He is Lalit Kishor, IAS 2022 batch.

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The Skin Doctor

Gorakhpur : He was on a surprise inspection in Bhagalpur when the local SDM, who didn’t recognise him, politely asked about his designation. Lalit lost his temper and slapped the SDM twice, repeatedly shouting, “Humko nahi pehchante ho?” The SDM was so embarrassed he didn’t even file a complaint.

Months passed. Today, while watching the news, the SDM saw a report that Gorakhpur Police had arrested a fake IAS officer in Lucknow. He was shocked to realise the imposter was the same man who had slapped him in Bhagalpur. Only then did he report the incident.

Meet Gaurav Kumar Singh alias Lalit Kishor, a maths postgraduate from Sitamarhi, Bihar. He couldn’t crack the UPSC so found a faster route to power: if you can’t clear IAS, just be IAS. And so emerged “IAS officer Lalit Kishor, 2022 batch.”

He forged documents, fake appointment letters, and built a whole ecosystem to sustain the lie. He roamed across states in a beacon-fitted Innova, backed by a 15-member entourage including 10 hired gummen. He created fake inspections, fake tenders, fake files. Maintaining this illusion cost him around five lakh rupees a month.

With the aura set, he targeted contractors and job-seekers across UP, Bihar, Jharkhand and MP. Over forty people fell for his promises of tenders and postings. One deal alone brought in five crore rupees. Meanwhile, his personal life drifted into full drama: four girlfriends, three claiming pregnancy, all believing they were with a senior IAS officer.

He was exposed when a businessman was caught at Gorakhpur station with nearly a crore meant for him.

देशी तालीम की कड़वी हकीकत: स्कूल दरकिनार, कोचिंग ही अब मुकद्दर की चाबी

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कोटा (राजस्थान): सुबह की पहली किरणें अभी आंखें मल रही होती हैं, लेकिन सुभाष की दौड़ पहले ही शुरू हो चुकी होती है। एक हाथ में कोचिंग की मोटी-मोटी किताबें लटक रही हैं, दूसरे में स्कूल का पुराना बैग लटका है, और कंधों पर तो पूरे खानदान की आशाओं का पहाड़ सवार है। बारहवीं कक्षा का यह दुबला-पतला लड़का मेडिकल और इंजीनियरिंग की इस बेरहम रेस में फँस चुका है, मानो दो पाटों वाली चक्की में पिसता हुआ अनाज। सुबह की मजबूरी में स्कूल, दोपहर कोचिंग की कैद, रात भर टेस्ट सीरीज की जद्दोजहद, और बीच-बीच में बस कुछ घूँट चाय और साँसें जो तनाव के बोझ तले सिकुड़ती जा रही हैं। अम्मी-पापा की गाढ़ी पसीने की कमाई दाँव पर लगी है, और सुभाष हर लम्हा खुद को साबित करने की अदृश्य जंग लड़ता रहता है, थका-हारा, दबा-कुचला, लेकिन अभी टूटा नहीं। लेकिन यह कहानी सिर्फ सुभाष की नहीं, बल्कि लाखों किशोरों की है, जो भारत की तालीम के इस काले साये तले जूझ रहे हैं।

उधर, शिक्षा मंत्रालय के बंद दरवाजों के पीछे चल रही एक नौ सदस्यीय हाई-लेवल कमिटी की बैठक ने देश की तालीम व्यवस्था का वह नंगा पक्ष सामने ला दिया है, जिसे सालों से नजरअंदाज किया जाता रहा। जून 2025 में गठित यह कमिटी, जो नीट और जेईई जैसी परीक्षाओं के कोचिंग संस्कृति पर फोकस कर रही है, ने साफ-साफ कहा कि आज भारत में कोई बड़ी प्रतियोगी इम्तिहान स्कूल की पढ़ाई से नहीं, बल्कि कोचिंग सेंटर्स की मेहनत से सफल होता है। जेईई मेन 2025 के सेशन-1 में 14 टॉपर्स ने 100 परसेंटाइल हासिल किया, जिनमें से ज्यादातर एलन या मोशन जैसे कोचिंग संस्थानों के शागिर्द थे। नीट 2025 में टॉप-10 में चार नाम एलन के थे, और कुल टॉप-100 में 39.

एनसीईआरटी की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, 90 फीसदी से ज्यादा टॉपर्स कोचिंग की चौखट से निकलते हैं। इसका मतलब साफ है: सरकारी और प्राइवेट स्कूलों की 12 साल की तालीम अब प्रतियोगी इम्तिहानों के लिए बेकार साबित हो रही है।

पिछले एक दशक में लाखों नौजवानों का रोजमर्रा दो हिस्सों में बंट चुका है, सुबह की मजबूरी में स्कूल, शाम कोचिंग की बेड़ियाँ। विद्यालय अब सिर्फ हाजिरी दर्ज करने की रस्म बनकर रह गए हैं, जबकि असली इल्म कोचिंग में बिकता है। नतीजा? कोटा, दिल्ली, पटना, हैदराबाद जैसे शहरों में कोचिंग इंडस्ट्री एक अरबों डॉलर की कारोबारी मशीन बन चुकी है। आईएमएआरसी ग्रुप की 2025 रिपोर्ट बताती है कि भारत की कोचिंग मार्केट साइज वर्तमान में 58,000 करोड़ रुपये है, जो 2028 तक 1.34 लाख करोड़ और 2033 तक 1.45 लाख करोड़ छू लेगी, 10.4 फीसदी की सालाना ग्रोथ रेट के साथ। लेकिन यह व्यवसाय बच्चों की जिंदगी पर भारी पड़ रहा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की 2023 रिपोर्ट के मुताबिक, छात्र आत्महत्याओं में 2012 से 2022 तक 65 फीसदी की बढ़ोतरी हुई, और 2023 में यह आंकड़ा 13,892 तक पहुंच गया , कुल सुसाइड्स के 8.1 फीसदी। कोटा में ही 2024-25 में 20 से ज्यादा केस दर्ज हुए, जहां लंबे कोचिंग सेशन, नींद की कमी, खान-पान की बेपरवाही और लगातार तनाव ने नौजवानों का दिमागी तौर पर तबाह कर दिया। आईसी3 इंस्टीट्यूट की स्टडी कहती है कि सालाना 13,000 से ज्यादा छात्र इस दबाव में जान दे देते हैं।
दुनिया के ज्यादातर तरक्की पसंद मुल्कों में कोचिंग तो होती है, लेकिन सहायक की हैसियत में। जर्मनी, फ्रांस, जापान, फिनलैंड या दक्षिण कोरिया में स्कूली तालीम इतनी मजबूत होती है कि बच्चे बिना एक्स्ट्रा कोचिंग के वर्ल्ड-क्लास यूनिवर्सिटी में दाखिला पा लेते हैं। फिनलैंड की मॉडल पर 2025 की एक यूनेस्को रिपोर्ट कहती है कि वहां स्ट्रेस-फ्री लर्निंग से छात्रों की क्रिएटिविटी 40 फीसदी ज्यादा है। लेकिन भारत अकेला ऐसा मुल्क है, जहां कोचिंग एक पैरलल, समानांतर तालीम निजाम बनकर स्कूलों को बौना साबित कर रही है। नई शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के तहत 2025 तक 5+3+3+4 स्ट्रक्चर लागू हो चुका है, जो स्ट्रीम्स की बेड़ियों को तोड़ता है, अब छात्र साइंस के साथ आर्ट्स चुन सकते हैं। एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट्स (एबीसी) से फ्लेक्सिबल लर्निंग मिली है, और 82 फीसदी स्कूलों में हाइब्रिड लर्निंग अपनाई गई है। लेकिन कोचिंग का वर्चस्व अभी भी बरकरार है, क्योंकि एंट्रेंस एग्जाम का सिलेबस स्कूल कोर्स से कटा हुआ है।

शिक्षाविदों का मानना है कि समस्या की जड़ एंट्रेंस इम्तिहानों का स्कूली सिलेबस से ताल्लुक न होना है। जब तक जेईई और नीट ग्यारहवीं के बजाय बारहवीं के सिलेबस पर न आधारित होंगे, कोचिंग का राज खत्म नहीं होगा। जून 2025 में गठित सेंट्रल गवर्नमेंट कमिटी ने सिफारिश की है कि ये इम्तिहान ग्यारहवीं में शिफ्ट हो जाएं, साल में दो बार मौका मिले, और बारहवीं का बोझ आधा हो, ताकि दोहरी जकड़न से बच्चे बाहर निकल सकें। नवंबर 2025 में संसदीय स्टैंडिंग कमिटी ने कोचिंग सेंटर्स की फसल को रिव्यू करने का ऐलान किया, जिसमें स्टूडेंट स्ट्रेस, डमी स्कूल्स और सोशल इश्यूज पर फोकस है। असम में कोचिंग इंस्टीट्यूट्स रेगुलेशन बिल 2025 पेश किया गया, जो ट्रांसपेरेंसी, क्वालिटी और स्टूडेंट वेलफेयर सुनिश्चित करेगा।
कोचिंग के बेलगाम कारोबार पर लगाम के लिए कमिटी ने सख्त कदम सुझाए। कई शहरों में बच्चे दिन में 6-7 घंटे कोचिंग में कैद रहते हैं, कमिटी ने इसे अधिकतम 3 घंटे तक सीमित करने का प्रस्ताव रखा। बोर्ड एग्जाम को मजबूत बनाकर, एक हल्के एप्टीट्यूड टेस्ट को मिलाकर एंट्रेंस स्कोर तैयार करने की दिशा में काम तेज। लक्ष्य है रटंत रिवाज को उखाड़ फेंकना और समझ-आधारित तालीम को हवा देना। डमी स्कूल्स की कड़वी हकीकत भी सामने आई, देशभर में हजारों ऐसे स्कूल्स जहां सिर्फ रजिस्ट्रेशन होता है, क्लासेस नहीं लगतीं। एनसीईआरटी को निर्देश दिया गया कि ग्यारहवीं-बारहवीं के लिए नेशनल मिनिमम कोर करिकुलम तैयार हो। हर विद्यालय में क्वालिफाइड करियर काउंसलर मुकर्रर करना जरूरी, क्योंकि गलत फहमियां और खौफ ही बच्चों को कोचिंग की ओर धकेलते हैं।

एनईपी 2020 के पांच सालों में प्रोग्रेस हुई है, टीचर ट्रेनिंग में 30 फीसदी इजाफा, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में 50 फीसदी कवरेज, लेकिन चैलेंजेस बाकी हैं। 2025 की एक स्टडी (इकोनॉमिक टाइम्स) कहती है कि इंटरनेशनल कोलैबोरेशन्स से करिकुलम डिजाइन बेहतर हो रहा है, लेकिन कोचिंग का असर अभी भी स्कूलों को कमजोर कर रहा। अगर ये सुधार वक्त पर लागू हो गए, इम्तिहान school सिलेबस से जुड़ें, कोचिंग पर अंकुश लगे, और करिकुलम यथार्थ की जरूरतों के मुताबिक ढल जाए, तो शायद कुछ सालों में वो दिन लौट आएं जब बच्चे स्कूल की बेंच से ही आईआईटी, एआईएमएस और बड़े यूनिवर्सिटी का टिकट कटाते नजर आएं। तब तक कोचिंग बादशाह बनी रहेगी, स्कूल प्रजा, और बच्चों का बचपन बाजार की भेंट चढ़ता रहेगा। लेकिन उम्मीद की किरण है, अब सरकार जाग चुकी है।

हम दो हमारे दो के नारे ने एक खामोश क्रांति को अंजाम दिया

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हैदराबाद : सुबह की गुलाबी रोशनी में महाराष्ट्र के सातारा ज़िले के एक छोटे से गाँव की रूटीन ज़िंदगी जगने लगती है, मुर्गों की बाँग, पीतल के बर्तनों की खनक, और बरगद के पेड़ के नीचे बैठी आशा वर्कर संगीता, जिसने अपनी नीली दवाई-बक्शा खोलकर सामने फैला दी है। गन्ने के खेतों पर पड़ती धूप में वह औरतों के एक घेरे को समझा रही है कि जन्मों में फ़ासला रखना कैसे माँ और बच्चे दोनों की ज़िंदगी बचाता है। कुछ औरतें बच्चों को गोद में लिए हैं, कुछ संकोच में ऐसे सवाल पूछ रही हैं जो शायद वे अपने शौहर के सामने कभी न पूछ पातीं। इस सादे से सुबह के दृश्य में भारत की असली आबादी-क्रांति दर्ज है, न फ़ाइलों में, न नारेबाज़ी में, बल्कि एक-एक आशा की सब्र, मोहब्बत, और इख़्तियार देने की कोशिश में।

आज़ादी के तुरंत बाद भारत एक बड़ी जनसंख्या चुनौती से घिरा था। तेज़ आबादी बढ़ोतरी ने अनाज, सरकारी सेवाओं, और विकास योजनाओं पर भारी दबाव डाला। 1952 में भारत ने दुनिया का पहला राष्ट्रीय परिवार नियोजन कार्यक्रम शुरू किया, एक बेहद दूरअंदेश कदम। मक़सद था: छोटे परिवार, बेहतर सेहत और बेहतर ज़िंदगी।

शुरुआती कोशिशों में उम्मीद थी, पर रफ़्तार धीमी। अनपढ़ी, परंपराएँ, और कमज़ोर स्वास्थ्य सेवाओं ने प्रयासों को सीमित रखा।
1960 के दशक के आख़िरी तक सरकार पर बढ़ती जनसंख्या का ख़ौफ़ हावी होने लगा। नसबंदी कैंप बढ़ाए गए; कई जगह दबाव और लक्ष्य थोपे जाने लगे। इमरजेंसी के दौरान (1975–77) यह अंधेरा चरम पर पहुँचा, संजय गांधी की बदनाम नसबंदी मुहिम में एक साल में 60 लाख से अधिक मर्दों की ज़बरन नसबंदी कराई गई। “फ़ैमिली प्लानिंग” एक डरावना जुमला बन गया।

सियासी प्रतिक्रिया भयंकर थी। सरकार को यह तीखा सच स्वीकारना पड़ा कि आबादी पर क़ाबू ज़बरदस्ती से नहीं, यक़ीन और भरोसे से होता है।
इमरजेंसी के बाद सरकार ने रास्ता बदला। 1977 में कार्यक्रम का नाम बदलकर ‘फ़ैमिली वेलफ़ेयर’ कर दिया गया, सारा ज़ोर सहमति, जागरूकता और भलाई पर रखा गया। औरतों को नीति की केन्द्र-बिंदु बनाया गया, क्योंकि सिर्फ़ उनके रुख से ही बदलाव संभव था।

1980 और 1990 के दशकों में धीरे-धीरे लक्ष्य-आधारित रवैया छोड़ा गया। 1994 की “टारगेट-फ्री” नीति ने पहली बार कमान समुदाय को सौंप दी। नारा बदला: “बच्चे हों पसंद से, मजबूरी से नहीं।”

2000 की राष्ट्रीय जनसंख्या नीति ने स्पष्ट दिशा दी, सबको गर्भनिरोधक उपलब्ध कराना, महिलाओं के प्रजनन अधिकार मजबूत करना, मर्दों की भागीदारी बढ़ाना, और कुल प्रजनन दर (TFR) को 2.1 तक लाना।

2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (NRHM) सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ। माँ-बच्चे की सेहत, टीकाकरण और परिवार नियोजन को पहली बार एक ही ढाँचे में जोड़ा गया। इसके केंद्र में थीं आशा (ASHA) कार्यकर्ता, गाँव-गाँव की वह भरोसेमंद दूत, जो घर-घर जाकर न सिर्फ़ दवाइयाँ देती है बल्कि एक भरोसेमंद मित्र की तरह खुलकर बात करने का हौसला देती है। परिवार नियोजन अब ‘हुक्म’ नहीं, बल्कि ‘हक़’ बन गया।

2010 के बाद भारत में परिवर्तन साफ़ दिखने लगा। मिशन परिवार विकास, अंतरा इंजेक्शन, छाया गोली, प्रसवोत्तर IUD और नो-स्कैल्पल नसबंदी जैसी योजनाओं ने विकल्प बढ़ाए।

नतीजे हैरतअंगेज़ हैं। 1960 के दशक में 6 की TFR अब 2025 में 1.9—यानि replacement level से भी नीचे। आबादी की वृद्धि दर 1% से कम। अनुमान है कि 2047 तक जनसंख्या स्थिर हो जाएगी। मातृ मृत्यु आधी रह गई, शिशु मृत्यु दर 1950 के 146 से घटकर 27 (2020) पर पहुँच गई।

छोटे परिवारों ने सामाजिक ढाँचे को भी बदला, ज़्यादा पढ़े-लिखे बच्चे, महिलाओं की शिक्षा और रोज़गार में बढ़त, और घरेलू निर्णयों में उनकी मज़बूत भूमिका।

तस्वीर पूरी तरह चमकदार नहीं। बिहार (TFR 3.0) और उत्तर प्रदेश (2.4) अब भी पिछड़ रहे हैं, जबकि दक्षिण भारत का TFR 1.8 से भी नीचे है। लगभग 10% महिलाओं की परिवार नियोजन की ज़रूरतें अब भी अधूरी हैं। बाल विवाह आज भी कई जगह गर्भधारण और ग़रीबी के चक्र को बनाए रखता है।

साथ ही, “जनसंख्या momentum”—भारत की बड़ी युवा आबादी—2050 तक लगभग 30 करोड़ और लोग जोड़ देगी। दूसरी तरफ़ घटती प्रजनन दर बुढ़ापे की नई चुनौतियाँ भी लाएगी, देखभाल, पेंशन, और सामाजिक सुरक्षा।

भारत की आबादी की कहानी अब ज़बरदस्ती की नहीं, बल्कि यक़ीन, और बुनियादी इंसानी गरिमा की है। यह इंक़लाब सरकारी दफ़्तरों में नहीं, बल्कि गाँव की चौपालों में, चाय की दुकानों में, और छोटी क्लीनिकों में हुआ, एक-एक बातचीत के ज़रिए।

आज परिवार नियोजन सिर्फ़ आंकड़ों का मसला नहीं, बल्कि बराबरी, सेहत और सम्मान का पैमाना है। दुनिया के सबसे बड़े मुल्क ने साबित कर दिया कि जब नीति लोगों के अधिकारों से मेल खाए, तो बदलाव खामोशी से भी आ सकता है, खूबसूरती से, अमन के साथ।

यह निस्संदेह आज़ाद भारत की सबसे बड़ी और सबसे ख़ामोश क्रांतियों में से एक है, जो घर-घर में, एक-एक औरत के फ़ैसले से आगे बढ़ी।

विकसित भारत का मूल मंत्र बनेगा- वंदे मातरम

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दिल्ली । जिससे स्वतंत्रा का मूल मंत्र, “वंदेमातरम” उद्भासित हुआ, जिसे गाते हुए हज़ारों की संख्या क्रांतिकारी फांसी के फंदे पर झूल गए, जीवन जेलों की क्रूर यातनाओं में काट दिया, जिस गीत ने माँ भारती के प्रति प्रेम और समर्पण को परिभाषित किया, जिस गीत ने स्वाधीनता की अलख संपूर्ण भारत में जगा दी वह गीत है राष्ट्रगीत वंदेमतारम। भारत विभाजन के पूर्वाभ्यास के रूप में बंग -भंग करने के अंग्रेजी षड्यंत्र को पहचानकर सम्पूर्ण राष्ट्र बंगाल विभाजन के विरुद्ध खड़ा हो गया । इस आंदोलन के दो हथियार थे स्वदेशी का स्वीकार और विदेशी का बहिष्कार और रणघोष बना था वंदेमातरम। इस गीत के रचनाकार थे बंगाल में जन्मे माँ भारती के महान सपूत श्री बंकिम चंद्र चटटोपाध्याय। आज वंदेमातरम अपनी रचना का 150 वां वर्ष मना रहा है।
इस अवसर पर वंदेमातरम गीत के माध्यम से एक बार पुनः राष्ट्र में ”स्व” की भावना की अलख जगाने का आह्वान प्रधानमंत्री मोदी जी ने किया है ।

वंदेमातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर देशभर में अनेकानेक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हें। इसी श्रृंखला में संसद के दोनों सदनों में वंदेमातरम पर व्यापक चर्चा हुई। लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तथा राज्यसभा में गृहमंत्री अमित शाह ने चर्चा की शुरुआत की। सत्तापक्ष के वक्ताओं ने जहां वंदेमातरम गीत के इतिहास और उसकी महत्ता पर प्रकाश डालते हुए वंदेमातरम के प्रति कांग्रेस व वामपंथी दलों की विचारधारा और सोच को बेनकाब किया। विपक्ष ने इसके पीछे बंगाल चुनावों को ध्यान में रखते हुए की गई चर्चा बताया। कुछ विपक्षी सांसदो न कहा कि वंदेमतारम पर बहस गैरजरूरी और मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए की जा रही है। इतने गम्भीर व ऐतिहासिक विषय की बहस के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी सदन से गायब रहे। संसद में वंदेमातरम पर हुई व्यापक चर्चा सिर्फ एक गीत पर विमर्श नहीं वरन भारत की सांस्कृतिक चेतना, स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणा और राष्ट्रीय एकता के मूल्यों को दोबारा केंद्र में लाने का प्रयास भी है।

चर्चा का आरम्भ करते हुए लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उसके बाद रक्षामंत्री राजनाथ सिंह तथा राज्यसभा में गृहमंत्री अमित शाह ने वंदेमातरम के प्रति कांग्रेस व उनके नेताओं की सोच को बेनकाब कर दिया। सरकार ने वंदेमातरम गीत की प्रेरणा से संकल्प लेकर वर्ष 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के साथ राष्ट्रगीत को जीवंत बनाने का संकल्प लिया। वंदेमातरम गीत की महानता पर बोलते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि जो वंदे मातरम 1905 में महात्मा गांधी को राष्ट्रगान के रूप मे दिखता था, देश के हर कोने में हर व्यक्ति के जीवन में जो भी देश के लिए जीता जागता था उन सबके लिए वंदेमातरम की ताकत बहुत बड़ी थी।वंदेमातरम इतना महान था, उसकी भावना इतनी महान थी तो फिर पिछली सदी में इसके साथ इतना बड़ा अन्याय क्यों हुआ? वंदे मातरम के साथ विश्वासघात क्यों हुआ ? वह कौन सी ताकत थी जो पूज्य बापू की भावनाओं पर भी भारी पड़ गई ? किसने वंदेमातरम जैसी पवित्र भावना को भी विवादों में घसीट दिया। सदन को बताया गया कि जब वंदे मातरम को 50 वर्ष हुए तब देश गुलामी में जीने को मजबूर था और जब वंदेमातरम के 100 वर्ष पूर्ण हुए तब देश आपातकाल की जंजीरो में जकड़ा हुआ था जिस वंदे मातरम ने देश को आजादी की नई ऊर्जा दी थी जब उसके 100 वर्ष हुए तो दुर्भाग्य से एक काला इतिहास हमारे कालखंड में उजागर हो गया।

प्रधानमंत्री ने बताया कि वंदे मातरम के प्रति मुस्लिम लीग के विरोध की राजनीति तेज होती जा रही थी। मोहम्मद अली जिन्ना ने लखनऊ से 15 अक्तूबर 1937 को वंदे मातरम के विरुद्ध नारा बुलंद किया। कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष जवाहर लाल नेहरू को अपना सिंहासन डोलता दिखा तो उन्होंने मुस्लिम लीग के आधारहीन बयानों को तगड़ा जवाब देने के बजाय वंदे मातरम की ही पड़ताल शुरू कर दी और कहा कि कांग्रेस कार्यकारिणी में वंदेमातरम की उपयोगिता पर चर्चा होगी। इससे पूरा देश हतप्रभ रह गया। देशभक्तों ने कांग्रेस के उस प्रस्ताव के खिलाफ देश के कोने -कोने में प्रभात फेरियां निकालीं और वंदेमातरम गीत गाया किन्तु देशभक्तों को अनसुना करते हुए 26 अक्तूबर 1937 को कोलकाता अधिवेशन में कांग्रेस ने वंदेमातरम पर समझौता कर लिया।

रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने वंदे मातरम को राष्ट्रगान जैसा सम्मान मिलने की बात कही। राजनाथ सिंह ने यह धारणा तोड़ने का प्रयास किया कि वंदे मातरम किसी सांप्रदायिक विचार का परिचायक है। उन्होंने कहा कि कुछ कट्टरपंथियों ने जानबूझकर इसे धर्म के चश्मे से देखने की कोशिश की जबकि यह गीत भारत माता के प्रति समर्पण और स्वतंत्रता की पुकार का प्रतीक है।

राज्यसभा में गृहमंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के 1937 के अधिवेशन में वंदे मातरम के अंतिम चार छंदों का गायन रोके जाने के प्रस्ताव पर बात की ओैर पंडित नेहरू के भूमिका पर प्रश्न उठाए। गृहमंत्री ने आरोप लगाया कि संसद में जब भी वंदेमातरम का गायन होता है तब कई विपक्षी सदस्य सदन से बाहर चले जाते हैं। वंदे मातरम पर चर्चा की आवश्यकता पर उत्तर देते हुए अमित शाह ने कहा कि वंदे मातरम पर चर्चा की आवश्यकता जब वंदे मातरम रचा गया था तब भी थी, आजादी के समय मे भी थी, आज भी है और 2047 में जब आधुनिक भारत होगा तब भी रहेगी क्योकि वंदे मातरम में कर्तव्य और राष्ट्रभक्ति की भावना है । गृहमंत्री अमित शाह ने स्पष्ट रूप से कहा कि जिस पार्टी के अधिवेशन की शुरुआत गुरुवर रवींद्र नाथ टैगोर वंदे मातरम गाकर कराते थे उस पर जब लोकसभा में चर्चा हुई तो गांधी परिवार के सदस्य सदन में नहीं थे।नेहरू से लेकर आज तक कांग्रेस ने वंदेमातरम गान का विरोध किया है। भविष्य में वंदेमातरम देश को विकसित और महान बनाने का उद्घोष बनेगा।

वंदेमातरम गीत ने राष्ट्र की सोई हुई को चेतना को जाग्रृत किया और देशवासियों ने विदेशी वस्तुओं का प्रयोग पूरी तरह से बंद कर दिया। आज आत्मनिर्भर भारत विकसित बनाने के लिए उसी वंदेमातरम के भाव का आह्वान प्रधानमंत्री जी ने किया है। वंदेमातरम कोटि कोटि भारत वासियों के ह्रदय के तारों को झंकृत करे और प्रत्येक भारतीय प्राणप्रण से भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के यज्ञ में कूद पड़े यही वंदेमातरम की 150 वीं वर्षगांठ मनाने की सार्थकता होगी।

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