सरकार को सुरक्षित करना होगा हर नागरिक का स्वच्छ हवा का मूल अधिकार

AQI.jpg

दिल्ली । सुबह सवेरे, वह मज़दूर कुछ देर ज़्यादा खाँसता रहा। ठंड थी, धुंध थी, और फेफड़ों में चुभती जलन थी। उसे नहीं पता था कि यह सर्दी की एलर्जी है या ज़हरीली हवा का असर। पता बस इतना था कि काम पर जाना ज़रूरी है, क्योंकि सांस भले ही दूषित हो, रोज़ी-रोटी नहीं रुक सकती।

उत्तर भारत की सर्दियों में यह दृश्य अब अपवाद नहीं, सामान्य सच बन चुका है। हवा इतनी जहरीली हो गई है कि सांस लेना अपने आप में एक जोखिम बन गया है। यह अब मौसम की मार नहीं, एक गहरी और स्थायी पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी है।

जैसे-जैसे सर्दी उत्तरी भारत पर अपनी पकड़ मज़बूत कर रही है, ज़हरीला स्मॉग एक बार फिर शहरों को निगल रहा है। दिल्ली में एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) अक्सर 400 के आसपास दर्ज हो रहा है। “बहुत ख़राब” से “गंभीर” श्रेणी में। PM2.5 सुरक्षित सीमा से कई गुना ऊपर है। ताजमहल के शहर आगरा में भी हाल बेहतर नहीं; यहाँ AQI 300 तक पहुँच जाता है, और PM10 व PM2.5 दोनों ही सेहत पर सीधा वार कर रहे हैं। गोरखपुर, लखनऊ जैसे शहर भी इसी दमघोंटू घेरे में हैं।

यह संकट अब सिर्फ़ उत्तर भारत तक सीमित नहीं रहा। मुंबई में AQI लगभग 180, पुणे में 212 और हैदराबाद में 166 के आसपास दर्ज किया गया, जो बताता है कि समस्या देशव्यापी हो चुकी है। IQAir, AQI.in और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के आंकड़े एक कड़वी सच्चाई सामने रखते हैं: बरसों की मॉनिटरिंग, जागरूकता अभियानों और भारी फंडिंग के बावजूद हवा की हालत में ठोस सुधार नहीं आया।

हाल ही में जनाग्रह द्वारा आयोजित राष्ट्रीय राउंडटेबल, “शहरों में वायु प्रदूषण: चुनौतियाँ और आगे का रास्ता”, ने इस संकट की जड़ पर उंगली रखी। सरकार, अकादमिक जगत, परोपकार संस्थानों और सिविल सोसाइटी के 35 से अधिक विशेषज्ञ एक बिंदु पर सहमत थे: डेटा बढ़ा है, लेकिन गवर्नेंस नहीं।
जनाग्रह की एक साल लंबी स्टडी, जो नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP) और 15वें वित्त आयोग के फंड पर आधारित है, एक बड़ा अंतर उजागर करती है। कुछ बड़े शहरों में फंड का आंशिक उपयोग हुआ, लेकिन 85.5% शहर 2024–25 के PM10 घटाने के लक्ष्य से पीछे हैं। CREA के ताज़ा विश्लेषण बताते हैं कि केवल 20–30% NCAP शहरों में ही प्रदूषण में वास्तविक और टिकाऊ कमी दर्ज की गई है, जबकि अब लक्ष्य 2026 तक 40% कटौती का है।

यह नाकामी केवल इरादों या पैसों की कमी की कहानी नहीं है। देशभर में मॉनिटरिंग नेटवर्क तेज़ी से फैला है, लेकिन वायु प्रदूषण आज भी एक क्षेत्रीय और बहु-क्षेत्रीय समस्या बना हुआ है। परिवहन, निर्माण, कचरा जलाना, उद्योग और शहरों के बाहर की खेती, प्रदूषण के स्रोत हर जगह हैं, मगर ज़िम्मेदारी बिखरी हुई। नगर निकायों से नतीजे तो मांगे जाते हैं, पर न उन्हें पूरा अधिकार मिलता है, न तकनीकी क्षमता, न समय पर फंड।
राउंडटेबल में यह भी साफ़ हुआ कि डेटा बहुत है, पर वही डेटा नीतियों और फैसलों में नहीं उतरता। काग़ज़ों पर अनुपालन दिख जाता है, ज़मीन पर असर नहीं। आईआईटी तिरुपति के डॉ. सुरेश जैन ने चेताया कि प्रदूषण सीमाएँ नहीं मानता; औपचारिक जवाबदेही से आगे बढ़कर साझा ज़िम्मेदारी का ढाँचा बनाना होगा। जनाग्रह के चीफ पॉलिसी एंड इनसाइट्स ऑफिसर आनंद अय्यर ने कहा, “वायु प्रदूषण का हल संभव है, शर्त यह है कि शहर सरकारों को असली ताक़त दी जाए, क्योंकि वही नागरिकों के सबसे क़रीब हैं।” जनाग्रह के सीईओ श्रीकांत विश्वनाथन ने मुख्यमंत्रियों और राज्य सरकारों से अपील की कि क्लीन एयर एजेंडा को शीर्ष प्राथमिकता बनाएं और सिविल सोसाइटी के साथ लंबी अवधि की साझेदारी करें।

इस संकट की इंसानी क़ीमत सबसे ज़्यादा ग़रीबों और बाहर काम करने वालों को चुकानी पड़ती है। यह एक असमान आपदा है, जो अमीर और ग़रीब की सांसों के बीच खाई पैदा करती है, उम्र घटाती है और अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ डालती है। सर्दी 2025 में दिल्ली, आगरा और लखनऊ जैसे शहरों में AQI बार-बार खतरनाक स्तर पार करता रहा, स्कूल बंद हुए, सफ़र मुश्किल हुआ, और रोज़मर्रा की ज़िंदगी ठहर-सी गई। छोटे शहर और कम शहरीकृत राज्य उतने ही जोखिम में हैं, लेकिन कमज़ोर मॉनिटरिंग और संस्थागत ढांचे के कारण वे अक्सर नज़रअंदाज़ रह जाते हैं।

समाधान साफ़ है, पर आसान नहीं। सिर्फ़ मॉनिटरिंग और खर्च की निगरानी से आगे बढ़कर नतीजों पर आधारित सुधार करने होंगे। शहर, ज़िला और राज्य स्तर पर ज़िम्मेदारियाँ स्पष्ट करनी होंगी; सेक्टर-वार उत्सर्जन संकेतक अपनाने होंगे; भरोसेमंद टूल्स, इम्पैक्ट असेसमेंट और प्लानिंग सपोर्ट देना होगा; और फंडिंग में ऐसी पारदर्शिता लानी होगी कि जनता जान सके, पैसा कहाँ गया और क्या बदला।

सर्दी 2025 के आंकड़े एक अंतिम चेतावनी हैं। दिल्ली दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानियों में गिनी जा रही है, आगरा की ऐतिहासिक विरासत धुएँ की चादर में छिपती जा रही है, और करोड़ों लोग रोज़ ज़हरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं। अब आधे-अधूरे क़दम काफी नहीं।

स्वच्छ हवा कोई लक्ज़री नहीं, एक मौलिक सार्वजनिक अधिकार है। इसे टालना आने वाली पीढ़ियों को उस संकट के हवाले करना है, जिसे आज रोका जा सकता है। अब “मापने” से आगे बढ़कर “जवाबदेही तय करने” का समय है, वरना यह लोकतंत्र ज़हरीली सांसों पर ही चलता रहेगा।

भारत राष्ट्र के स्वाभिमान और बुन्देलखण्ड की रक्षा केलिये सतत संघर्ष

india-innovation-ranking.jpg.webp

महाराजा छत्रसाल का पूरा जीवन स्वाभिमान रक्षा के संघर्ष में बीता। जब केवल बारह वर्ष के थे तब माता पिता का बलिदान हो गया। कभी मामा के यहाँ रहे कभी जंगल में भटके लेकिन अपनी मातृभूमि का मान बचाने का संकल्प कभी न डिगा। और अंत में औरंगजेब जैसे क्रूर आक्रमणकारी को पीछे धकेलकर बुंदेलखंड राज्य की स्थापना की।

ऐसे इतिहास प्रसिद्ध महाराजा छत्रसाल का जन्म 17 जून 1648 को विन्ध्य पर्वत क्षेत्र में बसे ग्राम मोर पहाड़ी चंदेरा में हुआ था। अब यह गांव टीकमगढ़ जिले के अंतर्गत आता है। महाराजा छत्रसाल के पूर्वज ओरछा के शासक रहे हैं लेकिन दिल्ली सल्तनत के लगातार आक्रमणों से जूझते हुये पिता चंपतराय वनों में रहकर अपने स्वाभिमान और राज्य रक्षा केलिये निरंतर संघर्ष कर रहे थे। संघर्ष के इन्हीं दिनों में महाराजा छत्रसाल का जन्म हुआ। जब वे बारह वर्ष के थे तो औरंगजेब की सेना से युद्ध करते हुये माता पिता दोनों का बलिदान हो गया। युद्ध में पति को घायल देखकर महारानी लालकुंवरि ने बड़ी कठिनाई से बालक छत्रसाल को सुरक्षित निकाला और दोनों ने प्राण त्याग दिये।
कोई कल्पना कर सकता है बारह वर्ष के उस बालक की जो मरणासन्न माता पिता की अवस्था में माता के आदेश पर जंगल में निकल गया हो। यहाँ उन सेवाभावी सैनिकों की प्रसंशा भी करनी होगी जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर ब्रह्म वर्षीय बालक छत्रसाल को उनके मामा साहेबसिंह जू देव धंधेरे के पास देलवाड़ा तक सुरक्षित पहुँचाया फिर वे देवगढ़ गये। यहाँ अपने बड़े भाई अंगद जू देव बुन्देला के साथ रहे। उनका विवाह परमार वंश की कन्या महारानी देवकुंअरि जू देव से विवाह किया। यह विवाह पिता ने अपने जीवन काल में ही निश्चित कर दिया था। और महाराज छत्रसाल ने पिता के वचन का पालन किया। पिता के वचन के अनुसार विवाह करके युवा छत्रसाल ने पिता के सम्मान और राज्य रक्षा की ओर कदम बढ़ाया। इसके लिये आवश्यक कुशल सैन्य प्रशिक्षण और संगठित सेना की आवश्यकता थी। इसके लिये वे जयपुर गये और अपने बड़े भाई के साथ राजा जयसिंह से मिले। राजा जयसिंह उन दिनों मुगल बादशाह औरंगजेब के सेनानायक थे। राजा जयसिंह ने दोनों भाइयों को अपनी सेना से जोड़ लिया एक एक छोटी टुकड़ी का प्रभारी बना दिया। युवा छत्रसाल को यहाँ दो अवसर मिले। एक तो सैन्य प्रशिक्षण और दूसरा औरंगजेब से सुरक्षा। सैन्य प्रशिक्षण लेना प्रारंभ कर दिया। इसी बीच ने औरंगजेब ने राजा जयसिंह को दक्षिण के अभियान पर भेजा। छत्रसाल भी उनके साथ इस अभियान पर गये। मई 1665 में बीजापुर युद्ध में महाराज छत्रसाल जू देव ने असाधारण वीरता दिखायी। वे जिस ओर गये वहाँ सेना को विजय मिली। वस्तुतः यह उनके जीवन का एक प्रशिक्षण और अपने पैर मजबूत करने का समय था। वे मुगलों की कुटिलता और क्रूरता दोनों से परिचित थे। इसलिये सैनिकों के बीच उन्होंने एक ऐसा समूह तैयार कर लिया था जो उनके साथ बुन्देलखण्ड चल सके।

अपनी दक्षिण यात्रा के दौरान 1668 में महाराज छत्रसाल की शिवाजी महाराज से भेंट हुई। इस भेंट का विवरण इतिहास में तो नहीं मिलता लेकिन इसके बाद घटे घटनाक्रम से स्पष्ट है कि इस भेंट में मंत्रणा क्या हुई होगी। वर्ष 1670 में महाराज छत्रसाल जू देव बुन्देला अपनी जन्मभूमि लौट आये। उन्होंने बुंदेलखंड भूमि की स्थिति भिन्न देखी। संपूर्ण क्षेत्र में विध्वंस की स्थिति थी। उनके लौटते ही समूचे जन सामान्य ने उनकी ओर से आशा भरी दृष्टि से देखा और संघर्ष करने का आव्हान किया। जन सामान्य में एक गीत बड़ा प्रसिद्ध है-

करो देस के राज छतारे
हम तुम तें कबहूं नहिं न्यारे।
दौर देस मुगलन को मारो
दपटि दिली के दल संहारो।
तुम हो महावीर मरदाने
करिहो भूमि भोग हम जाने।
जो इतही तुमको हम राखें
तो सब सुयस हमारे भाषें।

जन भावनाओं के अनुरूप उन्होंने संघर्ष केलिये अपने रिश्तेदारों से संपर्क किया। लेकिन अधिकांश रिश्तेदारों ने मुगलों के आधीनता स्वीकार कर ली थी। महाराज छत्रसाल ने सबसे मिलकर संगठित संघर्ष का प्रस्ताव रखा पर कोई मुगल सल्तनत से भिड़ने को तैयार न हुआ। फिर उन्होंने दतिया नरेश शुभकरणजी और ओरछा नरेश सुजान सिंह जूदेव से संपर्क किया। लेकिन एकजुट होकर संघर्ष के लिये तैयार न हुये। तब महाराज छत्रसाल ने अपने बड़े भाई के साथ जन सामान्य को एकजुट करके स्वयं संघर्ष करने का संकल्प लिया। उन्होंने सबसे पहले 5 घुड़सवारों और 25 पैदल सैनिकों की एक छोटी सैन्य टुकड़ी तैयार की और ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की पंचमी दिन रविवार को अपने संघर्ष का उद्घोष कर दिया।

यहीं से आरंभ होता है उनका स्वाभिमान संघर्ष। कभी आगे बढ़े कभी रणनीति के तहत पीछे हटकर कुछ समझौते भी किये। लेकिन समर्पण नहीं किया और अंत में औरंगजेब को पीछे हटना पड़ा। महाराज छत्रसाल ने अपनी जन्मभूमि को सुरक्षित कर लिया था। गर्भकाल से लेकर बाल्यकाल तक उन्होंने स्वाभिमान का बड़ा संघर्ष देखा था। यही भाव उनके उनकी प्रत्येक श्वाँस में था। इसकी झलक उनके पूरे जीवन में। निरंतर संघर्ष से ही उन्होंने अपना साम्राज्य स्थापित किया था। उनके साम्राज्य की सीमा और उनके शौर्य के बारे में एक दोहा प्रसिद्ध है-

“इत यमुना, उत नर्मदा,
इत चम्बल, उत टोंस।
छत्रसाल सों लरन की,
रही न काहू हौंस।।”

अर्थात यमुना, नर्मदा, चंबल और टोंस नदियों के बीच के क्षेत्र में महाराज छत्रसाल का राज्य स्थापित था और उनसे युद्ध करने का साहस मुगलों में बचा ही नहीं था।

महाराज छत्रसाल योद्धा होने के साथ एक कुशल प्रशासक भी थे। प्रजा की सुरक्षा सम्मान और हित उनकी प्राथमिकता में थे। वे समाज जीवन में शस्त्र और शास्त्र दोनों को आवश्यक मानते थे। उनके दरबार में विद्वानों और कवियों का आदर होता था। महाकवि भूषण द्वारा रचित ‘छत्रसाल-दशक’ उनकी वीरता का साहित्यिक प्रमाण है।

समय अपनी गति से आगे बढ़ा। बुंदेलखंड एक सशक्त राज्य के रूप में स्थापित हुआ। उन्होंने ही छतरपुर नगर की स्थापना की। महोबा को राजधानी बनाया। उनका पूरा जीवन धर्म की स्थापना और संस्कृति एवं स्वाभिमान की रक्षा में बीता। 20 दिसंबर 1731 को 83 वर्ष की आयु में उन्होंने जीवन की अंतिम श्वाँस ली। उनकी गणना महाराणा प्रताप और छत्रपति शिवाजी महाराज परंपरा में की जाती है। वे ऐसे इतिहासपुरुष थे जिन्होंने विषम परिस्थिति में जीवन संघर्ष आरंभ किया और अपने स्वाभिमान का राज्य स्थापित किया। पुण्यतिथि पर उनका स्मरण साहस, स्वाभिमान, संघर्ष कर्तव्यबोध का आत्मचिंतन करना और भविष्य की यात्रा आरंभ करना है।

एक की बदकिस्मती, दूसरे का बोनस और सब की सांसों का बिल!

images-5.jpeg

पटना । सुबह अगर आंख खुलते ही जलन हो, जैसे किसी ने मिर्ची का स्प्रे मार दिया हो, गले में खराश चिपक जाए मानो कोई पुराना कर्ज़ वसूल करने आ गया हो, और फेफड़े ऐसे खांसें जैसे ईएमआई की आखिरी किस्त पर डिफॉल्ट हो गया हो, तो घबराइए मत! बधाई हो, आप “विकास-प्रदत्त ऑक्सीजन” का मजा ले रहे हैं। गहरी सांस लीजिए, ये बदबू नहीं, बल्कि “सक्सेस की सिग्नेचर फ्रेग्रेंस” है। मुफ्त की हवा है जी, और मुफ्त में जो मिले, वो सबसे प्रीमियम क्वालिटी का होता है, बस एक्सपायरी डेट चेक मत करना!

ईश्वर का लाख-लाख शुक्र कि वो “ओवर-प्योरिटी” का पिछड़ा जमाना खत्म हुआ, जहां हवा साफ होती थी और लोग बिना मास्क के घूमते थे। हमने सालों की मेहनत से ये ज्ञान अर्जित किया है कि प्रदूषण कोई समस्या नहीं, बल्कि “इम्युनिटी बूस्टर” है, जैसे वो महंगे सप्लीमेंट्स, बस ये फ्री में मिलता है। जो ज्यादा खांस रहा है, वही ज्यादा आगे बढ़ रहा है; जो सांस रोककर जी रहा है, वही असली योगी है। कोरोना तो बस ट्रेलर था, असली फिल्म तो ये रोज़ाना का स्मॉग-शो है!

स्मॉग? वो ग्रे चादर है जो हमें नीले आसमान की “टॉक्सिक पॉजिटिविटी” से बचाती है। नीला आसमान? उफ्फ! उससे विटामिन-D की ओवरडोज हो जाती थी, और ज्यादा सेहत तो किसी ग्लोबल साजिश से कम नहीं। स्मॉग हमें असली बराबरी सिखाता है: अमीर-गरीब सबकी आंखें जलेंगी, सांसें अटकेंगी, ये है असली “सबका साथ, सबका सफरिंग”! दिल्ली-NCR में तो स्मॉग इतना घना है कि लोग एक-दूसरे को देखकर कहते हैं, “भाई, तू तो फोटोशॉप्ड लग रहा है!” और वो AQI? 300, 400, 500 ? वो तो हमारा नेशनल प्राइड स्कोर है, जितना हाई, उतना हाई-क्लास!

हमारी नदियां भी अब शर्मीली पारदर्शिता छोड़कर “मल्टी-कलर थेरपी” में लग गई हैं। रंग-बिरंगी, झागदार, हैवी मेटल्स से लबालब, पूरी बॉडी डिटॉक्स पैकेज! एंड होली रिवर्स? वो अब “इंडस्ट्रियल स्पा” बन गई हैं, जहां फैक्टरियां अपना “वेस्ट” डंप करती हैं और हम “पवित्र स्नान” कहते हैं। साफ पानी? सिर्फ पूंजीवादी वहम था, असली पानी वही जो डॉक्टरों को अमीर बनाए, हॉस्पिटल्स को फुल रखे। यमुना पर फोम पार्टी? फ्री की है, बस स्विमिंग सूट की जगह PPE सूट पहनना!

जंगलों को हमने “आजादी” दी है, पेड़ों की बेड़ियां काटकर उन्हें “फ्रीडम फाइटर” बना दिया। वृक्ष तो प्रगति के रोडब्लॉकर थे, चिड़ियों की चहचहाहट ऑफिस प्रोडक्टिविटी में डिस्टर्बेंस। छाया? वो आलस्य फैलाती थी, अब सूरज की धूप में हम “नेचुरल टैनिंग” लेते हैं। पहाड़ों को नंगा करके हमने उनका असली मकसद उजागर किया: खनन, पूजन, बेचन, फिर डेवलपमेंट! भूस्खलन? यानी ग्रैविटी के चंगुल से मुक्ति । बाढ़? प्रकृति की “फ्लैशबैक” जहां पानी अपनी पुरानी यादें ताजा करने आता है, और हमारे घरों को फ्री वॉटर पार्क बना देता है। केदारनाथ, चमोली, ये तो बस ट्रेलर हैं, असली फिल्म तो हिमालय के माइनिंग प्रोजेक्ट्स में है!

हमारे प्रबुद्ध गुरु, जो मोटिवेशनल लेक्चर देते हैं, समझाते हैं कि बीमारी दुख नहीं, “ओपॉर्चुनिटी” है। वायरस? मेडिकल इंडस्ट्री के “एंजेल इन्वेस्टर”! जितनी महामारी, उतनी रिसर्च ग्रांट्स; जितनी खांसी, उतने फार्मा शेयर्स। अस्पतालों के गलियारे गुलजार, स्टॉक्स स्काईरॉकेट, बरकत हो तो ऐसी! कोविड ने हमें मास्क की “एकजुटता” सिखाई, अब स्मॉग ने N95 को नेशनल यूनिफॉर्म बना दिया। थोड़ा “मैनेज्ड पैनिक” जरूरी है, वरना नागरिक सवाल पूछने लगेंगे, like “ये फैक्टरियां क्यों नहीं बंद?” और सवाल? वो विकास के सबसे बड़े दुश्मन हैं, जीडीपी गिरा देते हैं!

गरीबी को हमने “रिब्रैंड” किया है, अब वो शर्म नहीं, “लाइफस्टाइल ब्रांड” है। ऑस्कर-विनिंग फिल्में बनती हैं, TED टॉक्स चमकते हैं। “मिनिमलिज्म” अनिवार्य: कम सामान, कम चिंता, टपकती छत “माइंडफुलनेस” सिखाती है, भूख “इंटरमिटेंट फास्टिंग”। क्या शानदार “सेल्फ-हेल्प” प्रोग्राम! उधर हमारे दूरदर्शी नेता “आकांक्षी प्रचुरता” का अभ्यास करते हैं, प्राइवेट जेट्स से उड़ते हुए, ट्रैफिक के ऊपर से। वे हमें बताते हैं कि ऊंचाई पर नैतिकता के नियम अलग: “नीचे वाले सांस लें या न लें, हम तो क्लीन एयर जोन में हैं!” शोर? वो परेशानी नहीं, “लाइफ का साउंडट्रैक”, हॉर्न, ड्रिल, बीप, सब कहते हैं, “सिस्टम जिंदा है!” शांति में तो “खतरनाक विचार” पैदा होते हैं, जैसे “पर्यावरण कानून लागू क्यों नहीं?”

इतिहास ने सिखाया: युद्ध ही शांति है (आर्म्स इंडस्ट्री चलती है), अज्ञानता ही ताकत (ज्ञान आज्ञाकारिता बिगाड़ देता है), और विनाश ही विकास (फोटोज अच्छी आती हैं, फंडिंग मिलती है)। फिर भी, खांसी, बाढ़ और सायरन के बीच एक मनहूस सवाल कौंधता है: क्या हमें ऐसी हवा की जरूरत नहीं जो आंखें न जलाए?

और हां, हमारे प्लास्टिक महासागर! वाह! समुद्र तटों की “मॉडर्न आर्ट” सजावट, मछलियों की “प्लास्टिक डाइट”, जो उन्हें “इवॉल्व” करा रही है। पक्षियों के रंगीन खिलौने, जो सदियों तक अमर रहेंगे, हमारी “उन्नति का इटरनल लोगो”। ट्रैफिक जाम? वो तो “सोशल नेटवर्किंग इवेंट”, घंटों कार में बैठकर फैमिली बॉन्डिंग, पड़ोसी से गपशप, हॉर्न की “सिम्फनी” में मेडिटेशन। तेज रफ्तार दुर्घटनाएं लाती थी, अब धीमी गति में “लाइफ का रस” घोलिए, और अगर स्टक हो गए, तो ऑनलाइन शॉपिंग कर लीजिए!

जलवायु परिवर्तन? प्रकृति का “सरप्राइज गिफ्ट बॉक्स”! लंबी गर्मियां, AC और स्विमिंग पूल बिकेंगे। बाढ़ का मतलब नए “एडवेंचर टूरिज्म” स्पॉट्स। सूखा यानी पानी की “ट्रू वैल्यू” समझ आएगी। बर्फ पिघले? बढ़िया! आर्कटिक में “लक्जरी रिसॉर्ट्स” खुलेंगे, इंडियन टूरिस्ट्स के लिए स्पेशल “मेल्टिंग आइस” पैकेज। कॉर्पोरेट देवता कहते हैं, प्रदूषण “आर्थिक विकास का मीठा फल” है, अस्पताल, दवाइयां, एयर प्यूरीफायर, मास्क, सबका बूमिंग बिजनेस! गरीबों को “फ्री स्मॉग”, अमीरों को “प्राइवेट जेट की शुद्ध हवा”, ये है असली “इनक्लूसिव ग्रोथ”! ये सड़न भी एक “फफूंद वाली दवा” है। हम सब इसके आदी हो चुके हैं, क्योंकि प्रगति का ये “हेल्दी पॉटलक” कभी खत्म नहीं होता, बस स्वाद बदलता रहता है: आज स्मॉग, कल प्लास्टिक, परसों… कौन जाने? चीयर्स टू मोर डेवलपमेंट! बस, सांस लेते रहिए, जब तक ले सकें!

मोहब्बत के दीवानों को कोर्ट से नई राहत, नया हौसला

09_05_2022-27_09_2021-court_news_22059461_22696899.jpg

मुंबई : मोहल्ले की उस तंग गली में, हल्के पीले बल्ब की रोशनी तले, अब दो लोग डरकर नहीं मिलते। न उनके हाथ में फर्जी काग़ज़ हैं, न झूठे वादे, सिर्फ़ एक अदालत का आदेश है, जिसने उनके साथ रहने के हक़ को सरकारी शक और सामाजिक पहरेदारी से ऊपर रख दिया है। दरवाज़े के उस पार अब खौफ़ कम है। पहली बार क़ानून उनके साथ खड़ा दिखता है, उनके ख़िलाफ़ नहीं।
_________________________
भारत की न्यायपालिका में इन दिनों एक खामोश लेकिन गहरा बदलाव आकार ले रहा है। यह बदलाव अदालतों के ठोस, सोचे-समझे फैसलों के ज़रिये रोज़मर्रा की ज़िंदगी में उतर रहा है। न्यायपालिका संविधान की रोशनी में समाज के पुराने “नैतिक” समझौतों को नए सिरे से परख रही है, खासकर निजी रिश्तों के मामले में।

इन फैसलों का संदेश सीधा है: जहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक घबराहट आमने-सामने हों, वहां संविधान को प्राथमिकता मिलेगी, परंपरा को नहीं। यह वह कानून है जो हमदर्दी, गरिमा और इंसानी अनुभव को उन रूढ़ियों से ऊपर रखता है, जो प्रेम, साथ रहने और साथी चुनने के फैसलों को संदेह की निगाह से देखती रही हैं। अदालतें लगातार याद दिला रही हैं कि संविधान का अनुच्छेद 21, गरिमा के साथ जीने का अधिकार, प्रेम और साझेदारी के चुनाव को भी अपने भीतर समेटे है। न्यायपालिका अब परंपरा की चौकीदारी नहीं, बदलती ज़िंदगियों की संवैधानिक संरक्षक बनती दिख रही है।

सबसे साफ़ बदलाव लिव-इन रिश्तों को लेकर न्यायिक दृष्टिकोण में नज़र आता है। जो संबंध लंबे समय तक समाज की नज़रों में संदिग्ध और कानून के लिए असहज रहे, उन्हें अदालतें अब सामाजिक यथार्थ मानकर सुरक्षा के दायरे में ला रही हैं। सुप्रीम कोर्ट और कई हाई कोर्ट्स ने माना है कि यदि कोई जोड़ा लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहा है, तो धारा 125 CrPC जैसे भरण-पोषण के प्रावधानों को “सिर्फ़ काग़ज़ी शादी” की संकीर्ण शर्त में नहीं बांधा जा सकता। अदालतों ने स्पष्ट किया है कि धारा 125 कोई तकनीकी कानून नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा का औज़ार है, जिसका उद्देश्य छोड़ी गई या आर्थिक रूप से कमज़ोर महिला और बच्चों की हिफ़ाज़त है। अब सवाल स्टैम्प पेपर का नहीं, बल्कि यह देखने का है कि रिश्ता व्यवहार में शादी जैसा था या नहीं।

न्यायपालिका ने एक और नाज़ुक मोड़ पर संतुलित हस्तक्षेप किया है। जब दो बालिग लोग वर्षों तक आपसी सहमति से साथ रहते हैं और रिश्ता टूट जाता है, तो क्या हर ब्रेकअप आपराधिक मुक़दमे में बदल जाना चाहिए? हालिया फैसलों में अदालतों ने साफ़ कहा है कि “शादी का झूठा वादा” और लंबे समय तक चला सहमति-आधारित रिश्ता एक जैसे नहीं हैं। जहां रिश्ता आपसी सहमति से चला हो, वहां सिर्फ़ अलगाव को आपराधिक आरोपों का हथियार नहीं बनने दिया जा सकता। यह सोच दोहरी सुरक्षा देती है, एक तरफ़ यौन हिंसा के असली मामलों की गंभीरता बनी रहती है, दूसरी तरफ़ भावनात्मक टूटन को आपराधिक बदले में बदल देने की प्रवृत्ति पर रोक लगती है।
अंतर-धार्मिक जोड़ों की सुरक्षा से जुड़े फैसले इस बदलाव की सबसे मानवीय तस्वीर पेश करते हैं। सुप्रीम कोर्ट बार-बार दोहरा चुका है कि बालिग नागरिकों को अपना साथी चुनने का अधिकार संविधान ने दिया है, और राज्य का कर्तव्य उस अधिकार की रक्षा करना है, न कि उस पर शक करना। अनुच्छेद 21 के तहत “अपनी ज़िंदगी अपने तरीके से जीने” की आज़ादी, धर्म से परे शादी करने या साथ रहने के अधिकार को भी शामिल करती है। कई हाई कोर्ट्स ने धमकियों और हिंसा के डर से जूझ रहे अंतर-धार्मिक जोड़ों को तुरंत पुलिस सुरक्षा देने का आदेश देते हुए साफ़ कहा है कि यह पारिवारिक “इज़्ज़त” का नहीं, संवैधानिक अधिकार का सवाल है। “लव जिहाद” जैसे राजनीतिक नारों और धर्मांतरण-विरोधी कानूनों के शोर के बीच अदालतें यह रेखांकित कर रही हैं कि कोई भी कानून प्रेम और आस्था की निजी पसंद को अपराध घोषित करने का औज़ार नहीं बन सकता।

IPC की धारा 498A को लेकर भी न्यायपालिका ने संतुलन का रास्ता चुना है। एक ओर इसे वैवाहिक हिंसा और दहेज उत्पीड़न की शिकार महिलाओं के लिए ज़रूरी सुरक्षा कवच माना गया, तो दूसरी ओर इसके दुरुपयोग पर सख़्त चेतावनी भी दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि सामान्य, अस्पष्ट और सामूहिक आरोपों के आधार पर आपराधिक कार्रवाई नहीं चल सकती। क्रूरता साबित करने के लिए ठोस, विशिष्ट घटनाओं और प्रमाणों की ज़रूरत है। दशकों पुराने, सबूतहीन मामलों को ख़ारिज करते हुए अदालतों ने यह भी कहा कि झूठे या बढ़ा-चढ़ाकर लगाए गए आरोप न्याय को उतना ही नुकसान पहुंचाते हैं जितना असली अपराधों पर चुप्पी।

इन तमाम फैसलों के बीच एक बड़ा, लगभग अनकहा संकेत छिपा है। कानून, जो कभी परंपरा और पितृसत्ता का रखवाला लगता था, अब बदलते भारत की जटिल सच्चाइयों को सुनने लगा है। अदालतें “स्थिर सामाजिक व्यवस्था” बचाने से ज़्यादा इस सवाल से जूझ रही हैं कि क्या संविधान का वादा असली ज़िंदगियों, उलझे रिश्तों और असहज चुनावों के साथ न्याय कर रहा है। ऐसे दौर में, जब प्यार, साथ रहना और अलग होना, सब कुछ राजनीति और भीड़-निर्मित नैतिकता तय करने लगी है, न्यायपालिका ने संवैधानिक तर्क, व्यक्तिगत गरिमा और समानता को प्राथमिकता देने का रास्ता चुना है।

अदालत में हथौड़े की आवाज़ आज भी गूंजती है, लेकिन अब वह सिर्फ़ आदेश नहीं लगती, वह एक भरोसे की तरह सुनाई देती है। यह भरोसा कि कम से कम न्यायालयों की चारदीवारी के भीतर, मोहब्बत करने, साथ रहने या अलग हो जाने की अपनी कहानी लिखने का हक़ कानून की भाषा में भी दर्ज हो सकता है, सावधानी के साथ, लेकिन पूरे आत्मविश्वास के साथ।

scroll to top