दिल्ली । एक बच्चा जब स्कूल की पाठ्यपुस्तक खोलता है तो उसके सामने सिर्फ शब्द नहीं होते, उसके सामने इतिहास का एक अधिकृत संस्करण होता है। वह वहां लिखी पंक्तियों को सामान्यतः किसी लेखक की निजी राय न मानते हुए उसे ज्ञान का प्रमाण मानकर पढ़ता है। ऐसे में सवाल तब गंभीर हो जाता है, जब किसी समाज सुधारक के संघर्ष को समझाते हुए भाषा ऐसी हो जाए जिसमें एक सामाजिक वर्ग, धार्मिक परंपरा और सांस्कृतिक व्यवस्था एक साथ कठघरे में दिखाई देने लगें। एनसीईआरटी की हिंदी पाठ्यपुस्तक ‘अंतरा’ में ज्योतिबा फुले पर प्रकाशित पाठ को लेकर उठे सवाल आज इसी ओर ध्यान आकर्षित कर रहे हैं।
मामला ज्योतिराव फुले के योगदान को कमतर आंकने का नहीं है। स्त्री शिक्षा, वंचित वर्गों की शिक्षा, सामाजिक सुधार और सत्यशोधक समाज की स्थापना में फुले दंपति का योगदान भारतीय सामाजिक इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है। प्रश्न यह है कि क्या उनके संघर्ष को पढ़ाते समय इतिहास का पूरा परिदृश्य सामने रखा गया है? क्या तत्कालीन सामाजिक कुरीतियों और पूरे हिंदू समाज, ब्राह्मण परंपरा तथा धर्म के बीच आवश्यक अंतर स्पष्ट किया गया है? और क्या विद्यार्थी को स्वयं निष्कर्ष निकालने का अवसर दिया गया है? सीधे तौर पर ब्राह्मणों को कटघरे में एकतरफा खड़ा कर दिया गया है! दरअसल, यहीं से ‘अंतरा’ का यह पाठ एक बड़े पाठ्यक्रमीय विमर्श में बदल जाता है।
‘पांच समाज सुधारक’ कौन थे? पाठ में स्रोत कहां है?
पाठ के आरंभ में कहा गया है कि भारत के सामाजिक विकास और बदलाव के आंदोलन में जिन पांच समाज सुधारकों के नाम लिए जाते हैं, उनमें महात्मा ज्योतिबा फुले का नाम शामिल नहीं है और इस सूची को बनाने वाले ‘उच्चवर्णीय समाज के प्रतिनिधि’ हैं। यह वाक्य ही अपने आप में पहला बड़ा प्रश्न खड़ा करता है। अब वे पांच समाज सुधारक कौन थे? सूची किसने बनाई थी? किस संस्था या विद्वान ने उसे तैयार किया? उसका प्रकाशन कब हुआ? क्या कोई मूल दस्तावेज, पुस्तक या ऐतिहासिक संदर्भ उपलब्ध है?
स्कूली पाठ्यपुस्तक में यदि किसी कथन को ऐतिहासिक तथ्य के रूप में रखा जाता है तो विद्यार्थी को उसका स्रोत जानने का अधिकार है। उपलब्ध सामग्री में इस कथन के साथ ऐसा कोई विस्तृत संदर्भ नहीं दिया गया है। यह सीधे रूप में एक पूर्वनिर्धारित व्याख्यान है। इतिहास में किसी व्यक्ति की उपेक्षा हुई थी तो उसका दस्तावेजी प्रमाण सामने रखा जाना चाहिए। यह बताया जाना चाहिए कि किस कालखंड में, किन संस्थानों में और किन लेखकों ने ऐसा किया। इससे विद्यार्थी इतिहास-लेखन की प्रक्रिया समझता है। अन्यथा एक सामान्यीकृत आरोप पीढ़ी के सामने प्रमाण की तरह स्थापित होता है कि ब्राह्मण दोषी हैं।
फुले की तीखी भाषा, बच्चे के सामने कितना संदर्भ?
पाठ में फुले के हवाले से लिखा गया है कि जब ब्राह्मणों ने कहा, ‘विद्या शूद्रों के घर चली गई’, तो फुले ने उत्तर दिया, “सच का सवेरा होते ही वेद डूब गए, विद्या शूद्रों के घर चली गई, भू-देव (ब्राह्मण) शरमा गए।” फुले के समर्थकों के लिए यह तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष की तीखी भाषा हो सकती है, पर आज समस्या यह है कि स्कूली विद्यार्थी के सामने यह भाषा किस संदर्भ में रखी जानी चाहिए थी?
क्या विद्यार्थी को यह बताया जाता है कि यह 19वीं सदी के सामाजिक संघर्ष की भाषा थी? क्या उसे यह समझाया जाता है कि फुले का निशाना वेदों का दार्शनिक ज्ञान था अथवा उस समय वेदों के नाम पर कायम सामाजिक व्यवस्था? क्या ‘भू-देव’ शब्द पूरे ब्राह्मण समुदाय के लिए है या उस समय के किसी विशिष्ट सामाजिक व्यवहार पर व्यंग्य? उपलब्ध सामग्री में दोनों दृष्टिकोण सामने आते हैं। फुले के समर्थकों के अनुसार यह व्यवस्था पर प्रहार था, जबकि इसका सामने से जो दृष्य दिखता है, वह यही है कि ऐसे कथनों को बिना संदर्भ के रखना आज के विद्यार्थियों में किसी समुदाय के प्रति सामान्यीकृत धारणा बनाता है। वह यही है कि ब्राह्मण और ब्राह्मण ग्रंथ, वेद आदि समाज में विभेद पैदा करते हैं, जबकि यह झूठ है।
‘ब्राह्मणवादी’ से ‘ब्राह्मण’ तक पहुंचता अर्थ
पाठ में ब्राह्मण वर्चस्व, पुरोहितवादी मानसिकता और धर्मवादी सत्ता जैसे शब्द आते हैं। इन शब्दों के बीच स्पष्ट वैचारिक और ऐतिहासिक अंतर विद्यार्थियों के सामने नहीं रखा गया। ‘ब्राह्मण’ एक सामाजिक पहचान भी है, भारतीय ज्ञान परंपरा में एक विशिष्ट साधनात्मक अवधारणा भी रही है और आधुनिक राजनीतिक विमर्श में ‘ब्राह्मणवाद’ एक अलग आलोचनात्मक अवधारणा के रूप में प्रयुक्त होता है। इन तीनों को एक-दूसरे का पर्याय बना देना अकादमिक रूप से सावधानी मांगता है।
इसी तरह ‘पुरोहित’ और ‘पुरोहितवाद’ को एक ही अर्थ में देखना भी समस्या पैदा कर सकता है। किसी कालखंड के कुछ पुरोहितों की सामाजिक भूमिका की आलोचना और पूरे पुरोहित वर्ग को शोषण के पर्याय के रूप में प्रस्तुत करना दो अलग बातें हैं। स्कूली शिक्षा में यही अंतर सबसे महत्वपूर्ण है। ‘धर्मवादी सत्ता’ या धर्म के नाम पर बनी सत्ता? पाठ में फुले के विचारों के संदर्भ में राजसत्ता और ब्राह्मण आधिपत्य के साथ ‘धर्मवादी सत्ता’ की बात आती है। जोकि यहां पाठ में सीधे-सीधे हिंदू धर्म पर आक्षेप के रूप में देखा जा सकता है।
दूसरी ओर, फुले के विचारों की समर्थक व्याख्या यह कहती है कि उनका विरोध धर्म के आध्यात्मिक सिद्धांत से अधिक धर्म के नाम पर चलने वाली सामाजिक संस्थागत व्यवस्था से था। वे जन्म आधारित विशेषाधिकार, शिक्षा से वंचित रखने और सामाजिक भेदभाव जैसी व्यवस्थाओं पर प्रहार कर रहे थे। यहां फिर वही सवाल लौटता है- क्या पाठ विद्यार्थी को दोनों अर्थों के बीच अंतर समझाता है? यदि नहीं, तो ‘धर्म’ और ‘धर्म के नाम पर बनी सामाजिक व्यवस्था’ एक ही अर्थ में पढ़े जाएंगे।
विवाह पद्धति पर सबसे बड़ा सवाल
पाठ में ज्योतिबा फुले द्वारा पारंपरिक विवाह पद्धति को चुनौती देने, ब्राह्मण पुरोहित की भूमिका हटाने और नए मंगलाष्टक तैयार करने को सामाजिक सुधार के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यहां आलोचना का दूसरा बड़ा अध्याय शुरू होता है। यदि फुले का उद्देश्य विवाह में स्त्री की समानता स्थापित करना था, तो विद्यार्थियों को यह भी बताया जाना चाहिए कि वैदिक विवाह परंपरा में स्त्री की स्थिति को लेकर मूल ग्रंथ क्या कहते हैं।
उपलब्ध सामग्री ऋग्वेद के विवाह सूक्त के उस मंत्र की ओर ध्यान दिलाती है जिसमें नववधू को ‘साम्राज्ञी’ कहकर संबोधित किया गया है। वहां वह ससुर, सास, ननद और देवर के बीच सम्मानित स्थान प्राप्त करने की कामना से संबोधित होती है। जब पाठ पारंपरिक विवाह मंत्रों को स्त्री की ‘गुलामगिरी’ से जोड़ता है, तब वैदिक मंत्रों के मूल अर्थों को भी विद्यार्थियों के सामने रखा जाना चाहिए।
यदि भारतीय विवाह व्यवस्था में इतिहास के किसी दौर में स्त्री के साथ अन्याय हुआ है तो उसका अध्ययन भी होना चाहिए और उसके तथ्य भी सामने आने चाहिए थे। पर यहां तो किसी कालखंड की कोई सामाजिक विकृति को पूरी परंपरा का मूल चरित्र मान लिया जाकर प्रस्तुत किया गया है।
जब सुधारक की नई विधि और पुरानी परंपरा आमने-सामने रखी जाए
पाठ फुले की नई विवाह विधि में स्त्री को अधिकार देने की बात करता है, जबकि सच यह भी है कि सप्तपदी के वैदिक मंत्रों में भी वर-वधू के पारस्परिक दायित्व, सहजीवन, परिवार, संतान, समृद्धि और जीवनभर साथ निभाने की प्रतिज्ञाएं मौजूद हैं। यदि दोनों परंपराओं को साथ पढ़ाया जाए तो विद्यार्थी यह स्वयं देख सकता है कि फुले किस सामाजिक व्यवहार का विरोध कर रहे थे, उनकी नई विवाह विधि में क्या नया था और पारंपरिक वैदिक विवाह के मूल मंत्र क्या कहते हैं।
‘आदर्श परिवार’ में हिंदू कहां है?
पाठ में फुले की आदर्श परिवार की अवधारणा के रूप में पिता को बौद्ध, माता को ईसाई, बेटी को मुस्लिम और बेटे को सत्यधर्मी बताया गया है।यह पंक्ति भी बहस का विषय है। एक दृष्टिकोण इसे धार्मिक सद्भाव और बहुधार्मिक सह-अस्तित्व की आदर्श कल्पना मानता है। दूसरा दृष्टिकोण पूछता है कि यदि भारत की सामाजिक संरचना समझाई जा रही है तो इस उदाहरण में देश के बहुसंख्यक हिंदू समाज की अनुपस्थिति का अर्थ क्या है?
यहां भी पाठ्यपुस्तक विद्यार्थी को संदर्भ दे सकती थी। फुले किस सामाजिक परिस्थिति में यह विचार रखते थे? वे किन धार्मिक संघर्षों से चिंतित थे? उनके विचारों को उनके जीवन, समय और सामाजिक संघर्ष से कैसे जोड़कर पढ़ा जाना चाहिए? इससे ऐसा लगता है कि फुले सामाजिक संदर्भों में तत्कालीन समय में भारत में हो रहे कन्वर्जन यानी कि हिन्दू से जो ईसाई एवं इस्लामिक बनाए जा रहे थे, वे इस धर्मपरिवर्तन के समर्थक थे, हिन्दू शब्द नहीं लिखना बता रहा है कि वे किसी के नास्तिक होने को तो पसंद करते हैं, पर हिन्दुओं से उन्हें नफरत है, जबकि वे स्वयं एक हिन्दू थे!
फुले को लेकर आज समाज में तस्वीर अलग है
पाठ में यह स्थापना भी है कि तथाकथित संभ्रांत या उच्चवर्णीय समाज के प्रतिनिधियों ने फुले को समाज सुधारकों की सूची में स्थान नहीं दिया। इसके विपरीत उपलब्ध सामग्री यह तथ्य सामने रखती है कि आज भारत के विभिन्न सामाजिक वर्गों में ज्योतिबा फुले को व्यापक रूप से समाज सुधारक के रूप में सम्मान प्राप्त है। उनकी प्रतिमाएं विभिन्न राज्यों में स्थापित हैं और राजनीतिक-सामाजिक जीवन के अलग-अलग वर्ग उनके योगदान को स्वीकार करते हैं। सबसे बड़ी इसमें विरोधावासी बातें यह हैं कि आज जिन्होंने ज्योतिबाफुले को समाज सुधारक के रूप में स्थापित किया है, उनमें अधिकांश उच्च जातियां ही आगे रही हैं। यदि अतीत में किसी विचारधारा या वर्ग ने उन्हें पर्याप्त स्थान नहीं दिया, तो उसके प्रमाण दीजिए। यदि बाद के भारत ने उन्हें स्वीकार किया, तो वह भी बताइए।
सवाल फुले के नहीं, पाठ्यपुस्तक के तरीके का है
इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि सवाल ज्योतिबा फुले को पढ़ाने का नहीं है। सवाल यह है कि फुले को कैसे पढ़ाया जा रहा है। उनकी स्त्री शिक्षा की लड़ाई पढ़ाइए। सत्यशोधक समाज पढ़ाइए। वंचित वर्गों की शिक्षा का संघर्ष पढ़ाइए।‘गुलामगिरी’ और उनके अन्य लेखन पढ़ाइए।उनकी तीखी भाषा भी पढ़ाइए। और बताएं कि कैसे ज्योतिबाफुले के मन में हिन्दुओं की उच्च जातियों के प्रति एवं किसी हद तक हिन्दू के प्रति भी नफरत भरी हुई थी। साथ में यह भी बताइए कि वे किस ऐतिहासिक परिस्थिति में बोल रहे थे, उनके आरोपों के पीछे कौन से सामाजिक अनुभव थे, उनके विचारों की आलोचना क्या रही और बाद के भारत ने उन्हें किस प्रकार देखा।
इसी तरह ब्राह्मण परंपरा की आलोचना पढ़ाइए, पर भारतीय ज्ञान परंपरा में ब्राह्मण विद्वानों के योगदान को भी पाठ्यक्रम से गायब मत कीजिए। धर्म के नाम पर हुई सामाजिक रूढ़ियों को पढ़ाइए, पर ‘धर्म’ के दार्शनिक अर्थ को भी समझाइए। स्त्री पर हुए अन्याय को पढ़ाइए, पर वैदिक साहित्य में स्त्री की विद्वत्ता और गरिमा के प्रमाण भी सामने रखिए। पाठ्यपुस्तक का काम फैसला सुनाना नहीं, सवाल पैदा करना है। वस्तुत: शिक्षा की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि वह विद्यार्थी को तैयार उत्तर देने के बजाय प्रश्न करने की क्षमता देती है।
यदि बच्चा पूछता है कि फुले ब्राह्मण वर्चस्व के विरोध में क्यों थे, तो उसे उस दौर का इतिहास बताइए। यदि वह पूछता है कि क्या पूरा ब्राह्मण समाज उस व्यवस्था के लिए जिम्मेदार था, तो उसे अलग-अलग ऐतिहासिक प्रमाण देखने दीजिए। यदि वह पूछता है कि क्या वैदिक परंपरा में स्त्री को कोई अधिकार था, तो उसे मूल ग्रंथों के संदर्भ दीजिए। यदि वह पूछता है कि ‘धर्मवादी सत्ता’ से क्या आशय है, तो ‘धर्म’ और ‘रूढ़िवादिता’ के बीच अंतर समझाइए और यदि वह पूछता है कि फुले आज इतने व्यापक रूप से सम्मानित क्यों हैं, तो उसे वर्तमान भारत की सामाजिक स्मृति भी दिखाइए। यही वास्तव में सत्य शिक्षा है।
पांच सवाल, जिनसे शुरू होनी चाहिए पाठ्यपुस्तक की समीक्षा
पहला: किसी ऐतिहासिक दावे के साथ उसका प्राथमिक स्रोत क्यों न दिया जाए? दूसरा: किसी समाज सुधारक की तीखी भाषा के साथ उसका ऐतिहासिक संदर्भ क्यों न समझाया जाए? तीसरा: ‘ब्राह्मण’, ‘ब्राह्मणवाद’, ‘पुरोहित’, ‘पुरोहितवाद’ और ‘धर्मवादी सत्ता’ जैसे शब्दों की अलग-अलग परिभाषाएं विद्यार्थियों को क्यों न दी जाएं? चौथा: सामाजिक कुरीतियों की आलोचना के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल ग्रंथों और उनके सकारात्मक पक्षों को तुलनात्मक रूप से क्यों न पढ़ाया जाए? पांचवां: क्या पाठ्यपुस्तक विद्यार्थी को निष्कर्ष देती है या निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए पर्याप्त सामग्री देती है?
अंतिम बात : इतिहास किसका लिखा जाए?
ज्योतिबा फुले का इतिहास भी भारत का इतिहास है। सावित्रीबाई फुले का संघर्ष भी भारत का इतिहास है। वैदिक ऋषिकाओं की परंपरा भी भारत का इतिहास है। भारतीय ज्ञान परंपरा में योगदान देने वाले विद्वानों का इतिहास भी भारत का इतिहास है। सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष भी भारत का इतिहास है और उन कुरीतियों के विरुद्ध हुए सुधार आंदोलनों का विरोध और समर्थन भी इतिहास का हिस्सा है। अत: इनमें से किसी एक को हटाकर दूसरा स्थापित करने से इतिहास पूरा नहीं होता।
वास्तव में इतिहास तब पूरा होता है जब विद्यार्थी को संघर्ष भी दिखे, संदर्भ भी, आलोचना भी मिले, प्रमाण भी,सुधारक भी दिखाई दे और जिस समाज को उन्होंने बदलने का प्रयास किया, उसकी जटिलता भी। एनसीईआरटी जैसी राष्ट्रीय संस्था के सामने चुनौती इसलिए बड़ी है कि उसकी पुस्तक का एक वाक्य हजारों विद्यार्थियों की ऐतिहासिक स्मृति का हिस्सा बनता है, इसलिए प्रश्न सिर्फ यह नहीं कि ‘अंतरा’ में ज्योतिबा फुले के बारे में क्या लिखा गया है। बड़ा प्रश्न यह है कि क्या उस पाठ को पढ़ने वाला बच्चा इतिहास को समझकर निकलेगा या इतिहास के बारे में पहले से तय एक धारणा लेकर?
कुल मिलाकर कहना यही है कि शिक्षा का लक्ष्य किसी जाति को अपराधबोध देना, किसी समुदाय को कटघरे में खड़ा करना या किसी परंपरा को महिमामंडित करना नहीं होना चाहिए। उसका लक्ष्य विद्यार्थी को इतना सक्षम बनाना होना चाहिए कि वह प्रमाण देखे, प्रश्न करे, मतभेद समझे और अपना निष्कर्ष स्वयं निकाले।



