इन दिनों कहां हैं, शिवानंद द्विवेदी सहर

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दिल्ली। शिवानंद द्विवेदी सहर इन दिनों कहां हैं, सप्ताह में कोई ना कोई यह सवाल पूछ ही लेता है। निश्चित तौर पर यह प्रश्न पूछने वाले सभी सहर के मित्र और परिचित ही होंगे। जिनके नेटवर्क से अचानक शिवानंद बाहर चले गए हैं। उनका नाम पिछले दिनों भाजपा के आईटी सेल प्रमुख के लिए प्रमुखता से चला लेकिन अमितजी मालवीय गए नहीं, इसीलिए शिवानंदजी आए नहीं। ऐसा उनके जानने वाले ही बताते हैं।

कहां चले गए शिवानंद, इस प्रश्न के तलाश के लिए उंगलबाज.कॉम की टीम ने अपने अध्ययन से यह जानकारी निकाली है।

शिवानंद द्विवेदी भाजपा से जुड़े एक प्रमुख लेखक, संकलक और बौद्धिक कार्यकर्ता हैं। वे पार्टी की विचारधारा को जनता तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनकी सक्रियता मुख्य रूप से किताबों के लेखन, संकलन और मोदी सरकार की उपलब्धियों को दस्तावेजीकृत करने में देखी जाती है। उदाहरण के लिए, उन्होंने अनिर्बान गांगुली के साथ मिलकर ‘अमित शाह और भाजपा की यात्रा’ (Journey of Amit Shah and BJP) नामक पुस्तक का सह-लेखन किया। यह किताब भाजपा के संगठनात्मक विकास और अमित शाह के नेतृत्व में पार्टी की सफलता की यात्रा को विस्तार से बताती है। यह पुस्तक भाजपा की रणनीतिक मजबूती और चुनावी विजयों के पीछे की विचारधारा को समझने में मदद करती है।

इसके अलावा, शिवानंद द्विवेदी ने ‘अमृत काल की ओर’ (Towards Amrit Kaal) नामक पुस्तक का संकलन किया, जिसमें के.के. उपाध्याय के साथ मिलकर मोदी सरकार के नौ वर्षों की उपलब्धियों को संकलित किया गया। यह पुस्तक 2023 में भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा द्वारा जारी की गई थी। इस आयोजन में नड्डा ने राहुल गांधी की आलोचना करते हुए कहा कि कांग्रेस नेता ‘नफरत का मेगा शॉपिंग मॉल’ खोल रहे हैं, जबकि भाजपा सकारात्मक विकास की बात करती है। इस पुस्तक के माध्यम से द्विवेदी ने मोदी सरकार की नीतियों – जैसे आर्थिक सुधार, विदेश नीति, कोविड प्रबंधन और आत्मनिर्भर भारत – को बौद्धिक रूप से प्रस्तुत किया। यह कार्य भाजपा के बौद्धिक प्रकोष्ठ की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसमें सरकार की उपलब्धियों को तथ्यपूर्ण और विचारधारा-सम्मत तरीके से प्रचारित किया जाता है।

शिवानंद द्विवेदी की सक्रियता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन (SPMRF) से भी जुड़ी हुई है। SPMRF भाजपा की विचारधारा पर शोध करने वाला प्रमुख थिंक टैंक है, जो नीति सुझाव देता है और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण को मजबूत करता है। यहां द्विवेदी ने कई लेख और विश्लेषण लिखे हैं, जो पार्टी की संगठनात्मक ताकत, नेताओं की छवि और नए मतदाताओं से जुड़ाव पर केंद्रित होते हैं। उनके लेखों में भाजपा की चुनावी सफलताओं के पीछे की वजहों – जैसे करिश्माई नेतृत्व, स्वच्छ छवि और युवा जुड़ाव – को विस्तार से विश्लेषित किया जाता है। यह फाउंडेशन भाजपा के बौद्धिक कार्यों का केंद्र बिंदु है, जहां द्विवेदी जैसे कार्यकर्ता विचारधारा को आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत करते हैं।

भाजपा में बौद्धिक कार्यों की परंपरा लंबी है। 1990 के दशक से पार्टी ने इंटेलेक्चुअल सेल, इकोनॉमिक सेल और मीडिया सेल जैसे प्रकोष्ठ बनाए, ताकि बुद्धिजीवियों को जोड़ा जा सके। डॉ. सौरभ मालवीय और संजीव सिन्हा के नेतृत्व में कई पत्रकार और बौद्धिक भाजपा से जुड़े। शिवानंद द्विवेदी इसी परंपरा के हिस्से हैं। उनकी किताबें और लेख पार्टी की विचारधारा – एकात्म मानववाद, अंत्योदय और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद – को मजबूत करते हैं। वे मोदी सरकार की नीतियों को ‘अमृत काल’ के संदर्भ में प्रस्तुत करते हैं, जो भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में है।

द्विवेदी की सक्रियता केवल लेखन तक सीमित नहीं है। वे भाजपा के बौद्धिक मंचों पर चर्चा और सेमिनारों में भाग लेते हैं, जहां पार्टी की नीतियों का बचाव और विपक्ष की आलोचना की जाती है। उनकी रचनाएं भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए प्रशिक्षण सामग्री का हिस्सा बनती हैं। उदाहरणस्वरूप, अमित शाह की किताब में उन्होंने पार्टी के विस्तार – गुजरात से राष्ट्रीय स्तर तक – को दस्तावेजीकृत किया, जो कार्यकर्ताओं को प्रेरित करती है।

कुल मिलाकर, शिवानंद द्विवेदी भाजपा के बौद्धिक विंग के एक समर्पित सदस्य हैं। उनकी सक्रियता पार्टी को विचारधारा के स्तर पर मजबूत बनाती है। उनकी रचनाएं भाजपा की यात्रा को समझने का एक विश्वसनीय स्रोत हैं, जो पार्टी को एक विचार-आधारित संगठन के रूप में स्थापित करती हैं।

अवैध मतान्तरण को रोकने के लिए राष्ट्रव्यापी संकल्प की आवश्यकता

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डॉ सुरेन्द्र कुमार जैन,

दिल्ली । एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते समय माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अवैध मतान्तरण के दुष्परिणामों पर चिन्ता व्यक्त करते हुए चेतावनी दी कि यह धार्मिक स्वतन्त्रता के मूलभूत अधिकार और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हो सकता है। उन्होंने केवल चिन्ता ही व्यक्त नहीं की, अपितु केन्द्र सरकार को निर्देश भी दिए कि वह स्पष्ट रूप से बताए कि इस समस्या के समाधान के लिए क्या कदम उठाएंगे। पिछले काफी समय से अवैध मतान्तरण में संलग्न शक्तियों की आक्रामक रणनीतियां और उनके दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं।

कश्मीर में दो सिख लड़कियों का जबरन मतान्तरण, पंजाब में मिशनरियों द्वारा किए जा रहे मतान्तरण पर अकाल तख्त द्वारा चिन्ता व्यक्त करना, गुरुग्राम व लोनी में मूक-बधिर बच्चों का भी मतान्तरण करना, सम्पूर्ण देश में हिन्दू देवी-देवताओं व आस्थाओं के अपमान की सामग्री प्रकाशित होना या सोशल मीडिया पर अपलोड करना, कोरोना काल में भी चर्च का अप्रत्याशित व आक्रामक रूप से प्रसार होना आदि घटनाएं सम्पूर्ण देश को उद्वेलित कर रही हैं। अवैध मतान्तरण के ही एक वीभत्स रूप लव जिहाद शब्दों के उपयोग पर मजाक उड़ाने वाले भी दिल्ली में आफताब द्वारा श्रद्धा का कत्ल कर उसके शव को 35 टुकड़ों में जिस तरह बांटा गया, उससे स्तब्ध रह गए। अभी इस क्रूर हत्याकांड पर आक्रोश व्यक्त करने की समाज तैयारी कर ही रहा था कि लखनऊ में सूफियान ने अपनी प्रेमिका निधि गुप्ता को चौथी मन्जिल से धक्का देकर सिर्फ इसलिए मार दिया, क्योंकि उसने इस्लाम स्वीकार करने से मना कर दिया था।

अवैध मतान्तरण की यह विभीषिका भारत 13 सौ वर्षों से झेल रहा है। इसी कारण भारत में 10 करोड़ हिन्दुओं का नरसंहार हुआ। लगभग इतनों का ही जबरन मतान्तरण हुआ। भारत का दुर्भाग्यजनक विभाजन हुआ और कश्मीर की त्रासदी हुई। आतंकवाद और कई नरसंहारों की विभीषिका अवैध मतान्तरण के कारण ही भारत को झेलनी पड़ रही है। स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द, महात्मा गांधी, डॉक्टर भीमराव आम्बेडकर आदि कई महापुरुषों ने समय-समय पर इस मानवता विरोधी त्रासदी पर नियन्त्रण करने की आवश्यकता व्यक्त की है। पहले मतान्तरण बल प्रयोग या लालच से ही होता था, परन्तु अब तकनीक का उपयोग कर कई कुटिल तरीकों से मतान्तरण किया जाता है। विदेशों से मिल रही अकूत धन राशि और निजी स्वार्थों के कारण विशेष वर्ग का समर्थन इस समस्या को और जटिल बना देता है। इसके नए-नए स्वरूप देश के लिए नए-नए खतरों का निर्माण कर रहे हैं। इनका सामना करने के लिए केन्द्र सरकार, राज्य सरकारों व देश के साधु-सन्तों और राष्ट्रभक्त समाज को मिलकर समन्वित योजना के अन्तर्गत काम करना होगा।

अवैध मतान्तरण के राष्ट्रव्यापी षड्यंत्र को रोकने के लिए सबसे महत्वपूर्ण दायित्व केन्द्र सरकार का बनता है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी उससे ही अपेक्षा की है। वर्ष 1995 में सरला मुद्गल मामले में भी माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इसे रोकने के लिए केन्द्रीय कानून बनाने की आवश्यकता प्रकट की थी। संविधान सभा में इस विषय पर चर्चा के समय सरदार पटेल ने आश्वासन दिया था कि अगर संविधान के अनुच्छेद 25 का दुरुपयोग हुआ, तो उसे रोकने के लिए केन्द्रीय कानून लाया जाएगा।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद कुछ राज्य सरकारों ने इस दिशा में कदम उठाए परन्तु वोट बैंक की राजनीति ने राष्ट्रीय हितों की उपेक्षा कर दी। कई केन्द्र सरकारें इसे राज्य का विषय बताकर पल्ला झाड़ती रहीं। संविधान के अनुच्छेद 25 के अन्तर्गत मतान्तरण के अधिकार की बात करने वाले जानबूझकर इस अनुच्छेद के प्रतिबन्धात्मक प्रावधानों की चर्चा नहीं करते। सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य, नैतिकता के कानून केन्द्र सरकार के अन्तर्गत ही आते हैं। यह ठीक है कि भारत के आठ राज्यों में तत्सम्बन्धी कानून बने हैं परन्तु इस समस्या की भीषणता, व्यापकता और विदेशी शक्तियों के समर्थन को देखकर ऐसा महसूस होता है कि राष्ट्रव्यापी प्रभाव वाला सबल कानून बनना चाहिए। एक पृथक कानून बने या भारतीय दंड संहिता में कुछ संशोधन कर व्यवस्था बनाई जाए, इस पर चर्चा हो सकती है। 75 वर्षों से इस आवश्यकता की अनदेखी की जा रही है। समाज को विश्वास है कि स्वतन्त्रता के अमृत महोत्सव वर्ष में वर्तमान संकल्पवान सरकार, जो राष्ट्र को चुनौती देने वाले विषयों पर जीरो टॉलरेंस की नीति रखती है, इस दिशा में सबल कानून अवश्य बनाएगी।

13 सौ वर्ष पुरानी इस विकट समस्या का समाधान केवल कानून बनाकर नहीं हो सकता। जब भी देश के सामने इस प्रकार की चुनौतियां आती हैं, भारत के सन्त, महात्मा और चिन्तक प्रेरक व मार्गदर्शक के रुप में सामने आते हैं। देवल ऋषि, स्वामी विद्यारण्य, रामानुजाचार्य, रामानंद, चैतन्य महाप्रभु, गुरु तेग बहादुर गुरु गोविंद सिंह, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द, स्वामी श्रद्धानन्द, स्वामी चिन्मयानन्द, महात्मा गांधी, डॉक्टर भीमराव आम्बेडकर आदि कई सन्तों, महापुरुषों ने न केवल इस सम्बन्ध में जन-जागरण किया है, मतान्तरण की आंधी को रोकने का प्रयास किया है, अपितु भटके हुए बन्धुओं को अपनी जड़ों के साथ जोड़ने का प्रयास भी किया है।

आज कई पूज्य साधु-सन्त और चिंतक इस दिशा में सार्थक कदम उठा रहे हैं। देश के पूज्य साधु-सन्तों ने जिन उद्देश्यों को लेकर विहिप की स्थापना की थी, उनमें एक प्रमुख उद्देश्य मतान्तरण को रोकना और घर वापसी कराना था। इससे साधु-सन्तों की पीड़ा और प्राथमिकता स्पष्ट होती है। आज देश में लाखों साधु-सन्त हैं, जो इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि देश और हिन्दू बचेगा, तो ही उनका सम्मान और अस्तित्व सुनिश्चित रहेगा। चाणक्य ने जिस प्रकार विदेशी आक्रमणकारियों के संकट का सामना करने के लिए समन्वित अभियान चलाया था, आज समाज पूज्य सन्तों से वैसी ही अपेक्षा कर रहा है। अपनी कथाओं और प्रवचनों के माध्यम से जन जागरण, एक-एक जिले को दत्तक लेकर मतान्तरण के षडयंत्रों पर रोक लगाना और भटके बन्धुओं को अपने साथ जोड़ने का महा अभियान इस समय की आवश्यकता है। ऐसी हर चुनौती पर समाज ने पूज्य सन्तों के मार्गदर्शन में ही विजय प्राप्त की है और इस समय भी करेंगे, ऐसा विश्वास है।

सर्वविदित तथ्य है कि समाज के सहयोग के बिना कोई भी कानून फलीभूत नहीं हो सकता। दहेज विरोधी कानून का हश्र सबसे प्रबल उदाहरण है। इसलिए समाज को प्रेरित करने और व्याप्त जन जागरण हेतु सभी महापुरुषों और संगठनों को समन्वित अभियान चलाने की आवश्यकता है। परिवार के मुखिया परिवार की सदस्यों को अपने पूर्वजों के गौरव व परम्पराओं के सम्बन्ध में अवश्य बताते हैं। अपने परिवारों की परम्परा और समाज का गौरव जिस धर्म के कारण है, उसके प्रति स्वाभिमान निर्माण करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। सर्व पन्थ समादर हिन्दू समाज की विशेषता है। यह विशेषता हमारी कमजोरी नहीं बननी चाहिए। जो हमारे धर्म का आदर न करें, मतान्तरित करने के लिए हमारे श्रेष्ठ धर्म को अपमानित करें, उन पन्थों का आदर करते रहना आत्मघाती सद्गुण विकृति है, कुछ और नहीं। हमारी इस सद्गुण विकृति का दुरुपयोग कर हमारे समाज और धर्म को नष्ट करने का षड्यंत्र सफल नहीं होनी चाहिए। यह जागृति आज के समय की आवश्यकता है।

आज सम्पूर्ण विश्व के मतान्तरित समाजों में अपनी जड़ों से जुड़ने का स्वयं स्फूर्त अभियान चल रहा है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। परन्तु समाज की हिचक इसमें बाधा बनती है। अपने घर में वापस आने वाले बांधवों का शेष समाज के साथ रोटी-बेटी का सम्बन्ध जल्दी स्थापित नहीं हो पाता है। कुछ वर्ष पूर्व हरियाणा के रोहतक में आयोजित सर्व खाप पंचायत ने यह निर्णय लिया था कि जिनके पूर्वज जिस गोत्र से गए थे, वापस आने पर उनका वही जाति गोत्र माना जाएगा। उसके अनुसार ही उनका रोटी-बेटी का सम्बन्ध स्थापित होगा। इस प्रकार का जागरण अब समय की मांग है।

भारत में प्रतिदिन लव जिहाद की घटनाएं प्रकाश में आती रहती हैं। कोई न कोई श्रद्धा, निकिता, निधि, अंकिता, शिवानी आदि इन दरिन्दों का शिकार होती रहती है। इनमें वे भी मामले हैं, जिनके साथ जबर्दस्ती की जाती है। ऐसी घटनाएं मुस्लिम बहुल इलाकों में ज्यादा होती हैं। लव जिहाद के वे भी प्रकरण है, जिनमें हिन्दू लड़कियों को बहला-फुसलाकर षड्यंत्र के अन्तर्गत फंसाया जाता है। ऐसे में हिन्दू संगठनों व माता-पिता की भूमिका दोगनी हो जाती है। हमें अपनी लड़कियों की सुरक्षा करनी है, तो उन्हें स्वतन्त्रता और स्वच्छन्दता में अन्तर सिखाना पड़ेगा।

आज प्रत्येक माता-पिता अपने बच्चों को अच्छा स्पर्श (good touch), बुरा स्पर्श (bad touch) का अन्तर सिखाते हैं। ऐसे में क्या यह सिखाना आवश्यक नहीं है कि मित्रता किससे करनी चाहिए और किससे नहीं? आधुनिक कहलाने या “अपने बच्चों को स्वयं निर्णय लेने की क्षमता निर्माण कर दी है” की मृग मरीचिका कितनी आत्मघाती बन चुकी है, यह लव जिहाद पीड़ित युवतियों के माता-पिता से अवश्य जानना चाहिए। इस मृग मरीचिका के कल्पना लोक का काल्पनिक आनन्द क्या हमारी बहन-बेटी के जीवन से ज्यादा महत्वपूर्ण है? सभी सन्तों, प्रवचनकारों, शिक्षाविदों, समाजिक संगठनों व जनप्रतिनिधियों को इस सम्बन्ध में अपना दायित्व समझना होगा और इस जन-जागरण को सतत रूप से चलाना होगा।

मतान्तरण को अपना मिशन या देव प्रदत्त अधिकार मानने वाले मौलवी व मिशरियों को समझना होगा कि मतान्तरण का मिशन और शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व एक साथ नहीं चल सकते। अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, सीरिया, इराक, ईरान, नागालैंड, मिजोरम में इनकी जोर-जबर्दस्ती चलती है। वहां के अल्पसंख्यक समाज के सामने समर्पण या पलायन के अलावा जीवित रहने का कोई और विकल्प नहीं बचता है। वहां इनके इस चरित्र को किसी भी दृष्टि से मानवीय नहीं कहा जा सकता। परन्तु भारत में जहां ये अल्पसंख्यक हैं, वहां इनके अनुयायियों के अतिरिक्त कोई अन्य समाज इनकी पूजा-अर्चना में बाधा डालता है? क्या इनके चर्च या मस्जिद में जाने से इन्हें कोई रोकता है? क्या उनके धर्म प्रवर्तक या उनकी आस्थाओं के बारे में दुष्प्रचार करने में कोई पहल करता है? इसके विपरीत ईसाई व मुस्लिम नेताओं के द्वारा हिन्दू देवी-देवताओं और आस्थाओं के अपमान से सम्बन्धित सामग्री सोशल मीडिया व लेखन जगत में भरी पड़ी है। क्या धार्मिक सहिष्णुता और शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व का दायित्व एकपक्षीय हो सकता है?

अवैध मतान्तरण व उसके विभिन्न प्रकार न केवल दूसरों की आस्थाओं का अपमान करते हैं, अपितु सह-अस्तित्व के लिए भी खतरे का निर्माण करते हैं। सन्तों, महात्माओं से लेकर महात्मा गांधी, डॉ भीमराव आम्बेडकर आदि ने इस पर कई बार चिन्ता भी व्यक्त की है। नियोगी कमीशन, वेणुगोपाल कमीशन और वधवा कमीशन ने भी मतान्तरण के इस दुष्परिणाम पर स्पष्ट रूप से लिखा है। संविधान सभा में भी इन परिणामों पर आशंका व्यक्त की गई, तो संसद के दोनों सदनों में भी बार-बार ये मुद्दे उठाए जा चुके हैं।

मतान्तरण को अपना अधिकार मानने वाले समाजों को भी समझना पड़ेगा कि अवैध मतान्तरण दोधारी तलवार है। यह उनके समाज के लिए भी घातक है। यह उनके अनुभव में बार-बार आया भी है। उन्हें अपनी नई पीढ़ी को उज्जवल भविष्य निर्माण करने के लिए प्रेरित करना चाहिए न कि अवैध मतान्तरण और लव जिहाद के षड्यंत्रों की अंधेरी गलियों में जाने के लिए। इन गलियों की दिशा केवल विनाश की ओर ही जाती है, विकास की ओर नहीं। विहिप अवैध मतान्तरण के इन सब पक्षों पर कई वर्षों से काम कर रही है। अब चुनौतियां बढ़ रही हैं, तो दायित्व भी बढ़ रहे हैं। सन्तों के मार्गदर्शन में और सामाजिक धार्मिक संगठनों के सहयोग से इस चुनौती पर अवश्य विजय प्राप्त करेंगे।

(लेखक विहीप के संयुक्त महामंत्री हैं)

घरवापसी हिन्दू समाज का नैसर्गिक स्वभाव, पुरखों के घर लौट चलो

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मुरारी शरण शुक्ल

दिल्ली । पतितपावन सीताराम कहने का अर्थ ही है कि पतितों को पावन करने की व्यवस्था सनातन परिपाटी में थी। अग्नि, जल, वायु वस्तुओं को पवित्र कर देते हैं, तो तप का मार्ग मनुष्य की कलुषता और दूषण को नष्ट कर देता है। धर्म का मार्ग शोधन की क्षमता से युक्त होता है, इसीलिए यह धर्म धारण करने में समक्ष होता है। प्राचीनकाल के मानव-शोधन के अनेक प्रसंग शास्त्रों में उपलब्ध हैं, किन्तु आधुनिक काल में प्रथम प्रसंग चाणक्य द्वारा अपनाया गया प्रतीत होता है। सेल्यूकस अपनी यवन सेना की पराजय के उपरान्त अरस्तू की मानस विषकन्या कार्नेलिया को निहित यवन जय के उद्देश्य से युद्धक भेंट के रूप में चन्द्रगुप्त को सौंपता है। चाणक्य कार्नेलिया समेत उसके साथ आई उसकी सभी सहेलियों और सेवकों का शुद्धीकरण करते हैं, फिर राज्य में स्वीकार करते हैं। उन्होंने अल्पप्रमाण में बौद्धों का भी शोधन किया, जो बाद के काल में कुमारिल भट्ट जैसों के लिए पथप्रदर्शक बना।

जिस दिन प्रथम हिन्दू मतान्तरित हुआ, उसी दिन से हिन्दू अपने मतान्तरित बन्धुओं को वापस हिन्दू धर्म में लाने को सतत प्रयत्नशील हैं। तब न आर्य समाज था, न हिन्दू महासभा थी, न आरएसएस था, न विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना हुई थी। जब कुमारिल भट्ट बौद्धों की हिन्दू धर्म में घर वापसी करा रहे थे, तब हिन्दू धर्म के उद्धार की पीड़ा से चीखती बनारस की बुजुर्ग महिला की हिन्दू बंधुओं के घर वापसी की करुण पुकार ही उनकी प्रेरणा थी। अर्थात् हमारा समाज तब भी घर वापसी को लेकर गम्भीर था। सामान्य नागरिक भी इन बातों को लेकर जागृत था। मार्ग ढूंढ रहा था।

आद्य शंकर के अभियानों के पीछे भी घर वापसी प्रमुख प्रेरणा थी। ईसा की द्वितीय, तृतीय शताब्दी से सन्तों द्वारा चलाए गए ग्रन्थ लेखन अभियान, ग्रन्थों का टीकाकरण अभियान, भक्ति जागरण अभियान मूलतः मतान्तरण रोकने और मतान्तरित हो चुके हिन्दुओं की घर वापसी के उपक्रम ही थे। ऋषि देवल सिन्ध में मुसलमान हो चुके हिन्दुओं की घर वापसी और मुसलामानों से अपवित्र हो चुके हिन्दुओं के शुद्धीकरण पर ग्रन्थ लिख रहे थे, तो हारीत मतान्तरण करने वालों को मुंहतोड़ प्रत्युत्तर देने के लिए बप्पा रावल को तैयार कर रहे थे। शस्त्र और शास्त्र, दोनों के मार्ग से निदान ढूंढा जा रहा था। यही सफलता दक्षिण में स्वामी विद्यारण्य भी प्राप्त करते हैं, जब मुसलमान हो चुके हरिहर और बुक्का को वापस हिन्दू बनाकर विजयनगर साम्राज्य की स्थापना करते हैं, जो यह कर्म उस सम्पूर्ण क्षेत्र में तीन सौ वर्षों तक मतान्तरण की संभावना समाप्त कर देता है।

मेघातिथि मनुस्मृति का भाष्य करते हुए आचार्य चाणक्य के विजय अभियानों के सूत्रों के तारतम्य मनु के प्रबन्धों से बैठाते हैं और घर वापसी का मार्ग हिन्दू समाज को बताते हैं। मलिन हो चुका हिन्दू, पतित हो चुका हिन्दू, अपवित्र हो चुका हिन्दू, म्लेच्छों के सन्सर्ग में आ चुका हिन्दू अनेक उपक्रमों से पवित्र हो सकता है। हिन्दू समाज ने पवित्रीकरण, शुद्धीकरण के अनेक मार्ग तलाश किए हैं, जिनके सहारे हिन्दुओं की घर वापसी सहज सम्भव है। हिन्दुओं की हर पूजा, कर्मकांड और साधना शुद्धीकरण के ही उपक्रम हैं, शुद्ध से शुद्धतम होते जाने के हेतु से। आधुनिक काल में स्वामी श्रद्धानन्द, सावरकर इत्यादि महापुरुषों ने भी इसका सत्यापन किया है। घर वापसी और शुद्धीकरण की तत्कालीन संकल्पना का ही प्रभाव था कि बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर अत्यन्त खिन्न होने के पश्चात् भी मुसलमान या ईसाई नहीं बने, बौद्ध धर्म अपनाया।

आयुर्वेद में मनुष्य की काया शुद्धि के न जाने कितने प्रकारों का वर्णन उपलब्ध है। आहार शुद्धि से काया शुद्धि तक की बात की गई है। कायाकल्प से लेकर कल्पवास तक का विवरण उपलब्ध है। उपवास और व्रत के अनेकानेक विवरण उपलब्ध हैं। चन्द्रायण व्रत से लेकर एकादशी तथा पूर्ण और अर्द्धदिवसीय उपवासों का भी विवरण उपलब्ध है। कफ, पित्त, वायु विकारों के शमन-शोधन, सप्तधातु और सप्तरसों के शोधन के प्रकार का भी विवरण है, तो नाड़ी शोधन की विधि का विवरण भी उपलब्ध है। मन की शुद्धि का विवरण तो शास्त्रों में भरा पड़ा है। मन की शुद्धि सभी पवित्रीकरण के प्रकारों में सर्वोत्तम माना गया है। कबीर ने भी संकेत किया है कि मन न रंगाये, रंगाये जोगी कपड़ा। पवित्रीकरण के बिना तो कोई यज्ञ या कर्मकांड आरम्भ ही नहीं होता। गंगाजल, पंचगव्य, शंखपानी, इत्यादि भी शुद्धीकरण के मार्ग हैं। तुलसी पत्ता भी संसर्ग मात्र से शुद्धि कर देता है। यज्ञ का धूम्र तो सहज शोधक है। तीर्थयात्रा और पवित्र नदियों में स्नान भी शुद्धीकरण के मार्ग हैं।

जल की शोधक क्षमता का वर्णन मिलता है। शंखपानी तो विवाह का महत्वपूर्ण शोधनकर्म है। उबटन और लेपन से भी शोधन होता है। अग्नि भी बहुत बड़ा शोधक है। अग्नि में दिव्य औषधियों को जलाकर उनका ताप और धूम्र लेने से भी सहज शोधन होता है। साधना के सभी प्रकार शोधन की ही विधियां हैं। वायु की शोधन क्षमता का व्यापक विमर्श साधना के क्रम में प्राणवायु के शोधन के अर्थ में किया जाता है। श्वास के साथ बीज मंत्रों का जप प्राण वायु को विस्तारित करता है, एक-एक चक्र खोलता है, कुंडलिनी जागृत करता है, ब्रह्मरंध्र का स्फोट करता है, सहस्त्रार भेदन करता है, तब कुछ भी शोधन शेष नहीं रहता। ध्वनि से भी शोधन होता है। शंकराचार्य ने बौद्ध धर्म में मतान्तरित हिन्दुओं को जिन विद्याओं की ओर प्रवृत्त होकर समाजिक कलुषित व दूषित होता हुआ देखा, तो शंखध्वनि से समाज के शुद्धीकरण का विधान प्रस्तुत किया। आद्य शंकर ने कहा कि जहां तक शंख ध्वनि जाएगी, वहां तक के हिन्दुओं का स्वतः शुद्धीकरण हो जाएगा। मंत्रध्वनि, शंखध्वनि, ढोल, नगाड़े, वाद्ययंत्रों व शास्त्रीय संगीत का स्वर, मंदिर के घन्टे का नाद, निनाद तथा प्रणव नाद में समान शोधन क्षमता है।

इतना सब कुछ जानने वाला हिन्दू समाज मतान्तरित बन्धुओं को कभी भी घर वापसी सहज रूप में कराने में सक्षम है। मनुष्य कभी अपवित्र होता नहीं और दुर्योगवश यदि अपवित्र हो ही गया, तो स्थाई अपवित्रता कभी आती नहीं। डीएनए तक के शोधन का विज्ञान भारत के शास्त्रों में उपलब्ध है। कोशिका-अणु-परमाणु स्तर तक का शोधन सम्भव है। ऐसे में हिन्दू बन्धु-भगिनी की घर वापसी किसी भी क्षण, कभी भी संभव है। हमने भूमि शोधन किया है, जल शुद्धि, वायु शुद्धि, प्रकृति शुद्धि, जीव शुद्धि, यहां तक कि ब्रह्म तक की शुद्धि का विधान हिन्दू जानता है।

आवश्यकता है ज्ञात बातों के तार जोड़ने की। उनके सम्यक सदुपयोग की। इन्हीं बातों को समझकर हिन्दू समाज ने आरम्भ से अब तक सदा शुद्धीकरण अभियान चलाया है और अपने हिन्दू बन्धुओं की घर वापसी का प्रयत्न किया है। प्रयत्न कालान्तर में विभ्रम के कारण धीमा हो गया था। किन्तु समय-समय पर सन्तों, विद्वानों ने मार्गदर्शन किया, घर वापसी सुनिश्चित की। आज आवश्यकता है व्यापक घर वापसी के अभियानों की। घर वापसी के सन्दर्भों की जागरूकता आवश्यक है। इसके मार्ग का व्यापक ज्ञान सर्व समाज को होना आवश्यक है। साधारणतः ये बातें सब ओर प्रसारित होने से समाज अपना हल स्वतः निकाल लेगा।

जो मुसलमान या ईसाई बन गए हैं, उनका शोधन कर उन्हें कभी भी हिन्दू समाज में वापस लाया जा सकता है। उनकी शुद्धि की प्रक्रिया बहुत सहज, सरल व सर्वसुलभ है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के कालान्तर में मतान्तरित हो चुके ऐतिहासिक हिन्दू बंधुओं के व्यापक शुद्धीकरण की बात हिन्दू बन्धुओं को अब अवश्य सोचनी चाहिए।

पुरखों के बारे में जानने की जिज्ञासा आज पश्चिम एशिया और यूरोप के देशों में भी जागृत होने लगी है। उनकी यह जिज्ञासा उन्हें उनके सनातन मूल की ओर ले जा रही है। इससे कई देशों में ऑसम विदाउट अल्लाह और एथीस्ट होने, विदाउट फेथ, एक्स मुस्लिम इत्यादि के आन्दोलन चल पड़े हैं। नैसर्गिक धर्म का भान होते ही व्यक्ति सनातन धर्म की ओर मुड़ता है। बस आवश्यकता है सनातन मत के लोग अपनी धर्म धारणा के प्रति आग्रही बनें और अपनी विलक्षणताओं को जगत में प्रस्तुत करने की प्रयत्न श्रृंखला चलाएं। सबको सत्य-धर्म से अवगत कराकर आह्वान करें- आओ भारतवंशियों, पुरखों के घर लौट चलो। स्वधर्मे निधनं श्रेयः पर धर्मों भयावहः। पुरखों के धर्म में मरना भी श्रेष्ठकर्म है। अतः अपने पुरखों के धर्म में वापस आ जाओ।

(लेखक विश्व हिंदू के सहसम्पादक हैं)

एक आंदोलन है, एडिटर्स क्लब ऑफ इंडिया अमिताभ अग्निहोत्री

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नोएडा। एडिटर्स क्लब ऑफ इंडिया न केवल एक संगठन है, बल्कि एक मिशन है – एक आंदोलन है, जो मीडिया के सर्वोत्तम मानकों को फिर से स्थापित करने का प्रयास कर रहा है। इस क्लब का हिस्सा होना केवल सम्मान की बात नहीं है, यह एक गहरी जिम्मेदारी है। और हम यह जिम्मेदारी पूरी सच्चाई और समर्पण के साथ निभाएंगे।

पत्रकारिता का इतिहास हमेशा संघर्ष और सत्य की खोज का इतिहास रहा है। आज के समय में जब हर तरह की चुनौती सामने है – चाहे वह राजनीति का दबाव हो, समाज की बढ़ती बुराइयाँ हों, या फिर बदलते हुए मीडिया परिदृश्य की जटिलताएँ – हम संपादकों को अपनी भूमिका को और भी सशक्त बनाने की आवश्यकता है। हमें यह समझने की जरूरत है कि पत्रकारिता सिर्फ एक पेशा नहीं है, यह समाज को सही दिशा देने और उसकी समस्याओं को उजागर करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।

एडिटर्स क्लब ऑफ़ इंडिया का उद्देश्य यही है कि हम अपने सामूहिक प्रयासों से पत्रकारिता को न सिर्फ बचाएं, बल्कि उसे एक नए आयाम तक पहुंचाएं। हम न केवल सत्य बोलने की कोशिश करेंगे, बल्कि उस सत्य को जोर-शोर से और पूरी ताकत से प्रस्तुत करेंगे, जिसे समाज की नज़र से छुपा दिया जाता है। हम समाज के हर वर्ग की आवाज़ बनेंगे, उन मुद्दों पर काम करेंगे जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है, और सबसे बढ़कर, हम यह सुनिश्चित करेंगे कि पत्रकारिता का यह शंखनाद कभी रुके नहीं, कभी थमे नहीं।

हमारा संगठन एक मंच के रूप में कार्य करेगा, जहां देशभर के संपादक और पत्रकार आपस में विचार-विमर्श करेंगे, एक-दूसरे से सीखेंगे और सबसे बढ़कर, एक-दूसरे को सशक्त बनाएंगे। यह क्लब केवल एक नेटवर्क नहीं है, बल्कि यह एक परिवार है, जो पत्रकारिता की रक्षा करने के लिए एकजुट है। हम एक ऐसी पत्रकारिता की दिशा में काम करेंगे, जो समाज के हर तबके के लिए न्यायपूर्ण हो, जो अपने मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध हो, और जो मीडिया की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को सर्वोपरि रखे।

हमारा रास्ता कठिन हो सकता है, और हम पर कई बार दबाव डाला जाएगा, लेकिन हम यह कभी नहीं भूलेंगे कि हम जिस रास्ते पर चल रहे हैं, वह सत्य का मार्ग है। हमें यह याद रखना होगा कि कोई भी सच्चाई जितनी कठिन होती है, वह उतनी ही शक्तिशाली भी होती है। हम सब मिलकर इसे साबित करेंगे।

हमारे क्लब का उद्देश्य केवल पत्रकारिता के सशक्तिकरण तक सीमित नहीं है। हम चाहते हैं कि हर संपादक को अपनी शक्ति का अहसास हो, और वह अपने प्रभाव से समाज की दिशा को बदलने की ताकत रखता हो। जब हम एकजुट होंगे, तब हम किसी भी चुनौती का सामना कर सकते हैं, क्योंकि यह क्लब सिर्फ एक संगठन नहीं, बल्कि एक सोच, एक आंदोलन है।

आइए, हम सब मिलकर पत्रकारिता को एक नई दिशा दें और एक ऐसी मीडिया का निर्माण करें जो न केवल समाज को जागरूक करे, बल्कि उसे सशक्त भी बनाए।
(लेखक एडिटर्स क्लब ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष हैं)

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