भारतीय ज्ञान परंपरा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

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धीप्रज्ञ द्विवेदी

दिल्ली । भारतीय ज्ञान परंपरा भारत की प्राचीन ज्ञान और शिक्षा की एक विविध प्रणाली है, जिसमें विज्ञान, कला, दर्शन, गणित, खगोलशास्त्र, चिकित्सा और व्याकरण जैसे कई क्षेत्र शामिल हैं।यह वेदों, उपनिषदों और पुराणों से प्रारम्भ होकर संतों और विभिन्न शास्त्रों के माध्यम से विकसित हुई है। यह भारत की हजारों वर्षों में विकसित हुयी बहुआयामी बौद्धिक विरासत है। इस परंपरा का विकास वेद, उपनिषद, पुराण, धर्मशास्त्र तथा संत साहित्य के माध्यम से हुआ, और इसका उद्देश्य केवल बौद्धिक उन्नयन ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आत्मिक जागरण रहा है। हम कह सकते हैं कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल शिक्षा की प्रणाली नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन पर आधारित एक व्यापक ज्ञान-संहिता है। इसकी जड़ें वेद, उपनिषद, दर्शन, आयुर्वेद, खगोल विज्ञान, गणित, नाट्यशास्त्र, और कला-विज्ञान तक फैली हैं। यह परंपरा ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ जैसे सार्वभौमिक सिद्धांतों पर आधारित है। इसका लक्ष्य ज्ञान को केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि आत्मबोध, सामाजिक समरसता, और विश्वकल्याण का माध्यम बनाना है। इस प्राचीन सांस्कृतिक और बौद्धिक धरोहर का संरक्षण और पुनर्जीवन आवश्यक है। समकालीन समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं उसके साथ जुडेंशिक्षा संगठनों ने इस परंपरा को पुनर्जीवित करने के लिए संगठित प्रयास किए हैं, और इन प्रयासों के परिणाम भारत सरकार की नई शिक्षा नीति में भी परिलक्षित हो रही हैं। आज से कुछ वर्ष पहले तक अकादमिया में भारतीय ज्ञान परम्परा पर चर्चा होना एक प्रकार से असम्भव था और इसे पिछडेपन का प्रतीक माना जाता था। यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवम अन्य समान विचार वाले संगठनों के लगातार समंवित प्रयासों से सम्भव हो पाया है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण और योगदान

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ) भारतीय संस्कृति और मूल्यों के पुनरुद्धार का एक वैचारिक आंदोलन है। संघ का मूल उद्देश्य है— राष्ट्र जीवन का पुनर्निर्माण भारतीय मूल्यों की नींव पर। अतः भारतीय ज्ञान परंपरा इसके वैचारिक केंद्र में है।

वैचारिक दृष्टिकोण: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य केवल रोज़गार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चरित्र निर्माण और सांस्कृतिक चेतना का जागरण है। इसके लिए “स्व” यानी आत्मनिर्भर भारत और पंचमुखी विकास—शारीरिक, बौद्धिक, सामाजिक, आत्मिक, चारित्रिक—की संकल्पना पर बल दिया जाता है।​

इसके लिये विविध शैक्षिक संस्थाएँ स्थापित की गयी और पाठ्यक्रम निर्धारित किये गये। ‘विद्या भारती’, ‘भारतीय शिक्षण मंडल’ आदि की स्थापना कर भारतीय परंपराओं को पाठ्यक्रमों में शामिल किया गया है। इन पाठ्यक्रमों में योग, आयुर्वेद, भारतीय गणित, भारतीय विज्ञान, सांस्कृतिक मूल्यों, और लोक साहित्य को स्थान दिया गया।​

नई शिक्षा नीति (NEP 2020): नीति निर्माताओं पर प्रभाव डालकर भारतीय ज्ञान प्रणाली (Indian Knowledge System, IKS) की साझेदारी को बढ़ाया गया है। अब शोध, प्रशिक्षण, और पाठ्यक्रम में भारतीय दृष्टिकोण प्रमुख हो रहा है।​

सांस्कृतिक पुनरुद्धार: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्थानीय भाषाओं, परंपराओं, धार्मिक अनुष्ठानों, और सामुदायिक संगठनों के माध्यम से सांस्कृतिक एकता व राष्ट्रीय गौरव का प्रचार कर रहा है। इसके अतिरिक्त अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सेवा भारती इंटरनेशनल तथा ‘अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद्’ जैसी संस्थाओं के माध्यम से यह कार्य किया जा रहा है।

पंचमुखी विकास की अवधारणा एवं “स्व” बोध: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शैक्षिक दृष्टिकोण का विस्तार

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ) के शिक्षा-विंग, विशेषकर विद्या भारती, भारतीय ज्ञान परंपरा के संदर्भ में ‘पंचमुखी विकास’ की अवधारणा को प्रमुखता देता है। यह मॉडल संपूर्ण व्यक्ति-विकास का लक्ष्य रखता है, जो पश्चिमी/आधुनिक शिक्षा के केवल उपयोगितावादी दृष्टिकोण से अलग है।​

पंचमुखी विकास की संकल्पना

‘पंचमुखी विकास’ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा स्वीकृत एक समग्र शैक्षिक दृष्टिकोण जो अपने मूल स्वरूप में भारतीय ज्ञान परम्परा से ही मिली है, जिसमें पाँच प्रमुख आयाम शामिल हैं:

शारीरिक विकास: स्वास्थ्य, शक्ति और अनुशासन का निर्माण। योग, प्राणायाम तथा पारंपरिक आर्य व्यायाम इसका आधार हैं। विद्यार्थी में ऊर्जा, संयम और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता लाने पर बल।​

बौद्धिक विकास: आलोचनात्मक सोच और रचनात्मकता का विकास—परंतु भारतीय सांस्कृतिक नींव पर आधारित। ‘ज्ञान का स्वदेशीकरण’ यानी विचारों में आत्मनिर्भरता और संस्कृति-सम्मिलन।​

सामाजिक विकास: समाज के प्रति जिम्मेदारी, सेवा-भाव और सामुदायिक एकता। ‘सेवा’ जैसे कार्यक्रम छात्रों में समाजोत्थान, सहयोग व सामाजिक समरसता के भाव उत्पन्न करते हैं।​

आत्मिक विकास: आंतरिक शांति, नैतिकता और अपने वास्तविक स्वरूप की अनुभूति। यह स्व-बोध और चरित्र निर्माण का आधार है—राष्ट्रीय, धार्मिक और मानवीय मूल्यों के साथ।​

चारित्रिक विकास: सत्यनिष्ठा, साहस, ईमानदारी, जिम्मेदारी और दृढ़ता जैसे गुणों का निर्माण—यही शिक्षा का परम लक्ष्य माना जाता है। विद्यार्थी में सतत नैतिकता और नेतृत्व क्षमता विकसित करना।​

केस स्टडी: विद्या विकास परियोजना

विद्या विकास परियोजना उत्तर कर्नाटक के पिछड़े क्षेत्रों में शिक्षा एवं संस्कृति से वंचित बच्चों के लिए सेवा भारती ट्रस्ट द्वारा संचालित किया गया है।​

इसमें बच्चों को विद्यालय योग्य बनाना, उनकी पढ़ाई के साथ स्वच्छता एवं स्वास्थ्य का प्रशिक्षण दिया जाता है, नैतिक और आध्यात्मिक शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों का चारित्रिक निर्माण।

यह परियोजना न केवल शैक्षिक विकास पर बल देती है बल्कि उनकी छिपी प्रतिभाओं और कौशलों की पहचान कर उन्हें निखारने का काम भी करती है साथ ही ड्रॉपआउट कम करना और समुदाय के साथ जुड़ाव कायम करने की भी गतिविधियां चलाती है। इसके अतिरिक्त शिक्षकों के प्रशिक्षण और महिला सशक्तिकरण पर भी बल दिया जाता है।

परिणाम:

सैकड़ों केंद्रों में बच्चों की शिक्षा, प्रतिभा-निखार और समाजसेवा के कार्य सफल रहे।

अनेक छात्र CBSE व राज्य बोर्ड परीक्षाओं में अव्वल आए, और UPSC जैसी प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में भी सफल हुए।

विद्या भारती के पूर्व छात्र समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सेवा कर रहे हैं।​

यह केस स्टडी पंचमुखी विकास के हर पक्ष जैसे शारीरिक (स्वास्थ्य/व्यायाम), बौद्धिक (ज्ञान-संकलन), सामाजिक (सेवा/समुदाय), आत्मिक (नैतिकता/ध्यान) और चारित्रिक (नेतृत्व/ईमानदारी) के समग्र विकास को रेखांकित करती है।

“स्व” बोध: आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक जड़ें

पंचमुखी विकास के केंद्र में ‘स्व’ (Self) या ‘आत्म’ का बोध है।

“स्व” का तात्पर्य: एक ऐसी शिक्षा प्रणाली का निर्माण, जो बौद्धिक रूप से स्वतंत्र, विचारों में आत्मनिर्भर, और सांस्कृतिक रूप से अपनी जड़ों से जुड़ी हो। परिणामत: विद्यार्थियों में आत्मबोध, आत्मविश्वास और देश के प्रति जिम्मेदारी का भाव विकसित होता है, जिससे वे “आत्मनिर्भर भारत” के रचनाकार बनें।​

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने ‘पंच परिवर्तन’ जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से स्वदेशी सोच, समाज लाभ, पर्यावरण सरंक्षण, कुटुंब प्रबोधन और नागरिक कर्तव्य को आत्मनिर्भर भारत के निर्माण की दिशा में प्राथमिकता दी है।​​

शैक्षिक दृष्टिकोण और वर्तमान महत्व

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पश्चिमी शिक्षा प्रणाली को एक ऐसी प्रणाली के रूप में देखता है जो मनुष्य को मानव नहीं बल्कि भावना शुन्य मशीन बना देती है, क्योंकि वह व्यक्ति को केवल उपार्जन और उपयोगिता तक सीमित करती है; जबकि पंचमुखी विकास का उद्देश्य संपूर्ण मानवाधिकार, चरित्र, और समाजोत्थान है।​

विद्या भारती एवं अन्य शिक्षा-संगठनों में इस मॉडल का पाठ्यक्रमों, दैनिक गतिविधियों और सामाजिक सेवा में स्पष्ट प्रयोग है। विद्यार्थियों में यह दृष्टिकोण सामर्थ्य, संस्कृति-संबद्धता, एवं समाज-सेवा के भाव पैदा करता है। चरित्र, सेवा, और आत्मनिर्भरता आधुनिक भारत की पहचान बनती है।​

पंचपदी शिक्षण पद्धति

विद्या भारती के विद्यालयों में पंचपदी शिक्षण पद्धति को अपनाया गया है, जो भारतीय मनोविज्ञान और मनुष्य के भीतर स्थित ज्ञान को जाग्रत करने वाली प्रक्रिया है.​​ यह प्रणाली पूर्ण रूप से भारतीय ज्ञान परमपरा पर आधारित है।

पंचपदी पद्धति के पाँच चरण:

अधीति (Adhiti): विषय का अधिग्रहण—सुनना, देखना, पढ़ना, अनुभव करना।

बोध (Bodh): विषय की गहराईयों को समझना, आत्मसात करना, विश्लेषण और संश्लेषण करना।

अभ्यास (Abhyas): सीखी गई बातें बार-बार दोहराकर अपने व्यवहार में लाना।

प्रयोग (Prayog): सीख को जीवन में या समस्या के समाधान में व्यावहारिक प्रयोग करना।

प्रसार (Prasar): अर्जित ज्ञान का विस्तार करना, समाज में साझा करना, दूसरों को प्रेरित करना।

यह विधि ज्ञानार्जन को केवल सूचना स्मृति तक सीमित नहीं रखती, बल्कि व्यवहार, तर्क, अनुभव और समाज तक ले जाती है—जिससे शिक्षा जीवन का अभिन्न अंग बनती है।​​

अत: हम कह सकते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारतीय ज्ञान परम्परा के पुनरूथान के लिये प्रतिबद्ध है।

(लेखक पर्यावरण विज्ञान में स्नात्कोत्तर हैं, प्रतियोगिता परीक्षाओं के लिये पर्यावरण विज्ञान पढाते हैं और विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में पर्यावरण और स्वास्थ्य सम्बंधी आलेख प्रकाशित होते रहे हैं। लेखक शोध पत्रिका “सभ्यता सम्वाद के कार्यकारी सम्पादक हैं, तथा स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था स्वस्थ भारत के संस्थापक न्यासी हैं।)

राष्ट्रीय एकता के प्रतीक – लौहपुरुष सरदार पटेल

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अहमदाबाद । स्वतंत्रता के पश्चात भारत की राष्ट्रीय एकता के प्रतीक एक प्रखर देशभक्त जो ब्रिटिश राज के अंत के बाद 562 रियासतों को जोड़ने के लिए प्रतिबद्ध थे तथा एक महान प्रशासक जिन्होंने विभाजन कि विभीषिका से बिलखते और जलते भारत को स्थिर करने में महतवपूर्ण भूमिका निभायी ऐसे महान लौहपुरुष सरदार पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को ग्राम करमसद में हुआ था। इनके पिता झबेरभाई पटेल थे जिन्होंने 1857 में रानी झांसी के समर्थन में युद्ध किया था। इनकी मां का नाम लाडोबाई था।

वल्लभ भाई की प्रारम्भिक शिक्षा गांव के ही एक ऐसे विद्यालय में हुई जो कक्षा चार तक ही था। आगे की शिक्षा के लिए पटेल जिस विद्यालय में गए वह उनके मूल गांव से छह से सात किलोमीटर की दूरी पर था। वल्लभ भाई की हाईविद्यालय की शिक्षा उनके ननिहाल में हुई। उनके जीवन का वास्तविक विकास ननिहाल से ही प्रारम्भ हुआ था। उनमें बचपन से ही कुशल नेतृत्वकर्ता के गुण दिखाई देते थे । वे पढ़ने में तो तेज थे ही, गीत- संगीत व खेलकूद में भी आगे थे। उनमें एक ऐसा सम्मोहन था कि वे अपने साथियों के बीच विद्यालय के दिनों में ही लोकप्रिय हो गये थे तथा उनका नेतृत्व करने लग गये थे। वल्लभभाई की उच्च शिक्षा बहुत ही कष्टों के साथ इंग्लैंड में जाकर पूरी हुई जहाँ से उन्होंने बैरिस्टरी की परीक्षा उत्तीर्ण की।

पटेल कुशाग्रबुद्धि के थे तथा उनमें सीखने की अद्भुत क्षमता थी। बचपन में एक बार वे विद्यालय से आते समय पीछे छूट गये। कुछ साथियों ने जाकर देखा तो ये धरती पर गड़े एक नुकीले पत्थर को उखाड़ रहे थे। पूछने पर बोले,” इसने मुझे चोट पहुंचायी है अब मैं इसे उखाड़कर ही मानूंगा” और वे उस पत्थर को उखाड़ करके ही घर आये। एक बार उनकी बगल में फोड़ा निकल आया। उन दिनों गांवो में इसके लिए लोहे की सलाख को लालकर उससे फोड़े को दाग दिया जाता था। नाई ने सलाख को भट्ठी में रखकर गरम तो कर लिया पर वल्लभ भाई जैसे छोटे बालक को दागने की हिम्मत नहीं पड़ी। इस पर वल्लभ भाई ने सलाख अपने हाथ में लेकर उसे फोड़े में घुसा दिया आसपास बैठे लोग चीख पड़े लेकिन उनके मुंह से उफ तक नहीं निकला।

1926 में उनकी भेंट गांधी जी से हुई और वे स्वाधीनता आंदोलन में कूद पड़े और स्वदेशी जीवन शैली में आ गये। बारडोली में किसान आंदोलन का सफल नेतृत्व करने के कारण उनका नाम सरदार पड़ा। सरदार पटेल स्पष्ट व निर्भीक वक्ता थे। यदि वे कभी गांधी जी से असहमत होते तो वे उसे भी साफ कह देते थे। वे कई बार जेल गये। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्हें तीन साल की कैद हुई।

स्वतंत्रता के बाद उन्हें नेहरू मंत्रि परिषद में गृहमंत्री बनाया गया। सरदार पटेल ने चार वर्ष तक गृहमंत्री के पद पर कार्य किया। यह चार वर्ष न केवल उनके वरन स्वाधीन भारत के भी ऐतिहसिक वर्ष हैं। उन्होने 542 रियासतों का विलय करवाया जिसमें सबसे कठिन विलय जूनागढ़ और हैदराबाद का रहा। सरदार की प्रेरणा से ही जूनागढ़ में विद्रोह हुआ और वह भारत में मिल गया।हैदराबाद में बड़ी पुलिस कार्यवाही करनी पड़ी। जम्मू कशमीर का मामला नेहरू जी ने अपने पास रख लिया जिसका आंशिक समाधान नरेन्द्र मोदी जी ने धारा 370 की समाप्ति के रूप में कर दिया है जबकि पाकिस्तानी कब्जे वाला कश्मीरवापस लेना अभी शेष है। सरदार पटेल ने गृहमंत्री रहते हुए रेडियो एवं सूचना विभाग का कायाकल्प किया।

सरदार पटेल स्वभाव से बहुत कठोर भी थे तो बहुत ही सहज और उदार भी। समय के अनुसार निर्णय लेने में वे समर्थ तथा सक्षम थे। वे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को उचित परामर्श देने में भी नहीं हिचकते थे। जब चीन तिब्बत पर अपना अधिकार जता रहा था और नेहरू ने चीन की विस्तारवादी नीति का विरोध नहीं किया था जिसके ही तिब्बत पर चीन नियंत्रण हो गया था तब सरदार पटेल ने चीन के प्रति सर्वाधिक संदेह प्रकट करते हुए कहा था कि यदि चीन तिब्बत पर अधिकार कर लेता है तो यह भविष्य में भारत की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा होगा। कालांतर में दूरदर्शी पटेल की चिंता सच सिद्ध हुई । मंत्री के रूप में भी वे हर व्यक्ति से मिलते थे और उसकी समस्या का समाधान खोजते थे।

इस वर्ष सरदार पटेल की जयंती के 150 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। इस अवसर पर कई भव्य ओयाजन किए जा रहे हैं। हम सभी को सरदार पटेल कि स्मृति में होने वाले कार्यक्रमों का हिस्सा बनकर उनका पुण्य स्मरण करते हुए, उनके बताए गए पथ पर चलने की प्रेरणा लेनी चाहिए।

कहानी — अंकल-आंटी की शादी

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कैलाशचंद्र

ये एक अभियान है जिसमें बेटी का ब्याह और बहू की पढ़ाई महत्वपूर्ण है। “समय से विवाह होगा तो पांच पीढ़ियों का सुख भोग सकते हो” यह वाक्य भारतीय पारिवारिक जीवन-दर्शन से जुड़ा है।

भारतीय समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं होता, बल्कि दो परिवार- वंशों, दो कुलों और दो संस्कृतियों का संगम होता है। जिसमें यज्ञ होता है। “समय से विवाह” का अर्थ केवल उम्र की सीमा नहीं है, बल्कि मानसिक, सामाजिक, जैविक और पारिवारिक तैयारी के संतुलित समय से है।

एक ऐसा कथानक जहाँ शब्द मुस्कुराएँगे, संवाद चुभेंगे, और यथार्थ भीतर तक गूंजेगा।
शैली सरल, प्रवाहमान और अभिव्यंजक होगी- ठीक वैसे जैसे कोई समझदार कथाकार चाय की चुस्कियों के बीच समाज का आईना दिखा रहा हो।

शहर के बीचो बीच, एक चमकदार कैफे में बैठे थे — अमित और नेहा। दोनों मोबाइल के स्क्रीन में झुके हुए, पर एक-दूसरे से कुछ खास नहीं कह रहे थे।दोनों की उम्र लगभग तीस के आसपास। दोनों के चेहरे पर करियर की चमक थी, पर आंखों में हल्की थकान भी।

वेटर ने पूछा, “सर, ऑर्डर?”
अमित ने बिना ऊपर देखे कहा, “लो-फैट कैप्पुचिनो।”
नेहा ने मुस्कराकर कहा, “साथ में एक्स्ट्रा शुगर।”
अमित की भौंह थोड़ी चढ़ी — “शुगर? इतनी मिठास में कैलोरी है।”
नेहा बोली, “ज़िंदगी में अगर मिठास ही न हो तो कैलोरी का क्या करेंगे?”
दोनों हल्के से हँसे — फिर वही मौन।

💥कहानी यहीं से शुरू होती है :

अमित की माँ पिछले महीने फिर अस्पताल गई थीं। कहती थीं, “बेटा, शादी कर ले। अब बहू के हाथ की चाय पीने का मन करता है।”
अमित ने हंसकर कहा था, “माँ, अभी टाइम नहीं है। कंपनी में नया प्रोजेक्ट चल रहा है।”
माँ बोली थीं, “बेटा, जिंदगी कोई प्रोजेक्ट नहीं, एक साझेदारी है — जो समय पर शुरू हो तो रंग लाती है, वरना रिपोर्ट बनकर रह जाती है।”
उधर नेहा के पापा भी बार-बार समझाते थे,
“बेटी, अब उम्र हो रही है।”
नेहा मुस्कराकर कहती— “पापा, 30 तो नई 20 है।”
पापा कहते— “हां, पर हमारे जमाने में 20 में लोग बच्चे पालते थे, अब 30 में कुत्ते पालते हैं।”

💥पहले “लड़का-लड़की”, अब “अंकल-आंटी”
एक दिन ऑफिस की पार्टी में किसी ने अमित से मजाक में कहा, “सर, आपकी तो शादी हो जानी चाहिए अब।”

अमित ने जवाब दिया— “भाई, अब तो मुझे कोई ‘लड़की’ नहीं चाहिए, कोई HR compliant partner चाहिए।”
सभी हँस पड़े।
पर हँसी के पीछे एक खालीपन था— जैसे कोई अंदर से कुछ खो चुका हो।

नेहा ने एक दिन खुद से कहा— “अब मैं किसी रोमांटिक कहानी की नायिका नहीं रही।
अब जो भी मिलेगा, कहेगा– ‘आप बहुत मैच्योर हैं।’
और मैं मुस्करा दूँगी- क्योंकि मैच्योर का मतलब होता है ‘अब ज़्यादा उम्मीद मत रखो।’”

💥घर में ‘विवाह का अभियान’ :

अमित के पापा ने एक शाम अखबार रखकर कहा —
“देख बेटा, हमारे मोहल्ले के शर्मा जी के पोते की शादी तय हो गई।”
अमित बोला— “अरे पापा, वो तो मुझसे दस साल छोटा है!”
पापा ने अखबार मोड़ा— “हाँ बेटा, लेकिन उसने ‘टाइम पर’ शादी कर ली।”
माँ ने जोड़ा— “समय से विवाह होगा तो पांच पीढ़ियों का सुख भोग सकते हो।”
अमित हँस पड़ा— “माँ, आप तो ऐसे बोलती हैं जैसे शादी कोई लाइफ टाइम ऑफर हो।”
माँ बोली — “हाँ बेटा, अब तो तुम्हारे ऑफर की validity period खत्म होने वाली है।”

💥विवाह नहीं, वार्तालाप :

नेहा की सहेली रीमा ने पूछा —
“तू शादी के लिए किसी को देख रही है?”
नेहा बोली— “देख रही हूँ, लेकिन अब लोग रिश्ता नहीं, रिज्यूमे मांगते हैं।”
रीमा हँस पड़ी— “हाँ, अब रिश्ते में भी ‘package’ और ‘perks’ पूछे जाते हैं।”
नेहा ने धीरे से कहा- “कभी लगता है, हम सब अंकल-आंटी बन गए हैं।
वो जो ‘दिल से’ वाला दौर था, वो कहीं गूगल कैलेंडर में खो गया।”

💥समय गया, साथ नहीं मिला :

कुछ महीने बाद अमित की माँ नहीं रहीं।
अंतिम वाक्य यही था— “काश तेरी बारात देख लेती।”
उस दिन अमित ने पहली बार अपने मोबाइल का लॉक खोले बिना रोया।

नेहा ने उसे सांत्वना दी, और कहा—
“हम दोनों ने बहुत कुछ पाया, बस सही समय खो दिया।”
अमित बोला- “शायद यही फर्क है लड़का–लड़की और अंकल–आंटी में।
एक वक्त था जब हम हँसते थे, अब सिर्फ तर्क करते हैं।
पहले प्यार में जोश था, अब शादी में ‘जॉब सिक्योरिटी’ ढूंढते हैं।”

• कहानी का अंत :

दोनों ने अगले महीने शादी कर ली।
बिलकुल शांत, सरल, बिना शोर के।
किसी ने कहा— “अब तो अंकल–आंटी बन ही गए।”
नेहा मुस्कराई- “हाँ, लेकिन देर से ही सही, अब कम से कम एक-दूसरे के अंकल-आंटी तो हैं।”
अमित ने धीरे से कहा—
“काश, हमने ये कदम पाँच साल पहले उठाया होता। तब शायद आज हमारी बेटी स्कूल जा रही होती।”
नेहा बोली— “और तुम्हारी माँ खिड़की से मुस्करा रही होती।”

• समय, संबंध और सच्चाई :

समय से किया गया विवाह कोई पुरातन आग्रह नहीं, बल्कि जीवन का प्राकृतिक लयबद्ध निर्णय है। जो देर से लिया गया, वह प्रेम को नहीं रोकता, पर उसके सुगंध को थोड़ा मुरझा देता है।
अब जब समाज में “अंकल–आंटी की शादियाँ” बढ़ रही हैं।

तो याद रखिए— संबंध तब सबसे सुंदर होते हैं जब दिल जवान हो, बात बात पर उत्साह और उमंग हो और जिम्मेदारी भी साथ चले।वरना देर से मिली, बिना उमंगों के खुशी भी अक्सर बिना रंगों वाले जीवन जैसी ‘थकान’ लगने लगती है।🌹🙏

सांस्कृतिक गौरव के लिये समर्पित जीवन : आरक्षण का लाभ जनजातियों को ही मिले : धर्मान्तरित को नहीं : अभियान चलाया

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रांची । स्वतंत्रता के साथ विदेशी सत्ता से मुक्ति का संघर्ष तो समाप्त हो गया था लेकिन भारत के सांस्कृतिक गौरव और परंपराओं की स्थापना का संघर्ष अभी चल रहा है। स्वतंत्रता के पहले और बाद में कितने ही महापुरूषों ने स्वत्व केलिये अपना जीवन समर्पित किया। वनवासी नायक कार्तिक उरांव ऐसी ही विभूति थे। उन्होंने एक ओर आदिवासी समाज में साँस्कृतिक जागरण का अभियान चलाया तो दूसरी ओर धर्मान्तरण करने वालों को आरक्षण का लाभ न देने का राजनैतिक अभियान भी चलाया। लेकिन पता नहीं भारतीय समाज में उनके व्यक्तित्व और कृतित्व की उतनी चर्चा नहीं होती जितना उनका चिंतन रहा है।
भारत के वनक्षेत्र में दोनों प्रकार के संघर्ष हुये। एक राष्ट्ररक्षा के लिये युद्ध के मैदान, और दूसरा संस्कृति रक्षा केलिये गांव गांव में। युद्ध के मैदान में भी वनवासी नायकों के असंख्य बलिदान हुये हैं और आदिवासी संस्कृति की रक्षा केलिये भी असंख्य विभूतियों ने अपना जीवन समर्पित कर दिया। वनक्षेत्र में आदिवासी संस्कृति रूपान्तरण का कुचक्र स्वतंत्रता के बाद भी कम न हुआ। इसका कारण अंग्रेजों का वह कुचक्र था जो उन्होंने अपनी सत्ता स्थापना के बाद भारत के वनक्षेत्र की संपदा हथियाने और वनवासियों को अपना स्थाई सेवक बनाने केलिये रचा था। वनक्षेत्र में यह काम ईसाई मिशनरीज ने आरंभ किया था। वनवासी क्षेत्रों में मिशनरीज की यह सक्रियता 1773 के आसपास आरंभ हुई और केवल पचास वर्षों में पूरे भारत के वनक्षेत्र में पहुँच गये। मिशनरीज के प्रभाव में आदिवासी समाज अपनी परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं से दूर होकर ईसाई धर्म अपनाने लगे। ऐसी विषम परिस्थिति में जन्म हुआ था सुप्रसिद्ध विचारक शिक्षाविद् और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कार्तिक उरांव का। उनका पूरा इसी संघर्ष में बीता। वे अपने छात्र जीवन में ही स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ गये थे। पटना में पढ़ते हुये भारत छोड़ो आँदोलन और इसके बाद प्रभात फेरियों में सतत सक्रिय रहे। महाविद्यालय में भी भारत राष्ट्र के अखंड गौरव पर युवाओं की संगोष्ठियाँ आयोजित कीं। और फिर आगे पढ़ने केलिये अमेरिका चले गये।

ऐसी विलक्षण प्रतिभा के धनी कार्तिक उरांव का जन्म 29 अक्टूबर 1924 को झारखंड राज्य के गुमला जिला अंतर्गत करौंदा लिटाटोली गाँव में हुआ था। उनका परिवार इसक्षेत्र में आदिवासियों के “कुरुख” जनजाति शाखा से संबंधित थे। पिता जयरा उरांव का आदिवासी समाज में एक प्रमुख स्थान था और माता बिरसी उरांव अपनी परंपराओं और संस्कृति केलिये बहुत समर्पित थीं। कार्तिक उरांव चार भाइयों में सबसे छोटे थे। उनका जन्म भारतीय पंचांग के अनुसार कार्तिक माह में हुआ था। इसलिए परिवार के बड़े बुजुर्गों ने उनका नाम कार्तिक रखा। उनकी प्रारंभिक शिक्षा अपने गाँव में ही हुई और 1942 में हाई स्कूल परीक्षा जिला मुख्यालय गुमला से उत्तीर्ण की। 1942 में ही आगे की पढ़ाई केलिये पटना आ गये। पटना में गाँधीजी के आव्हान भारत छोड़ो आँदोलन का बहुत जोर था। सभाएँ और प्रभात फेरियाँ निकल रहीं थीं। वे इन प्रभात फेरियों में स्वयं भी शामिल होते और अपने साथी युवाओं को भी प्रोत्साहित करते। उन्होंने पटना के साइंस कॉलेज से इंटरमीडिएट और बिहार इंजीनियरिंग कॉलेज से इंजीनियरिंग में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। इंजिनियरिंग की स्नातक डिग्री लेकर भी उन्होंने इंजीनियरिंग में अपनी पढ़ाई जारी रखी। वे इंजीनियरिंग का संपूर्ण स्वरूप समझना चाहते थे। इसलिये उन्होंने इंजीनियरिंग के विभिन्न विषयों में ही अपनी पढ़ाई की और नौ डिग्रियाँ प्राप्त कीं। इनमें से कुछ डिग्रियाँ भारत में और कुछ अमेरिका जाकर भी पढ़े। इंजीनियरिंग की इतनी डिग्रियाँ लेने के बाद वे लंदन चले गये। लंदन जाकर वकालत डिग्री प्राप्त की। इंजिनियरिंग की नौ डिग्रियों के साथ वकालत पास करने वाले वे आदिवासी समाज में ही नहीं पूरे भारत में भी पहले व्यक्ति थे। पढ़ाई पूरी करके भारत लौटे और बिहार के सिंचाई विभाग में सहायक अभियंता बन गये। विदेश में रहकर इतनी डिग्रियाँ लेने के बाद भी वे अपने निजी जीवन में अपनी मातृभाषा उरांव सादरी और कुरुख का ही उपयोग करते थे। वे अक्सर अपने गाँव जाते और समाज का पिछड़ापन, मिशनरीज द्वारा आदिवासी संस्कृति समाप्त करने का अभियान उन्हें विचलित करता था। उनका मन न गाँव में लगता था न नौकरी में। वे वापस लंदन चले गये। वहाँ उन्होंने कई संस्थानों में काम किया। ब्रिटिश रेलवे और ब्रिटिश ट्रांसपोर्ट कमीशन से जुड़कर विश्व के सबसे बड़े हिंकले प्वाइंट एटॉमिक पावर स्टेशन का डिजाइन उन्होंने ही तैयार किया था। इसकी चर्चा पूरे विश्व में हुई। प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के आग्रह वे भारत लौट आए। यहाँ आकर हेवी इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन में डिप्टी चीफ इंजीनियर एवं चीफ स्ट्रक्चरल डिजाइन ऑफिस एंड स्ट्रक्चरल फैब्रिकेशन वर्कशॉप बने।

अपनी इस उच्च स्तरीय नौकरी के साथ उन्होंने समाज जागरण अभियान आरंभ किया। इसके लिये अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद नामक संगठन की स्थापना की थी। यह संगठन गैर राजनीतिक था और इसका उद्देश्य केवल सामाजिक एवं सांस्कृतिक जागरण था। नेहरुजी के आग्रह पर ही वे राजनीति में आये। 1962 में काँग्रेस प्रत्याशी के रूप में बिहार के लोहरदगा क्षेत्र से पहला लोकसभा चुनाव लड़ा लेकिन इस चुनाव में जीत न सके। लेकिन 1967 में इसी क्षेत्र से लोकसभा में पहुँचे।

पूरे देश में तीन सूत्रीय अभियान चलाया

उन्होंने देशभर की यात्रा की और आदिवासी समाज को जागरूक करने का अभियान चलाया। उनके अभियान के तीन प्रमुख विन्दु थे। एक तो सभी आदिवासी समाज अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं का पालन करे, दूसरा यह कि सभी आधिवासी समाज हिन्दू हैं और तीसरा कि जिन आदिवासियों ने मतान्तरण कर लिया है उन्हें आदिवासियों के लिये निर्धारित आरक्षण एवं अन्य सुविधाओं से दूर रखा जाये।
कार्तिक उरांव जी ने अपनी सभाओं और लेखन जनजातीय समाज को यह समझाया कि ईसा से हजारों वर्ष पहले भी आदिवासी समाज रहा है। इसी समुदाय में निषादराज गुह, माता शबरी, कण्णप्पा आदि हो चुके हैं, इसलिए आदिवासी सदैव हिंदू थे और हिंदू रहेंगे। अपनी बात को प्रमाणित करने केलिये उन्होंने देश के विभिन्न भागों में आदिवासियों का पहनावा, मान्यताएँ, लोक जीवन की कथाएँ, भी आदिवासियों को हिन्दु प्रमाणित करते हैं। वे आराधना के प्रतीकों का उदाहरण देकर समझाया करते कि आदिवासी अपने समुदायों में जन्म तथा विवाह जैसे अवसरों पर गाए जाने वाले मंगल गीतों में जसोदा मैया द्वारा श्रीकृष्ण को झूला झुलाना, सीता मैया का पुष्प वाटिका में रामजी को निहारना जैसे प्रसंग आते हैं जो आदिवासियों को हिन्दू होना ही प्रमाणित करते हैं। उन्हें ‘पंखराज साहेब’ की संज्ञा दी गई। और आदिवासी समाज का “काला हीरा” कहा गया। वे तीन बार सांसद और भारत सरकार में मंत्री भी रहे। एक विधायक भी रहे।

मतान्तरण करने वालों को आरक्षण का लाभ देने का अभियान चलाया

वे अधिकारी रहे हों अथवा राजनीति में। उनका मिशनरीज के साथ वैचारिक संघर्ष सदैव रहा। उन्हें लगता था कि मिशनरीज जनजातीय समाज को भ्रमित करके आदिवासी संस्कृति मिटा रहीं हैं। कार्तिक उरांवजी का प्रत्येक पल जनजातीय संस्कृति और परंपराओं की पुनर्प्रतिष्ठा केलिये समर्पित रहा है। वे मतान्तरण कर लेने के बाद भी आरक्षण का लाभ लेने के विरुद्ध थे। उरांव जी का मानना था कि मिशनरीज सरकारी तंत्र से मिलकर आरक्षण और शासकीय योजनाओं का पूरा लाभ इन्हीं मतांतरित लोगों को दिला देतीं हैं जिससे जनजातीय समाज के समान्यजन वंचित ही रह जाते हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि आरक्षण और सरकारी योजनाओं का लाभ समाज के उन्ही वंचित बंधुओं को मिलना चाहिए जो आदिवासी परंपरा और संस्कृति से जुड़े हैं। जिन्होंने दूसरा धर्म अपना लिया है उन्हे इन सुविधाओं से दूर रखा जाना चाहिए। उन्होंने धर्मान्तरित व्यक्तियों द्वारा आरक्षण का लाभ लेने को जनजातीय समाज के साथ धोखा बताया। उन्होंने सरकार से भी अपेक्षा की कि कानून में संशोधन करके धर्मान्तरण करने वालों को आरक्षण एवं अन्य लाभ से दूर किया जाय। उन्होंने अपनी यह बात सभाओं में कही, आलेख भी लिखे और संसद में भी उठाई।
इसके लिये उन्होंने 1967 में अनुसूचित जाति/जनजाति आदेश संशोधन विधेयक प्रस्तुत किया। इस पर विचार केलिये संसद की एक संयुक्त समिति बनी और इस समिति ने 17 नवंबर 1969 को अपनी सिफारिशें भी प्रस्तुत कर दीं। उनमें प्रमुख सिफारिश यही थी कि यदि कोई व्यक्ति जनजातीय मत तथा विश्वासों का परित्याग करके ईसाई अथवा इस्लाम धर्म अपना लेता है तो वह अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं समझा जाएगा। इस समिति ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अधिनियम में ऐसा संशोधन करने की सिफारिश कर दी। लेकिन फिर भी इस संशोधन विधेयक पर संसद में चर्चा टलती रही। एक लंबी प्रतीक्षा के बाद कार्तिक उरांव जी ने इन सिफारिशों पर लोकसभा में चर्चा केलिये हस्ताक्षर अभियान चलाया। उन्हें अनेक सांसदों का समर्थन मिला। उरांव जी ने 10 नवंबर 1970 को 322 लोकसभा सदस्य और 26 राज्यसभा सदस्यों के हस्ताक्षरों से युक्त एक ज्ञापन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को सौंपा और आग्रह किया कि समिति की सिफारिशों के अनुरूप संशोधन विधेयक पर चर्चा हो। 16 नवंबर 1970 को इस संशोधन विधेयक पर लोकसभा में चर्चा आरंभ हुई। लेकिन अगले ही दिन 17 नवंबर को सरकार की ओर से संयुक्त समिति की सिफारिशें विधेयक से हटाने केलिये एक संशोधन प्रस्तुत किया। 24 नवंबर 1970 को कार्तिक उरांव जी ने इस संशोधन विधेयक पर अपना पक्ष रखा। उनके तर्कों और तथ्यों से पूरा सदन प्रभावित हुआ।
किन्तु प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने इस संशोधन विधेयक पर सत्र के अंतिम चर्चा करने को कहा और चर्चा टल गई। लेकिन संसद के अंतिम दिन चर्चा न हो सकी और लोकसभा भंग हो गई। इसके साथ वह संशोधन विधेयक इतिहास का अंग बन गया।

जीवन की अंतिम श्वाँस तक सांस्कृतिक जागरण अभियान

उरांव जी ने यह कभी परवाह नहीं की कि उनके अभियान से कौन नाराज हो रहा है। काँग्रेस सांसद रहते हुये उन्होंने अधिनियम संशोधित करने का अभियान चलाया। यह माना जाता है कि मिशनरीज के दबाव में ही इंदिराजी ने वह चर्चा टाली थी। संसद में संशोधन न करा पाने की पीड़ा उन्हें जीवन भर रही। इसे कार्तिक जी ने एक पुस्तक लिखकर व्यक्त की। “बीस वर्ष की काली रात” नामक इस पुस्तक में मिशनरीज द्वारा आदिवासियों का धर्मांतरण करने का तरीका और आदिवासियों द्वारा अपने भोलेपन के कारण प्रभावित होने को उजागर किया ताकि आदिवासी समाज सावधान रहे। उन्होंने यह भी लिखा कि अंग्रेजी शासनकाल के 150 वर्षों में आदिवासियों का इतना धर्म परिवर्तन नहीं हुआ, जितना आजादी के बाद हुआ। वे सच्चे समाज सेवी, संस्कृति रक्षक उद्भट विद्वान और प्रखर प्रवक्ता थे। संसद में जब भी बोलते थे तो सब उनकी बाते ध्यान से सुनते थे। ‘द हिंदू’ जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्र ने उन्हें ‘बाघ’ की संज्ञा दी थी, लिखा था- ‘एक आदिवासी, जो संसद में बाघ की तरह दहाड़ता है”।
उनका पूरा जीवन राष्ट्रगौरव और सांस्कृतिक प्रतिष्ठा के पुनर्जागरण में बीता। सतत सक्रियता के बीच 8 दिसंबर 1981 को उन्हें संसद भवन में ही दिल का दौरा पड़ा और उन्होंने संसार से विदा ले ली। तब वे भारत सरकार में उड्डयन और संचार मंत्री थे।
उनके बाद उनकी पत्नी श्रीमती सुमति उरांव भी सांसद बनीं और फिर बेटी गीताश्री उरांव भी विधायक और झारखंड की शिक्षा मंत्री भी बनीं लेकिन कार्तिक उरांव जी के साँस्कृतिक जागरण अभियान उतनी गति न ले सके जो उनके समय रहे।

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