतरिक पूछताछ पर्याप्त नहीं। पूर्ण पारदर्शिता, एफआईआर और सख्त कानूनी कार्रवाई अनिवार्य है।

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने मामले को गोपनीय तरीके से संभालते हुए उत्तर प्रदेश सरकार से निष्पक्ष जांच की मांग की है लेकिन बिना परदर्शिता के निष्पक्षता अक्सर संदेहास्पद होती है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ट्रस्ट के पत्र पर तुरंत संज्ञान लिया और तीन सदस्यीय विशेष जांच दल (SIT) गठित कर दिया। इस टीम में लखनऊ मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत, आईजी किरण एस और विशेष सचिव वित्त नील रतन शामिल हैं। एसआईटी को प्रारंभिक रिपोर्ट सात दिनों में और अंतिम रिपोर्ट 15 दिनों में सौंपनी है। कुछ कर्मचारियों से पूछताछ हुई है, अचानक बढ़ी संपत्ति और दान पेटियों में गड़बड़ी के संकेत मिले हैं। एक कर्मचारी के घर से गाय के गोबर में छिपाकर रखी लाखों रुपये की नकदी बरामद हुई। ये तथ्य गंभीर हैं, लेकिन ये छोटे कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहने चाहिए।

समस्या यह है कि गोपनीय या उच्च-स्तरीय जांच में अक्सर बड़े नाम सामने नहीं आते। छोटे-मोटे चोर पकड़े जाते हैं, उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाता है और मामला शांत हो जाता है। लेकिन जब बात करोड़ों भक्तों की आस्था की हो, तो यह पर्याप्त नहीं। एफआईआर दर्ज होनी चाहिए ताकि जांच सीआरपीसी के तहत चले, सबूत संरक्षित हों, गवाह सुरक्षित हों और दोषी—चाहे कोई भी हो—पर कानूनी शिकंजा कसे जा सके। एसआईटी अच्छा कदम है, लेकिन इसे पूर्ण स्वायत्तता और समयबद्धता के साथ पारदर्शी बनाना होगा। रिपोर्ट सार्वजनिक होनी चाहिए, ऑडिट रिपोर्ट्स खुली हों और मंदिर के वित्तीय लेन-देन की पूरी जानकारी भक्तों को उपलब्ध हो। सीसीटीवी को लगाते समय वे कौन से लोग थे, जिन्होंने बाधा उत्पन्न की थी। उनके नाम सार्वजनिक होने चाहिए।

उत्तर प्रदेश में यह साल चुनाव का साल है। श्रीराम मंदिर करोड़ों हिन्दुओं की आस्था से सीधा जुड़ने वाला विषय है। गोपनीय जांच के नाम यदि चंदा चोरी मामले को ठंडे बस्ते में डालने का प्रयास किया जाएगा तो इस बार विपक्ष को बैठे बिठाए एक मुद्दा मिलेगा। बिना किसी सहानुभूति के इस पूरे मामले की पारदर्शी और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। एफआईआर हो और बड़े छोटे कैसे भी चोर हों, उनके साथ रियायत नहीं की जाए।

यदि इस चंदा चोरी मामले में चोरों को बड़े—छोटे का भेद किए बिना लटकाने की मिसाल उत्तर प्रदेश की सरकार पेश कर पाती है तो पूरे देश में महाराज जी की जय—जयकार होगी।

राम मंदिर केवल ईंट-गारे का ढांचा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक है। यदि यहां चंदा चोरी साबित होने के बाद चोरो पर यूपी स्टाइल में कार्रवाई नहीं हुई तो न केवल विश्वास टूटेगा, बल्कि विरोधी ताकतें इसे हिंदू समाज पर हमला करने का हथियार बनाएंगी। इसलिए न्याय सिर्फ छोटे कर्मचारियों की बर्खास्तगी से नहीं, बल्कि पूरी सच्चाई उजागर करने, दोषियों पर सख्त कार्रवाई और भविष्य में ऐसे गबन को रोकने वाले मजबूत तंत्र से मिलेगा। ट्रस्ट, सरकार और समाज को मिलकर सुनिश्चित करना चाहिए कि रामलला के चरणों में चढ़े एक एक पैसे का हिसाब सार्वजनिक हो और वह पैसा सुरक्षित हाथों में रहे।

आस्था पर कोई समझौता नहीं हो सकता। पारदर्शिता ही सबसे बड़ा बलिदान और सच्ची श्रद्धा है।

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