बंगाल की सियासी आग: तृणमूल का तुष्टीकरण और 2026 का हिंदू जागरण

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कोलकाता की गलियों में राम नवमी की धूम मच रही थी। हिंदू युवा भगवा झंडे लहराते, मंदिरों की घंटियां बज रही थीं। तभी, मुरशिदाबाद के बेल्डंगा में एक पोस्टर चिपका मिला—’बाबरी मस्जिद का शिलान्यास 6 दिसंबर को’। यह घोषणा तृणमूल कांग्रेस के विधायक हुमायूं कबीर की थी। “तीन साल में मस्जिद पूरी हो जाएगी, मुस्लिम नेता आएंगे,” उन्होंने कहा। दूर अयोध्या में राम मंदिर की भव्यता का जश्न मनाते हिंदू समाज के लिए यह चुभन थी। बीजेपी नेता सुकंता मजुमदार ने इसे “हिंदुओं के लिए खुली धमकी” कहा। बिहार के डिप्टी सीएम विजय सिन्हा ने चेतावनी दी, “भारत माता के बच्चे जाग चुके हैं, बाबर का कोई समर्थक अब बाबरी नहीं बना सकेगा।”

यह घटना 2025 की है, लेकिन 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों की नींव इसी पर रखी जा रही है। ममता बनर्जी की तृणमूल सरकार पर मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोप सालों से लगते रहे हैं। अब ‘पश्चिम बंगाल’ को ‘पश्चिम बांग्लादेश’ कहना बीजेपी का नया हथियार बन गया है। कारण? अवैध घुसपैठ, जनसांख्यिकीय बदलाव और हिंदू असुरक्षा। बीजेपी की नजर में, यह तुष्टीकरण बंगाल को ‘ईस्ट पाकिस्तान’ की तरह विभाजित करने की साजिश है। 1947 में बंगाल का धार्मिक आधार पर बंटवारा हुआ था—पूर्वी हिस्सा मुस्लिम बहुल ईस्ट बंगाल (बाद में बांग्लादेश) बना, पश्चिमी हिस्सा हिंदू बहुल वेस्ट बंगाल। आज, बीजेपी दावा करती है कि ममता की नीतियां उसी इतिहास को दोहरा रही हैं।
कबीर का बयान कोई पहला उदाहरण नहीं। तृणमूल का मुस्लिम तुष्टीकरण लंबे समय से विवादों में रहा है। 2012 में, ममता सरकार ने 77 मुस्लिम समुदायों को OBC कोटा में शामिल किया—इनमें से 75 शुद्ध मुस्लिम थे। कलकत्ता हाईकोर्ट ने इसे “अल्पसंख्यक तुष्टीकरण” करार देते हुए रद्द कर दिया।

बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी ने कहा, “OBC का मतलब अब ‘वन साइडेड बेनिफिशरी’ हो गया—केवल मुसलमानों के लिए।” इससे पहले, इमामों को 2500 रुपये मासिक भत्ता दिया गया, जबकि हिंदू पंडितों को सिर्फ 1000। सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक ठहराया। ममता ने खुद 2019 में कहा, “मैं मुसलमानों का तुष्टीकरण करती हूं, और सौ बार करूंगी। दूध देने वाली गाय की लात खाने को तैयार हूं।” फुरफुरा शरीफ दावत-ए-इफ्तार में उनकी मेजबानी, वक्फ एक्ट विरोध में मुसलमानों को “दीदी आपकी संपत्ति की रक्षा करेगी” का आश्वासन—ये सब तुष्टीकरण के प्रमाण हैं।
‘पश्चिम बांग्लादेश’ की उपाधि का आधार जनसांख्यिकीय आंकड़े हैं। 2011 की जनगणना में मुसलमान 27% थे, लेकिन अब अनुमान 30% से ऊपर। बीजेपी का आरोप है कि बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ ममता सरकार की आंखें बंदी से बढ़ी। 2025 में SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) अभियान में 10 लाख नए वोटर जोड़े गए—जिनमें से अधिकांश मुस्लिम। बीजेपी अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा, “यह चुपचाप जनसांख्यिकीय आक्रमण है। 2026 का चुनाव बंगाल और बंगाली हिंदुओं के अस्तित्व का फैसला करेगा।” मुरशिदाबाद में Waqf एक्ट विरोध के दौरान हिंसा हुई—तीन मौतें, 150 गिरफ्तारियां। बीजेपी ने इसे “इस्लामिस्ट भीड़” कहा, जबकि TMC ने “बीजेपी की साजिश”। संदेशखाली हिंसा, जहां हिंदू महिलाओं पर अत्याचार हुए, ने हिंदू मतदाताओं को झकझोर दिया।

बीजेपी के लिए यह सुनहरा अवसर है। 2024 लोकसभा में 38.73% वोट शेयर के साथ, वे 2026 में 7-8% की बढ़ोतरी चाहते हैं। हिंदू ध्रुवीकरण उनकी रणनीति है—राम मंदिर जश्न, हनुमान जयंती पर भगवा झंडे। सुवेंदु अधिकारी कहते हैं, “ममता हिंदू-विरोधी हैं, बंगाल को बांग्लादेश बना देंगी।” RSS की घासफूस मजबूत हो रही है, गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों (ईसाई, बौद्ध) को लुभाया जा रहा। लेकिन चुनौती बाकी: मुस्लिम 30% वोट TMC के पक्के हैं, 100 सीटों पर वे निर्णायक। बीजेपी को 150+ सीटें चाहिए, जो TMC की बूथ-स्तरीय ताकत से मुश्किल।

फिर भी, कबीर का बयान बीजेपी का ट्रंप कार्ड है। यह हिंदू असंतोष को भुनाएगा—जैसे हरियाणा, महाराष्ट्र में हुआ। ममता का ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ (मंदिर दर्शन, दुर्गा पूजा) जवाब है, लेकिन घुसपैठ और हिंसा के सवालों से बचना मुश्किल। 2026 में बंगाल ‘NRC चुनाव’ से ‘SIR चुनाव’ बनेगा। हिंदू जागेंगे, बीजेपी मजबूत। ममता की कुर्सी डगमगाएगी। बंगाल की मिट्टी में राम का नाम गूंजेगा, बाबर का नहीं। क्या यह ‘पश्चिम बांग्लादेश’ को ‘मां भारती का अभिन्न अंग’ बना देगा? समय बताएगा, लेकिन बीजेपी का संदेश साफ: “हम बंगाल बचाएंगे।”

धर्मेंद्र की मृत्यु पर सोशल मीडिया पर बने दो खेमे

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सर्जना शर्मा

दिल्ली। सिने स्टार धर्मेंद्र की मृत्यु के बाद सोशल मीडिया पर दो तरह के खेमे हैं एक जो हेमा मालिनी को धर्मेंद्र के परिवार की खुशी के लिए बलिदान और त्याग की देवी बता रहे हैं । दूसरे वो जो प्रकाश कौर की सहनशीलता , संयम, भलमानसत और सामाजिक गरिमा की बात कर रहे हैं । कुछ लोग कह रहे हैं कि देयोल परिवार ने हेमा मालिनी को अंतिम संस्कार और शोकसभा से दूर रख कर अच्छा नहीं किया ।

एक बार जरा इतिहास में जाएं एमजी रामाचंद्रन की पत्नी जानकी रामाचंद्रन ने जय ललिता को क्या सबक सिखाया था । जॉर्ज फर्नाडीस की पत्नी लैला कबीर ने कैसे दशकों बाद आ कर बीमार फर्नाडीज की जिम्मेदारी और देखभाल अपने हाथ में ले ली थी । जया जेतली को जार्ज से मिलने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा था । और जॉर्ज नें अदालत में लैला कबीर के साथ रहने का मूक संकेत दिया था क्योंकि वे बोल नहीं पा रहे थे । लैला ने अंतिम समय में ज़ॉर्ज की सेवा की क्योंकि लैला कबीर ने कभी अपने पति से तलाक नहीं लिया था । जब जया जेटली और जॉर्ज की नजदीकियां बढ़ी और दोनो एकसाथ रहने लगे तो जया के आईएएस पति अशोक जेटली और जॉर्ज की हाई प्रोफाइल पत्नी लैला कबीर बिना किसी तमाशे के अलग हो गए थे। जया और जॉर्ज को अपने मन की जिंदगी जीने के लिए छोड़ दिया था । लेकिन भारतीय पत्नी का कोई मुकाबला नहीं जब देखा कि जॉर्ज बहुत बीमार है असहाय हो चुके हैं लैला कबीर लौट आयीं और बन गयी सती अनुसुइया । पति के सत्तर खून माफ जया जेटली की क्या गत हुई सब जानते हैं ।

अब बात करते हैं दक्षिण भारत की सुंदरी और दबंग नेता एस जयललिता की । एम जी रामाचंद्रन की पत्नी जानकी सब कुछ देखती रही सहती रही लेकिन अपने पति को तलाक नहीं दिया । एमजीआर की मृत्यु के समय जयललिता के साथ एमजीआर के परिवार ने क्या सलूक किया हर राजनीतिक संवाददाता जानता है । जय ललिता को इतनी चिकोटियां काटी औऱ धक्के दिए कि जिस ट्रक पर एमजीआर का शव अंतिम संस्कार के लिए ले जाया जा रहा था उससे उतरना पड़ा जयललिता को । भाजपा के एक वरिष्ठ तमिल ब्राह्मण नेता से जय ललिता का भाई बहिन का रिश्ता था उनको जय ललिता ने आप बीती सुनायी थी । एमजीआर की मौत के बाद जानकी और जय ललिता में पार्टी को लेकर भी बहुत विवाद चला चुनाव आयोग तक पहुंची जानकी।

अब बात करते हैं एन टी रामाराव और उनकी दूसरी पत्नी लक्ष्मी पार्वती की । यहां एनटीरामाराव की पत्नी का देहांत हो चुका था । लक्ष्मी पार्वती एनटीआर से उम्र में तीस साल छोटी थी । दोनों ने शादी की लेकिन एनटीआर के बच्चों को ये पसंद नहीं आया । एनटीआर के दामाद चंद्रबाबू नायडु के नेतृत्व में उन्होंने विद्रोह कर दिया । लक्ष्मी पार्वती के बढते दखल का हवाला दे कर टीडीपी पार्टी पर कब्जा कर लिया । वो पूरा रहस्य रोमांच भरा नाटक भला किसको याद नहीं है । पार्टी पर चंद्र बाबू नायडू के कब्जे के पांच महीने बाद एनटीआर चल बसे और साथ ही गुमनामी के अंधेरों में खो गयी लक्ष्मी पार्वती ।
धर्मेंद्र की पत्नी प्रकाश कौर ने बहुत गरिमा , संयम और धैर्य के साथ सब कुछ सहा लेकिन कभी हेमा मालिनी के खिलाफ मीडिया में बयान नहीं दिया । धर्मेंद्र के बेटों और बेटियों ने भी कभी हेमा मालिनी या अपनी दोनों सौतेली बहनों के खिलाफ कभी कुछ नहीं कहा । लैला कबीर और जानकी रामाचंद्रन की तरह प्रकाश कौर ने भी धर्मेंद्र को तलाक नहीं दिया । अपने चारों बच्चों में मगन हो कर रहीं । धर्मेंद्र के बीमार पडने पर प्रकाश कौर ने दिन रात एक कर उनकी सेवा की । कुछ लोगों को यदि संदेह हो तो बॉबी देयाल का वो इंटरव्यू पढ़लें जिसमें उन्ंहोने बताया कि हेमा मालिनी देखने और मिलने नहीं आती हैं मम्मी ही पापा का ध्यान रख रही हैं ।

अब धर्मेंद्र की मौत के बाद देयोल परिवार ने क्या किया कैसे किया क्यों किया मुझे लगता है उन पर ही छोड़़ देना चाहिए । ये उनका अपना निजी मामला है कि धर्मेंद्र का अंतिम संस्कार और शोक सभा वे कैसे करना चाहते थे । हां एक बात मैं ज़रूर कहना चाहूंगी कि हेमा मालिनी को देयोल परिवार की शोक सभा से किसी अलग दिन शोक सभा रखनी चाहिए थी । देयोल परिवार उनके लिए बहुत नरम रहा और उनको पूरा सम्मान दिया है ।

SIR पर भ्रम का वातावरण ठीक नहीं, BLO का दर्द समझें

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~ कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

भोपाल । के नाम पर अविश्वास, भ्रम का वातावरण तैयार करना किसी भी स्थिति में ठीक नहीं है। मुझे लगता है कि—हमारे निर्वाचन आयोग से निष्पक्ष और न्यूनतम संसाधनों में निरन्तर चुनाव करा पाना अन्यत्र कहीं संभव नहीं है। मैं ये दावे के साथ कह सकता हूं कि— आंशिक तौर पर भले कुछ अशुद्धियां सामने आ जाएं। लेकिन देश के चुनाव आयोग से बेहतर प्रबंधन किसी और देश के पास नहीं है। भारत जैसा विशाल देश और निरन्तर चुनाव। ये सब करा पाना इतना आसान नहीं है। जैसा हमारे यहां हो पाता है।

•ये तब है जबकि केवल चुनाव के समय निर्वाचन आयोग को कार्यकारी शक्तियां मिलती हैं। चुनाव के बाद अधीनस्थों के अतिरिक्त कोई दंडात्मक शक्तियां नहीं रहती हैं।

•इस बीच लगातार SIR से जुड़े कर्मचारियों की मौतों की ख़बरें आ रही हैं। वो डरावनी हैं। भले BLO की मौतों के कारणों का वास्तविक पता नहीं चल पा रहा हो। लेकिन सच्चाई ये है कि BLO पर वर्क प्रेशर बहुत ज़्यादा है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता है।

मेरे पिताजी मध्यप्रदेश सरकार के शिक्षा विभाग में शिक्षक थे। इसके अतिरिक्त उनके पास BLO का भी सरकार की ओर से अतिरिक्त दायित्व था। इस कारण मैंने उनकी समस्याओं को बेहद क़रीब से देखा है। जब भी चुनाव का समय आता था। साल भर पहले से लगातार उनकी मीटिंग्स का दौर शुरू हो जाता था।

•डोर टू डोर हर घर जाना। मतदाता सूची में नए नाम जोड़ना। दावा-आपत्तियां स्वीकार करना। मृत लोगों के नाम हटाना। कभी नया फोटो अपडेट करना। कभी आधारकार्ड और मोबाइल नंबर फीड करना। संबंधित ऐप में डाटा अपडेट करना। ऑनलाइन आए फॉर्म को जांच-परख कर अप्रूवल देना। निर्वाचन कार्यालय से वोटर आईडी कार्ड लाकर वितरण करना। वो ये सारे कार्य अध्यापन कार्य के साथ ही पूरे करते थे। पूरी प्रक्रिया के दौरान सारे अवकाश कैंसल रहते थे। यहां तक कि रविवार भी।

•ऊपर से निर्वाचन आयोग की किसी भी स्तर की मीटिंग का ख़ौफ अलग रहता था। एक मीटिंग में अगर BLO नहीं पहुंच पाता है तो तुरंत ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी हो जाता है। यानी कार्रवाई की तलवार हर वक्त उस पर लटकती रहती है। ऊपर से कोई सनकी नोडल/ सेक्टर/ जिला अधिकारी हो तो— आप प्रेशर का अंदाजा नहीं लगा सकते। नोटिस के बाद अब BLO लिखित और मौखिक स्तर पर संबंधित वरिष्ठ अधिकारियों के पेशी में दौड़ता फिरे। अपने सही होने की गवाही देता रहे। याकि अगर बहुत ज्यादा टेक्नो फ्रेंडली न हो तो व्यवस्था का दंड भुगते।

वहीं अगर एक नाम के—दो लोग हों और धोखे से किसी का नाम कट जाए। याकि पिता का नाम ग़लत लिख जाए तो संबंधित BLO की नौकरी ख़तरे में आ जाती है। जबकि उसकी नियुक्ति चुनाव आयोग में नहीं बल्कि शिक्षा विभाग या अन्य विभागों में होती है।

•ऊपर से मतदाता महोदय महान रहते हैं। एक घर के सभी सदस्यों से जुड़ी सभी जानकारियां फीड करने/ अपडेट करने के लिए BLO को न जाने कितनी मशक्कत करनी पड़ती है। ऊपर से डेडलाइन में कार्य पूरा करने का अलग दबाव रहता है। कई लोग तो ऐसे होते हैं जो कई जगह नाम जुड़वाए होते हैं। जो कि कानून अपराध है। बावजूद इसके अगर BLO इस आधार पर तथ्यात्मक जानकारी के साथ संबंधित के नाम काटने का प्रपत्र भर दे..तो शिकायतों का अंबार और जवाब देते-देते थक जाए।

•फिर जब चुनाव आता है तो घर-घर वोटिंग पर्चियां पहुंचाना । चुनाव के दिन पोलिंग टीम की समुचित व्यवस्था करना। बुजुर्गों और दिव्यांगों के घर जाकर आम लोगों के मतदान से पहले उनकी मतदान की प्रक्रिया पूरी करवाना। चुनाव शुरू होने से लेकर चुनाव टीम रवाना होने तक BLO का हर समय मौजूद रहना। ये सब झमेले झेलने पड़ते हैं। यानी BLO सबसे निरीह प्राणी होता है।

अब आपको BLO का मानदेय बताऊं? संभवतः जब पिताजी के पास ये दायित्व था । उस समय BLO कार्य के लिए सालाना 12 हज़ार से 18 हज़ार रुपए निर्वाचन आयोग की ओर से आता था। जोकि सालाना वाहन के पेट्रोल खर्च के बराबर नहीं रहता था। अथक परिश्रम। हर समय मानसिक तनाव। ये सब मामूली बात थी। पिताजी तो निर्वाचन के समय अपना मोबाइल फोन भी हम बच्चों के हाथों नहीं लगने देते थे। उन्हें लगता था कि कहीं कोई गड़बड़ी न कर दें।

अब, जबकि SIR जैसी विशेष प्रक्रिया चल रही है। उस वक्त आप BLO के ऊपर आ रहे मानसिक प्रेशर का सहज ही अंदाज़ा लगा सकते हैं। ऐसे में ज़रुरी ये है कि इस अभियान में पर्याप्त सहयोग दीजिए। निर्वाचन आयोग को भी BLO के प्रति लचीला व्यवहार करने की आवश्यकता है। उनकी समस्याओं और वस्तुस्थितियों के समझें। वरिष्ठ अधिकारी डेडलाइन और आंकड़ों के लिए प्रेशर न बनाएं। क्योंकि ज़मीन पर आप जैसे आदेश देने वाले महारथी नहीं हैं। बल्कि अपनी नौकरी को दांव में लगाकर काम करने वाले समर्पित लोग हैं। जो हर तरह की समस्याओं के बावजूद महत्वपूर्ण कार्य में तन्मयता से जुटे हैं। कुछ दिनों पहले ही पिताजी ने हम सभी के संबंधित रिकॉर्ड मंगाकर — अपने शिक्षक साथी रहे BLO को दिया है। SIR की प्रक्रिया पूरी की है।

•इन सब बातों के कहने का आशय ये भी है कि — जो लोग SIR के नाम पर हाय तौबा मचाए हुए हैं। वो निर्वाचन आयोग के सबसे अंतिम लेकिन सबसे मज़बूत स्तंभ यानी BLO की वर्तमान स्थिति का अंदाजा नहीं लगा सकते हैं। वो किन परिस्थितियों में मोर्चा संभाले हुए हैं। 4 नवंबर से जबसे SIR प्रक्रिया शुरू हुई है। BLO चैन से सोए नहीं होंगे। ऐसे में SIR का विरोध करने वाले क्या देश की सांविधानिक व्यवस्था को कठघरे में खड़ा नहीं कर रहे हैं? क्या ये लोग मानसिक दबाव नहीं बना रहे हैं?

ऊपर से राहुल गांधी और कांग्रेस जैसी पार्टियों की अराजक मानसिकता के क्या कहने हैं। जो जनता की ओर से बारंबार ख़ारिज होने के बाद अपनी नाकामी का ठीकरा चुनाव आयोग पर फोड़ रहे हैं। लोगों के अंदर हर सांविधानिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास का वातावरण तैयार कर रहे हैं। क्या ये किसी के हिसाब से लोकतंत्र के लिए सही है? ये कौन लोग हैं जो हर सांविधानिक संस्था को कटघरे में खड़ा कर, संविधान की दुहाई देते हैं? क्या ये कभी संविधान के रक्षक हो सकते हैं? राहुल गांधी वही हैं न जो भारत निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया से जनता द्वारा जनप्रतिनिधि चुने गए हैं। लेकिन दूसरी ओर उसी चुनाव आयोग के ख़िलाफ़ ज़हर उगल रहे हैं। क्या ये दोहरा मापदंड नहीं है?

इन्हीं कारणों के चलते, आप मानें या न मानें लेकिन BLO पर निर्वाचन कार्य से अधिक प्रेशर राहुल गांधी जैसे ग़ैर ज़िम्मेदार नेताओं ने बना रखा है। आधे लोगों को ये भय है कि – क्या पता कब राहुल गांधी सरीखे नेता और उनके अनुयायी। किसी मामूली भूल के लिए भी BLO की शिकायत लेकर पहुंच जाएं। फिर निर्वाचन आयोग तो नोटिस जारी कर कार्रवाई की अनुशंसा कर ही देगा न !… क्या कोई BLO की पैरवी करेगा?

ऐसे में ये नितांत आवश्यक है कि निर्वाचन आयोग SIR के लिए पर्याप्त समय दे। अपने BLO और इस प्रक्रिया से जुड़े समस्त अधिकारियों और कर्मचारियों की मानसिक सेहत का ध्यान दे। साथ ही राष्ट्र यज्ञ में हर व्यक्ति अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाए। सहजता-सरलता के साथ पूरी प्रक्रिया में BLO का सहयोग करे। क्योंकि ये केवल SIR नहीं है बल्कि राष्ट्र के नागरिकों के सांविधानिक अधिकारों की गारंटी है। घुसपैठियों और कालनेमियों के मुखौटों को नोंच फेंकने का सशक्त माध्यम है। एक राष्ट्रभक्त नागरिक का कर्तव्य निभाना हमारा प्रथम कर्तव्य है। ऐसे में SIR की प्रक्रिया ख़ुद पूरी कीजिए और सभी से आग्रह कीजिए।

राहुलजी, गाँव कब से आपकी प्रतीक्षा में है, लौट आइए!

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विजय मनोहर तिवारी

दिल्ली । सुप्रसिद्ध पत्रकार राहुलदेव 38 साल बाद एनसीआर छोड़ने पर मजबूर हैं। दैनिक भास्कर के फ्रंट पेज पर उनकी तस्वीर के साथ यह खबर छपी है, जिसके शीर्षक का पहला शब्द है-दर्द। वे हम सबकी तरह दिल्ली के प्रदूषण को लेकर यह पीड़ा व्यक्त कर रहे हैं। उनके शब्द हैं-अपने शहर लखनऊ जा रहा हूँ। वहाँ भी दिक्कत हुई तो गाँव चला जाऊँगा…
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यह तो होना ही है। आजादी के बाद हाशिए पर छोड़े गए गाँवों के दुष्परिणाम दिल्ली से ही आने चाहिए थे, जहाँ लाल किले से भारत की एक नई सुबह की शपथ शेरवानी में गुलाब खोंसकर ली गई थी।

वो नई सुबह उसी दिल्ली को इस सुबह तक ले आई है। दूरदराज गाँवों में सदियों की गुलामी सहन करते हुए रहती रही भारत की 80 फीसदी आबादी को उपेक्षित छोड़कर विकास का अनूठा मॉडल बनाया गया, जिसकी प्राथमिकता में केवल और केवल शहर थे। अच्छे स्कूल वहाँ थे, अच्छे अस्पताल वहीं बने, अच्छी सड़कें, साफ पानी और हर समय बिजली शहरों को ही मिली। बापू के सपनों का स्वराज्य और बापू के सपनों के गाँव बापू वालों ने बदहाल बना दिए।

गाँवों से एकतरफा पलायन हर दशक में तेज होता गया। हम पढ़ने के लिए शहरों में भागे। नौकरियों के लिए और बड़े शहरों का रुख किया। हमारी अगली पीढ़ी तो गाँवों से पूरी तरह डिस्कनेक्ट ही हो गई। आज गाँव वीरान पड़े हैं। एक कमरा भी किराए पर ले सकने की क्षमता वाला गरीब आदमी पास के किसी कस्बे या छोटे शहर में पड़ा हुआ है। बच्चों को पढ़ाना है, काम करना है, गाँवों में क्या रखा है? हमारे ज्यादातर जनप्रतिनिधियों की पृष्ठभूमि में गाँव थे, कृषि थी। वे किसान पुत्र कहकर खुद को महिमामंडित करते थे, लेकिन गाँवों और किसानों को दुर्दशाग्रस्त पीछे छोड़कर उन्होंने अपनी पालकियाँ राजधानियों में निकालीं।

बीस लाख आबादी के किसी भी शहर में ढाई-तीन लाख सेवानिवृत्त लोग डटे हुए हैं, जो कभी सरकारी या प्राइवेट नौकरियों के लिए गाँव-कस्बों से ही निकले थे। उनके बच्चे बेंगलुरू-हैदराबाद या दिल्ली-मुंबई या ऑस्ट्रेलिया-कनाड़ा जा पहुँचे हैं। लेकिन वे शहरों में खजूर की तरह अटके हुए हैं। आबोहवा कितनी भी साफ भले ही हो, राहुलजी को 38 साल बाद दिल्ली या लखनऊ नहीं, अपने गाँव लौटने की जरूरत है। और मैं यह इसलिए भी कह पा रहा हूँ, क्योंकि मैं अपने गाँव लौट गया हूँ।

ढाई-तीन दशक की नौकरी या बिजनेस के बाद आप शहरों में रहकर थोड़ी पूँजी कमाते हैं, कुछ अधिक संबंध कमाते हैं और सर्वाधिक अनुभव अर्जित करते हैं। इन तीनों का एक अंश लौटकर अपने गाँव में लगा दीजिए और गाँवों की वीरानी को कम कीजिए। शहरों में बेवजह टिकी यह अनुभव संपन्न आबादी करोड़ों में है, जो गाँव लौट जाए तो दिल्ली पर भी कृपा करे और गाँव पर भी, जो कब से उनकी बाट जोह रहे हैं।

प्रधानमंत्री आदरणीय नरेंद्र मोदी की वाणी प्रभावी है। एक बार उन्होंने भारत स्वच्छता का आव्हान किया और देखते ही देखते इंदौर जैसा नर्क हो चुका शहर साफ-सफाई में अव्वल आ गया। संडास में बदल चुके रेलवे स्टेशन और ट्रेनें बैठने-चलने लायक हो गए। अब मैं उनसे आग्रह करूंगा कि वे भारत स्वच्छता अभियान के बाद अगले ही 15 अगस्त को लाल किले से “रिवर्स माइग्रेशन’ का आव्हान करें। शहरों में तीन-चार दशक बिता चुके धन, साधन और अनुभव संपन्न लोग अपने गाँव-कस्बों में कुछ नया करने का प्लान करें। अब गाँवों तक अच्छी सड़कें, बिजली, पानी मुहैया है। इन्फ्रास्ट्रक्चर तेजी से सुधरा है, जिसकी जर्जर हालत ने गाँवों को वीरान कर दिया था। आइए पंचतत्व में विलीन होने के पहले अपने हिस्से का थोड़ा सा समय और योगदान अपने ही गाँव को दे दीजिए।

मैंने 2018 में अपने पिता के जन्मस्थान पर लौटने का निर्णय लिया था। बीस साल पहले अपनी पूज्य मां के हाथों लगाई आम-अमरूद की एक बगिया में एक छोटी सी कुटिया बनाई। 2021 में अमरूद के ढाई हजार पौधे रोपे। उन्हीं के नाम पर इसे सावित्री वृक्ष मंदिर का नाम दिया। चार साल बाद इस बाग में छह महीने 20 लोगों को काम मिला और सात-आठ कर्मवीरों की स्थाई टीम बन गई। गाँव लौटने से दूसरे कुछ काम अलग से मिल गए, जिनकी अलग कहानी है। मेरे मित्रों को उदयपुर की नियमित मासिक हेरिटेज वॉक के बारे में पता है। मेरी एक किताब इसी पर है-जागता हुआ कस्बा।

मुझे इजरायल के पहले प्रधानमंत्री डेविड बेन गुरियन के घर जाने का अवसर मिला था, जो तेल अवीव या ओल्ड जेरूशलम की शानदार रिहाइशों में नहीं था। कार्यकाल समाप्त होने के बाद राजधानी से दूर वे अपने गाँव में खेती करने लौट गए थे। मगर भारत में विचित्र है। एक बार यहाँ जो दिल्ली चला गया, उसके बाद उसका बंगला संग्रहालय में बदलेगा और अजीब-अजीब से नाम वाले घाटों पर उनकी समाधियाँ बनेगी। मुझे आश्चर्य होता है कि अपनी राजनीतिक पारी समाप्त होने के बाद वे अपने गाँव क्यों नहीं लौटते? मरने के बाद भी दिल्ली का मोह नहीं छूटेगा तो दिल्ली जीते-जी आपको छोड़ने के लिए मजबूर कर देगी।

राहुलजी के दर्द ने यह रेखांकित किया है कि सरकार जो करे सो करे, समाज भी गाँवों को अपना ही बिछुड़ा हुआ कुटुंब मानकर उनकी सुध ले। हजार-दो हजार आबादी के किसी भी गाँव से निकले दस-बीस लोग लौट आएँ तो पाँच साल में ही हवा बदल सकते हैं। जरूरी नहीं कि वे बुढ़ापे में लौटकर खेती ही करें। वे स्कूल में दो कमरे बना सकते हैं। चार कम्प्यूटर दे सकते हैं। मंदिर के पास एक बगीचा बना सकते हैं। बच्चों के खेलने के लिए पार्क विकसित कर सकते हैं। किसी ऐतिहासिक स्थान की सुध ले सकते हैं। गाँव वालों को अपने जीवन के अनुभव का कोई भी लाभ दे सकते हैं।

गाँवों से शहरों में हुए एकतरफा पलायन ने गाँव वीरान कर दिए और शहरों का कचूमर निकाल दिया। शहर मर रहे हैं। पंचायती चुनावों ने गाँवों को कलह और वैमनस्य से भर दिया है। मुफ्त की स्कीमों, घटिया राजनीति और बेहिसाब मदिरा ने पूरा ढाँचा ही हिला दिया है।

राहुलजी, इसमें क्या दर्द की बात है, मजबूरी न हो तब भी विचार कीजिए। लखनऊ या अपने गाँव लौटने के पहले एक बार मेरे गाँव में आइए। यूनाइटेड स्टेट ऑफ अमरूद में आपका स्वागत है!

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