ईरान को कमजोर समझ कर हमला करने का खामियाजा भुगत रहा अमेरिका

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लखनऊ । अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अक्सर महाशक्तियाँ एक गंभीर भूल कर बैठती हैं—वे अपने प्रतिद्वंद्वी की सैन्य शक्ति को नहीं, बल्कि उसकी राजनीतिक इच्छाशक्ति, भूगोल, सामाजिक सहनशीलता और रणनीतिक क्षमता को कम आंक लेती हैं। 28 फरवरी 2026 को ईरान के विरुद्ध अमेरिका और इज़राइल द्वारा शुरू किया गया सैन्य अभियान भी कुछ हद तक इसी भूल का उदाहरण बनता दिखाई दे रहा है। फरवरी में शुरू हुए इस संघर्ष को तीन महीने से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन न तो अमेरिका अपने घोषित उद्देश्यों को पूरी तरह हासिल कर सका है और न ही ईरान को निर्णायक रूप से झुका पाया है। इसके विपरीत, आज स्थिति यह है कि अमेरिका स्वयं आर्थिक, सामरिक और राजनीतिक दबावों का सामना कर रहा है।
युद्ध की शुरुआत में यह धारणा बनाई गई थी कि ईरान की सैन्य और आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर है कि कुछ सप्ताह के भीतर उसे बातचीत की मेज पर आने के लिए मजबूर किया जा सकता है। वर्षों के प्रतिबंध, आर्थिक संकट, आंतरिक असंतोष और क्षेत्रीय दबावों को देखते हुए अनेक पश्चिमी विश्लेषकों को लगा कि ईरान लंबी लड़ाई लड़ने की स्थिति में नहीं है। लेकिन घटनाक्रम ने बिल्कुल अलग तस्वीर प्रस्तुत की।
ईरान ने प्रत्यक्ष सैन्य शक्ति से अधिक अपनी भू-राजनीतिक स्थिति को हथियार बना दिया। फारस की खाड़ी और विशेष रूप से होरमुज़ जलडमरूमध्य पर उसका प्रभाव इस पूरे संघर्ष का निर्णायक तत्व बन गया। यही वह समुद्री मार्ग है जिसके माध्यम से विश्व के तेल और गैस व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। युद्ध शुरू होने के बाद इस मार्ग पर यातायात बुरी तरह प्रभावित हुआ। जहाँ पहले प्रतिदिन लगभग 125 से 140 जहाजों का आवागमन होता था, वहीं कई अवधियों में यह संख्या घटकर लगभग 10 जहाज प्रतिदिन तक पहुँच गई। हजारों नाविक और सैकड़ों जहाज खाड़ी क्षेत्र में फँसे रहे।
यही वह बिंदु है जहाँ अमेरिका की रणनीतिक गणना कमजोर पड़ती दिखाई देती है। अमेरिका ने सोचा था कि आर्थिक प्रतिबंध और सैन्य दबाव ईरान को झुका देंगे, लेकिन ईरान ने दुनिया को यह याद दिला दिया कि आधुनिक युद्ध केवल मिसाइलों से नहीं, बल्कि समुद्री मार्गों, ऊर्जा आपूर्ति और भूगोल से भी लड़े जाते हैं। होरमुज़ जलडमरूमध्य पर बने संकट ने वैश्विक तेल बाजारों को झकझोर दिया। जून के पहले सप्ताह तक तेल की कीमतों में लगातार वृद्धि देखी गई और हर नई सैन्य झड़प के साथ ऊर्जा बाजारों में घबराहट बढ़ती गई।
विडंबना यह है कि इस संकट का सबसे बड़ा आर्थिक प्रभाव केवल यूरोप, एशिया या विकासशील देशों पर ही नहीं पड़ा, बल्कि स्वयं अमेरिका पर भी पड़ा। मूडीज़ के विश्लेषण के अनुसार युद्ध और ऊर्जा संकट के कारण अमेरिकी परिवारों पर लगभग 100 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ा है। ईंधन, हवाई यात्रा, परिवहन, उर्वरक और अनेक उपभोक्ता वस्तुओं की लागत बढ़ी है। मध्यम और निम्न आय वर्ग के अमेरिकी नागरिकों पर इसका विशेष प्रभाव पड़ा है।
यह स्थिति अमेरिका के लिए इसलिए भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि युद्ध का घोषित उद्देश्य ईरान को कमजोर करना था, लेकिन वास्तविकता में अमेरिका को अपनी ही अर्थव्यवस्था में महँगाई और आपूर्ति संकट का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिकी प्रशासन को अब घरेलू राजनीतिक दबावों का भी सामना करना पड़ रहा है। युद्ध जितना लंबा खिंचता है, उसका आर्थिक और राजनीतिक मूल्य उतना ही बढ़ता जाता है।
ईरान की दूसरी बड़ी सफलता यह रही कि उसने संघर्ष को पूर्ण सैन्य पराजय या विजय के बजाय “लंबे गतिरोध” में बदल दिया। आज तीन महीने से अधिक समय बीतने के बाद भी युद्ध निर्णायक परिणाम तक नहीं पहुँचा है। एक अस्थिर युद्धविराम, रुक-रुक कर होने वाली सैन्य कार्रवाइयाँ और लगातार चल रही वार्ताएँ इस बात का संकेत हैं कि अमेरिका भी अब किसी न किसी समझौते की तलाश में है।
इतिहास में अमेरिका को इराक और अफगानिस्तान में भी इसी प्रकार के अनुभवों से गुजरना पड़ा है। सैन्य दृष्टि से शक्तिशाली होने के बावजूद वह राजनीतिक स्थिरता स्थापित करने में कठिनाइयों का सामना करता रहा। ईरान का मामला उससे भी अधिक जटिल है। ईरान केवल एक देश नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया की शक्ति-संरचना का केंद्रीय घटक है। उसके पास क्षेत्रीय सहयोगियों का नेटवर्क, वैचारिक प्रभाव, सामरिक भूगोल और ऊर्जा मार्गों पर प्रभाव जैसी ऐसी क्षमताएँ हैं जिन्हें केवल हवाई हमलों से समाप्त नहीं किया जा सकता।
युद्ध ने अमेरिका और उसके सहयोगियों के भीतर भी मतभेद पैदा किए हैं। यूरोप की प्राथमिकता ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक स्थिरता है, जबकि इज़राइल की प्राथमिकता सुरक्षा है। अमेरिका को इन दोनों के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है। यही कारण है कि हाल के सप्ताहों में वाशिंगटन की भाषा में पहले जैसी आक्रामकता नहीं दिखाई देती। अब बातचीत, समझौते और युद्धविराम की चर्चा अधिक सुनाई दे रही है।
एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ईरान ने अपने सीमित संसाधनों के बावजूद वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने की क्षमता प्रदर्शित कर दी है। आधुनिक विश्व व्यवस्था अत्यधिक परस्पर निर्भर है। यदि होरमुज़ जैसा एक समुद्री मार्ग बाधित होता है, तो उसका प्रभाव टोक्यो से लेकर मुंबई, फ्रैंकफर्ट से लेकर न्यूयॉर्क तक दिखाई देता है। यही कारण है कि ईरान के साथ संघर्ष केवल क्षेत्रीय युद्ध नहीं रहा; वह वैश्विक आर्थिक संकट का स्रोत बन गया।
अमेरिका की एक रणनीतिक भूल यह भी रही कि उसने ईरान को मुख्यतः आर्थिक दृष्टि से देखा। यह सही है कि प्रतिबंधों ने ईरानी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचाया है, लेकिन किसी राष्ट्र की प्रतिरोधक क्षमता केवल सकल घरेलू उत्पाद से नहीं मापी जाती। राष्ट्रीय अस्मिता, वैचारिक प्रतिबद्धता, ऐतिहासिक स्मृति और भूगोल भी उतने ही महत्वपूर्ण कारक होते हैं। ईरान ने बार-बार यह दिखाया है कि वह आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद लंबे संघर्ष झेलने की क्षमता रखता है।
आज की स्थिति यह है कि अमेरिका को वही करना पड़ रहा है जिसे वह युद्ध के आरंभ में टालना चाहता था—बातचीत। विभिन्न सूत्रों के अनुसार युद्ध समाप्त करने के लिए प्रस्तावित समझौते पर चर्चा जारी है। ईरान भी अपने हितों को सुरक्षित रखते हुए किसी अंतरिम व्यवस्था पर विचार कर रहा है, लेकिन दोनों पक्षों के बीच अविश्वास अभी भी गहरा है।
इस पूरे घटनाक्रम से एक बड़ा सबक सामने आता है। किसी देश को केवल उसकी आर्थिक कठिनाइयों, प्रतिबंधों या तकनीकी पिछड़ेपन के आधार पर कमजोर मान लेना खतरनाक भूल हो सकती है। ईरान ने यह सिद्ध किया है कि सामरिक भूगोल, ऊर्जा मार्गों पर प्रभाव और दीर्घकालिक प्रतिरोध क्षमता किसी भी आधुनिक युद्ध में अत्यंत महत्वपूर्ण तत्व हैं।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आज अमेरिका केवल ईरान से नहीं लड़ रहा, बल्कि उस भू-राजनीतिक वास्तविकता से जूझ रहा है जिसे उसने प्रारंभ में पर्याप्त गंभीरता से नहीं समझा। युद्ध शुरू करना अपेक्षाकृत आसान होता है; उसे अपने अनुकूल परिणाम तक पहुँचाना कहीं अधिक कठिन। ईरान को शीघ्र झुकाने की जो परिकल्पना युद्ध के आरंभ में दिखाई दे रही थी, वह आज एक लंबे और महँगे गतिरोध में बदल चुकी है।
यदि आने वाले दिनों में कोई व्यापक समझौता होता है, तो वह केवल सैन्य शक्ति की नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक यथार्थ की जीत होगी। और यदि यह संघर्ष लंबा चलता है, तो उसकी कीमत केवल ईरान ही नहीं, बल्कि अमेरिका और पूरी दुनिया को चुकानी पड़ेगी। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि ईरान को कमजोर समझकर शुरू किए गए अभियान का अपेक्षित परिणाम नहीं मिला है, जबकि उसका आर्थिक, राजनीतिक और रणनीतिक मूल्य अमेरिका को लगातार चुकाना पड़ रहा है।

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डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला, नईदुनिया एवं गौड़सन्स टाइम्स के सलाहकार संपादक हैं और सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह के संपादक की भी भूमिका निभा रहे हैं)

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