रात का खाना या मौत का न्योता?

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मुंबई । आज रात खाने में क्या बनेगा?
यह सवाल शायद दुनिया का सबसे साधारण सवाल है। हर घर में पूछा जाता है। कभी प्यार से, कभी शिकायत के साथ, कभी मज़ाक में।
लेकिन अगर यही सवाल किसी की जान ले ले तो?
अगर चिकन करी, नमक या बिरयानी की एक प्लेट हत्या का कारण बन जाए तो समझ लीजिए कि समस्या रसोई में नहीं, रिश्तों में पक रही है।
हाल के महीनों में भारत के अलग-अलग हिस्सों से आई घटनाएं चौंकाती भी हैं और डराती भी हैं।
तेलंगाना के कामारेड्डी में एक युवक ने पत्नी से चिकन करी न बनने पर नाराज़गी जताई। बहस बढ़ी। रिश्तेदारों ने बीच-बचाव किया। मामला शांत होता दिखाई दिया। लेकिन घर के भीतर जमा गुस्सा ठंडा नहीं हुआ। कुछ देर बाद पत्नी ने हंसिया उठाया और पति की गर्दन पर वार कर दिया। युवक की मौत हो गई।
गुजरात के वडोदरा में एक मजदूर ने पत्नी के बनाए भोजन को खाने से इनकार कर दिया। कहासुनी हुई। आरोप-प्रत्यारोप चले। कुछ मिनटों में बहस हिंसा में बदल गई और एक व्यक्ति की जान चली गई।
सवाल है कि क्या लोग सचमुच चिकन करी या एक थाली भोजन के लिए हत्या कर सकते हैं?
जवाब है: नहीं।
मौत चिकन करी से नहीं हुई। मौत उस तनाव से हुई जो वर्षों से भीतर जमा था।
खाने का विवाद केवल आखिरी चिंगारी था।
देश भर की पुलिस फाइलें ऐसी घटनाओं से भरी पड़ी हैं। कहीं साबूदाना खिचड़ी में नमक ज्यादा होने पर पत्नी की हत्या कर दी गई। कहीं बिरयानी के स्वाद पर शुरू हुआ झगड़ा खून-खराबे में बदल गया। कहीं मटन करी न बनने पर घरेलू हिंसा ने जान ले ली।
दुनिया भी इससे अलग नहीं है।
ब्रिटेन में जन्मदिन के भोजन को लेकर हुए विवाद ने एक परिवार उजाड़ दिया। अमेरिका में चिकन ड्रमस्टिक पर शुरू हुई बहस हिंसा तक पहुंच गई। वॉशिंगटन में पैनकेक को लेकर झगड़ता बुजुर्ग दंपती आखिरकार हत्या के मामले में बदल गया।
देश बदल जाते हैं। भाषाएं बदल जाती हैं। लेकिन कहानी वही रहती है।
रसोई में पकता भोजन कई बार रिश्तों की कड़वाहट भी उबाल देता है।
विशेषज्ञ कहते हैं कि ऐसी घटनाओं में भोजन असली कारण नहीं होता। असली कारण होता है आर्थिक तनाव, बेरोजगारी, शराब की लत, घरेलू हिंसा, अपमान, असफल अपेक्षाएं और वर्षों से दबा हुआ गुस्सा।
जब ये सब परत-दर-परत जमा होते रहते हैं तो फिर एक मामूली वाक्य भी विस्फोट कर सकता है।
“आज चिकन क्यों नहीं बनाया?”
“इतना नमक किसने डाल दिया?”
“मैं यह खाना नहीं खाऊंगा।”
सुनने में साधारण लगने वाले ये वाक्य कभी-कभी बारूद पर गिरी चिंगारी बन जाते हैं।
भारतीय समाज में भोजन केवल भोजन नहीं है। वह भावनाओं की भाषा भी है।
एक पत्नी के लिए खाना बनाना अक्सर जिम्मेदारी, सेवा और प्रेम का प्रतीक माना जाता है। दूसरी ओर पुरुष पर कमाने, परिवार चलाने और आर्थिक दबाव झेलने की अपेक्षा रहती है।
दोनों पक्ष अपने-अपने तनाव ढो रहे होते हैं।
मुसीबत तब शुरू होती है जब संवाद खत्म हो जाता है।
तब दाल में केवल दाल नहीं होती। उसमें महंगाई भी होती है। थकान भी होती है। शिकायतें भी होती हैं। अधूरी इच्छाएं भी होती हैं।
और फिर एक दिन थाली बहस का मैदान बन जाती है।
मनोवैज्ञानिकों ने एक दिलचस्प शब्द गढ़ा है: “हैंग्री”।
अर्थात भूख और गुस्से का मिश्रण।
शोध बताते हैं कि भूखे व्यक्ति की सहनशीलता कम हो जाती है। वह जल्दी चिढ़ता है। छोटे विवाद बड़े लगने लगते हैं। यही कारण है कि अधिकांश घरेलू झगड़े शाम या रात के भोजन के आसपास भड़कते हैं।
दिन भर की थकान।
जेब की चिंता।
काम का दबाव।
और ऊपर से भूख।
यह मिश्रण कई बार खतरनाक साबित होता है।
इन घटनाओं में एक और समानता दिखाई देती है। हथियार अक्सर पहले से खरीदे नहीं जाते। वे घर में ही मौजूद होते हैं।
रसोई का चाकू।
हंसिया।
कैंची।
बेलन।
यानी हत्या की योजना नहीं होती। केवल एक ऐसा क्षण होता है जब गुस्सा विवेक को धक्का देकर बाहर कर देता है।
लेकिन वही एक क्षण पूरी जिंदगी बदल देता है।
पांच मिनट का क्रोध कई बार पचास साल की सजा बन जाता है।
विडंबना देखिए। जिस रसोई को भारतीय संस्कृति ने प्रेम, सेवा और परिवार का केंद्र माना, वही जगह कभी-कभी सबसे भयावह हिंसा का मंच बन जाती है।
हम अक्सर हत्या के बाद नमक, चिकन या बिरयानी की चर्चा करते हैं। असली सवाल पूछना भूल जाते हैं।
घर में संवाद क्यों खत्म हो गया?
क्रोध इतना अनियंत्रित क्यों हो गया?
लोग मदद मांगने से क्यों हिचकते हैं?
घरेलू तनाव को मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे की तरह क्यों नहीं देखा जाता?
जब तक इन सवालों के जवाब नहीं खोजे जाएंगे, तब तक ऐसी खबरें आती रहेंगी।
चिकन करी किसी की जान नहीं लेती।
बिरयानी भी नहीं।
एक चुटकी नमक भी नहीं।
जान लेती है वर्षों से जमा कड़वाहट, लगातार अपमान, अनियंत्रित क्रोध और संवाद का अभाव।
रसोई की आग का काम भोजन पकाना है।
जब वही आग रिश्तों को जलाने लगे, तब समझ लीजिए कि समाज को केवल रेसिपी नहीं, रिश्तों की भी मरम्मत करनी होगी।
क्योंकि मौत कभी थाली में परोसे गए भोजन से नहीं होती।
मौत उस ज़हर से होती है जो धीरे-धीरे रिश्तों में घुलता रहता है।

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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